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CBSE दो दशक में कई बार बोर्ड परीक्षाओं में बदलाव कर चुका है, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड किस तलाश में है?

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CBSE ने एक बार फिर बोर्ड परीक्षाओं में बदलाव किया गया है. जिनमें 2026 से लागू हो रही दो बार बोर्ड परीक्षा सबसे नई पहल है. 2026 में, CBSE दोनों कक्षाओं की परीक्षाएं 17 फरवरी से शुरू करेगा, और दसवीं के विद्यार्थियों को साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने का विकल्प मिलेगा. ऐसा जैसा कि NEP-2020 की अनुशंसा के चलते किया जा रहा है. CBSE ने पिछले दो दशकों में शिक्षा प्रणाली में बोर्ड परीक्षाओं के स्वरूप में कई बड़े प्रयोग किए हैं. 2026 में कक्षा 10 और 12 के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षा कराने का ऐलान NEP-2020 की सिफारिशों के बाद सबसे नया और बड़ा कदम है. पर क्या इतने बार और इतने बड़े पैमाने पर बदलाव सही हैं? यह समीक्षा इसी सवाल पर केंद्रित है

बोर्ड परीक्षाओं के प्रमुख प्रयोग और सुधार पर नजर डालिए

  • 2009 में CCE (Continuous and Comprehensive Evaluation) लागू हुआ, जहां साल में कई मूल्यांकन होते थे और बोर्ड परीक्षा कक्षा 10 के लिए वैकल्पिक बना दी गई थी.
  • 2017 से कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा फिर से अनिवार्य की गई, CCE हटा दिया गया.
  • 2020 में NEP-2020 के अनुसार परीक्षा पैटर्न में बड़े बदलावों की प्रक्रिया शुरू हुई. इसमें मूल दक्षताओं पर आधारित पेपर, कोर-सब्जेक्ट्स का फोकस के अलावा इस बात पर जोर दिया गया कि कोचिंग केंद्रित रटन विद्या वाला कल्चर खत्म हो.
  • अब अगले साल से कक्षा 10 के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने की योजना. पहली मुख्य परीक्षा और दूसरी ‘इंप्रूवमेंट’ परीक्षा होगी. दोनों का स्कोर ‘best of two’ के सिद्धांत पर मान्य रहेगा और छात्रों को एक ही अकादमिक सत्र में दो अवसर मिलेंगे.

CCE एक क्रांतिकारी कदम बताया गया था, लेकिन 10 साल भी नहीं चला सिस्टम

अगर बात करें 2009 की तो CCE (Continuous and Comprehensive Evaluation) की शुरुआत में बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक कर दी गई और छात्रों का मूल्यांकन पूरे साल किया जाने लगा. इसके ज़रिए पढ़ाई का दबाव कम करने, समग्र कौशल पर ध्यान देने और आउटकम-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने का लक्ष्य था. परन्तु, इसकी कार्यवाही अधूरी और शिक्षकों की कमी के कारण कमजोर साबित हुई.

तकनीकी रूप से इसे सफलतापूर्वक लागू नहीं किया जा सका और फिर साल 2017 में इसे खत्म कर दिया गया. इसके बाद 2017 से पारंपरिक बोर्ड परीक्षा पुनः अनिवार्य हुई, जिससे विद्यार्थियों और अभिभावकों में स्थिरता आई. लेकिन NEP-2020 ने फिर से लचीलापन और व्यावहारिकता की मांग की और अब 2026 में CBSE ने साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने की योजना घोषित की.

लेकिन सवाल यह है कि क्या एजुकेशन सिस्टम में इस तरह बार-बार प्रयोग सही है? एक पक्ष यह है कि लंबे समय तक एक ही परीक्षा प्रणाली को बनाए रखना जरूरी होता है, ताकि सभी पक्ष उसके अनुसार खुद को ढाल सकें. साथ ही नए बदलाव के परिणामों का मूल्यांकन कर सुधार करने के लिए भी पर्याप्त समय चाहिए. बिना पर्याप्त परीक्षण के लगातार बड़े पैमाने पर बदलाव शिक्षा प्रणाली को अस्थिर बनाते हैं. इसलिए, बोर्ड परीक्षाओं के सुधार में जरूरी है कि एक संतुलित योजना बनाई जाए. एक ऐसा खाका तैयार हो, जहां बदलाव की गति तो कम से कम नियंत्रित हो और उनकी गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाए.

ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि छोटे-छोटे पायलट प्रोजेक्ट्स के माध्यम से नीतियों का परीक्षण होना और फिर सफलतापूर्वक सिद्ध होने पर ही व्यापक स्तर पर लागू करना चाहिए. बावजूद इसके शिक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इसके क्रियान्वयन में विद्यार्थियों का हित और शिक्षकों की दक्षता का भी ख्याल रखा जाना चाहिए.v

एफ़आईआर में जीआईएस लोकेशन क्यों ज़रूरी है: राजस्थान पुलिसिंग को 21वीं सदी में ले जाने का समय

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राजस्थान में हर बड़े हादसे, झगड़े, चोरी या सड़क दुर्घटना के बाद एक सवाल बार–बार उठता है क्या हमारी पुलिसिंग वाकई उतनी आधुनिक है, जितनी हो सकती है? जवाब असहज कर देने वाला है। टेक्नोलॉजी के दौर में भी हमारी एफ़आईआर व्यवस्था घटना स्थल की सही लोकेशन तक नहीं दर्ज करती। नतीजा यह होता है कि न अपराध का असली हॉटस्पॉट पता चलता है, न पुलिस की तैनाती वैज्ञानिक तरीके से हो पाती है। सोचिए, अगर हर एफ़आईआर में घटना का सटीक जियो-लोकेशन यानी लैटिट्यूड और लॉन्गिट्यूड अनिवार्य हो जाए तो क्या बदल सकता है? सबसे पहले, अपराध के असली पैटर्न सामने आएंगे। हम सिर्फ़ अनुमान या शिकायतकर्ता की याददाश्त पर निर्भर नहीं रहेंगे। चोरी, छेड़छाड़, दुर्घटना कौन सा अपराध किन इलाकों में बार-बार हो रहा है, इसका डिजिटल नक्शा बनेगा। पुलिस की तैनाती, पेट्रोलिंग और रोकथाम सब डेटाबेस से तय हो पाएँगे। दूसरी बात, जवाबदेही बढ़ेगी। SHO से लेकर जिला स्तर तक हर अधिकारी यह देख सकेगा कि किस थाने ने किन इलाकों में अपराध पर पकड़ बनाई और कहाँ कमी रह गई। ड्यूटी अब सिर्फ़ काग़ज़ी न रहकर ज़मीनी होगी।तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात नागरिकों का भरोसा बढ़ेगा। जब लोग देखेंगे कि पुलिस की गश्त और कार्रवाई किसी फोन कॉल या संपर्क पर नहीं, बल्कि वास्तविक डेटा पर आधारित है, तो पुलिसिंग की छवि बदल जाएगी। सुरक्षा का एहसास बढ़ेगा। सबसे अच्छी बात यह सुधार न खर्चीला है, न जटिल। हर पुलिसकर्मी के पास स्मार्टफ़ोन या टैबलेट पहले से मौजूद है। CCTNS में एक छोटा-सा अपडेट, और एफ़आईआर सिस्टम स्वतः लोकेशन-टैगिंग सक्षम कर सकता है। बस एक क्लिक, और घटनास्थल का पिन मैप पर दर्ज।राजस्थान अगर एक केन्द्रीयकृत क्राइम मैपिंग डैशबोर्ड विकसित कर ले, तो पूरे राज्य का अपराध-मानचित्र पुलिस मुख्यालय में रियल-टाइम दिख सकता है किस जिले में किस किस्म की घटनाएँ बढ़ रही हैं, कहाँ रोकथाम तेज़ करनी है, कहाँ संसाधन बढ़ाने हैं। हम अक्सर पुलिसिंग को बदलने की बात करते हैं, पर बदलाव वहीं से शुरू होता है जहाँ डेटा ईमानदार हो, साफ़ हो और वैज्ञानिक हो। एफ़आईआर में जीआईएस लोकेशन टैगिंग, एक छोटा-सा कदम राजस्थान पुलिस को पूरी तरह डेटा-ड्रिवन, आधुनिक और नागरिक-केंद्रित बना सकता है।ज़रूरत है कि राज्य सरकार इस सरल लेकिन क्रांतिकारी सुधार को जल्द लागू करे क्योंकि सटीक जानकारी ही सबसे बड़ा हथियार है।

Two-Minute Delivery Is Dead. Long Live the Headline and Optics

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Two-minute delivery did not die a natural death. It was executed swiftly, decisively, and with full political ceremony because it dared to outrun the comfort zone of India’s political economy. What should have been celebrated as a breakthrough in logistics, urban efficiency, and youth employment became a victim of that one thing the state truly excels at: headline management.The official narrative was noble on the surface. Delivery executives were unsafe. Traffic was chaotic. Citizens were alarmed. But stripped of theatrics, the truth is far simpler: innovation moved too fast, and the system panicked.

