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Saturday, August 30, 2025

हिंसक विद्रोह के एक साल बाद भी बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता कोसों दूर

Newsहिंसक विद्रोह के एक साल बाद भी बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता कोसों दूर

ढाका, चार अगस्त (एपी) पिछले साल पांच अगस्त को हुए छात्रों के नेतृत्व वाले बड़े विद्रोह और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने के एक साल बाद भी बांग्लादेश अब तक राजनीतिक स्थिरता हासिल नहीं कर पाया है।

तेइस वर्षीय मेहरुन्निसा अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी और अपने भाई अब्दुर रहमान तारीफ से फोन पर बात कर रही थी। तभी फोन पर अचानक आवाज़ बंद हो गई।

तारीफ ने बताया कि उसे आशंका हुई कि कुछ तो गड़बड़ है और वह सुरक्षाबलों तथा प्रदर्शनकारियों के बीच गोलीबारी से किसी तरह बचते हुए घर भागा जहां उसके माता-पिता खून से लथपथ बहन को डॉक्टर के पास ले जा रहे थे। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

फोन पर बात करते समय अचानक एक गोली मेहरुन्निसा के सीने में जा लगी थी। वह पांच अगस्त ही था। उसी दिन बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा था और उनका 15 साल लंबा शासन एक हिंसक विद्रोह के बाद समाप्त हो गया।

ज्यादातर लोगों के लिए हसीना का पद छोड़ना खुशी की बात थी। तीन दिन बाद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस ने अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में कार्यभार संभाला और व्यवस्था बहाल करने तथा सुधारों के बाद नए चुनाव कराने का वादा किया।

हसीना की अनुपस्थिति में उन पर मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप में मुकदमा चल रहा है। वह इस समय भारत में निर्वासन में हैं। लेकिन कई लोगों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक सहिष्णुता का सपना अब भी अधूरा है।

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न्यूयार्क आधारित मानवाधिकार समूह ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की एशिया मामलों की निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, ‘‘जो हजारों लोग एक साल पहले शेख हसीना की दमनकारी सत्ता के खिलाफ हिंसा की आशंका के बावजूद सड़कों पर उतरे थे, उनकी उम्मीदें अब भी अधूरी हैं।’’

हसीना के खिलाफ हुए विद्रोह के दौरान सैकड़ों लोगों की मौत हुई, जिनमें अधिकतर छात्र थे। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस थानों और सरकारी इमारतों में आग लगा दी। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच खूनी संघर्ष भी हुआ।

बेहतर राजनीतिक बदलाव के इच्छुक 20 वर्षीय तारीफ ने कहा, ‘‘हम अन्याय और भेदभाव से मुक्त देश चाहते थे। लेकिन अब मैं हताश हूं।’’

यूनुस सरकार ने 11 सुधार आयोग बनाए हैं, जिनमें एक राष्ट्रीय सहमति आयोग भी शामिल है जो प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ चुनाव प्रक्रिया पर काम कर रहा है। लेकिन अब तक चुनाव की समयसीमा और प्रक्रिया पर सहमति नहीं बन सकी है।

महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर धार्मिक चरमपंथियों के हमले बढ़े हैं। हालांकि, मानवाधिकार समूहों का कहना है कि जबरन गायब करने जैसी कुछ ज्यादतियाँ रुकी हैं, लेकिन अब मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। विशेषकर, शेख हसीना के समर्थकों को निशाना बनाने के आरोप हैं।

हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध है, और उसके मुताबिक, पिछले एक साल में हिरासत में उसके 24 से अधिक समर्थकों की मौत हो चुकी है।

‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ ने 30 जुलाई को कहा कि अंतरिम सरकार अपनी मानवाधिकार प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में असफल रही है। उसने कुछ इलाकों में जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की शिकायत की है।

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देश में राजनीतिक अस्थिरता का दौर अब भी जारी है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की अगुवाई वाली विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने दिसंबर या फरवरी में चुनाव की मांग की है, जबकि यूनुस सरकार अप्रैल में चुनाव की बात कह रही है।

पूर्व में प्रतिबंधित इस्लामी दलों को यूनुस सरकार के तहत उभरने का अवसर मिला है। वहीं, आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्र नेताओं ने एक नया राजनीतिक दल बना लिया है, जो संविधान में व्यापक बदलाव की मांग कर रहा है।

जमात-ए-इस्लामी जैसे दलों ने बड़ी रैलियाँ आयोजित की हैं, जिससे यह आशंका जताई जा रही है कि कट्टरपंथी ताकतें बांग्लादेश की राजनीति को और अधिक विभाजित कर सकती हैं।

राजनीतिक विश्लेषक नज़मुल अहसान कालिमुल्लाह ने कहा, ‘‘इस्लामी ताकतों का उभार दिखाता है कि भविष्य में बांग्लादेश में कट्टरता की जड़ें गहराई तक जा सकती हैं।’’

उन्होंने कहा कि यूनुस सरकार से लोगों की उम्मीद थी कि वह चुनावी प्रक्रिया में सुधार को प्राथमिकता देगी, लेकिन वह अवसर चूकती नजर आ रही है।

मेहरुन्निसा के पिता मोशर्रफ हुसैन ने कहा, ‘‘यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं था, बल्कि यह गहरी निराशा की अभिव्यक्ति था। 54 वर्षों बाद भी हमें असली आज़ादी नहीं मिली है।’’

तारीफ ने भी अपने पिता की बातों का समर्थन करते हुए कहा कि वह एक ऐसा बांग्लादेश चाहते हैं जहाँ ‘‘कानून का शासन हो, ज़बरदस्ती गायब कर देने जैसी घटनाएँ न हों, और बोलने की आज़ादी सुनिश्चित हो।’’

भाषा मनीषा नेत्रपाल

नेत्रपाल

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