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ऑल वेदर चौड़ी सड़कों और टूटी पहाड़ी ढलानों के बीच पहाड़ हमें चेतावनी दे रहे हैं-अब ठहर जाओ।**

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“जब एक घंटे में एक महीने जितनी बारिश हो जाए, इलाके जलमग्न नहीं होते, वो ग़ायब हो जाते हैं।”

इस बार मानसून में पहाड़ों पर सिर्फ बारिश नहीं हुई, आसमान जैसे फट पड़ा हो। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में कुछ ही घंटों की मूसलाधार बारिश ने घाटियों को उजाड़ दिया, पुल ढहा दिए और पूरे-पूरे ज़िले को ठप कर दिया। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में 14 अगस्त 2025 को अचानक आई भीषण बारिश ने तीर्थयात्रियों और ग्रामीणों को बहा दिया; अधिकारियों ने कम से कम 60 लोगों की मौत, 100 से अधिक घायल और करीब 200 लापता होने की पुष्टि की। हिमाचल में 16-17 अगस्त तक 300 से अधिक सड़कें बंद रहीं, बिजली और पानी की आपूर्ति ठप हो गई और नुकसान ₹2,000 करोड़ से अधिक आँका गया। 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली गाँव में आई बाढ़ ने दर्जनों लोगों को लापता कर दिया और एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया: क्या हम अपने ही विकास से आपदाओं को न्योता दे रहे हैं?

क्लाउडबर्स्ट आखिर है क्या?

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) इसे इस तरह परिभाषित करता है: एक घंटे में लगभग 100 मिमी या उससे अधिक बारिश किसी छोटे से क्षेत्र (20–30 वर्ग किलोमीटर) में होना। यह घटना बेहद दुर्लभ और स्थानीय होती है, लेकिन इतनी ताक़तवर कि पहाड़ों को पिघलाकर पत्थर और मलबे की नदियाँ बहा सकती है।
ख़तरा प्राकृतिक है, लेकिन तबाही इंसानी है। जो चीज़ इन अचानक बारिशों को हर साल और ज़्यादा घातक बनाती है, वह है हमारा अनियंत्रित निर्माण, हाईवे-टनल-डैम परियोजनाएँ और नाज़ुक भू-भाग पर कब्ज़ा, अक्सर उन्हीं नियमों को तोड़कर जिन्हें हमने ख़ुद बनाया था।

आँकड़े जिनसे नज़र नहीं हटाई जा सकती

हिमाचल प्रदेश में 16 अगस्त तक प्रशासन ने बताया कि 313 सड़कें बंद, 348 ट्रांसफ़ॉर्मर और 119 जल योजनाएँ प्रभावित, 136 मौतें और 37 लापता और कुल नुकसान ₹2,144 करोड़ से ज़्यादा का हुआ। पूरे मानसून सीज़न का आंकड़ा देखें तो मौतें 250 से ऊपर जा चुकी हैं।
जम्मू-कश्मीर में किश्तवाड़ की त्रासदी सबसे गंभीर रही। 15 अगस्त तक सरकार ने 60 से अधिक शव मिलने और करीब 200 लोगों के लापता होने की पुष्टि की।
उत्तराखंड के उत्तरकाशी (धराली) में 5 अगस्त को आई बाढ़ ने दर्जनों घर बहा दिए और कई ज़िंदगियाँ ले लीं। यहाँ बहस फिर वही है – क्या पहाड़ों में इंसानी दख़ल ही असली खतरा है?

हमने हालात और बदतर कैसे किए

1) चौड़ी सड़कें और खतरनाक ढलान कटाई
उत्तराखंड की चारधाम सड़क परियोजना इसका प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति (HPC) ने 5.5 मीटर चौड़ी सड़क (2018 के मानक) की सिफारिश की थी और क्यूम्युलेटिव असर (सामूहिक प्रभाव) का आकलन ज़रूरी बताया था। लेकिन राजनीतिक दबाव में कई हिस्सों में ज़्यादा चौड़ी सड़कें बनीं। हर अतिरिक्त मीटर की कटाई पहाड़ों को और अस्थिर बना देता है और मलबा नदियों को रोककर अचानक बाढ़ का कारण बनता है।

2) सुरंगें और जलविद्युत परियोजनाएँ
खनन सुरंगें (adits), मनमाना मलबा फेंकना (muck dumping), और भूमिगत जल निकासी प्रणाली में बदलाव, ढलानों के ढहने के तरीके को बदल देते हैं। परियोजना-दर-परियोजना किए गए पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), कैचमेंट-स्तर के मॉडलिंग के बिना, यह समझने में विफल रहते हैं कि किस तरह एक ही घाटी में कई हस्तक्षेप मिलकर बादल फटने जैसी बारिश के दौरान सामूहिक विफलता का कारण बन सकते हैं। राष्ट्रीय दिशा-निर्देश लंबे समय से जोखिम-आधारित स्थल चयन और संचयी आकलन पर ज़ोर देते रहे हैं, लेकिन इनका पालन टुकड़ों में ही होता है।

3) बाढ़ मैदानों और मलबा-प्रवाह पंखों पर रियल एस्टेट
कुल्लू से उत्तरकाशी और सोनमर्ग तक, निर्माण कार्य प्रवाही पंखों (alluvial fans) और संकरी बाढ़-धाराओं पर फैल चुका है। इसमें अक्सर नदी-तल खनन और क्षतिग्रस्त तटवर्ती बफ़र्स ने मदद की है। जब कोई खड़ी जलग्रहण क्षेत्र ढहता है, तो ठीक इन्हीं सतहों पर चट्टानों और लकड़ियों का मलबा फिर से फैलकर काबिज़ हो जाता है। धराली की घटना पर की गई रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशकों से ज्ञात मलबा-प्रवाह मार्गों पर लगातार निर्माण होता रहा है।

4) जलवायु परिवर्तन बड़ा फैक्टर
गर्म हवा अधिक नमी अपने में समेटती है; जब मानसूनी लहरें और पश्चिमी विक्षोभ खड़ी स्थलाकृति से टकराते हैं, तो अत्यधिक और अल्पकालिक वर्षा तेजी से बढ़ जाती है। पश्चिमी हिमालय के लिए की गई कई पीयर-रिव्यू समीक्षाएँ यह दर्शाती हैं कि ऐसी चरम घटनाओं का बढ़ता जोखिम सीधे–सीधे मौजूदा ऊष्मीकरण और वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव से जुड़ा है।
सभी बादल फटने की घटनाओं में रुझान देखने की ज़रूरत नहीं है; तर्क सीधा है।

सुनों छात्रों, विदेश में पढ़ने का सपना ना देखें…क्योंकि राजस्थान सरकार ऐसा नहीं चाहती है!

