सुप्रीम कोर्ट में 11 सितंबर को हुई सुनवाई में मंत्रालय ने लिखित रूप से माना कि सार्वजनिक आपत्तियों को लेना अनिवार्य है. अब मंत्रालय को ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी करना होगा, लोगों की आपत्तियां आमंत्रित होंगी और फिर इस पर अंतिम निर्णय होगा.
सरकार से कुछ जरूरी सवाल
- सरकार के लिए संगमरमर की खादानें ज़्यादा महत्व रखती हैं या जंगल?
- क्या जंगलों को खत्म करके मानव जीवन के बाक़ी रहने की संभावनाओं को कम नहीं किया जा रहा?
- क्या सरकार बाघों के इलाक़े को कम करके उसे खदान लॉबी को सौंप कर बाघ संरक्षण कर रही है?
अरावली पहले ही जगह-जगह से ज़ख्मों से पीड़ित है और खान माफियाओं ने उसकी पूरी पारस्थितिकी को ही बदल दिया. यही वजह रही की इस बार की बारिश में पूर्वी राजस्थान में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए. बफर जोन को कम करके वहां खनन करने से बाघ आसपास के गांवों में आ रहे हैं. बाघ लोगों का शिकार का रहे हैं, और लोग भी उन पर हमले कर रहे हैं. ऐसा रणथम्भौर में आये दिन होता है. बाघ आबादी क्षेत्र का रुख कर रहे हैं, वो या तो लोगों को मार रहे हैं या लोग उन्हें मार रहे हैं. सिर्फ मानव परिवार ही नहीं, बाघों के परिवार भी इस कथित विकास की मार झेल रहे हैं.