And no panic is complete without hypocrisy.

After all, nothing says “we care for delivery boys” like taxing them 45–50 percent on every litre of petrol they buy for their scooters. Nothing says “pro-worker” like extracting indirect taxes from individuals earning barely Rs 18,000–22,000 a month. And nothing says “public safety” like ignoring potholes big enough to swallow small automobiles while policing the speed at which a grocery order travels.But if India’s reaction feels bizarre, it becomes even more striking when compared to how other major economies approach similar disruptions.

In the United States, disruptive ideas are not strangled at birth. Uber, DoorDash, and Instacart did not face moral panic; they faced tough debates, lawsuits, and regulatory reform but never a political crusade designed to suffocate them for optics. Innovation came first, adjustments later.

In Europe, quick-commerce faced zoning issues, worker-protection debates, and urban planning challenges. But Berlin didn’t shutter the model because riders looked too fast on CCTV. Paris didn’t eliminate hyperlocal delivery because it generated uncomfortable news cycles. They regulated, negotiated, corrected and kept the industry alive.

In China, rapid delivery is a national capability. The state built e-scooter lanes, battery-swapping networks, and digital logistics infrastructure. Delivery workers are not treated as a problem to be contained but as partners in a hyper-efficient economy. The guiding question was: “How do we scale this safely?” not “How do we make this disappear before prime-time news?”

And then there is India, where innovation is tolerated only if it behaves slowly and doesn’t embarrass bureaucratic pace.

Here, the moment an idea becomes too visible, too fast, or too job-creating, it is framed as a national threat. The same ecosystem that never hesitates to collect taxes from low-income gig workers suddenly transforms into their self-declared guardian angel the minute a disruptive model threatens old narratives. Regulation becomes a weapon, not a tool.While other countries ask how to make innovation safer, India asks how it might look on television tonight.

This is tragic, because India actually needs such innovations more than any of these economies. We have the youngest workforce among major nations. We have dense, chaotic cities begging for efficient logistics. We have millions seeking flexible, entry-level employment. Quick-commerce including ultra-fast delivery was one of the few models where technology and job creation rose together.But in a system where optics dominate outcomes, the wrong thing dies first.The message has now been broadcast to every entrepreneur in the country:
Innovate, but not too fast.
Create jobs, but not too visibly.
Disrupt industries, but never the political narrative.
And whatever you do, do not deliver anything faster than the bureaucracy itself can think.

Two-minute delivery is dead.
But the real casualty is our credibility as a nation that claims to champion innovation. If we continue killing ideas that other economies regulate, refine, and celebrate, we will keep pretending that headlines are progress and mistaking political comfort for national growth.

ज़रूरत या ज़बरदस्ती? राजस्थान की 3,200 मेगावाट कोयला योजना

राजस्थान ऊर्जा विकास और आईटी सर्विसेज लिमिटेड (RUVITL) ने नियामक आयोग के 18 नवंबर 2025 के आदेश पर पुनर्विचार माँगा है, क्योंकि 25 वर्षों तक 3,200 मेगावाट कोयला खरीद की अनुमति नहीं मिली। समीक्षा याचिका का मुख्य तर्क यह है कि भविष्य की बिजली मांग आयोग ने “ठीक से देखी नहीं।” मगर याचिका पढ़ने के बाद लगता है कि शायद याचिका लिखने वालों ने खुद अपने ही दस्तावेज ठीक से नहीं देखे।

सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि जिस 1,350 मेगावाट की “संभावित रिटायरमेंट” दिखाकर कोयला खरीद को जरूरी बताया जा रहा है, उसी में 850 मेगावाट कोटा TPS की यूनिटें भी शामिल हैं।
ये वही यूनिटें हैं, जिनके बारे में दूसरी फाइलों में RVUNL केंद्र सरकार को बड़े गर्व से लिख रहा है कि बहुत कुशल हैं, बहुत सस्ती हैं, बहुत बढ़िया चल रही हैं।
कुछ फाइलों में ये यूनिटें रिटायर,
कुछ में “राजस्थान की शान।”
एक ही राज्य में दो राजस्थान चल रहे हैं एक योजना बनाने वालों का और एक कागजों पर उलझे तथ्यों का।