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– दो बातों से साफ है कि वर्तमान भाजपा सरकार नहीं चाहती है कि कम या मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे विदेश में पढ़ाई करे – 1.देश के संस्थानों के लिए पिछले साल 143 सीटें खाली थी जिसके बाद भी सरकार ने इस बार देश के संस्थानों के लिए सीटें 200 से बढ़ाकर 350 कर दी. 2. वहीं E-2 कैटेगरी (सालाना आय ₹8 लाख से ₹25 लाख) वाले अब देश के संस्थानों में भी अप्लाई कर सकते हैं…इससे पहले इस कैटेगरी वाले केवल विदेश के लिए ही पात्र थे. राजस्थान के छात्रों के लिए देश-विदेश की यूनिवर्सिटीज में पढ़ने के सपने को कैसे किश्तों में तोड़ा गया है इसका साक्षात उदाहरण ‘स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप योजना’ है जिसे पहले राजीव गांधी स्कॉलरशिप फॉर एकेडमिक एक्सीलेंस कहा जाता था. ऐसे में खुद स्वामी विवेकानंद अगर आज होते तो क्या सोचते, सोचिए जरा? अब सरकार ने स्कॉलरशिप-2025 के लिए आवेदन मांगे गए हैं लेकिन योजना में कई बदलाव किए गए हैं. अब स्कॉलरशिप में यूनिवर्सिटी की संख्या भी 150 से कम करके 50 कर दी गई है. कई महीनों से छात्र संबंधित विभाग के चक्कर लगा रहे थे कि नोटिफिकेशन जारी हो लेकिन हुआ तो ये जिसका उनको अंदाजा तक नहीं था. इस बार कुल 500 सीटों पर आवेदन मांगे गए हैं जिनमें से 150 सीटें विदेश के संस्थानों के लिए और 350 सीटें भारत के संस्थानों के लिए हैं. इससे पहले सरकार ने विदेशी संस्थानों के लिए 300 सीट की थी और देश के संस्थानों के लिए 200 सीटें रखी थीं. वहीं 2024-25 की बात करें तो कुल 500 स्कॉलरशिप दी गई थी जहां 365 छात्रों के चयन में से 308 विदेश और 57 देश में पढ़ाई के लिए गए थे और 143 सीटें देश में खाली थीं जिन्हें दोबारा खोलने की अनुमति दी गई. अब देश वाली सीटें खाली क्यों रही इसकी वजह है लेटलतीफी, संस्थानों में एडमिशन का समय आ गया इधर नोटिफिकेशन ही जारी नहीं हुआ. कितने ही छात्र हैं जिनका साल तक खराब हो गया. जिन देश की सीटों में 143 खाली थी उसी सेक्शन में सरकार ने अब इस बार 350 सीटें रखी है और विदेश वाली सीधी आधी कर दी गई है. वहीं इस बार की गाइडलाइन में बताया गया है कि अब E-2 कैटेगरी (वार्षिक आय ₹8 लाख से ₹25 लाख) वाले देश के संस्थानों में भी अप्लाई कर सकते हैं. इससे पहले इस कैटेगरी वाले केवल विदेश के लिए ही पात्र थे. डिप्टी सीएम बैरवा का विधानसभा में दिया एक भाषण है जिसमें उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के विकसित भारत 2047 के संकल्प को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार विकसित राजस्थान की दिशा में काम कर रही है जिसमें उच्च शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी…लेकिन दूसरी ओर सरकार ने उच्च शिक्षा लेने जाने वाले बच्चों की सीटों में हर साल कटौती की है. 25 लाख से ऊपर वालों पर चुप्पी! इस साल अप्रैल में सिरोही की 20 वर्षीय छात्रा मनजीत देवड़ा ने हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी जिस पप कोर्ट ने कहा था कि इस योजना का लाभ सम्पन्न विद्यार्थी ले रहे हैं और गरीब प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को सहयोग देने का मूल उद्देश्य गौण हो गया है. इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने कहा था कि करदाताओं की गाढ़ी कमाई लुटाने के इस मामले पर कोर्ट आंख नहीं मूंद सकता और सरकार से यह भी पूछा कि क्यों न इस योजना और उसके दुरुपयोग पर रोक लगाने का आदेश दिया जाए? कोर्ट ने 25 लाख रुपए से अधिक आय वालों को योजना का लाभ देने पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से लाभार्थियों का ब्यौरा मांगा था. हालांकि बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने एकलपीठ के 29 अप्रैल को दिए इस आदेश पर खंडपीठ ने रोक लगा दी थी जिसके तहत एकलपीठ ने स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप स्कीम के तहत 25 लाख रुपए सालाना आय वाले परिवार के अभ्यर्थी को ई3 वर्ग में दी जा ही छात्रवृत्ति पर रोक लगाई थी. वहीं अब वर्तमान नोटिफिकेशन में भी ई-3 कैटेगरी में सालाना आय 25 लाख या उससे ऊपर का प्रावधान रखा गया है और इसमें सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया है.

बीजेपी हो या कांग्रेस, एंट्री भी गहलोत ही तय करेंगे और एग्जिट भी!

