
SMART METER SCAM ?
What was pitched as a power sector reform is now under scrutiny by the Enforcement Directorate (ED) for large-scale corruption in Bihar.According to ThePrint, Genus Power Infrastructures Ltd. won a ₹3,300 crore contract (2022–23) to install smart meters across Bihar. The ED alleges that ₹60 crore was routed as kickbacks to IAS officer Sanjeev Hans through subcontracting to his controlled firms. He served as CMD of Bihar State Power Holding Co. Ltd.

माँ का दूध ही ज़हर बन रहा है यह सिर्फ़ मातृत्व का नहीं, हमारे सिस्टम का संकट है। यह सिर्फ़ ग्रामीण या ग़रीब तबके की समस्या नहीं है।शहरी, शिक्षित और मध्यम वर्गीय महिलाएं भी इस संकट से जूझ रही हैं। यह एक सार्वजनिक नीति संकट है, जिसकी जड़ें खाद्य नीति, कृषि नियंत्रण, स्वच्छता व्यवस्था और स्वास्थ्य निगरानी की लापरवाही से जुड़ी हैं।
जरूरत है एक समग्र सार्वजनिक नीति की जिसमे- 1. स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए टॉक्सिकोलॉजी जांच अनिवार्य की जाए। 2. जल स्रोतों की ज़हर मुक्त मानिटरिंग नीति लागू की जाए। 3. गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए कीटनाशक मुक्त पोषण किट शुरू की जाए। 4. दूध, अन्न और घरेलू जल के लिए स्थानिक रासायनिक विश्लेषण प्रयोगशालाएं स्थापित हों। 5. मातृत्व और बाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों को रसायन जागरूकता अभियान से जोड़ा जाए। 6. घरेलू उपयोग में लाए जा रहे डिटर्जेंट/कीटनाशकों के लिए सुरक्षित भंडारण नियमों के साथ प्लास्टिक फ़ूड पैकेजिंग को रोकने की जनजागरूकता हो।

देवीलाल चौधरी का नारा – अजगर कांग्रेस को खा जाएगा और पहली बार बीजेपी सत्ता में आई.
*जब शाहपुरा में जाट नेता ने ऐलान किया- मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत होंगे* *यहां जानिए राजस्थान में जाट राजनीति की बड़ी उथल- पुथल के बारे में*
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद राजस्थान में जाट राजनीति का मुद्दा गरमा गया है. प्रदेश में परसराम मदेरणा, नाथूराम मिर्धा जैसे दिग्गज नेताओं ने राजस्थान की राजनीति में योगदान तो दिया, लेकिन जाटों का अच्छा दबदबा होने के बावजूद कभी इस जाति से कोई भी नेता मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. बहरहाल, 1985 के विधानसभा चुनाव के बाद से जाट वर्ग विभिन्न दलों में बंटा हुआ रहा, जिससे जाट नेतृत्व में अक्सर टकराव होता रहा. नाथूराम मिर्धा राजस्थान लोकदल के अध्यक्ष और विधायक दल के नेता रहे, वहीं कल्याणसिंह कालवी जनता पार्टी के अध्यक्ष बने. चौधरी चरण सिंह के स्वास्थ्य में गिरावट के बाद उनके पुत्र अजीत सिंह फिर राजनीति में उभरे. 1979 में जनता पार्टी के बिखरने के बाद दल-दल की स्थिति और गहराई. इन सबके बीच, एक नारा जो 1990 के दशक में बड़ा प्रचलित हुआ था और यह नारा दिया था दिग्गज जाट नेता देवीलाल चौधरी ने. 1990 के विधानसभा चुनाव के दौरान कहा था कि ‘अ.ज.ग.