कोटा TPS का प्रदर्शन इतना अच्छा है कि उसने मार्च 2024 में 97 प्रतिशत उपलब्धता दिखाई। जिस यूनिट में इतना पैसा डालकर R&M और FGD लगा चुके हैं, जिस पर पूंजी लागत वसूल भी हो चुकी है, उसे “पुरानी” बताकर हटाने की कोशिश ऐसे की जा रही है जैसे कोई पुराना मोबाइल हो अपग्रेड चाहिए, तर्क नहीं।
इसी तर्ज पर सूरतगढ़ TPS की यूनिट 1 और 2 भी “रिटायर” घोषित कर दी गईं, जबकि न उम्र 30 साल पार, न तकनीकी कमी, न कोई कमीशन की नोटिंग। बस एक नई स्कीम को फिट करने के लिए पुरानी यूनिटों को अचानक “बुजुर्ग” घोषित कर देना CEA खुद कह चुका है कि उनकी उम्र वाली गाइडलाइन वित्तीय है, तकनीकी नहीं। पर राजकीय निर्णय गाइडलाइन से कम, और तर्क के साथ कम्फर्ट से ज्यादा चलते हैं।

राजस्थान का अजीब मॉडल है जो यूनिटें सबसे सस्ती बिजली देती हैं, उन्हीं को सबसे पहले रिटायर करने का प्रस्ताव। जो नई बिजली सबसे महंगी होगी, उसी को “अनिवार्य” बताया जा रहा है।
अगर यही आर्थिक विवेक है, तो उपभोक्ता भविष्य में अपने बिलों में “सरकार की रचनात्मकता शुल्क” जोड़कर भरने की तैयारी कर लें।

फिर उन परियोजनाओं को देखिए जिन्हें अचानक गायब कर दिया गया

  • गिरल परियोजना: वापस
  • छाबड़ा संयुक्त उद्यम: हवा में
  • माही-बांसवाड़ा: अनिश्चित घोषित
  • 630 मेगावाट फर्म RE: रद्द
  • NTPC/केंद्रीय पावर: गिनती में ही नहीं
  • रावतभाटा की संभावनाएँ: अनदेखी

ऐसा लगता है कि 3,200 मेगावाट की कोयला योजना पहले से तय थी बाकी सभी विकल्पों को बस इतना ही काम दिया गया:
“कृपया रास्ते से हट जाएँ, हम नई 3200 MW कोयला आधारित बिजली खरीद को जरूरी साबित कर रहे हैं।”नवीकरणीय ऊर्जा, स्टोरेज और हाइब्रिड समाधान जिन्हें देशभर में भविष्य का आधार माना जा रहा है इस याचिका में ऐसे पेश किए गए हैं जैसे वे “सहायक कलाकार” हों और कोयला ही कहानी का नायक। तथ्य यह है कि 25 वर्षों के लिए ऐसी भारी कोयला खरीद राजस्थान को उसी दौर में वापस ले जाएगी जब प्रदूषण, लागत और फिक्स्ड चार्ज मिलकर उपभोक्ताओं की जेब हल्की और हवा भारी करते थे।

समग्र निष्कर्ष यह है कि यह प्रस्ताव न प्रदर्शन पर आधारित है, न लागत पर, न राष्ट्रीय व्यवहार पर बस इस धारणा पर आधारित है कि अगर किसी चीज़ को बार-बार “आवश्यक” कहा जाए, तो वह वास्तव में आवश्यक हो जाती है।

The Smart Cities Mission sounds ambitious, but the math exposes its limits: ₹59,385 crore for 31 cities → ₹1,915 crore per citySpread over 10 years → just ₹191 crore annually.

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The Smart Cities Mission sounds ambitious, but the math exposes its limits: ₹59,385 crore for 31 cities → ₹1,915 crore per city
Spread over 10 years → just ₹191 crore annually.
For an average 20 lakh population, that is barely ₹955 per person per year not enough to fix core infrastructure, let alone build a “smart city.” At best, it funds cosmetic retrofitting.

By 2035, nearly 65% of Indians about 900+ million people will live in cities. Existing systems are already overstretched. To make cities livable and future-ready, India needs Capex of at least $1 trillion (₹90 lakh crore+) in the next decade.
Current investment is short by 10–15x, leaving urban India critically underfunded.

Rajasthan Govt announced an ambitious target of $4.3 trillion GDP by 2047. While this demonstrates bold vision, the underlying math reveals significant challenges worth examining.

