आज के भारतीय शहरों की हालत देश की विकासगाथा पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है।

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बढ़ती आबादी, जाम, पानी की कमी, प्रदूषण, कचरे के ढेर और बेतरतीब विस्तार ने शहरी जीवन को असुरक्षित और अव्यवस्थित बना दिया है। यह केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि आर्थिक क्षति, सामाजिक असमानता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का कारण भी है। विश्व बैंक और अन्य संस्थानों के आकलन बताते हैं कि भारत को अगले दो दशकों में कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब ₹83–85 लाख करोड़) का निवेश अपने शहरों के पुनर्निर्माण और विस्तार के लिए चाहिए। यह केवल सड़कें या मेट्रो बनाने की बात नहीं है, बल्कि जलवायु-प्रतिरोधी, ऊर्जा-कुशल और नागरिक-केंद्रित शहरों की रचना का सवाल है। अनुमान है कि 2050 तक भारत की शहरी जनसंख्या लगभग दोगुनी होकर 950 मिलियन तक पहुँच जाएगी, यानी हमें अगले 25 वर्षों में लगभग 400–500 मिलियन नए शहरी निवासियों के लिए रहने, काम करने और आवागमन की व्यवस्था करनी होगी। यदि अभी बड़े पैमाने पर निवेश नहीं हुआ तो भविष्य में यह संकट आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय त्रासदी का रूप ले लेगा। देरी का मतलब है महंगे सुधार, असमानता में वृद्धि और जलवायु जोखिम का गहराना। 1 ट्रिलियन डॉलर का यह निवेश सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि बचाव और पुनरुत्थान दोनों है; यह रोज़गार सृजन, आर्थिक उत्पादकता, सार्वजनिक परिवहन, हरित अवसंरचना और किफायती आवास के जरिए आने वाले दशकों की स्थिरता का आधार बनेगा। स्थानीय निकायों के वित्तीय सुधार, भूमि उपयोग नीति, ग्रीन बॉन्ड, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और क्लाइमेट-रेज़िलिएंट डिजाइन को इस निवेश रणनीति में शामिल करना होगा। यह निवेश भारत की वृद्धि कहानी का सबसे निर्णायक अध्याय हो सकता है एक ऐसा अध्याय जो शहरों को भीड़ और अव्यवस्था से निकालकर उन्हें मानव गरिमा, अवसर और जीवन की गुणवत्ता का केंद्र बना दे। अब यह सवाल नहीं कि हम इसे वहन कर सकते हैं या नहीं; सवाल यह है कि क्या हम इसके बिना अपने भविष्य को वहन कर पाएंगे?

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