दम तोड़ती RTI को हाइकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से मिलेगा ऑक्सीजन, तानाशाही संस्थाओं के मुंह पर करारा तमाचा यह निर्णय

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अफसरशाही के लिए ‘नॉन कोर’ हो चुके RTI एक्ट के लिए राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है.

सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के लागू होने के 2 दशक में ऐतिहासिक फैसला है. संभवतः यह पहली बार है जब RTI एक्ट के तहत राशि राजकोष में ना जाकर आवेदक को दी जाएगी. यह फैसला राजस्थान हाईकोर्ट ने राजसमंद जिले के देवगढ़ – मदारिया निवासी गोपाल कंसारा को सूचना का अधिकार अधिनियम-2006 के तहत सुनाया है जिसमे आवेदक को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19(8)(बी) के तहत प्रताड़ना पर मुआवजा दिलाया जाएगा. हाईकोर्ट की जयपुर बेंच में ने प्रतिवादी को अनावश्यक रूप से परेशान करने की वजह से विश्वविद्यालय पर जुर्माना ठोका है और जुर्माने की राशि को राजकोष की बजाय आवेदक को अदा करने का निर्णय दिया है

गोपाल कंसारा ने 21 अगस्त 2008 को सूचना की अधिकार अधिनियम- 5 की धारा 6 में राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (RUHS) जयपुर से जानकारी मांगी थी. उन्होंने RTI के तहत वर्ष 2008 की राजस्थान प्री मेडिकल टेस्ट से संबंधित सूचना मांगी थी. लेकिन RUHS की ओर से सूचना नहीं दी गई. इसके लिए कंसारा की ओर से पहली और दूसरी अपील का जवाब नहीं मिलने पर राजस्थान राज्य सूचना अयोग में परिवाद दिया गया.

सूचना आयुक्त के फैसले के खिलाफ कोर्ट में लगी थी याचिका

तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त श्रीनिवासन ने 12 दिसंबर 2011 को बी. जैन उप कुलसचिव पर 10 हजार रुपए पेनल्टी लगाई. इसके खिलाफ राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय-जयपुर के रजिस्ट्रार ने हाई कोर्ट- जयपुर में वर्ष 2012 में रिट फाईल की.

क्यों अहम है यह फैसला?

दरअसल, आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के तहत, यदि किसी लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर जुर्माना लगाया जाता है, तो वह जुर्माना सरकारी खजाने में जमा किया जाता है. कभी भी इस राशि को याचिकाकर्ता को नहीं दिया गया. फैसले को सिर्फ इस लिहाज से नहीं देखा जाए कि यह राशि किसके खाते में जाएगी. बल्कि अहम बात यह है कि सूचना को सार्वजनिक ना करने या जनता तक सूचना ना पहुंचाने वाली संस्थाओं के लिए यह सबक है. सबक इसलिए भी क्योंकि ऐसी कई सूचनाएं दबाने के साथ ही भ्रष्ट तंत्र की जानकारियां छुपी रह जाती हैं.

अब नियम भी जानिए

आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के तहत, यदि कोई लोक सूचना अधिकारी (PIO) बिना किसी उचित कारण के सूचना देने से इनकार करता है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक जानकारी देता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है. जुर्माना 250 रुपये प्रतिदिन हो सकता है, जिसकी अधिकतम सीमा 25,000 रुपए है.

कोर्ट ने इस शक्ति का किया उपयोग

कोर्ट का यह फैसला अधिनियम की धारा 19(8)(बी) के तहत दिया गया है, जिसमें सूचना आयोग के लिए प्रावधान है कि आवेदक को भी मुआवजा देने निर्देश दिया जा सकता है. लेकिन ऐसा तब होता है, “जब आवेदक को यह साबित करता है कि सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा सूचना उपलब्ध कराने में विफलता या आरटीआई आवेदन के दौरान उत्पीड़न के कारण उन्हें हानि या नुकसान हुआ है.”

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