वागड़ का अहमदाबाद- दाहोद जैसे 5 अहम शहरों से सीधा जुड़ाव, हालात यह कि एक फोर लेन सड़क भी नहीं
आज बांसवाड़ा में देश की आठवीं परमाणु विद्युत परियोजना का शिलान्यास होगा. इससे राजस्थान की कुल बिजली जरूरत का 20 फीसदी उत्पादन का रास्ता साफ होगा. पानी, बिजली के साथ यह क्षेत्र मैंगनीज अयस्क, डोलोमाइट, चूना पत्थर, तांबा, क्वार्टजाइट जैसे खनिजों का भंडार है. इसमें एक चमक अब सोने की भी जुड़ने वाली है, जो देश के कुल सोने की आपूर्ति का 25% तक योगदान कर सकता है. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और झारखंड के बाद बांसवाड़ा चौथा क्षेत्र होगा, जहां सोने का खनन होगा. करीब 113.52 मिलियन टन स्वर्ण अयस्क के आंकलन के साथ देश को बड़ा भंडार मिलने का अनुमान है.
इन तमाम प्राकृतिक उपहारों के बावजूद यह इलाका आजादी के 78 साल बाद भी उपेक्षा का शिकार है. प्रधानमंत्री की सभा स्थल पर 1 लाख से ज्यादा लोग बांसवाड़ा जिले के नापला (छोटीसरवन) आएंगे. इस जगह तक जाने के लिए गेमन पुल ही एकमात्र रास्ता है. बांसवाड़ा-रतलाम रोड पर स्थित माही नदी पर बने इस 1.27 किलोमीटर पुल की सेहत पर भी कई बार सवाल खड़े हो चुके हैं. इसकी आयु बढ़ाने के लिए कई तरह की मशक्कत की जा रही है. बूढ़े होते इस पुल की मजबूती में कुछ कमी आने की स्थिति में ‘मास्टिक’ का काम किया गया, ताकि इसकी आयु करीब 10 से 15 साल और बढ़ जाए. इसके सभी 27 स्पान के क्षतिग्रस्त हुए हिस्सों की मरम्मत का प्लान भी साल 2017 में बनाया गया था.
वहीं, हवाई या रेल कनेक्टिविटी की बात छोड़िए, एक ऐसा जिला है जहां एक भी फोर-लेन नहीं है. जबकि बांसवाड़ा का नजदीकी 5 बड़े शहरों से सीधा जुड़ाव है. बावजूद इसके बांसवाड़ा से रतलाम, अहमदाबाद, उदयपुर, निम्बाहेड़ा और दाहोद तक जाने के लिए सिर्फ टू लेन है.
दिल्ली- मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से गुजरता तो 90 किमी से ज्यादा की दूरी होती कम
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे को लेकर पहले खबर आई कि यह बांसवाड़ा से गुजरेगा लेकिन इस मामले में भी निराशा हाथ लगी. यह एक्सप्रेसवे रतलाम जिले से 91 किलोमीटर की दूरी तक गुजरता है और जिले के लगभग 87 गांवों को कवर करता है. झाबुआ से तलावड़ा, महूड़ी का माल होते हुए सैलाना, रतलाम जिले में प्रवेश करता है. एक अनुमान के मुताबिक, अगर दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से होकर बनाया जाता तो कुल दूरी में लगभग 60-70 किलोमीटर की बचत होती. वर्तमान में यह एक्सप्रेसवे राजस्थान के कोटा, चित्तौड़गढ़, रतलाम होते हुए गुजरता है, जबकि बांसवाड़ा मार्ग भौगोलिक रूप से छोटा व सीधा पड़ता है और इससे गुजरात का प्रवेश क्षेत्र भी जल्दी आता. इससे ईंधन, समय, दोनों की और बचत होती, और राजस्थान के दक्षिणी यानी आदिवासी क्षेत्र को भी बड़ा आर्थिक फायदा मिलता.
परमाणु परियोजना को भी करना पड़ा लंबा इंतजार
आज से 13 साल पहले 3 जून 2011 के दिन डूंगरपुर-रतलाम वाया बांसवाड़ा रेलवे परियोजना का शिलान्यास हुआ था. तत्कालीन गहलोत सरकार के दौरान यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शिलान्यास किया था. योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से 200 करोड़ रुपए भी दे दिए गए थे, लेकिन यह परियोजना कई वजहों से ठंडे बस्ते में चली गई, जिसके बाद से ही यहा रेलवे परियोजना का काम ठप्प हो चला हा है. जिला मुख्यालय पर उप मुख्य अभियंता कार्यालय भी बंद हो गया.

