राजस्थान में शिक्षा को लेकर नया बवाल गहराता जा रहा है। कक्षा 12 की राजनीति विज्ञान की किताब में नेहरू-गांधी परिवार सहित कई कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों का जिक्र है, लेकिन वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना में यह हिस्सा कहीं ज़्यादा विस्तार से है इसी बात को लेकर सियासत गरमा गई है।
भाजपा सरकार के मंत्री कह रहे हैं कि ये किताबें स्कूलों में नहीं पढ़वाई जाएंगी। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इतिहास में जिन प्रधानमंत्रियों का योगदान रहा, उनका उल्लेख करना अब असहज कर देने वाली बात बन गया है? क्या वर्तमान प्रधानमंत्री का अपेक्षाकृत कम जिक्र होना किताब हटाने का आधार बन सकता है?
क्या एक और एक नई किताब या पाठ्यक्रम वर्तमान प्रधानमंत्री और शासन के साथ इस किताब को जारी नहीं रखा जा सकता ?
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर का बयान चौंकाने वाला है:
“अगर कोई मुझे कहे कि साहब मैं हजार रुपये का ज़हर ले आया हूं और कहे कि खाना ही पड़ेगा तो ज़हर तो नहीं खाएंगे। बेकार चले जाएंगे पैसे तो चले जाएंगे।”
अगर सरकार इस किताब को अनुपयुक्त मान रही है, तो यह सवाल भी उठेगा कि पांच लाख किताबें छापने और 80% तक बांट देने तक किसी को आपत्ति क्यों नहीं हुई? पाठ्यपुस्तक मंडल और बोर्ड सचिव साफ कह रहे हैं कि यह सब सरकार की मंजूरी के बाद हुआ।
क्या सरकार अपनी ही प्रक्रिया और निर्णयों से मुकर रही है?
क्या यह तालमेल की कमी है या अफसरशाही पर दोष डालने की रणनीति?
क्या एकेडमिक मापदंडों और विशेषज्ञ समिति की राय की अब कोई अहमियत नहीं रही?
क्या पूर्व प्रधानमंत्रियों का उल्लेख पाठ्यपुस्तक के लिए ‘ज़हर’ हो गया?
यह पूरा विवाद न केवल शिक्षा व्यवस्था की साख पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सरकार और प्रशासन के बीच संवाद, समझ और ज़िम्मेदारी का संतुलन किस कदर गड़बड़ा गया है।