राजकुमार की फिल्म है- सौदागर. इस मूवी का फेमस डायलॉग याद आता है- “जानी, हम तुम्हें मारेंगे, जरूर मारेंगे. पर बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी और वह वक्त भी हमारा होगा.” चलिए, इस डायलॉग को थोड़ा बदल देते हैं- “जानी, हम तुम्हें मात देंगे, जरूर देंगे. व्यक्ति भी हमारा होगा और तरीका भी. और वह वक्त भी हमारा होगा.” यही राजस्थान में अशोक गहलोत की राजनीति का स्टाइल है. उनकी राजनीति देखे तो उनके साथ खिलाफ गुटबाजी करने वाले नेता भी कभी उनके साथ खड़े दिखे और उनके साथ खड़े रहने वाले नेता उनके खिलाफ. चाहे वह राजेश पायलट हो, परसराम मदेरणा, शीशराम ओला, डॉ. सीपी जोशी हो, बीडी कल्ला या सचिन पायलट. गहलोत ने कई दिग्गजों को राजनीति में शिकस्त दी और सियासत में ‘जादूगर’ का खिताब हासिल किया. बीते दिनों अमीन खान की कांग्रेस पार्टी में वापसी में पूर्व सीएम अशोक गहलोत की अहम भूमिका रही है. पार्टी से सवा साल तक निष्कासित रहें अमीन खान पर लोकसभा चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप था. कई बार विवादों में रहने वाले और पूर्व मंत्री अमीन खान को गहलोत ने पार्टी में वापस लाने के लिए खास पहल की. वे काफी वक्त से इसके लिए कोशिश कर रहे थे, लेकिन कई तरह के रोड़े आए और इसमें देरी भी हुई. रेगिस्तान की राजनीति में अहम दखल रखने वाले अमीन खान गहलोत खेमे के एक मजबूत खिलाड़ी रहे हैं. वो खिलाड़ी, जिनके बूते गहलोत ने हरीश चौधरी को मौके दर मौके पछाड़ने की कोशिश की. हालांकि हरीश चौधरी हाईकमान की नजदीकियों के चलते पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी पाते चले गए तो गहलोत की चिंताएं भी बढ़ती चली गईं. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, गहलोत खेमे के होने के कारण अमीन खान की वापसी संभव हुई है. इससे गहलोत की पार्टी में पकड़ भी मजबूत हुई है. हरीश चौधरी की काट के लिए अमीन खान को लाए? अमीन खान की वापसी से कांग्रेस में कुछ गुटबाजी के संकेत भी मिले हैं, लेकिन गहलोत ने अपने प्रभाव से उन्हें पार्टी में फिर से शामिल करवाया है, ताकि पश्चिम राजस्थान में हरीश चौधरी के खिलाफ उनके समीकरण मजबूत हो सके. जैसेलमेर और बाड़मेर में मेवाराम जैन, सालेह मोहम्मद और अमीन खान की राजनीति के जरिए गहलोत ने हमेशा पकड़ बनाए रखी. बायतू विधायक हरीश चौधरी मारवाड़ में कांग्रेस की अहम धुरी बनने की लगातार कोशिश में हैं और इस मौके पर वो गहलोत से सीधे टकरा जाते हैं. यही वजह है कि गहलोत ने कांग्रेस के कई नेताओं को हरीश चौधरी के खिलाफ खड़ा किया और गुट को मजबूत किया. बात सिर्फ अमीन खान की नहीं है, बल्कि ऐसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है जो उनके मनमुताबिक पार्टी में मजबूत हुए, फिर बाहर भी हुए और बीजेपी ज्वॉइन कर खामोश भी हो गए. साइडलाइन होने के बावजूद भी ऐसे नेता बीजेपी में जाने के बाद पार्टी में बने हुए हैं. राजनीतिक एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ‘जादूगर’ अपने करीबियों को ऐसे ही मोहरा बनाते हैं और फिर जब चुनाव आते हैं या सरकार की वापसी होती है तो उन्हें वापस ले आते हैं. साल 2018 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान में 13 बागी जीतकर आए थे, जिन्होंने सचिन पायलट के सीएम बनने के मंसूबों पर पानी फेरा. तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष पायलट ने जब इन गहलोत के करीबियों के टिकट काटे तो ये पार्टी से बागी हो गए और निर्दलीय पर्चा भरा. 99 पर अटकी कांग्रेस के लिए गहलोत ने इन्हीं निर्दलीयों के सहारे बिसात बिछाई और कांग्रेस हाईकमान को ताकत भी दिखाई. नतीजा यह रहा कि गहलोत की तीसरी बार ताजपोशी हुई और संयम लोढा, रामकेश मीणा जैसे कांग्रेस के बागी सरकार में सलाहकार तक पहुंचे और दूदू विधायक बाबूलाल नागर, महादेव खंडेला, ओमप्रकाश हुड़ला समेत कई निर्दलीय भी पार्टी के समर्थन में दिखे. वो नेता, जो कभी गहलोत के करीबी थे और आज बीजेपी में हैं- ⦁लालचंद कटारिया – लालचंद कटारिया जयपुर ग्रामीण से पूर्व सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे. राजस्थान में जाट वोटबैंक पर उनकी अच्छी पकड़ थी. मार्च 2024 में बीजेपी में आए. लालचंद कटारिया के साथ उनके दामाद और डेगाना से पूर्व विधायक विजयपाल मिर्धा, उनके समधी पूर्व कांग्रेस विधायक रिछपाल मिर्धा ने भी बीजेपी ज्वॉइन की. दोनों ही समधियों को बीजेपी ने अभी तक ना तो संगठन में कोई जिम्मेदारी दी और ना ही सरकार में हिस्सेदारी. ⦁महेंद्रजीत सिंह मालवीया- वागड़ में कांग्रेस की मजबूत धुरी रहे. आदिवासी अंचल में मजबूत पकड़. गहलोत की सरकार में जल संसाधन जैसे भारी-भरकर विभाग संभाला. बीजेपी के पूर्व जिला अध्यक्ष लालचंद पटेल ने इनके खिलाफ करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत की सरकार पर सवाल खड़े हो गए. फिर लाभचंद पटेल ने ही

अब लेटलतीफ सरकार ने आवेदन भी मांगे तो छात्रवृत्ति में उच्च आय वर्ग के बच्चों को भी शामिल कर लिया?

‘स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप योजना’ के आवेदन लंबे समय के बाद 21 अगस्त से शुरू कर दिए हैं. भले ही सरकार आवेदन ले रही है, लेकिन यह सीधे तौर पर गरीब बच्चों के साथ कुठाराघात भी है. क्योंकि अल्प आय वर्ग के लिए जब यह योजना लाई गई थी तो इसमें संशोधन क्यों किया गया? क्या सरकार नहीं चाहती है कि गरीब परिवारों के बच्चे यूरोप-अमेरिका समेत विश्व के प्रतिष्ठित संस्थानों में उच्च शिक्षा ले? सरकार ने स्कॉलरशिप के लिए आवेदन तो मांग लिए, अब यूनिवर्सिटी की संख्या भी 150 से कम करके 50 कर दी गई है. कई महीनों से छात्र संबंधित विभाग के चक्कर लगा रहे थे कि नोटिफिकेशन जारी हो, लेकिन जब हुआ तो कई शर्तों के साथ. शर्तें भी ऐसी कि यह योजना नहीं, बल्कि मेधावी छात्रों के लिए परेशानी बन जाए. उच्च शिक्षा विभाग ने साल 2025-26 के गाइडलाइन जारी की है. इस योजना में E-2 कैटेगरी (सालाना आय ₹8 लाख से ₹25 लाख) जोड़ी है. इस कैटेगरी के परिवार के बच्चे भी अब देश के संस्थान के लिए अप्लाई कर सकते हैं. इससे पहले इस कैटेगरी वाले केवल विदेश के लिए ही पात्र थे. अब सवाल यह है कि जब यह योजना गरीब बच्चों के लिए हैं तो देश के संस्थान में योग्यता के लिए आय सीमा को बढ़ाकर गरीब बच्चों के लिए मुकाबला कड़ा क्यों किया जा रहा है? साथ ही नए नियमों के मुताबिक, विदेश में 150 और देश में 350 सीटों पर छात्रवृत्ति मिलेगी. पहले नए सत्र के लिए गाइडलाइन जान लीजिए ⦁प्रथम चरण के लिए आवेदन की सीमा 21 अगस्त से 20 सितंबर 2025 ⦁इस बार कुल 500 सीटों पर आवेदन लिए जाएंगे. ⦁150 सीटें विदेश के संस्थानों में अध्ययन के लिए. ⦁350 सीटें भारत के प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई के लिए. ⦁30% सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित. ⦁पिछले वर्षों की तुलना में इस बार विदेश की सीटों में कटौती की गई है. राजस्थान में नौकरी की अनिवार्यता क्यों? मामला सिर्फ यही तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़ाई पूरी करने के बाद इन स्टूडेंट्स को राजस्थान में नौकरी करना जरूरी होगा. देश के किसी कोने या विदेश में पढ़ने के बाद छात्र क्यों राजस्थान में ही नौकरी करें? क्या विदेश में उसे करियर का अच्छे करियर का अवसर मिल रहा है तो सरकार की यह गाइडलाइन उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं? पिछले साल के मुकाबले ये बदलाव साल 2024-25 की बात करें तो कुल 500 स्कॉलरशिप दी गई थी, जहां 365 छात्रों के चयन में से 308 विदेश और 57 देश में पढ़ाई के लिए गए थे. हालांकि 143 सीटें देश में खाली थीं, जिन्हें दोबारा खोलने की अनुमति दी गई. इस बार कुल 500 सीटों पर आवेदन मांगे गए हैं, जिनमें से 150 सीटें विदेश के संस्थानों के लिए और 350 सीटें भारत के संस्थानों के लिए हैं. क्या ऐसे पूरा होगा पीएम मोदी केविकसित भारत-2047′ के संकल्प? इस मौके पर उच्च शिक्षा विभाग की कमान संभाल रहे डिप्टी सीएम डॉ. प्रेमचंद बैरवा का विधानसभा में दिया एक भाषण याद किया जाना चाहिए है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पीएम मोदी के ‘विकसित भारत-2047’ के संकल्प को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार विकसित राजस्थान की दिशा में काम कर रही है, जिसमें उच्च शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी. सरकार अब इस संकल्प को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में छात्रवृत्ति लेने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं की सीटों में हर साल कटौती क्यों कर रही है? हाईकोर्ट की टिप्पणी भी नजरंदाज कर गई सरकार? इस साल अप्रैल में सिरोही की 20 वर्षीय छात्रा मनजीत देवड़ा ने हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी. याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि इस योजना का लाभ सम्पन्न विद्यार्थी ले रहे हैं और गरीब प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को सहयोग देने का मूल उद्देश्य गौण हो गया है. हाईकोर्ट ने कहा था कि करदाताओं की गाढ़ी कमाई लुटाने के इस मामले पर कोर्ट आंख नहीं मूंद सकता. साथ ही सरकार से यह भी पूछा कि क्यों न इस योजना और उसके दुरुपयोग पर रोक लगाने का आदेश दिया जाए? कोर्ट ने 25 लाख रुपए से अधिक आय वालों को योजना का लाभ देने पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से लाभार्थियों का ब्यौरा मांगा भी था. हालांकि बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने एकलपीठ के 29 अप्रैल को दिए इस आदेश पर खंडपीठ ने रोक लगा दी थी, जिसके तहत एकलपीठ ने स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप स्कीम के तहत 25 लाख रुपए सालाना आय वाले परिवार के अभ्यर्थी को ई3 वर्ग में दी जा ही छात्रवृत्ति पर रोक लगाई थी. वहीं अब वर्तमान नोटिफिकेशन में भी ई-3 कैटेगरी में सालाना आय 25 लाख या उससे ऊपर का प्रावधान रखा गया है और इसमें सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया है.