र. यानी अहीर-जाट-गुजर-राजपूत कांग्रेस को खा जाएगा और हुआ भी ऐसा ही. कहानी शुरू होती है 1985 के चुनाव से. जब इमरजेंसी में जेल गए नेताओं और उनके द्वारा गठित पार्टियों की स्थिति सुधरती जा रही थी. भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय जनसंघ पूरा क्षेत्र अपने अधीन कर लिया था. लेकिन किसान वर्ग के नाम पर जाट नेतृत्व में टकराव जारी था. नाथूराम मिर्धा राजस्थान लोकदल के अध्यक्ष और विधायक दल के भी नेता थे. जनता पार्टी के अध्यक्ष कल्याणसिंह कालवी थे. चौधरी चरण सिंह का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहने लगा था. तभी 1990 के चुनाव की तैयारी भी शुरू हो गई थी. जनता दल के नेता चौधरी देवीलाल ने लोकसभा चुनाव के समय एक नारा दिया था अ.ज.ग.र. यानी – अ – से अहीर, ज – से जाट, ग – से गुजर और र – से राजपूत और कहा था कि यही ‘अजगर’ कांग्रेस को खा जाएगा. इसी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर चुनाव लड़ा गया और कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी. कांग्रेस के खाते में सीटें आई 50, जबकि बीजेपी 85 और जनता दल 55 सीटें जीतने में कामयाब रहीं. राजस्थान की कुर्सी बीजेपी के खाते में आई. देवीलाल ने शाहपुरा (जयपुर) की आम सभा में घोषणा कर दी थी कि राजस्थान के अगले मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत होंगे और वैसा ही हुआ. किसी ने इस पर विरोध जाहिर नहीं किया और जनता दल- बीजेपी की सरकार बनी. देवीलाल की राजस्थान में सक्रियता कभी शेखावत को पसंद नहीं थी इससे पहले, जनता दल की सरकार में बढ़ता तनाव, राम मंदिर निर्माण का मुद्दा और मंडल आयोग की सिफारिशों ने दिल्ली में बैठे सत्ता के साझीदारों को हिलाकर रख दिया था. इधर, राजस्थान में चौधरी देवीलाल की निरंतर बढ़ती सक्रियता और गतिविधियों का प्रारंभ में बीजेपी नेता भैरोसिंह शेखावत ने भी विरोध किया था और उन्होंने कहा कि राजस्थान को हरियाणा का उपनिवेश नहीं बनाने देंगे. फिर दोनों एक रथ पर सवार होकर निकल पड़े… लेकिन जब राजस्थान में गठबंधन की सरकार बनी तो देवीलाल और शेखावत एक ही रथ में सवार होकर शेखावाटी, चूरू, बीकानेर, गंगानगर समेत कई जिलों का दौरा किया. देवीलाल के पोते अजयसिंह दातारामगढ़ से विधायक चुने गए थे, जो भैरोसिंह शेखावत का गृह जिला था. जब भाजपा ने वी.पी. सिंह सरकार का समर्थन वापस लिया, तब इसकी प्रतिक्रिया में राजस्थान में शेखावत की सरकार गिराने के लिए जनता दल के सदस्यों को खुला खेलने को कहा गया. इस पर राजस्थान जनता दल में दो धड़े हो गये. मंत्रिमंडल के 11 सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया, लेकिन जनता दल (दिग्विजय सिंह) के धड़े ने शेखावत का साथ दिया. इससे सरकार तो गिरने से बच गई, लेकिन जनता दल में बिखराव हो गया. इसके बाद डॉ. चन्द्रभान वाले जनता दल के भी 3 टुकड़े हो गए. इसी बीच, नाथूराम मिर्धा का एक धड़ा कांग्रेस में फिर से वापसी कर गया.

मल-मूत्र खरीदने के लिए माइक्रोसॉफ्ट खर्च करेगा 14 हजार करोड़ रुपए, दुनिया की प्रमुख टेक कंपनी की यह डील आपको चौंका देगी!