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If India achieves its projected $30+ trillion economy by 2047, Rajasthan capturing $4.3 trillion would mean holding a 14%+ share nearly triple its current 5.26%. This would require sustaining 14-15% annual growth for 22 consecutive years, a feat that’s historically unprecedented for a regional economy of this scale.

A more grounded assessment suggests a different trajectory with sustained 10-12% growth which itself represents strong performance Rajasthan could realistically reach $1.5-2 trillion by 2047. This would elevate its share to approximately 6-7% of India’s national economy, effectively doubling its current economic weight.

The $4.3 trillion figure serves an important purpose as an aspirational benchmark driving policy ambition, attracting investment, and mobilizing resources. However, the $1.5-2 trillion range represents where tangible transformation occurs enhanced infrastructure, expanded manufacturing capacity, rising household incomes, and measurably improved living standards.

Notably, even reaching $2 trillion would require Rajasthan to slightly outpace India’s overall growth (approximately 10.5-11% CAGR) challenging but achievable with focused execution.

प्रीपेड स्मार्ट मीटर की बाध्यता: केंद्र, राज्य और उपभोक्ता का दृष्टिकोण

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किसी भी अधिनियम को लागू करने के लिए अधिकृत संस्थाओं को नियम और विनियम बनाने का अधिकार होता है। ये नियम एवं विनियम मूल अधिनियम के अनुरूप (संगत) होना आवश्यक है। भारतीय विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 47 की उपधारा (1) और (5) के अनुसार विद्युत उपभोक्ताओं को पोस्ट-पेमेंट और प्री-पेमेंट दोनों का विकल्प दिया गया है। अतः इस अधिनियम के अंतर्गत बनाए गए कोई भी नियम या विनियम उपभोक्ता को केवल प्रीपेड मोड में बिजली लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। धारा 55(1) के तहत प्राधिकरण को उपभोक्ताओं के यहाँ मीटर स्थापित करने के संबंध में विनियम बनाने का अधिकार है। धारा 177(2)(ग) के अंतर्गत प्राधिकरण को मीटर के संस्थापन और संचालन से संबंधित नियम बनाने की शक्ति दी गई है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि ये नियम मूल अधिनियम के अनुरूप हों। चूंकि मूल अधिनियम उपभोक्ताओं को पोस्टपेड और प्रीपेड दोनों का विकल्प देता है, अतः केवल प्रीपेड मोड को अनिवार्य बनाना मूल अधिनियम से असंगत होगा। यह बात सही है कि प्राधिकरण मीटरों में प्रीपेड फीचर अनिवार्य कर सकता है और उपभोक्ताओं के यहाँ ऐसे मीटर लगाने हेतु नियम जारी कर सकता है जिनमें यह सुविधा हो। मीटरिंग विनियम (संशोधित) 2019 के खंड 4(1)(ख) के अनुसार, मीटरों में प्रीपेड सुविधा होना अनिवार्य है, प्रीपेड मोड में इंस्टॉल करना नहीं। इलेक्ट्रिसिटी कंज़्यूमर्स राइट्स रूल्स, 2020 में भी स्मार्ट प्रीपेड मीटर की सुविधा (feature) को अनिवार्य किया गया है, लेकिन प्रीपेड मोड में इंस्टॉल करना नहीं। मीटर विनियम 2006 के खंड 2(R) को 2019 के संशोधन में हटा दिया गया है। प्रीपेड सुविधा को अनिवार्य इसलिए किया गया है ताकि उपभोक्ताओं को यह विकल्प मिल सके, जैसा कि मूल अधिनियम में प्रावधान है। इसलिए संबंधित अधिकारियों को इन विनियमों और नियमों का दोबारा अध्ययन करना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या अनिवार्यता केवल प्रीपेड फीचर की है या प्रीपेड मोड में मीटर इंस्टॉल करने की भी? मुख्य प्रश्न: 1.क्या अगस्त 2021 में भारत सरकार द्वारा सभी उपभोक्ताओं के यहाँ प्रीपेड मोड में मीटर स्थापित करने की अधिसूचना भारतीय विद्युत अधिनियम 2003 के अनुरूप और उचित है? 2.जब विद्युत अधिनियम 2003 उपभोक्ताओं को प्रीपेड विकल्प चुनने का अधिकार देता है, तो सभी स्मार्ट मीटरों में प्रीपेड फीचर को अनिवार्य करना कहाँ तक उचित है? क्या प्रीपेड फीचर वाला स्मार्ट मीटर केवल उन्हीं उपभोक्ताओं के यहाँ नहीं लगना चाहिए जो यह विकल्प चुनते हैं? 3.क्या केंद्र सरकार का राज्यों को यह निर्देश देना कि वे सभी उपभोक्ताओं के यहाँ प्रीपेड मोड में स्मार्ट मीटर लगाएं (जो कि मूल अधिनियम से असंगत है), उचित है? स्मार्ट मीटरों को प्रीपेड फीचर के साथ स्थापित करने पर लगभग ₹10,000 से ₹12,000 करोड़ का अतिरिक्त व्यय राज्यों/डिस्कॉम्स/उपभोक्ताओं पर आएगा। क्या केवल ₹5,000–₹6,000 करोड़ की आरडीएसएस ग्रांट के लिए ₹10,000–₹12,000 करोड़ खर्च करना उचित है? 4.क्या राज्य सरकारों/डिस्कॉम अधिकारियों ने यह मूल्यांकन किया है कि इतने भारी खर्च से डिस्कॉम को उसके अनुपात में लाभ होगा? या यह केवल एक दावा है? क्या कोई सक्षम अधिकारी इसकी गारंटी दे सकता है?