28 अगस्त, 2025….राजस्थान के इतिहास में काला दिन- कोर्ट ने कहा “जब घर का भेदी लंका ढाए”, तो फिर RPSC को कौन बचाए?

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जब राजस्थान लोक सेवा आयोग पर ही सवालिया निशान है तो उसके द्वारा कराई गई भर्ती का क्या? RPSC को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी इस संस्था की कार्यशैली नहीं, बल्कि इसके अस्तित्व पर सीधा सवाल खड़ा करती है. साथ ही संस्था से जुड़े रहे सदस्य रामूराम राईका, बाबूलाल कटारा के साथ RPSC के तत्कालीन अध्यक्ष संजय श्रोत्रिय और आरपीएससी के अन्य सदस्य मंजू शर्मा, संगीता आर्य और पूर्व अध्यक्ष जसवंत राठी भी सवालों के घेरे में हैं. यह मामला सिर्फ 6 सदस्यों का नहीं है, कोर्ट ने सीधे तौर पर RPSC के पूरे ढांचे को कटघरे में खड़ा किया है. न्यायालय ने कहा कि आरपीएससी की ओर से हर स्तर पर पेपर कराने में चूक हुई. हाईकोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के बाद अब सवाल यह है कि क्या इस संस्था के पुर्नगठन पर बात नहीं होनी चाहिए, जिसे कांग्रेस के राज में बीजेपी ने उठाया और बीजेपी के सत्तासीन होने के बाद कांग्रेस के हलकों में आवाजें सुनाई दीं.  कोर्ट की ये लाइनें, RPSC के काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई “अदालत ने साफ कहा है कि आयोग का पूरा ढांचा एक फार्स यानी ढकोसला साबित हुआ है. आयोग का संवैधानिक कर्तव्य था कि राज्य में भर्ती प्रक्रियाओं को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए, लेकिन इसके सदस्य ही लीक और भ्रष्टाचार के खेल में शामिल पाए गए. अदालत ने कहा कि जब शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ही अपनी शपथ और कर्तव्यों से छल करेगा, तो यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर चोट है.” अब समझिए पूरी साजिश की कहानी, जो युवाओं के भविष्य के पहरेदारों ने ही रची सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2021 के दौरान पेपर लीक की साजिश आयोग के ही सदस्यों बाबूलाल कटारा और रामुराम राईका ने मिलकर रची, वो भी उस समय जब प्रश्नपत्र छपाई प्रेस तक नहीं पहुंचे थे. आरोप पत्र के मुताबिक, कई अन्य सदस्यों मंजू शर्मा, संगीता आर्या और जसवंत राठी की संलिप्तता भी दर्ज हुई है. इन सबकी जानकारी आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष संजय श्रोतिया को भी थी, जिन्होंने अपने बेटे-बेटी के इंटरव्यू तक प्रभावित किए और पैनल का हिस्सा बने.   न्यायालय ने खुद कहा- मेहनतकश परीक्षार्थी हार गया हाईकोर्ट ने आगे कहा कि मेहनतकश परीक्षार्थी सबसे बड़ा हारा हुआ है. लाखों उम्मीदवार, जो बेहतर भविष्य और समाज की सेवा के सपने लेकर परीक्षा देते हैं, उनकी मेहनत भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. आयोग ने अपनी साख का जो ढिंढोरा पीटा था, वह अब पूरी तरह से गिर चुका है. पेपर लीक और इंटरव्यू में धांधली की पूरी व्यवस्था मकड़ी के जाले की तरह थी, जिसमें आयोग के सदस्य और बाहरी गिरोह मिलकर व्यवस्था को खोखला कर रहे थे. अदालत ने 2nd ग्रेड टीचर भर्ती (2022), सीनियर टीचर भर्ती (2022), राजस्व अधिकारी और कार्यकारी अधिकारी भर्ती (2023), यहां तक कि 2018 की RAS भर्ती तक के उदाहरण भी दिए, जहां गंभीर अनियमितताएं सामने आईं. बार-बार पेपर लीक, गलत उत्तर कुंजी, मार्क्स नॉर्मलाइजेशन में गड़बड़ी और पारदर्शिता की कमी ने आयोग को नाकाम साबित किया है. विशेष जांच दल (SIT) की 2024 की रिपोर्ट ने भी यही कहा कि पेपर लीक तो छपाई से पहले ही आयोग के अंदर से हुआ और सुरक्षा इंतज़ाम महज़ नाम के थे.  *जब बाड़ ही खेत को खा जाए*  कोर्ट ने याद दिलाया कि आयोग द्वारा बाद में अपनाए गए कदम– जैसे परीक्षा रद्द करना, उम्मीदवारों का पुनः सत्यापन, सुरक्षा उपाय – सब महज़ दिखावा थे. असल समस्या यह है कि परीक्षा की ईमानदारी को नुकसान केवल बाहरी असामाजिक तत्वों से नहीं, बल्कि आयोग के ही सदस्यों से हुआ. यह भरोसे का ह्रास इतना गहरा है कि अब हर भर्ती प्रक्रिया पर भ्रष्टाचार का साया मंडरा रहा है. हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में उन सभी बिंदुओं को रेखांकित किया – परीक्षा केंद्रों से कम करना , निजी स्कूलों और इनविजिलेटरों का प्रयोग, कमजोर सुरक्षा उपाय, ड्यूटी का गैर-रैंडमाइज्ड बंटवारा, पेपर लीक, अंक सामान्यीकरण में असमानता और सूचना छुपाना – जो इस संस्थान की खोखली हकीकत को उजागर करते हैं. न्यायालय ने इस पूरे परिदृश्य को देखते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि अदालत स्वयं स्वतः संज्ञान लेकर RPSC की इन व्यवस्थागत खामियों पर जनहित याचिका शुरू करे. यह न केवल आयोग की जवाबदेही तय करेगा, बल्कि राज्य में भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता बहाल करने के लिए जरूरी कदम भी साबित होंगे.  *अब आगे क्या होना चाहिए?*  – सुधार की रूपरेखा में सबसे पहले आवश्यकता है कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को ही बदला जाए, ताकि भ्रष्ट और पक्षपातपूर्ण व्यक्तियों की नियुक्ति न हो सके. 

