राजस्थान के विश्वविद्यालयों में पीएचडी शोधार्थियों की स्थिति पर CAP राजस्थान के हालिया सर्वे ने उच्च शिक्षा तंत्र की वास्तविकता उजागर की। इसमें यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान, जयपुर; महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय (MSBU), भरतपुर; पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय (PDSU), सीकर; मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (MLSU), उदयपुर; और बनस्थली विद्यापीठ, टोंक शामिल हैं।
राज्य में शोध और अकादमिक प्रशिक्षण में गंभीर खामियाँ हैं। पीएचडी अब शोधार्थियों के लिए करियर, आर्थिक संघर्ष और मानसिक दबाव का प्रतीक बन गया है। सर्वे में 48% से अधिक शोधार्थी पीएचडी को नौकरी व सामाजिक प्रतिष्ठा के साधन के रूप में देखते हैं, जबकि रिसर्च उनकी प्राथमिकता से पीछे है।
पीएचडी गाइड के साथ संबंधों पर 62% शोधार्थी संतुष्ट थे, 17.5% असंतुष्ट और बाकी मिश्रित। कुछ विश्वविद्यालयों में पर्यवेक्षक शोध को दिशा देते हैं, लेकिन कई जगह यह औपचारिकता बन जाता है, जिससे देरी, मनोबल गिरावट और अधूरे शोध होते हैं।
शोध सुविधाओं में भी निराशा है: 79% शोधार्थी अपनी यूनिवर्सिटी से पीएचडी न करने की सलाह देते हैं। MSBU, भरतपुर के 61% ऐसा ही कहते हैं। पुस्तकालय में सामग्री की कमी, पत्रिकाओं-डेटाबेस का अभाव और सेमिनारों की अनुपलब्धता प्रमुख कारण हैं, जिससे शोधार्थी बाहरी संसाधनों पर निर्भर होकर समय-धन बर्बाद करते हैं।
आर्थिक सहायता में भी चुनौतियाँ: 48% को UGC/CSIR से मदद मिलती है, 8% को राज्य/विश्वविद्यालय से, जबकि 43% को कोई सहायता नहीं। छात्रवृत्ति व संसाधनों की कमी से कई पार्ट-टाइम नौकरियाँ करने को मजबूर हैं।
जब दुनिया नवाचारों व रिसर्च में निवेश कर रही है, वहीं हमारे संस्थानों के रिसर्च विभाग बद से बदतर हो रहे हैं। यह दिशाहीनता है, जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है।

