राजस्थान ऊर्जा विकास और आईटी सर्विसेज लिमिटेड (RUVITL) ने नियामक आयोग के 18 नवंबर 2025 के आदेश पर पुनर्विचार माँगा है, क्योंकि 25 वर्षों तक 3,200 मेगावाट कोयला खरीद की अनुमति नहीं मिली। समीक्षा याचिका का मुख्य तर्क यह है कि भविष्य की बिजली मांग आयोग ने “ठीक से देखी नहीं।” मगर याचिका पढ़ने के बाद लगता है कि शायद याचिका लिखने वालों ने खुद अपने ही दस्तावेज ठीक से नहीं देखे।
सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि जिस 1,350 मेगावाट की “संभावित रिटायरमेंट” दिखाकर कोयला खरीद को जरूरी बताया जा रहा है, उसी में 850 मेगावाट कोटा TPS की यूनिटें भी शामिल हैं।
ये वही यूनिटें हैं, जिनके बारे में दूसरी फाइलों में RVUNL केंद्र सरकार को बड़े गर्व से लिख रहा है कि बहुत कुशल हैं, बहुत सस्ती हैं, बहुत बढ़िया चल रही हैं।
कुछ फाइलों में ये यूनिटें रिटायर,
कुछ में “राजस्थान की शान।”
एक ही राज्य में दो राजस्थान चल रहे हैं एक योजना बनाने वालों का और एक कागजों पर उलझे तथ्यों का।
कोटा TPS का प्रदर्शन इतना अच्छा है कि उसने मार्च 2024 में 97 प्रतिशत उपलब्धता दिखाई। जिस यूनिट में इतना पैसा डालकर R&M और FGD लगा चुके हैं, जिस पर पूंजी लागत वसूल भी हो चुकी है, उसे “पुरानी” बताकर हटाने की कोशिश ऐसे की जा रही है जैसे कोई पुराना मोबाइल हो अपग्रेड चाहिए, तर्क नहीं।
इसी तर्ज पर सूरतगढ़ TPS की यूनिट 1 और 2 भी “रिटायर” घोषित कर दी गईं, जबकि न उम्र 30 साल पार, न तकनीकी कमी, न कोई कमीशन की नोटिंग। बस एक नई स्कीम को फिट करने के लिए पुरानी यूनिटों को अचानक “बुजुर्ग” घोषित कर देना CEA खुद कह चुका है कि उनकी उम्र वाली गाइडलाइन वित्तीय है, तकनीकी नहीं। पर राजकीय निर्णय गाइडलाइन से कम, और तर्क के साथ कम्फर्ट से ज्यादा चलते हैं।
राजस्थान का अजीब मॉडल है जो यूनिटें सबसे सस्ती बिजली देती हैं, उन्हीं को सबसे पहले रिटायर करने का प्रस्ताव। जो नई बिजली सबसे महंगी होगी, उसी को “अनिवार्य” बताया जा रहा है।
अगर यही आर्थिक विवेक है, तो उपभोक्ता भविष्य में अपने बिलों में “सरकार की रचनात्मकता शुल्क” जोड़कर भरने की तैयारी कर लें।
फिर उन परियोजनाओं को देखिए जिन्हें अचानक गायब कर दिया गया
- गिरल परियोजना: वापस
- छाबड़ा संयुक्त उद्यम: हवा में
- माही-बांसवाड़ा: अनिश्चित घोषित
- 630 मेगावाट फर्म RE: रद्द
- NTPC/केंद्रीय पावर: गिनती में ही नहीं
- रावतभाटा की संभावनाएँ: अनदेखी
ऐसा लगता है कि 3,200 मेगावाट की कोयला योजना पहले से तय थी बाकी सभी विकल्पों को बस इतना ही काम दिया गया:
“कृपया रास्ते से हट जाएँ, हम नई 3200 MW कोयला आधारित बिजली खरीद को जरूरी साबित कर रहे हैं।”नवीकरणीय ऊर्जा, स्टोरेज और हाइब्रिड समाधान जिन्हें देशभर में भविष्य का आधार माना जा रहा है इस याचिका में ऐसे पेश किए गए हैं जैसे वे “सहायक कलाकार” हों और कोयला ही कहानी का नायक। तथ्य यह है कि 25 वर्षों के लिए ऐसी भारी कोयला खरीद राजस्थान को उसी दौर में वापस ले जाएगी जब प्रदूषण, लागत और फिक्स्ड चार्ज मिलकर उपभोक्ताओं की जेब हल्की और हवा भारी करते थे।
समग्र निष्कर्ष यह है कि यह प्रस्ताव न प्रदर्शन पर आधारित है, न लागत पर, न राष्ट्रीय व्यवहार पर बस इस धारणा पर आधारित है कि अगर किसी चीज़ को बार-बार “आवश्यक” कहा जाए, तो वह वास्तव में आवश्यक हो जाती है।

