लेकिन पिछले 14 साल में यह हाल रहा कि जिन 300 सड़कों की योजना बनी, उनमें से अधिकांश की डिमार्केशन तक नहीं हुई. अप्रैल 2023 में जेडीए की मास्टरप्लान शाखा ने सभी ज़ोन से सड़कों की सूची मांगी थी, लेकिन इतनी धीमी प्रक्रिया रही कि महीनों बाद महज़ 225 सड़कों की जानकारी ही मिल पाई. चौंकाने वाली बात तो यह है कि इंजीनियरिंग शाखा के पास अब तक पूरी सूची ही नहीं है और जेडीसी की बैठकों में साफ़ हुआ कि जिन सड़कों का डेटा दिया गया है, उनमें कई की ज़मीन मौके पर मौजूद ही नहीं है.
सिस्टम के ढीला रवैए ने मास्टर प्लान की बलि चढ़ा दी
असलियत यह है कि मास्टर प्लान का पूरा खाका जेडीए की सुस्ती, विभागीय असमन्वय और राजनीतिक टालमटोल की भेंट चढ़ गया है. इसका सीधा असर जयपुर की जीवन-गुणवत्ता, ट्रैफिक व्यवस्था और शहरी स्वरूप पर पड़ा है. जिन सेक्टर सड़कों को समय रहते बना दिया जाता, वहां आज कॉलोनियों की गलियों में वाहनों की बेतहाशा आवाजाही न होती और मुख्य मार्गों पर जाम का दबाव कम हो चुका होता. सड़कें न बनने से अवैध कब्जे पक्के हो गए, और जो कभी “स्लम प्रिवेंशन प्लान” होना चाहिए था, वह उल्टा “स्लम प्रमोशन प्लान” साबित हो गया.
