28 अगस्त, 2025….राजस्थान के इतिहास में काला दिन- कोर्ट ने कहा “जब घर का भेदी लंका ढाए”, तो फिर RPSC को कौन बचाए?

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जब राजस्थान लोक सेवा आयोग पर ही सवालिया निशान है तो उसके द्वारा कराई गई भर्ती का क्या? RPSC को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी इस संस्था की कार्यशैली नहीं, बल्कि इसके अस्तित्व पर सीधा सवाल खड़ा करती है. साथ ही संस्था से जुड़े रहे सदस्य रामूराम राईका, बाबूलाल कटारा के साथ RPSC के तत्कालीन अध्यक्ष संजय श्रोत्रिय और आरपीएससी के अन्य सदस्य मंजू शर्मा, संगीता आर्य और पूर्व अध्यक्ष जसवंत राठी भी सवालों के घेरे में हैं. यह मामला सिर्फ 6 सदस्यों का नहीं है, कोर्ट ने सीधे तौर पर RPSC के पूरे ढांचे को कटघरे में खड़ा किया है. न्यायालय ने कहा कि आरपीएससी की ओर से हर स्तर पर पेपर कराने में चूक हुई. हाईकोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के बाद अब सवाल यह है कि क्या इस संस्था के पुर्नगठन पर बात नहीं होनी चाहिए, जिसे कांग्रेस के राज में बीजेपी ने उठाया और बीजेपी के सत्तासीन होने के बाद कांग्रेस के हलकों में आवाजें सुनाई दीं.  कोर्ट की ये लाइनें, RPSC के काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई “अदालत ने साफ कहा है कि आयोग का पूरा ढांचा एक फार्स यानी ढकोसला साबित हुआ है. आयोग का संवैधानिक कर्तव्य था कि राज्य में भर्ती प्रक्रियाओं को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए, लेकिन इसके सदस्य ही लीक और भ्रष्टाचार के खेल में शामिल पाए गए. अदालत ने कहा कि जब शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ही अपनी शपथ और कर्तव्यों से छल करेगा, तो यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर चोट है.” अब समझिए पूरी साजिश की कहानी, जो युवाओं के भविष्य के पहरेदारों ने ही रची सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2021 के दौरान पेपर लीक की साजिश आयोग के ही सदस्यों बाबूलाल कटारा और रामुराम राईका ने मिलकर रची, वो भी उस समय जब प्रश्नपत्र छपाई प्रेस तक नहीं पहुंचे थे. आरोप पत्र के मुताबिक, कई अन्य सदस्यों मंजू शर्मा, संगीता आर्या और जसवंत राठी की संलिप्तता भी दर्ज हुई है. इन सबकी जानकारी आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष संजय श्रोतिया को भी थी, जिन्होंने अपने बेटे-बेटी के इंटरव्यू तक प्रभावित किए और पैनल का हिस्सा बने.   न्यायालय ने खुद कहा- मेहनतकश परीक्षार्थी हार गया हाईकोर्ट ने आगे कहा कि मेहनतकश परीक्षार्थी सबसे बड़ा हारा हुआ है. लाखों उम्मीदवार, जो बेहतर भविष्य और समाज की सेवा के सपने लेकर परीक्षा देते हैं, उनकी मेहनत भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. आयोग ने अपनी साख का जो ढिंढोरा पीटा था, वह अब पूरी तरह से गिर चुका है. पेपर लीक और इंटरव्यू में धांधली की पूरी व्यवस्था मकड़ी के जाले की तरह थी, जिसमें आयोग के सदस्य और बाहरी गिरोह मिलकर व्यवस्था को खोखला कर रहे थे. अदालत ने 2nd ग्रेड टीचर भर्ती (2022), सीनियर टीचर भर्ती (2022), राजस्व अधिकारी और कार्यकारी अधिकारी भर्ती (2023), यहां तक कि 2018 की RAS भर्ती तक के उदाहरण भी दिए, जहां गंभीर अनियमितताएं सामने आईं. बार-बार पेपर लीक, गलत उत्तर कुंजी, मार्क्स नॉर्मलाइजेशन में गड़बड़ी और पारदर्शिता की कमी ने आयोग को नाकाम साबित किया है. विशेष जांच दल (SIT) की 2024 की रिपोर्ट ने भी यही कहा कि पेपर लीक तो छपाई से पहले ही आयोग के अंदर से हुआ और सुरक्षा इंतज़ाम महज़ नाम के थे.  *जब बाड़ ही खेत को खा जाए*  कोर्ट ने याद दिलाया कि आयोग द्वारा बाद में अपनाए गए कदम– जैसे परीक्षा रद्द करना, उम्मीदवारों का पुनः सत्यापन, सुरक्षा उपाय – सब महज़ दिखावा थे. असल समस्या यह है कि परीक्षा की ईमानदारी को नुकसान केवल बाहरी असामाजिक तत्वों से नहीं, बल्कि आयोग के ही सदस्यों से हुआ. यह भरोसे का ह्रास इतना गहरा है कि अब हर भर्ती प्रक्रिया पर भ्रष्टाचार का साया मंडरा रहा है. हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में उन सभी बिंदुओं को रेखांकित किया – परीक्षा केंद्रों से कम करना , निजी स्कूलों और इनविजिलेटरों का प्रयोग, कमजोर सुरक्षा उपाय, ड्यूटी का गैर-रैंडमाइज्ड बंटवारा, पेपर लीक, अंक सामान्यीकरण में असमानता और सूचना छुपाना – जो इस संस्थान की खोखली हकीकत को उजागर करते हैं. न्यायालय ने इस पूरे परिदृश्य को देखते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि अदालत स्वयं स्वतः संज्ञान लेकर RPSC की इन व्यवस्थागत खामियों पर जनहित याचिका शुरू करे. यह न केवल आयोग की जवाबदेही तय करेगा, बल्कि राज्य में भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता बहाल करने के लिए जरूरी कदम भी साबित होंगे.  *अब आगे क्या होना चाहिए?*  – सुधार की रूपरेखा में सबसे पहले आवश्यकता है कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को ही बदला जाए, ताकि भ्रष्ट और पक्षपातपूर्ण व्यक्तियों की नियुक्ति न हो सके. 

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