स्ट्रीट वेडिंग एक्ट देश के लिए Retail क्रांति का हथियार है:, लेकिन संसद के बनाए इस कानून की 11 साल बाद भी ठीक से पालना नहीं हो रही!

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स्ट्रीट वेंडिंग एक्ट 2014 (आजीविका संरक्षण और स्ट्रीट वेंडिंग का विनियमन अधिनियम, 2014), एक ऐसा कानून, जो ना सिर्फ करीब 70 लाख रेहड़ी-पटरी वालो के लिए रोजगार के रास्ते खोलता है, बल्कि उनकी सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है. लेकिन कैसे संसद के द्वारा बनाए गए कानून का मखौल बना दिया जाता है, यह उसका जीता-जागता उदाहरण है. नगर निकाय या शहरी सरकार पर जिम्मा है कि वह इस कानून की पालना कराए, लेकिन यह स्ट्रीट वेंडर्स को उनके हक दिए जाने से ज्यादा सिर्फ और सिर्फ उन्हें अतिक्रमणकारी बताकर बेदखली के प्रयास या फिर ‘डंडा कानून’ में तब्दील हो गया है. साथ ही साथ जिन लोगों से नगर निकाय शुल्क भी वसूलता है, उन्हें भी सामाजिक सुरक्षा मिले. यह सब ‘स्ट्रीट वेडिंग एक्ट- 2014’ के प्रावधानों में है.

शहर में इस व्यवसाय को बढ़ावा देने की बजाय रेहड़ी-पटरी वालों को अतिक्रमणकारी बताकर नगर निकायों की ओर से उनकी बेदखली की योजना ही तैयार की जाती है. शहरों में ‘नो वेंडिंग जोन’ तो बना दिए गया, लेकिन वेंडिंग जोन की पहचान करने के मामले में तेजी नहीं लाई जाती. जबकि इसी एक्ट के मुताबिक, स्ट्रीट वेंडरों को पहचान पत्र और वेंडिंग सर्टिफिकेट जारी करना प्रशासन की जिम्मेदारी है.”

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने स्ट्रीट वेंडर संबंधित एक मामले की सुनवाई में कहा था- “भारत, मूल रूप से गांवों और शहरों से आने वाले लोगों का देश है, जो हरियाली के लिए कस्बों की ओर ग्रामीणों के आंदोलन से बना है, यह एक कृषि प्रधान समाज बना हुआ है. वास्तव में, किसी भी शहर का विकास गांवों से शहरों और कस्बों से शहरों में लोगों के आंदोलन के कारण होता है.”

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को भी पढ़ा जाना चाहिए

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्ट्रीट वेंडर्स को केवल वेंडिंग सर्टिफिकेट न होने के कारण बेदखल नहीं किया जा सकता है और चंडीगढ़ नगर निगम को सामाजिक सुरक्षा योजनाएं प्रदान करने की संस्तुति की है.

जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मीनाक्षी आई मेहता की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा,
“यह एक्ट स्ट्रीट वेंडिंग के लिए बनाए गए हैं, जिसमें टाउन वेंडिंग कमेटी को प्रत्येक 5 वर्ष बाद सर्वे करने का दायित्व दिया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सर्वेक्षण किए गए सभी लोगों को कुछ शर्तों के अधीन वेंडिंग जोन में समायोजित किया जाए. सर्वेक्षण पूरा होने और सभी स्ट्रीट वेंडर्स को वेंडिंग सर्टिफिकेट जारी किए जाने तक किसी भी स्ट्रीट वेंडर को बेदखल या स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए.”

2020 के ये आंकड़े काफी अहम हैं

साल 2020 में SBI की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 7.8 लाख रेहड़ी पटरी वाले हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में इनकी संख्या 5.5 लाख है. देश के कुल रेहड़ी पटरी वालों में दोनों राज्यों की सामूहिक हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है. जबकि बिहार में 5.3 लाख रेहड़ी पटरी वाले, राजस्थान में 3.1 लाख, महाराष्ट्र में 2.9 लाख, तमिलनाडु में 2.8 लाख, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में 2.1 लाख, गुजरात में दो लाख, केरल और असम में 1.9 लाख, ओडिशा में 1.7 लाख, हरियाणा में 1.5 लाख और मध्य प्रदेश तथा पंजाब में 1.4 लाख रेहड़ी पटरी वाले हैं.

इस एक्ट के तहत यह जरूरी है कि-

एक्ट की पालना कराने के साथ ही विक्रेताओं पर किसी भी तरह की गैर कानूनी कार्रवाई करने का आदेश देने और उनकी बेदखली पर रोक लगाई जाए.
विक्रेताओं के पहचान सर्वे में हुई अनियमितताओं को दूर किया जाए और सर्वे में छूटे हुए सभी प्रकार के पथ विक्रेताओं का सर्वे करवाएं.
एक अच्छा उपाय यह भी है कि रात्रि बाजार, फूड हब, महिला बाजार और बुक बाजार को भी चिन्हित कर उसे डेवलप किया जा सकता है.
एक्ट के मुताबिक, टाउन वेंडिंग कमिटी को ही पूरे अधिकार दिए जाएं. इसी कमेटी के माध्यम से ही सर्वे हो और क्रियान्वन के लिए निगरानी कमेटी गठित करने के आदेशों की भी पालना हो
सभी शहरी क्षेत्र में विभिन्न आवश्यक सुविधा और भंडारण की व्यवस्था के साथ वेंडिंग जोन का निर्माण व विकास हो.विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में पथ विक्रेताओं का समावेश सुनिश्चित करना और कर्मचारी राज्य बीमा योजना के साथ पथ विक्रेताओं को जोड़ने का प्रयास शुरू किया जाए.
कई बार सुझाव दिया जाता है कि हालांकि पथ विक्रेता कानून सिर्फ शहरी क्षेत्र में लागू किया जाता है, ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में स्ट्रीट वेंडर्स के लिए भी योजनाएं बनाई जाए और इसके लिए बजट का प्रावधान रखा जाए.

बांसवाड़ा में पीएम मोदी के सभा स्थल तक पहुंचने के लिए 1.27 किमी गेमन पुल ही एकमात्र रास्ता, इसकी सेहत पर कई बार उठ चुके हैं सवाल

वागड़ का अहमदाबाद- दाहोद जैसे 5 अहम शहरों से सीधा जुड़ाव, हालात यह कि एक फोर लेन सड़क भी नहीं

आज बांसवाड़ा में देश की आठवीं परमाणु विद्युत परियोजना का शिलान्यास होगा. इससे राजस्थान की कुल बिजली जरूरत का 20 फीसदी उत्पादन का रास्ता साफ होगा. पानी, बिजली के साथ यह क्षेत्र मैंगनीज अयस्क, डोलोमाइट, चूना पत्थर, तांबा, क्वार्टजाइट जैसे खनिजों का भंडार है. इसमें एक चमक अब सोने की भी जुड़ने वाली है, जो देश के कुल सोने की आपूर्ति का 25% तक योगदान कर सकता है. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और झारखंड के बाद बांसवाड़ा चौथा क्षेत्र होगा, जहां सोने का खनन होगा. करीब 113.52 मिलियन टन स्वर्ण अयस्क के आंकलन के साथ देश को बड़ा भंडार मिलने का अनुमान है.

