जल संकट से निपटने के लिए पड़ोसी राज्यों के साथ समझौते के अलावा व्यर्थ बह रहे पानी को भी रोकना होगा। ERCP चुनाव के दौरान भी बड़ा मुद्दा बना और सरकार के गठन के बाद भी राजस्थान सरकार ने मध्य प्रदेश से समझौता किया। पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना से एमपी में लगभग 4 लाख हेक्टयर में सिंचाई होगी और राजस्थान में 2 लाख 80 हजार हेक्टेयर में सिंचाई होगी, लेकिन इससे ज्यादा पानी तो हम व्यर्थ बहा दे रहे हैं और जिसे रोकने के उपायों पर भी काम नहीं हो रहा।
राजस्थान के पंजाब की सीमा से लगे हुए जिले श्रीगंगानग़र में प्रतिदिन हजारों क्यूसेक पानी- पाकिस्तान को जा रहा है, किंतु बीकानेर कैनाल को पूरी आपूर्ति नहीं दी जा रही। अगर यह पानी रोक दिया जाए तो करीब 1.50 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई हो सकती है, जबकि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सिंधु जल समझौता रद्द कर दिया गया। बावजूद इसके पाकिस्तान को पानी जा रहा है और हमारे किसानों की मेहनत बर्बाद हो रही है।
उत्तर ही नहीं, प्रदेश के दक्षिण क्षेत्र में भी ऐसी तस्वीर सामने आ रही है। यहां माही बांध से ओवरफ्लो होते पानी को रोकने का भी कोई मैनेजमेंट नहीं है, अगर इस पर काम किया जाए तो 3 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हो सकेगा। यानी काफी मशक्कत के बाद एक समझौते से करीब 3 लाख हेक्टेयर सिंचाई भूमि पर पानी उपलब्ध हो रहा है, जबकि 4 लाख से ज्यादा ओवरफ्लो बह रहा है.
किसान पानी को मोहताज
राजस्थान के पंजाब की सीमा से लगे हुए जिले—श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर- इन दिनों गंभीर जल संकट की चपेट में हैं। यहां की नहरें, खासकर बीकानेर कैनाल और गंगनहर, जो पंजाब के हरिके हेड वर्क्स से आती हैं, सूखी पड़ी हैं। क्षेत्र के किसान बार-बार सिंचाई के पानी की मांग उठा रहे हैं, पर समाधान नहीं निकल रहा। चिंता की बात यह है कि इस बार हिमाचल प्रदेश में असामान्य रूप से अधिक बारिश और भाखड़ा-पोंग बांधों में बंपर पानी आया, फिर भी राजस्थान का जल हिस्सा अधूरा है।
किसानों का सवाल- पाकिस्तान को क्यों जा रहा पानी?
हरिके हेड वर्क्स से हुसैनीवाला की ओर 28 हजार क्यूसेक और पाकिस्तान की ओर 25 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है। बीकानेर कैनाल को उसका जायज हिस्सा नहीं मिल रहा। गुजरात से समझौता खत्म, लेकिन हम पानी को फिर भी रोक नहीं पा रहे।
साल 1966 में राजस्थान सरकार ने माही-नर्मदा परियोजना के तहत माही बांध निर्माण का समझौता हुआ। इसके तहत 40 टीएमसी पानी गुजरात को जाना था। बांध के निर्माण में गुजरात सरकार ने भी मदद की थी। बांसवाड़ा के किसान विरोध में उतरे तो नर्मदा ट्रिब्यूनल ने खोसला कमेटी बनाई। कमेटी ने रिपोर्ट में कहा कि जब तक गुजरात के कडाणा बांध तक पानी नहीं पहुंचता, तब तक माही से सप्लाई होगी।
उसी समय एक और प्रोजेक्ट बना, जिसके तहत माही का पानी जालोर, सिरोही और बाड़मेर तक पहुंचना था। जब गुजरात का कडाणा बांध का प्रोजेक्ट पूरा हुआ तो भी माही का ओवरफ्लो पानी जालोर से बाड़मेर तक नहीं पहुंचा। आज भी राजस्थान का यह ओवरफ्लो पानी गुजरात जा रहा है। नतीजा यह हुआ कि कई नजदीक के के गांवों में खेतों में फसल सूख रही है और किसानों की आय में गिरावट हो रही है। अगर सरकार इसे रोकने में कामयाब हो जाए तो तीन लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हो सकेगा। गुजरात को हर वर्ष 40 टीएमसी पानी माही बांध से दिया जा रहा है, जबकि राजस्थान के साथ ऐसा कोई समझौता या शर्त नहीं है।
आखिर सरकार के पास क्या विकल्प है?
– लगातार कम हो रही नहरों की आपूर्ति, समझौतों की अनदेखी और जल प्रबंधन के पुराने ढांचे ने राजस्थान को जल संकट के कगार पर ला खड़ा किया है.
– अगर राजस्थान को माही व नर्मदा सहित अन्य जल स्रोतों से उसका उचित हिस्सा मिल जाता है, तो लाखों लाख हेक्टेयर नए क्षेत्र में सिंचाई हो सकती है, जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था और किसान दोनों को राहत मिलेगी.