हम बदलते क्यों नहीं

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लगातार बदलती दुनिया और माहौल के बावजूद आप हमारे आस पास और ख़ास कर सरकार से जुड़े मसलों में बदलाव देखने को नहीं मिलता है। विशेषकर राजस्थान जैसे प्रदेश जिसमे मतदाता लगातार बदलाव करते पर उसके अनुरूप इसकी झलक प्रशासन-नीतियों में क़तई नहीं दिखती है। बदलाव के नाम पर कुछ ट्रांसफ़र डेपुटेशन और अस्थायी कर्मचारियों को हटा कर सरकारें बड़ा दम भरती है जबकि इससे धरातल पर कोई आमूलचूल परिवर्तन देखने को नहीं मिलता। हमें ज़रूरत है नीतिगत बदलावों व आम जीवन में सकारात्मक परिवर्तन दिखने की। साढ़े सात करोड़ जनसंख्या के प्रदेश में रोज़गार के नाम पर केवल कुछ दशमलव सरकारी नौकरी के अलावा कोई और चर्चा नहीं होती। हम नहीं बदल पा रहे क्योंकि बुनियादी रूप में हम उन सवालों से भाग रहे है जो आम राजस्थानी की प्रगति के लिए आवश्यक है। शहरी विकास से पर्यावरण तक और रोज़गार से दैनिक जीवन के सामान्य संघर्ष जैसे ट्रैफिक-सफ़ाई पर हम यथास्थिति को अंगीकार कर चुके है।

पर हमे बदलना चाहिए क्योंकि हमारे शहरों की आबोहवा लगातार बद से बदतर हो रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अनुसार राजस्थान के बड़े शहरों के साथ कस्बों में बढ़ा वायु प्रदूषण लगातार विकराल रूप ले रहा है। स्वच्छ वायु कार्यक्रम के बावजूद न केवल गैर-लक्ष्य प्राप्ति वाले शहरों में बल्कि राजस्थान के छोटे शहरों और कस्बों में भी वायु की गुणवत्ता खराब हो रही है। वायु गुणवत्ता में समयबद्ध सुधार के लिए उद्योग, वाहन और परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, अपशिष्ट प्रबंधन, निर्माण और हरियाली सहित प्रदूषण के सभी प्रमुख क्षेत्रों में प्रणालियों और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए राज्यव्यापी कार्रवाई की आवश्यकता है। बेरोज़गारी में देश में अव्वल स्थानों पर होने के बावजूद हमारे पास इससे पार पाने के लिए कोई कार्यायोजना नहीं है। हमारे ट्रैफिक यातायात दयनीय हालत में है हम नये सुसज्जित शहरों की बजाय सरकारी ज़मीन पर घालमेल के तरीक़ों से ज़मीन के पट्टों से वोट लेने तक सीमित हो चले हैं। आर्थिक उदारवादी दौर के बाद राजस्थान की राजनीति आज सबसे उदारवादी आकार में है जहाँ बिना पूर्वाग्रह के एक नए चेहरे के हाथ में प्रदेश की कमान है सुधार के लिए इससे बेहतर कोई संयोजन नहीं हो सकता है। हमे बदलना चाहिए क्योंकि दो दशक पूर्व आई सूचना प्रोद्योगिकी क्रांति में हम बेंगलूरू पुणे हैदराबाद मुंबई गुड़गाँव से पिछड़ चुके है, हमारे शहरों के खूबसूरत हैरिटेज वास्तुकला को सहेजने और आगे बढ़ाने में हम नाकामयाब रहे है। हमे बदलना चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया हमारे पुरातत्व-पर्यटन में काफ़ी सरोकार और संभावना देखती है। हमारी विविध संस्कृति भौगिलिकी स्थिति और स्थापत्य कला समन्वेषण की नई परिभाषा तय कर सकती है। हमारी परिधान संस्कृति और ब्लॉक प्रिंटिंग कला प्रेमियों में उत्तेजना पैदा करती है इसके संवर्द्धन के लिए हमे बदलना चाहिए। एक ऐसे नये कल के लिये जिसमें आशाओं का अम्बर संभावनाओं का सागर और सुनहरे भविष्य की संरचना हो के लिए हमें बदलना चाहिए।

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