नयी दिल्ली, 23 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक याचिकाकर्ता को समाचार रिपोर्ट पढ़कर मुकदमा दायर करने के प्रति आगाह किया और उसे याचिका दायर करने से पहले पूरी तैयारी करने को कहा।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और उनके सहयोगी संस्थानों के लिए बाहरी भर्ती कंपनियों या एजेंटों के नियमन के अनुरोध वाली एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
याचिका में केनरा बैंक के प्रबंधन नियंत्रण वाली सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनी कैन फिन होम्स लिमिटेड (सीएफएचएल) में भर्ती में कथित गड़बड़ियों की सेबी (केंद्रीय प्रतिभूति नियामक बोर्ड) या सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) से स्वतंत्र जांच कराने का भी अनुरेध किया गया था।
पीठ ने याचिका को ‘‘अधूरा’’ करार दिया। इसने पाया कि एक नए समाचार पोर्टल ने बताया था कि एक ‘व्हिसलब्लोअर’ ने बैंक से ‘‘भर्ती में गंभीर गड़बड़ियों’’ की शिकायत की थी। इस मामले में जांच की गई लेकिन कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला और मामला बंद कर दिया गया।
न्यायाधीश ने समाचार पत्रों की रिपोर्ट के साक्ष्य मूल्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि अदालत किसी समाचार रिपोर्ट का तब तक संज्ञान नहीं ले सकती जब तक कि उसकी पुष्टि न हो जाए।
अदालत ने याचिकाकर्ता से पूछा, ‘‘अखबार की रिपोर्ट का साक्ष्य मूल्य क्या है? अपने स्तर पर छानबीन कीजिए। इस तरह की याचिकाएं किसी न किसी रिपोर्ट को लेकर दायर की जाती हैं। अखबार पढ़ने के बाद आपके मन में क्या विचार आते हैं?’’
इसने पूछा कि अगर कोई अपराध हुआ था तो उसने सेबी या भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से संपर्क क्यों नहीं किया।
न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता को जनहित याचिका कानून को ‘‘इतने हल्के में’’ नहीं लेने का सुझाव दिया।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘आपको अपना काम खुद करना होगा। अखबार पढ़कर जनहित याचिका दायर मत कीजिए।’’
भाषा सुरभि नेत्रपाल
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