भारत में स्वास्थ्य सेवा अब सेवा नहीं, लूट का तंत्र बन चुकी है

0
1

दवा कंपनियाँ डॉक्टरों को कमीशन, विदेश यात्राएँ और महँगे तोहफे देकर अपनी ब्रांडेड दवाएँ लिखवाती हैं जबकि वही दवा जेनेरिक रूप में दसवें हिस्से की कीमत पर उपलब्ध होती है। डॉक्टर मरीज़ को उस लैब, उस डायग्नोस्टिक सेंटर भेजते हैं जहाँ से उन्हें हर टेस्ट पर 20 से 40 प्रतिशत का कट मिलता है। मरीज़ की ज़रूरत नहीं, डॉक्टर की कमाई देखी जाती है। बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल अपने डॉक्टरों को मासिक राजस्व का टारगेट देते हैं और टारगेट पूरा करने के लिए ग़ैर-ज़रूरी ऑपरेशन, ICU में भर्ती और लंबे इलाज की दबाव रहता है। मेडिकल की पढ़ाई में दाखिले के लिए 50 लाख से 2 करोड़ रुपये तक की डोनेशन/फीस वसूली जाती है और जो डॉक्टर इतना कर्ज़ लेकर पढ़ता है, वह मरीज़ से वसूलकर ही उबरता है। आयुष्मान भारत और बीमा योजनाओं के नाम पर फर्जी दावे, नकली प्रक्रियाएँ और फुलाए हुए बिल सरकारी खजाने को खोखला कर रहे हैं। जन औषधि की दुकानें खुलती हैं, पर केमिस्ट और डॉक्टर मिलकर मरीज़ को वहाँ जाने से रोकते हैं क्योंकि ब्रांडेड दवा में मुनाफ़ा है। और इस पूरे तंत्र की निगरानी करने वाले NMC, CDSCO और राज्य मेडिकल काउंसिल खुद इसी व्यवस्था के हिस्सेदार हैं।

नियम बने हैं, कागज़ों पर। असल में मरीज़ अकेला है, बीमार
और लुटा हुआ भी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here