इन तमाम प्राकृतिक उपहारों के बावजूद यह इलाका आजादी के 78 साल बाद भी उपेक्षा का शिकार है. प्रधानमंत्री की सभा स्थल पर 1 लाख से ज्यादा लोग बांसवाड़ा जिले के नापला (छोटीसरवन) आएंगे. इस जगह तक जाने के लिए गेमन पुल ही एकमात्र रास्ता है. बांसवाड़ा-रतलाम रोड पर स्थित माही नदी पर बने इस 1.27 किलोमीटर पुल की सेहत पर भी कई बार सवाल खड़े हो चुके हैं. इसकी आयु बढ़ाने के लिए कई तरह की मशक्कत की जा रही है. बूढ़े होते इस पुल की मजबूती में कुछ कमी आने की स्थिति में ‘मास्टिक’ का काम किया गया, ताकि इसकी आयु करीब 10 से 15 साल और बढ़ जाए. इसके सभी 27 स्पान के क्षतिग्रस्त हुए हिस्सों की मरम्मत का प्लान भी साल 2017 में बनाया गया था.

वहीं, हवाई या रेल कनेक्टिविटी की बात छोड़िए, एक ऐसा जिला है जहां एक भी फोर-लेन नहीं है. जबकि बांसवाड़ा का नजदीकी 5 बड़े शहरों से सीधा जुड़ाव है. बावजूद इसके बांसवाड़ा से रतलाम, अहमदाबाद, उदयपुर, निम्बाहेड़ा और दाहोद तक जाने के लिए सिर्फ टू लेन है.

दिल्ली- मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से गुजरता तो 90 किमी से ज्यादा की दूरी होती कम

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे को लेकर पहले खबर आई कि यह बांसवाड़ा से गुजरेगा लेकिन इस मामले में भी निराशा हाथ लगी. यह एक्सप्रेसवे रतलाम जिले से 91 किलोमीटर की दूरी तक गुजरता है और जिले के लगभग 87 गांवों को कवर करता है. झाबुआ से तलावड़ा, महूड़ी का माल होते हुए सैलाना, रतलाम जिले में प्रवेश करता है. एक अनुमान के मुताबिक, अगर दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से होकर बनाया जाता तो कुल दूरी में लगभग 60-70 किलोमीटर की बचत होती. वर्तमान में यह एक्सप्रेसवे राजस्थान के कोटा, चित्तौड़गढ़, रतलाम होते हुए गुजरता है, जबकि बांसवाड़ा मार्ग भौगोलिक रूप से छोटा व सीधा पड़ता है और इससे गुजरात का प्रवेश क्षेत्र भी जल्दी आता. इससे ईंधन, समय, दोनों की और बचत होती, और राजस्थान के दक्षिणी यानी आदिवासी क्षेत्र को भी बड़ा आर्थिक फायदा मिलता.

परमाणु परियोजना को भी करना पड़ा लंबा इंतजार

आज से 13 साल पहले 3 जून 2011 के दिन डूंगरपुर-रतलाम वाया बांसवाड़ा रेलवे परियोजना का शिलान्यास हुआ था. तत्कालीन गहलोत सरकार के दौरान यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शिलान्यास किया था. योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से 200 करोड़ रुपए भी दे दिए गए थे, लेकिन यह परियोजना कई वजहों से ठंडे बस्ते में चली गई, जिसके बाद से ही यहा रेलवे परियोजना का काम ठप्प हो चला हा है. जिला मुख्यालय पर उप मुख्य अभियंता कार्यालय भी बंद हो गया.

कोर्ट आदेश के ‘पैराग्राफ नंबर-44’ से संसद द्वारा पारित शिक्षा का अधिकार कानून RTE संकट में , 3 लाख बच्चों का भविष्य दांव पर


विज्ञापन के फेर में लाखों परिवारों को प्रभावित करने का वाला विषय अखबारों से हुआ ओझल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE एक्ट) के तहत प्रवेश के योग्य इन बच्चों का मामला कोर्ट में अटक गया है. निजी स्कूलों और शिक्षा विभाग के बीच की कानूनी लड़ाई में प्रक्रिया अधर में अटक गई है. मामला कोर्ट में लंबित है और अक्टूबर में इसकी अगली सुनवाई होगी. तब तक आधा सत्र भी निकल गया होगा, जिससे कि स्कूल में प्रवेश पाने की उम्मीद रखने वाले गरीब परिवार के बच्चों की स्कूल शिक्षा पर संकट गहरा गया है. इस संकट के गहराने की एक वजह है और वो है RTE एक्ट के पैराग्राफ नंबर- 44 पर कानूनी पेंच. इस पैरा- 44 के मुताबिक, निजी स्कूलों में विद्यार्थियों के एडमिशन के लिए दो स्तरों पर नर्सरी/PP3+ (प्री-प्राइमरी एजुकेशन) और कक्षा-1 (प्राइमरी एजुकेशन) के स्तर पर पात्र मानी जाती है. इस बिंदु में दोनों ही लेवल को एजुकेशन का एंट्री प्वाइंट माना गया है यानी स्कूल चाहे तो नर्सरी या क्लास-1 पर एडमिशन दे सकता है. इन दोनों ही स्तर पर एडमिशन के बदले के निजी स्कूल सरकार से भुगतान की मांग कर रहे हैं. जबकि शिक्षा विभाग ने आदेश जारी किया है कि पहली कक्षा को ही एंट्री प्वाइंट माना जाएगा और उन्हीं कक्षाओं में गरीब बच्चों के लिए RTE का भुगतान स्कूल को होगा. इस मामले में कोर्ट ने पैरा-44 पर स्टे लगाते हुए सुनवाई अक्टूबर तक टाल दी है. अब इसी स्टे की व्याख्या करते हुए निजी स्कूल का कहना है कि कोर्ट स्टे की स्थिति में एडमिशन नहीं होंगे. जबकि शिक्षा विभाग का कहना है कि एडमिशन की प्रक्रिया पर रोक नहीं है, बल्कि एंट्री प्वाइंट (नर्सरी हो या पहली कक्षा) के मामले में कोर्ट ने स्थगन आदेश दिया है. ऑनलाइन लॉटरी के बाद एडमिशन लटके 2025-26 के लिए ऑनलाइन लॉटरी निकाली गई थी, जिसमें राज्य के 34,799 निजी विद्यालयों में तीन लाख से अधिक बच्चों का चयन किया गया. इनमें से करीब डेढ़ लाख छात्र-छात्राएं पहली कक्षा के लिए चयनित हुए. लेकिन पहली क्लास में प्रवेश देने को लेकर निजी स्कूलों और शिक्षा विभाग में ठन गई. अब इसका खामियाजा इस बार भी अभिभावकों और बच्चों को भुगतना पड़ रहा है. मामला पिछले सत्र के दौरान शिक्षा विभाग की ओर से भुगतान नहीं किए जाने का है. निजी स्कूल प्रबंधनों का कहना है कि आरटीई के अंतर्गत प्री प्राइमरी कक्षाओं में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के पुनर्भरण का भुगतान सरकार ने नहीं किया, पहले वह भुगतान करे. दरअसल, लॉटरी पहली और नर्सरी क्लास के लिए निकाली जाती है. शिक्षा विभाग का कहना है कि भुगतान सिर्फ पहली क्लास का किया जाएगा.  वहीं, निजी स्कूलों का कहना है कि उनकी एंट्री लेवल क्लास ‘नर्सरी’ है, इसलिए वे नर्सरी में ही आरटीई के तहत प्रवेश दे रहे हैं. निजी स्कूलों के इस तर्क पर शिक्षा विभाग का कहना है कि कोर्ट के आदेश का गलत अर्थ निकाला गया है और पहली कक्षा में आरटीई प्रवेश बाधित नहीं किया जा सकता. हर बार एडमिशन में होती है देरी, स्थाई समाधान क्यों नहीं? ये पहली बार नहीं है, जब RTE का मामला पेचीदगियों का सामना कर रहा है. साल दर साल इस तरह की दिक्कतें सामने आती रहती हैं. हर साल निजी स्कूल शिक्षा विभाग पर भुगतान नहीं होने का आरोप लगाते हैं और फिर प्रवेश प्रक्रिया बाधित भी होती है. सरकार की ओर से इन 3 लाख बच्चों को निशुल्क पढ़ाए जाने का निर्देश निजी स्कूलों को दिया गया है, बावजूद इसके कोई स्थाई समाधान नहीं हो रहा और RTE जैसी योजनाओं पर ग्रहण लग जाता है. क्या है इसका समाधान? राजस्थान के 30 हजार से ज्यादा निजी स्कूलों को भुगतान करने की व्यवस्था के बजाय क्या सरकार ऐसा नहीं कर सकती कि सीधे बच्चों के खाते में राशि ट्रांसफर की जाए? RTE की लॉटरी, फिर बच्चों को प्रवेश और सत्र खत्म होने के बाद शिक्षा विभाग का भुगतान, यह एक लंबी प्रक्रिया है. ऐसे में राजस्थान में बच्चों के खाते में राशि हस्तांतरित कर इस प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है. ताकि सत्र में देरी भी ना हो और बच्चों को प्रवेश भी समय पर मिले. सिंधी बच्चे परिजन के साथ स्कूल जाएंगे और प्रवेश प्रकिया पूरी करेंगे. यह ठीक वैसे ही होगा, जैसे आम बच्चों के लिए उनके परिजन भुगतान करते.