माइक्रोसॉफ्ट अमेरिका में कार्बन रिमूवल के लिए बड़ा कॉरपोरेट निवेश करने जा रहा है. यह कोई आम डील नहीं, बल्कि विश्व की प्रमुख टेक कंपनी मानव अपशिष्ट, खाद और सीवेज खरीदने के लिए 1.7 बिलियन डॉलर यानी 14 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा खर्च करेगा. सीधे तौर पर, टेक कंपनी अब 14 हज़ार करोड़ रुपए खर्च कर इंसानी मल-मूत्र खरीदकर करेगा. सुनने में ये थोड़ा अजीबो-गरीब प्रोजेक्ट जरूर लग रहा है, लेकिन बिल गेट्स ने इसके लिए वॉल्टेड डीप से 12 साल का समझौता किया. यह प्रोजेक्ट 12 साल यानी 2038 तक के लिए होगा. इसके तहत 4.9 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड हटाने का समझौता किया गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तकनीक से मीथेन उत्सर्जन कम, जमीन-पानी प्रदूषण की रोकथाम और स्थानीय रोजगार बढ़ेंगे. क्या है वॉल्टेड डीप और यह कंपनी कैसे काम करती है? वॉल्टेड डीप प्रदूषण से निजात पाने के लिए काम कर रही है. यह तकनीक का उपयोग करके इसे स्थायी रूप से हटाने के लिए पृथ्वी में बहुत गहराई तक इंजेक्ट करते हैं, ताकि स्थायी रूप से कार्बन लॉक हो जाे. इससे वातावरण से कार्बन हटाने के साथ ही मीथेन का उत्सर्जन भी कम होता है. माइक्रोसॉफ्ट ने डील के बारे में दी जानकारी माइक्रोसॉफ्ट का कहना है, “वॉल्टेड डीप कार्बन रिमूवल के लिए सुरक्षित, भरोसेमंद व स्केलेबल तकनीक प्रदान करता है, जिससे न केवल जलवायु को तुरंत लाभ मिलता है बल्कि लोकल इकोनॉमी में भी रोज़गार सृजित होता है.” यह डील दोनों कंपनियों के लिए वेस्ट मैनेजमेंट और जलवायु परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिससे वॉल्टेड डीप अपना मॉडल अमेरिका भर में विस्तार कर सकेगा.

मैं वही गरीब हूं, जिसकी मजबूरियां हजार हैं, और आवाज़ अब भी दबी रह जाती है। मैं वही हूं, जिसकी भूख को आंकड़ों में, नीतियों में और बजट भाषणों में पिरोकर हर साल बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं। सरकारें आती हैं, लाखों करोड़ के विकास के सपने सजा जाती हैं…लेकिन मेरे घर की रसोई अब भी ठंडी है।
मुझे याद है कितनी ही रातें मैं खुले आसमान के नीचे आंखों में उज्ज्वल भविष्य का सपना लिए गुजारता हूं, लेकिन नींद टूटती है, तो फटी चादर, खाली पेट और टूटी छत का सच सामने खड़ा रहता है।
कभी व्यवस्था मेरे सिर पर पुल गिरा देती है, तो कभी सरकारी स्कूल की छत! हर बार मेरा परिवार आस लगाता है कि शायद इस बार हमारी फरियाद सुनी जाएगी, शायद इस बार योजनाओं की रकम घर तक पहुंचेगी… लेकिन हर बार उम्मीदें उन्हीं फाइलों में दबकर दम तोड़ देती हैं, जहां ‘गरीब कल्याण’ सिर्फ एक आंकड़ा है।
मुल्क में हर साल 5 लाख करोड़ रुपए खाद्य सुरक्षा, 60 हजार करोड़ मनरेगा, और न जाने कितनी योजनाओं में खर्च होते हैं। कागजों में मेरे लिए भरपूर इंतजाम दिखता है, लेकिन रोटी का टुकड़ा अब भी छिन जाता है किसी साहब के दस्तखत या बाबू की फाइल के नीचे। आवाज़ उठाई, मदद की गुहार लगाई फिर भी मेरी दुनिया में सन्नाटा है।
मेरे बेटे ने ख्वाब देखा था कलक्टर बनेगा, डॉक्टर बनेगा… उस दिन उसे स्कूल भेजा था, भरोसा था वो पढ़-लिखकर मेरी तकदीर बदल देगा। लेकिन व्यवस्था की लापरवाही की छत उसके सिर पर गिर गई। मासूम की लहूलुहान देह कंधे पर डाल अस्पताल भागा—लेकिन शिक्षकों समेत सभी जिम्मेदारों ने हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया। संवेदनाओं के भाषण मिले, लेकिन इन्साफ नहीं।
कई बार स्कूल की दीवार खिसकी, शिकायत की लेकिन ना स्कूल ने सुनी, ना अफसरों ने, ना गांव के सरपंच ने। कागजों में करोड़ों उसी स्कूल के नाम चले, लेकिन मेरे बच्चे की हिफाजत के लिए एक मजबूत छत तक नसीब न हो पाई।
आज मेरा बच्चा चला गया मैं दो दिन खबरों में रहूंगा, लोग सहानुभूति जता जाएंगे। फिर वही पुराना संघर्ष, वही भूख, वही बेबसी, फिर नए आंकड़ों में छुपी मेरी तकलीफ।
मैं सिर्फ इतना चाहता था कि मेरे बच्चों को बराबरी का मौका मिले, वे भी डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनें…लेकिन मेरी हसरतें अपनी उम्र से पहले ही दम तोड़ रही हैं। सिस्टम झूठी तसल्ली दे जाएगा, लेकिन मुझे अपनी उम्मीदें, अपने जख्म और अपने गरीब होने का सच खुद ही ढोना है… हमेशा की तरह।
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जब दुनिया ने जाना कि सरिस्का में एक भी टाइगर नहीं बचा है और फिर सरिस्का आबाद हुआ.
