एम्स जैसे संस्थानों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के खाली पद: देश के स्वास्थ्य ढांचे पर गंभीर सवाल

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22 जुलाई 2025 को संसद में राज्यसभा के एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में जो जानकारी सामने आई, वह देश के सबसे प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थानों की स्थिति पर चिंता बढ़ाने वाली है। एम्स जैसे संस्थानों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में पद खाली हैं और यह न सिर्फ संस्थान की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि देश के आम मरीज की उम्मीदों पर भी असर डालता है। स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने संसद को बताया कि देश भर के एम्स में स्पेशियलिटी और सुपर स्पेशियलिटी विभागों के संचालन के लिए पदों का सृजन और भर्ती एक सतत प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि रिक्त पदों को भरने के लिए हर एम्स में स्थायी चयन समिति बनाई गई है। मगर जो आंकड़े सामने आए, वे बताने के लिए काफी हैं कि ‘सतत प्रक्रिया’ के बावजूद हालात सुधर नहीं रहे।

उदाहरण के तौर पर देश का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित एम्स, दिल्ली जहां 1306 स्वीकृत पद हैं, लेकिन उनमें से केवल 844 पर ही डॉक्टर पदस्थापित हैं। यानी 462 पद अभी भी खाली हैं। सवाल यह है कि जब सरकार देश भर के एम्स में मॉडल और नजीर स्थापित करना चाहती है, तो एम्स दिल्ली में ही ये मानक क्यों नहीं बन पा रहे? राजस्थान के जोधपुर एम्स की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है यहां 405 में से 171 पद खाली हैं। इसी तरह भोपाल, भुवनेश्वर, ऋषिकेश, पटना, नागपुर, और अन्य कई नए एम्स संस्थानों में भी बड़ी संख्या में स्वीकृत पद खाली पड़े हैं।

जिला अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी की वजह से मरीजों की उम्मीदें अक्सर एम्स जैसे संस्थानों पर टिक जाती हैं। लेकिन जब एम्स में भी डॉक्टर नहीं मिलते, तो यह स्थिति सीधे-सीधे आम नागरिक की सेहत पर असर डालती है। भारत जैसे देश में, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है, वहां एम्स जैसे संस्थानों में डॉक्टरों के खाली पद यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम वास्तव में किस दिशा में जा रहे हैं। ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता अंतरराष्ट्रीय मानकों से बहुत पीछे है। ऐसे में, सरकारों के सामने यह जिम्मेदारी है कि स्वास्थ्य तंत्र को मज़बूत बनाने की ओर ठोस कदम उठाए जाएं।

देश को अब सिर्फ संस्थान बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें चलाने लायक पर्याप्त संसाधन और मानव संसाधन देने की ज़रूरत है ताकि हर नागरिक को समुचित इलाज और स्वास्थ्य का अधिकार मिल सके।

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