Political News: कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के समर्थक खेमों के बीच जुबानी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान भी हालात को शांत करने के लिए लगातार मंथन कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार बनने के समय दोनों नेताओं के बीच ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर सहमति बनी थी। अब जब सिद्धारमैया का आधा कार्यकाल पूरा होने को है, डीके शिवकुमार अपनी बारी की मांग को तेज कर रहे हैं। लेकिन देश का सियासी इतिहास बताता है कि सत्ता साझेदारी का ऐसा फार्मूला कभी अमल में नहीं आ पाया—और जहां-जहां आज़माया गया, वहां टकराव और टूट ही सामने आए।
पायलट बनाम गहलोत-फार्मूला बना विवाद की आग
राजस्थान में भी यही ढाई-ढाई साल वाला मॉडल विवाद की वजह बना था। जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने तो कहा गया कि सचिन पायलट से सत्ता साझा करने का एक अघोषित समझौता हुआ था। लेकिन जुलाई 2020 में हालात इतने बिगड़ गए कि गहलोत खेमे के विधायक मानेसर में डेरा डालकर बैठ गए। कॉन्ग्रेस हाईकमान ने बीच-बचाव की कोशिश की, लेकिन अशोक गहलोत अपने पद से हटने को तैयार नहीं हुए और उन्होंने पूरा कार्यकाल पूरा किया। इस विवाद ने पार्टी की आंतरिक राजनीति को गहरे तक झकझोर दिया था।
छत्तीसगढ़: बघेल–टीएस सिंह देव की खींचतान
छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस सरकार के भीतर भूपेश बघेल और टीएस सिंह देव के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर लंबा खींचतान चला। टीएस सिंह देव ने भी ढाई-ढाई साल के एक अघोषित समझौते का दावा किया था, लेकिन राजनीतिक ताकत और संगठन पर पकड़ के कारण भूपेश बघेल भारी पड़े। टीएस सिंह देव को आखिरकार पीछे हटना पड़ा, और बघेल ने पूरा कार्यकाल पूरा किया। हालांकि इसका असर 2023 के चुनाव में दिखा, जहां कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी।
महाराष्ट्र: ढाई-ढाई साल का फार्मूला तोड़कर शिवसेना ने तोड़ा गठबंधन
2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा–शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला था। लेकिन सरकार बनने से पहले ही सीएम पद पर ढाई-ढाई साल की रोटेशन का दावा सामने आया। शिवसेना ने कहा कि भाजपा ने चुनाव से पहले इस पर सहमति दी थी, लेकिन भाजपा ने इससे इनकार कर दिया—और यहीं से गठबंधन में बड़ा टूटाव आया। इसके बाद उद्धव ठाकरे ने भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस–एनसीपी के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी सरकार बनाई और खुद मुख्यमंत्री बने। हालांकि कुछ ही साल बाद शिवसेना में दो फाड़ हो गया और एकनाथ शिंदे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए।
कर्नाटक का संकट भी उसी राह पर?
कर्नाटक में सिद्धारमैया–शिवकुमार विवाद भी उसी ऐतिहासिक पैटर्न को दोहराता दिख रहा है। ढाई-ढाई साल का फार्मूला अगर फिर विफल हुआ, तो कर्नाटक सरकार के भीतर की इस खींचतान का असर आगामी चुनावों पर पड़ना तय माना जा रहा है।