लेकिन आज उसी सरिस्का में टाइगर के लिए हम इंसानी दखल को बढ़ाना चाहते हैं, इसके नतीजे कितने गंभीर होंगे?
आज बाघों ने अपने ऐतिहासिक क्षेत्र का 95% खो दिया है. यानी वो महज 5% क्षेत्र में संघर्ष कर रहे हैं. भारत में दुनिया के लगभग 75% बाघ की आबादी निवास करती है. टाइगर्स के मामले में भारत के अलावा रूस, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मलेशिया, इंडोनेशिया और थाईलैंड प्रमुख देश हैं.
आज भारत में कुल 58 टाइगर रिजर्व अधिसूचित हैं, जो देश के लगभग 2.5% भौगोलिक क्षेत्र को घेरते हैं. भारत में ही दुनिया के 70% से ज़्यादा जंगली बाघों का घर है. आज देश के 18 राज्यों के 58 अभयारण्यों में 3,682 बाघ हैं.
मई 2005 में एक ऐसा वाकया हुआ, जब दुनिया हैरान रह गई. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री नमो नारायण मीना ने भारतीय संसद को बताया था कि अरावली के मुकुट सरिस्का में अब कोई बाघ नहीं बचा है. 2003 और 2004 टाइगर की हत्याओं के लिए बदनाम रहा और हमने सरिस्का में इस प्रजाति को खो दिया. इसके बाद शुरू हुआ रणथंभौर से लाए गए बाघों का पुनर्वास. सरिस्का अभयारण्य के वन क्षेत्र की सीमा तथा सुरक्षा को बढ़ाया गया, जिसके कारण वर्तमान में यहां लगभग 50 बाघ आबाद हो चुके हैं.
लेकिन सरकार को शायद टाइगर की यह आबादी रास नहीं आ रही है, इसी के चलते सरिस्का टाइगर रिजर्व की सीमा पुनर्निर्धारण के नाम पर इंसानी दखल को बढ़ाने की तैयारी कर ली गई है. क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) क्षेत्र की सीमा को फिर से तय करने के सरकारी प्रस्ताव का वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों ने विरोध शुरू कर दिया है.
केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा है कि सीटीएच के पुनर्सीमांकन का आधार वैज्ञानिक मूल्यांकन और बाघों के संरक्षण की आवश्यकताओं पर केंद्रित है, न की खनन को छूट देने के उद्देश्य से प्रेरित है. वह इस विरोध को राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं.
अब आप पूरा मामला समझिए और खुद ही फैसला कीजिए कि इसका सीमा निर्धारण कितना सही है?
वर्तमान में सरिस्का का जंगल 1213 वर्ग किलोमीटर में फैला है. इसमें 886 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र जंगल का कोर एरिया है. जबकि अन्य क्षेत्र बफर जोन में शामिल है.
1997 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरिस्का का सीमांकन निर्धारित किया गया था. 1997 में गजट नोटिफिकेशन के दौरान कई माइंस बंद कर दी गई थी. साल 2023 का मामला कोर्ट में जाने के बाद कोर एरिया का 1 किलोमीटर और बफर के 10 किलोमीटर में व्यावसायिक ओर खनन गतिविधि पर पूर्ण रोक लगा दी थी. इसके चलते सरिस्का टहला क्षेत्र की 57 खान बंद कर दी गई थी.
लेकिन अब टाइगर रिजर्व का एरिया अब 1873 वर्ग किलोमीटर का हो जाएगा. इसमें अलवर, जयपुर वन मंडल का जंगल शामिल किया जा रहा है. सरिस्का प्रशासन ने यह प्रस्ताव सरकार को भेजा है. जुलाई तक इस प्रस्ताव पर मुहर लगने की संभावना है.
