बरसात, अगर तुम ना आती,तो अफसरशाही की चाल समझ ना आती।तू आई, तो गड्ढे उभर आए,स्कूल की छतें टपक-टपक जाए।

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बरसात, अगर तुम ना आती,
तो अफसरशाही की चाल समझ ना आती।

तू आई, तो गड्ढे उभर आए,
स्कूल की छतें टपक-टपक जाए।

नदियाँ उफनीं, पुल बह गए,
जनता के सपने फिर से ढह गए।
तेरा आना बना विघ्न बड़ा,
कोर वर्क से भटका अफसरों का धड़ा।

मरम्मत, निर्माण — सब नॉन कोर,
कोर वर्क तो है बस मीटिंग और रिपोर्ट की होड़।
नीतियों पर लेखों की रचना,
जैसे बारिश से नहीं, बस शब्दों से हो रचना।

बरसात तू आई, तो पर्दा उठा,
“विकास” का सच हर कोने से फूटा।
काश तुझसे डरते वो अफसर ज़रा,
जो कोर-नॉन कोर में उलझे सारा भरम सारा।

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