राजस्थान में दीपावली से पहले सरकारी स्कूलों को सजाने, रंग-रोगन और लाइटिंग से चमकाने का अभियान चलाया जा रहा है. शिक्षा विभाग का विद्यालय सौंदर्यीकरण एवं कायाकल्प अभियान बैनर के तहत प्रशासन जिलों में विज्ञापन, नोटिस और रंगीन तस्वीरें जारी कर रहा है, जिसमें हर स्कूल परिसर को त्योहार के रंग और रोशनी से जगमगाने की तैयारी का विवरण मिलता है. दीवाली जैसे त्योहार पर हमारे स्कूलों को जगमग करने की ये सोच अच्छी है. लेकिन सच्चाई यह है कि स्कूल भवनों की हालत, सुरक्षा, सुविधाओं और मरम्मत पर जब सिस्टम की असली परीक्षा आती है, तो आंकड़े और घटनाएँ सामने आते ही सरकारी मॉडल की पोल खुल जाती है.
हाल ही में स्कूल के जर्जर भवन के सुधार कार्य के मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी आई कि काम सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि हकीकत में भी उतरने चाहिए. झालावाड़ हादसे में एक स्कूल भवन ढह गया और बच्चों की जान पर बन आई. उसके बाद हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार से सख्त सवाल पूछा कि कागजों में मरम्मत-रंग-रोगन के काम की बजाय वास्तव में स्कूलों की सुरक्षा, भवन की मजबूती और आधारभूत सुविधाओं को प्राथमिकता मिले. अदालत ने रिपेयरिंग के काम की स्वतंत्र निरीक्षण एजेंसी से जांच की बात कही, साथ में सभी पक्षों को नाम सुझाने के निर्देश दिए. उच्च न्यायालय ने कहा कि जो बजट पांच लाख रुपये प्रति स्कूल तय किया गया है, उसमें महज रंग-रोगन ही हो सकता है; जबकि हजारों स्कूलों की छतें टूटी हैं, दीवारें कमजोर हैं, बच्चों की क्लास टीन शेड या अस्थायी ढांचे के नीचे चलती हैं.
ऐसा इसलिए, क्योंकि प्रदेश में करीब 1,21,000 सरकारी/मान्यता प्राप्त स्कूल हैं. इनमें शिक्षा विभाग और UDISE+ 2025 के आंकड़ों के अनुसार 7,800 स्कूल भवन जर्जर या असुरक्षित श्रेणी में हैं. 5,100 स्कूलों में आज भी शौचालय नहीं है. 3,300 स्कूलों में पक्की छत नहीं, जगह-जगह टीन शेड हैं. 18,000+ स्कूल ऐसे हैं, जहां कई कक्षाएं एक साथ पढ़ाई करती हैं या बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर अनुपस्थित है. सफाई, पानी, बिजली, डेस्क-बेंच, टॉयलेट जैसी सुविधाओं की स्थिति 20 फीसदी प्राथमिक-उच्च प्राथमिक स्कूलों में न्यूनतम स्तर पर है.
सत्र की शुरुआत होती है तो भवन की मरम्मत, छत की मजबूती, शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था अक्सर कागज पर या मॉडल फाइलों में रह जाती है. दीपावली पर सौंदर्यीकरण की सरकारी तस्वीरों में हल चल दिखती है, पर सैकड़ों-हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां रंग-रोगन सिर्फ उधार ली गई दीवारों तक ही सीमित है. बाकी जगह अंदरूनी जर्जर हालत, दीवारों में दरारें, बरसात में टपकता पानी, टूटे-फूटे गेट बच्चों की सुरक्षा रोज़ खतरे में रहती है.
हाईकोर्ट ने हाल में जो कहा, वो सोते सिस्टम पर करारा तमाचा है!
हाईकोर्ट पांच लाख रुपये प्रति स्कूल का बजट तय किया; क्या इससे ठोस मरम्मत हो पाएगी? लाखों रुपये सिर्फ रंग-सफेदी में चले जाते हैं, क्या जर्जर छत, दीवारें और आधारभूत कमियां इससे ठीक होंगी? महाधिवक्ता ने कहा कि जरूरत पड़ी तो बजट बढ़ाया जाएगा, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि मरम्मत-अवलोकन का काम स्वतंत्र एजेंसी से कराया जाए, न कि ठेकेदार-पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के भरोसे.
सरकारी रिपोर्ट में दावा है कि सबसे जर्जर स्कूल भवनों में सुधार मार्च 2026 तक कर लिया जाएगा; बाकी में काम नवंबर 2026 तक. पर अदालत ने कहा रिपोर्ट सतही न हो, हर जिले, ब्लॉक और गांव के स्कूल की असली हालत का परीक्षण होना चाहिए. कोर्ट की निगरानी में सरकार को रोडमैप देना है कि कितनी संख्या में जर्जर स्कूल हैं, मरम्मत कब पूरी होगी, किस स्कूल में क्या-क्या समस्या है.
इस बीच सैकड़ों-हजारों बच्चों की पढ़ाई प्रतिदिन खतरे में है. एक तरफ सरकारी बजट की सीमाएं; दूसरी तरफ मेरिट, मॉनीटरिंग और बेसिक सुविधाओं की सच्चाई. सरकार प्रत्येक स्कूल को दीपावली पर सजाने की घोषणा कर ही है, लेकिन हजारों स्कूलों के बच्चे अभी भी टीन शेड, अस्थायी छत, बिना बाथरूम और बगैर पानी के रोज पढ़ाई कर रहे हैं. शिक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान के ग्रामीण प्राथमिक-उच्च प्राथमिक स्कूलों में लगभग 30% में लड़कियों/बालिकाओं के लिए अलग टॉयलेट नहीं है जिससे सुरक्षा, स्वास्थ्य और बच्चियों की शिक्षा पर सीधा असर है.
