कांग्रेस ने राजस्थान में हाल ही में 45 जिला अध्यक्षों की नई सूची जारी की है। इस घोषणा के साथ ही पार्टी के भीतर नाराजगी और असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कई जिलों में टिकटार्थियों और स्थानीय नेताओं में सिर-फुटव्वल जैसी स्थिति बनी हुई है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इस पूरी प्रक्रिया में किस खेमे का पलड़ा भारी रहा—अशोक गहलोत या सचिन पायलट?
सब हाई कमान ने किया’
जिला अध्यक्षों की सूची जारी होने के बाद पूरे प्रदेश में इस बात पर चर्चा थी कि आखिर कांग्रेस के “पावर सेंटर” की पकड़ कितनी मजबूत है और किस नेता की बात को प्राथमिकता मिली। इसी बीच, जोधपुर में मीडिया के सवाल पर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साफ कहा कि जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। गहलोत ने कहा—”मैंने पहले ही हाई कमान को कह दिया था कि मैं इंटरफेयर नहीं करूंगा। जो भी हुआ, सब हाई कमान की पसंद से हुआ है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि जो 45 जिला अध्यक्ष बने हैं, वे सब उनके समर्थक हैं और वह भी उनका समर्थन करते हैं।
जोधपुर में ‘साफा एपिसोड’ बना चर्चा का केंद्र
जिला अध्यक्षों की नियुक्ति से कुछ दिन पहले ही जोधपुर में गहलोत का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी। सर्किट हाउस में कार्यकर्ताओं से मुलाकात के दौरान गहलोत ने अपना साफा उतारकर कांग्रेस नेता ओमकार वर्मा को पहना दिया था। इस घटना के बाद चर्चा तेज हो गई थी कि गहलोत ने संकेतों में ही भविष्य का संदेश दे दिया है। और हुआ भी वही—कांग्रेस की आधिकारिक लिस्ट जारी होने पर ओमकार वर्मा को जोधपुर शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इसके बाद गहलोत समर्थकों में खुशी देखी गई, जबकि अन्य गुटों में नाराजगी भी देखी जा रही है।
कई जिलों में मची भारी नाराजगी
नई जिलाध्यक्षों की सूची सामने आने के बाद कई जिलों में कार्यकर्ताओं ने खुले तौर पर नाराजगी जताई है। कई जगहों पर बैठकों और विरोध के स्वरों ने कांग्रेस की अंदरुनी खींचतान को उजागर कर दिया है। सियासी एक्सपर्ट्स के अनुसार, जिला अध्यक्षों की नियुक्ति 2028 विधानसभा की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी, इसलिए अंदरूनी असंतोष को शांत करना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है।
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