जयपुर मोलेस्टेशन केस ने यह साफ कर दिया कि समाज का सबसे डरावना हिस्सा अपराधी का व्यवहार नहीं, बल्कि आस-पास खड़ी भीड़ की चुप्पी है। लोग देखते हैं, समझते हैं, लेकिन बोलते नहीं। लॉ एंड ऑर्डर का अर्थ सिर्फ गिरफ्तारी नहीं है। जब तक राजस्थान पुलिस “कम्युनिटी आउटरीच” को अपने मैंडेट का हिस्सा नहीं मानती, महिलाओं की “फ्री रोमिंग” एक सपना ही रहेगा।
राजस्थान में महिला सुरक्षा का असली संघर्ष कानून-व्यवस्था से ज़्यादा मानसिकता से है और मानसिकता बचपन में बनती है। स्कूलों में पुलिस का आउटरीच आज भी औपचारिकता से आगे नहीं बढ़ पाया, जबकि लड़कों को कॉन्सेंट और रिस्पेक्ट का पाठ पढ़ाना और लड़कियों को अपने अधिकारों व आत्मरक्षा के बारे में जागरूक करना भविष्य की सुरक्षा संस्कृति का पहला कदम है।
राजस्थान पुलिस का “अभय ” कार्यक्रम कागज़ पर है, ज़मीन पर नहीं। हर ज़िले में जेंडर सेंसिटाइज़ेशन ट्रेनर्स की अनिवार्य तैनाती, सालाना 20 स्कूल सत्र, और थानों में महिला मित्र सैल यह सब फाइलों में नहीं, हकीकत में उतरना चाहिए। आज भी जयपुर की चार दिवारी से लेकर जोधपुर के सदर बाज़ार तक, रात नौ बजे के बाद महिलाओं की मौजूदगी अचानक गायब हो जाती है यह सामान्य नहीं डर का मानचित्र है।
इस डर को मिटाने का तरीका स्पष्ट है हर महीने महिलाओं, पुलिस और नगर निगम की सेफ्टी वॉक जिसमें महिलाएँ खुद बताएं कि कौन-सी गली अंधेरी और कौन-सी जगह असुरक्षित लगती है, जिसका 60 दिनों में ठोस समाधान हो। लेकिन सबसे गहरी पीड़ा यह है कि कई बार अपराध से ज़्यादा डरावनी होती है समाज की चुप्पी जयपुर मोलेस्टेशन केस में जैसे भीड़ ने देखा, समझा, पर बोला नहीं। इसलिए राजस्थान को तुरंत एक बड़े पैमाने का बायस्टैण्डर इंटरवेंशन प्रोग्राम करना चाहिए
“देखो, समझो, बोलो” जहाँ हर मोहल्ले, हर बाज़ार में लोगों को हस्तक्षेप करने की ज़िम्मेदारी सिखाई जाए, और पुलिस का बीट कॉन्स्टेबल इस परिवर्तन का वाहक बने। यह तब तक संभव नहीं जब तक कम्युनिटी आउटरीच को SP और DySP की एसीआर का हिस्सा नहीं बनाया जाता, और पदोन्नति सीधे इस काम से नहीं जोड़ी जाती।
सुधार का असली नाम जवाबदेही है और राजस्थान की महिला तब तक सुरक्षित नहीं होगी जब तक वह आधी रात को अकेले निकले और एक बार भी पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत महसूस न करे क्योंकि वही दिन होगा जब पुलिसिंग नहीं, समाज की आत्मा बदली होगी।