जयपुर को 2055 तक 138 किलोमीटर के मेट्रो नेटवर्क से जोड़ने की कवायद है। आज केंद्रीय कैबिनेट से Phase-2 की मंजूरी मिलने के बाद प्रहलादपुरा से टोड़ी मोड़ तक 42.8 km के इस कॉरिडोर को 2031 तक पूरा करने की डेडलाइन तय की गई है।

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जयपुर को 2055 तक 138 किलोमीटर के मेट्रो नेटवर्क से जोड़ने की कवायद है। आज केंद्रीय कैबिनेट से Phase-2 की मंजूरी मिलने के बाद प्रहलादपुरा से टोड़ी मोड़ तक 42.8 km के इस कॉरिडोर को 2031 तक पूरा करने की डेडलाइन तय की गई है।

इसके बाद Phase-3 में चार कॉरिडोर ट्रांसपोर्ट नगर से जगतपुरा(17 km), अजमेर रोड चौराहा से कालवाड़ रोड (8.5 km), कनकपुरा से झालाना डूंगरी (16.3 km) और ISBT हीरापुरा से बालाजी मोड़ (16 km) कुल 57.8 km के नेटवर्क को 2041 तक पूरा किया जाएगा ।

Phase-4 में जगतपुरा से खातीपुरा रेलवे स्टेशन (6.5 km), गलता जी से आमेर तक टूरिस्ट कॉरिडोर (9.5 km), ट्रांसपोर्ट नगर से बगराना(10.4 km) और कालवाड़ रोड से लक्ष्मी नारायणपुरा (11.1 km) यानी 37.5 km का विस्तार 2055 तक प्रस्तावित है।​​​​​​​​​​​​​​​​

जयपुर को वर्ष 2031 तक शहरी यातायात और मोबिलिटी सिस्टम के लिए ₹19,035.9 करोड़ की आवश्यकता आंकी गई है। इसमें से ₹14,980 करोड़ की लागत वाले मेट्रो फेज-2 को कल केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल चुकी है। इसके अतिरिक्त इन परियोजनाओं के लिए फंड आना बाकी है।

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•550 इलेक्ट्रिक बसें: ₹793 करोड़
•6 नए बस डिपो: ₹300 करोड़
•150 बस शेल्टर (निर्माण + पुनरुद्धार): ₹90 करोड़
•फ्रेट/ट्रक टर्मिनल: ₹140 करोड़
•आउटर रिंग रोड: ₹1,040 करोड़
•सड़क चौड़ीकरण: ₹500 करोड़
•ROB/RUB: ₹350 करोड़

  • फ्लाइओवर -अंडरपास: ₹600 करोड़
    •फुटपाथ विकास: ₹40 करोड़
    •पैदल यात्री एवं सिविल इंजीनियरिंग सुधार: ₹27 करोड़
    •जियोमेट्रिक इम्प्रूवमेंट: ₹22.5 करोड़
    •मल्टी-लेवल पार्किंग ऑन-स्ट्रीट पार्किंग जोन: ₹68 करोड़
    •इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर (ICCC): ₹50 करोड़
    •एडेप्टिव ट्रैफिक सिग्नल जंक्शन: ₹25 करोड़