नयी दिल्ली, 30 जुलाई (भाषा) भारतीय सेना के ‘मास्टर जनरल सस्टेनेंस’ लेफ्टिनेंट जनरल ए एस औजला ने बुधवार को गोला-बारूद को महज एक उत्पाद नहीं बल्कि ‘‘रणनीतिक प्रतिरोध का एक पहलू’’ बताते हुए एक सुरक्षित और लचीला गोला-बारूद तंत्र बनाने की पैरवी की, जो स्मार्ट समाधान लेकर आए।
उन्होंने कहा कि यह एक आकांक्षा नहीं बल्कि एक ‘‘अभियानगत और राष्ट्रीय आवश्यकता’’ है।
यहां एक रक्षा सम्मेलन में अपने संबोधन में उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि देश को कोई न कोई ‘‘गोला-बारूद दृष्टि’’ लेकर आनी चाहिए, चाहे वह 2030, 2035 या 2040 के लिए हो।
लेफ्टिनेंट जनरल औजला ने कहा कि युद्ध तेजी से गहन और जटिल प्रकृति के होते जा रहे हैं तथा गोला-बारूद से संबंधित वैश्विक परिदृश्य भी तीव्र गति से ‘‘बदल’’ रहा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय सशस्त्र बल भी इन चुनौतियों का सामना करने के लिए बहुत सोच-समझकर, रणनीतिक तरीके से तैयारी कर रहे हैं और मुख्य बात यह है कि ‘‘हमें हर समय रणनीतिक रूप से तैयार रहना चाहिए।’’
औजला ने कहा कि हाइब्रिड और विषम युद्ध, साइबर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तथा सूचना युद्ध, अंतरिक्ष क्षमताओं में निवेश और ड्रोन-रोधी तथा मिसाइल-रोधी प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा, ‘‘इन सबमें गोला-बारूद अपने आप ही एक मूल आधार बन जाता है, जो हमारी संभावित क्षमताओं और सामर्थ्य को तय करता है।”
‘एमो कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) द्वारा किया गया।
सचिव (रक्षा उत्पादन) संजीव कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि सीमा पर प्रतिकूल संबंध या प्रतिकूल स्थिति के समय गोला-बारूद की मांग बढ़ जाएगी।
लेफ्टिनेंट जनरल औजला ने सभी हितधारकों से ऑपरेशन सिंदूर और विश्व में अन्य सैन्य संघर्षों से सीख लेकर काम करने का आग्रह किया।
भाषा नोमान नेत्रपाल
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