सीटीएच का दायरा बदलने से क्या होगा?
सीटीएच का दायरा बदलने से टहला क्षेत्र की बंद करीब 50 से अधिक मार्बल की खाने शुरू हो जाएंगी. साथ ही होटल्स पर गिरी गाज भी खत्म हो सकती है. इस परिवर्तन से सरिस्का के लिए खतरा पैदा हो सकता है. क्योंकि इस वक्त 48 टाइगर हैं, उनका जीवन खतरे में है. टाइगर के उस क्षेत्र को चेंज करने की कोशिश की जा रही है, जिस क्षेत्र में टाइगर का पहले से ही आवास है.

एम्स जोधपुर के ट्रॉमा और क्रिटिकल केयर ब्लॉक की डिजाइन में गंभीर खामियां, आपातकालीन सेवाओं की क्षमता पर पड़ सकता है असर
पश्चिमी राजस्थान के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जोधपुर में करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे ट्रॉमा ब्लॉक और क्रिटिकल केयर ब्लॉक (CCB) की डिजाइन व निर्माण में कई गंभीर व्यवहारिक कमियां सामने आ रही हैं, जो इस राष्ट्रीय महत्व के संस्थान की प्रभावशीलता, कार्यक्षमता और आपातकालीन सेवाओं की क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।
आपदा स्थिति के लिए कोई पृथक ज़ोन नहीं
केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) और एम्स प्रशासन से जुड़े विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, निर्माणाधीन ट्रॉमा सेंटर भवन में आपदा या दुर्घटना की स्थिति में बड़ी संख्या में घायलों के उपचार के लिए कोई पृथक डिज़ास्टर ज़ोन निर्धारित नहीं किया गया है। इससे किसी भी बड़े हादसे की स्थिति में व्यवस्थाएं बुरी तरह चरमरा सकती हैं।
ब्लड बैंक और लैब की कमी से बढ़ेगा खतरा
सबसे गंभीर कमियों में यह है कि भवन में ब्लड बैंक के लिए कोई स्थान निर्धारित नहीं किया गया है। वर्तमान ब्लड बैंक की दूरी के चलते गोल्डन ऑवर के भीतर रक्त चढ़ाने में देरी मरीज की जान पर भारी पड़ सकती है। साथ ही, आपातकालीन जांचों के लिए प्रयोगशाला की कोई व्यवस्था भी इस ब्लॉक में नहीं की गई है, जिससे इलाज में विलंब होना तय है।
परिजनों के लिए प्रतीक्षालय तक नहीं
सूत्रों के मुताबिक, निर्माणाधीन ट्रॉमा और क्रिटिकल केयर ब्लॉक में मरीजों के परिजनों के लिए कोई प्रतीक्षालय नहीं बनाया जा रहा है। एक सार्वजनिक अस्पताल में परिजनों के बैठने की जगह न होना अमानवीय और अपमानजनक स्थिति को दर्शाता है।
जरूरी मेडिकल और सर्जिकल स्टोर का प्रावधान नहीं
पूर्व सर्जरी विशेषज्ञों ने बताया कि किसी भी उच्च-भार वाले ट्रॉमा सेंटर की सुचारू कार्यप्रणाली के लिए ऑपरेशन थिएटर और इमरजेंसी यूनिट के पास आवश्यक सर्जिकल उपकरणों और सामग्रियों जैसे इम्प्लांट, स्प्लिंट और कंज्यूमेबल्स के लिए समर्पित स्थान जरूरी होता है, जिसकी व्यवस्था इस डिज़ाइन में नहीं की गई है।
भविष्य में विस्तार संभव नहीं
अभियंताओं के अनुसार, भवन के चारों ओर पहले से निर्मित और कार्यरत इकाइयों के चलते भविष्य में किसी भी प्रकार का विस्तार संरचनात्मक रूप से असंभव होगा। ऐसे में यह अवसर अंतिम है जब सभी आवश्यक सुविधाएं इस चरण में ही सुनिश्चित की जानी चाहिए थीं।
सूचित करने के बावजूद कोई सुधार नहीं
सूत्रों का दावा है कि एम्स प्रशासन के एक पूर्व अधिकारी ने उक्त आवश्यकताओं को शामिल करने हेतु कार्यकारी निदेशक को पत्र लिखकर अनुमोदन का अनुरोध किया था, लेकिन आज तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