पाकिस्तान में पानी क्यों जा रहा, सरकार ने तो रोकने की बात कही थी? 

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राजस्थान सरकार समझौते से 2.50 लाख हेक्टेयर सिंचाई भूमि के लिए पानी के पाती है, जबकि प्रदेश के हिस्से का 4 लाख हेक्टेयर से ज्यादा पानी हम बहा दे रहे हैं? जल संकट से निपटने के लिए पड़ोसी राज्यों के साथ समझौते के अलावा व्यर्थ बह रहे पानी को भी रोकना होगा. ERCP चुनाव के दौरान भी बड़ा मुद्दा बना और सरकार के गठन के बाद भी. राजस्थान सरकार ने मध्य प्रदेश से समझौता किया. पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना से एमपी में लगभग 4 लाख हेक्टयर में सिंचाई होगी और राजस्थान में 2 लाख 80 हजार हेक्टेयर में सिंचाई होगी. लेकिन इससे ज्यादा पानी तो हम व्यर्थ बहा दे रहे हैं और जिसे रोकने के उपायों पर भी काम नहीं हो रहा. राजस्थान के पंजाब की सीमा से लगे हुए जिले श्रीगंगानग़र में प्रतिदिन हजारों क्यूसेक पानी- पाकिस्तान को जा रहा है, किंतु बीकानेर कैनाल को पूरी आपूर्ति नहीं दी जा रही. अगर यह पानी रोक दिया जाए तो करीब 1.50 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई हो सकती है. जबकि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सिंधु जल समझौता रद्द कर दिया गया. बावजूद इसके पाकिस्तान को पानी जा रहा है और हमारे किसानों की मेहनत बर्बाद हो रही है. उत्तर ही नहीं, प्रदेश के दक्षिण क्षेत्र में भी ऐसी तस्वीर सामने आ रही है. यहां माही बांध से ओवरफ्लो होते पानी को रोकने का भी कोई मैनेजमेंट नहीं है, अगर इस पर काम किया जाए तो 3 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हो सकेगा.  यानी काफी मशक्कत के बाद एक समझौते से करीब 3 लाख हेक्टेयर सिंचाई भूमि पर पानी उपलब्ध हो रहा है, जबकि 4 लाख से ज्यादा ओवरफ्लो बह रहा है. पूरे देश में पानी की आवक, सीमावर्ती इलाकों में किसान पानी को मोहताज राजस्थान के पंजाब की सीमा से लगे हुए जिले—श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर- इन दिनों गंभीर जल संकट की चपेट में हैं. यहां की नहरें, खासकर बीकानेर कैनाल और गंगनहर, जो पंजाब के हरिके हेड वर्क्स से आती हैं, सूखी पड़ी हैं. क्षेत्र के किसान बार-बार सिंचाई के पानी की मांग उठा रहे हैं, पर समाधान नहीं निकल रहा. चिंता की बात यह है कि इस बार हिमाचल प्रदेश में असामान्य रूप से अधिक बारिश और भाखड़ा-पोंग बांधों में बंपर पानी आया, फिर भी राजस्थान का जल हिस्सा अधूरा है.  किसानों का सवाल- पाकिस्तान को क्यों जा रहा पानी?  हरिके हेड वर्क्स से हुसैनीवाला की ओर 28 हजार क्यूसेक और पाकिस्तान की ओर 25 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है. बीकानेर कैनाल को उसका जायज हिस्सा नहीं मिल रहा. गुजरात से समझौता खत्म, लेकिन हम पानी को फिर भी रोक नहीं पा रहे साल 1966 में राजस्थान सरकार ने माही-नर्मदा परियोजना के तहत माही बांध निर्माण का समझौता हुआ. इसके तहत 40 टीएमसी पानी गुजरात को जाना था. बांध के निर्माण में गुजरात सरकार ने भी मदद की थी. बांसवाड़ा के किसान विरोध में उतरे तो नर्मदा ट्रिब्यूनल ने खोसला कमेटी बनाई. कमेटी ने रिपोर्ट में कहा कि जब तक गुजरात के कडाणा बांध तक पानी नहीं पहुंचता, तब तक माही से सप्लाई होगी. उसी समय एक और प्रोजेक्ट बना, जिसके तहत माही का पानी जालोर, सिरोही और बाड़मेर तक पहुंचना था. जब गुजरात का कडाणा बांध का प्रोजेक्ट पूरा हुआ तो भी माही का ओवरफ्लो पानी जालोर से बाड़मेर तक नहीं पहुंचा. आज भी राजस्थान का यह ओवरफ्लो पानी गुजरात जा रहा है. नतीजा यह हुआ कि कई नजदीक के के गांवों में खेतों में फसल सूख रही है और किसानों की आय में गिरावट हो रही है. अगर सरकार इसे रोकने में कामयाब हो जाए तो तीन लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हो सकेगा. गुजरात को हर वर्ष 40 टीएमसी पानी माही बांध से दिया जा रहा है, जबकि राजस्थान के साथ ऐसा कोई समझौता या शर्त नहीं है. आखिर सरकार के पास क्या विकल्प है? – लगातार कम हो रही नहरों की आपूर्ति, समझौतों की अनदेखी और जल प्रबंधन के पुराने ढांचे ने राजस्थान को जल संकट के कगार पर ला खड़ा किया है. – अगर राजस्थान को माही व नर्मदा सहित अन्य जल स्रोतों से उसका उचित हिस्सा मिल जाता है, तो लाखों लाख हेक्टेयर नए क्षेत्र में सिंचाई हो सकती है, जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था और किसान दोनों को राहत मिलेगी.

राजस्थान की राजनीति में 90 का दशक: जब माथुर-गहलोत के खिलाफ तीन दिग्गजों ने रची साचिश और जादूगर का साथ देने के चलते शिवचरण माथुर को गंवानी पड़ी थी कुर्सी


1980 से 1990 के बीच प्रदेश लगातार राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था। 1980 में जगन्नाथ पहाड़िया के बाद 1981-85 तक शिवचरण माथुर मुख्यमंत्री रहे। फिर हरिदेव जोशी को सत्ता की बागडोर मिली और उन्होंने 1988 तक सरकार चलाई। उसके बाद फिर माथुर की वापसी हुई, लेकिन वे महज सालभर ही टिक पाए। 1989 में हरिदेव जोशी दोबारा गद्दी पर आए, मगर साल 1990 के बाद वे भी हाशिए पर चले गए। इन वर्षों में राजस्थान ने एक के बाद एक कई मुख्यमंत्रियों को बदलते देखा। यही वह दौर था जब दिल्ली के करीब माने जाने वाले नेता अशोक गहलोत प्रदेश कांग्रेस के मठाधीशों की आंखों की किरकिरी बन गए थे। आज गहलोत का जिक्र होता है तो बातचीत अक्सर उनकी सचिन पायलट से अदावत या हालिया वर्षों में डॉ. सीपी जोशी जैसे दिग्गजों को पटखनी देने तक सिमट जाती है। लेकिन 90 के दशक की शुरुआत में, जब गहलोत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब उनके खिलाफ पार्टी के भीतर ही असंतुष्ट विधायकों और सांसदों की बड़ी फौज खड़ी हो गई थी। इसी असंतोष की अगुवाई हरिदेव जोशी, हीरालाल देवपुरा और सांसद नवलकिशोर शर्मा ने की। डीग कांड और माथुर की विदाई 20 फरवरी 1985 को शिवचरण माथुर चुनाव प्रचार के लिए भरतपुर जिले के डीग कस्बे में पहुंचे थे। वहां निर्दलीय प्रत्याशी और पूर्व विधायक राजा मानसिंह व कांग्रेस समर्थकों के बीच टकराव हो गया। कहा जाता है कि राजा मानसिंह ने अपनी जीप से चुनाव सभा का मंच और माथुर के हेलिकॉप्टर को नुकसान पहुंचाया। पुलिस ने उन पर हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया। अगले दिन 21 फरवरी को डीग बाजार में पुलिस से झड़प के दौरान गोलीबारी हुई, जिसमें राजा मानसिंह और उनके दो साथी मारे गए। इस घटना ने न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरे देश में जाट समाज को कांग्रेस के खिलाफ खड़ा कर दिया। नतीजा यह हुआ कि चुनाव के बाद शिवचरण माथुर से इस्तीफा ले लिया गया और 1985 में हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद सत्ता की कमान कभी जोशी तो कभी माथुर के हाथों में रही। 1988 में माथुर की वापसी और नया मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री राजीव गांधी की इच्छा पर 20 जनवरी 1988 को विधानसभा कांग्रेस दल ने माथुर को नेता चुना। 26 जनवरी को उन्होंने छोटा मंत्रिमंडल गठित किया, जिसमें हनुमान प्रभाकर, गोविंदसिंह गुर्जर, डॉ. बीडी कल्ला और माधोसिंह दीवान मंत्री बनाए गए। वहीं वैद्य भैरूलाल भारद्वाज, अश्कअली टाक और कमला भील को राज्यमंत्री नियुक्त किया गया। इसके बाद 6 फरवरी 1988 को मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, जिसमें शीशराम ओला, नरपतराम बरबड़, नारायणसिंह, रघुनाथ विश्नोई, रामकिशन वर्मा जैसे नेता शामिल हुए। बीना काक, डॉ. गिरिजा व्यास, चंद्रशेखर शर्मा और सूरजपालसिंह जैसे युवा चेहरे भी सरकार में आए। राजनीति में नया खून उतर चुका था और सत्ता में हिस्सेदारी की होड़ तेज थी। असंतोष और गहलोत का गृह मंत्री बनना माथुर ने हरिदेव जोशी मंत्रिमंडल (1985-88) के कई वरिष्ठ नेताओं को बाहर कर दिया था। हीरालाल देवपुरा, गुलाबसिंह शक्तावत, रामसिंह विश्नोई, नरेंद्रसिंह भाटी, रामदेवसिंह, सुजानसिंह यादव जैसे कई नाम मंत्रिमंडल से बाहर थे। इससे पार्टी में असंतोष गहराता गया। इस बीच माथुर ने अशोक गहलोत को गृह मंत्री बना दिया। गृह जैसा अहम विभाग अब तक खुद सीएम के पास था। गहलोत तब विधायक भी नहीं थे, बल्कि लोकसभा सदस्य थे। यह निर्णय पार्टी में कई लोगों को नागवार गुजरा। उधर, हनुमानप्रसाद प्रभाकर और लक्ष्मणसिंह को मंत्रिमंडल से बाहर करने से असंतोष और भड़क उठा। धीरे-धीरे गहलोत असंतुष्ट खेमे के सीधे निशाने पर आ गए। 1989: बजट सत्र का बहिष्कार और बगावत असंतोष का चरम उस समय देखने को मिला जब 1989 में विधानसभा का बजट सत्र शुरू हुआ। सत्तारूढ़ दल के ही असंतुष्ट विधायकों ने 17 मार्च को सत्र का बहिष्कार कर दिया। यह कांग्रेस इतिहास में अभूतपूर्व था। हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा और सीएम को केवल चार महीने का लेखानुदान पारित कर सत्र खत्म करने का निर्देश दिया गया। दिल्ली से आया संदेश और नए समीकरण जब अंदरूनी कलह थमी नहीं, तो कांग्रेस हाईकमान ने सख्त कदम उठाए। जगन्नाथ पहाड़िया और हरिदेव जोशी को क्रमशः बिहार और असम का राज्यपाल बना दिया गया। 7 जून 1989 को अशोक गहलोत को हटाकर हीरालाल देवपुरा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वहीं माथुर को मंत्रिमंडल विस्तार का आदेश दिया गया। 6 जून 1989 को तीसरा विस्तार और मंत्रिपरिषद 35 सदस्यों तक पहुंच गई, जिसमें मुख्यमंत्री समेत 13 मंत्री, 16 राज्यमंत्री, 3 उपमंत्री और 3 संसदीय सचिव शामिल