समय के इस संक्रांत काल में, जब विचारधाराएँ डिजिटल परिपथों में समाहित होकर अपने नैसर्गिक स्वरूप को विस्मृत कर रही हैं, संपादकीय मंचों की भूमिका पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक हो गई है। एक समय था जब संपादकीय विचार जनचेतना का बौद्धिक परिपाक हुआ करते थे तर्क, विवेक और आत्म-मंथन की कसौटी पर परखे गए विश्लेषण। परंतु अब, वह स्थान धीरे-धीरे लोकप्रियता के कृत्रिम पैमाने से प्रदूषित हो रहा है। आज का विमर्श एल्गोरिदम और प्रचारतंत्र के कृत्रिम पेंडुलम से संचालित हो रहा है, जहाँ ट्रेंड ही तथ्य का स्थान लेने लगे है। यथार्थ की गहराइयों में उतरने की अपेक्षा, सतही वायरल बुखार ने विमर्श को नाटकीयता और संवेग के पैमाने में कैद कर दिया है। विचार अब उत्पन्न नहीं होते, प्रक्षेपित किए जाते हैं। और जिन विचारों में आक्रोश, आकृति और अनुकरण का तड़का नहीं होता, वे ‘फीड’ से गायब हो जाते हैं। इस तकनीकी-प्रायोजित जनमत के युग में संपादकीय दायित्व भीड़ के मनोविज्ञान से संघर्ष करता प्रतीत होता है। जहाँ एक समय संपादकीय सत्य के निर्भीक उद्घोषक हुआ करते थे, वहाँ अब वे प्रायः जनभावना के अनुमानित रुझानों के अनुसार झुकते दिखाई देते हैं। यह झुकाव स्वाभाविक नहीं, बल्कि संस्थागत अस्तित्व की विवशता से उपजा हुआ है क्योंकि आज विचार नहीं बिकते, वायरल होते हैं। परंतु यह विस्मरण खतरनाक है। संपादकीय का मौलिक उत्तरदायित्व तथ्य और लोकप्रिय भ्रांति के मध्य सेतु बनाना है, न कि एक का पक्ष लेकर दूसरे को दबाना। उसे वह आवाज़ बनना था जो बहुमत के शोर में अल्पसंख्यक सत्य की प्रतिध्वनि बन सके। जब मीडिया का विवेक जनता के चित्त को पोषण देने के स्थान पर केवल तात्कालिक लाइक और शेयर प्राप्त करने की होड़ में जुट जाता है, तब लोकतंत्र का संवाद दृश्य तो होता है, परन्तु सार्थक नहीं। इसलिए समय की पुकार है संपादकीय मंच पुनः अपने आत्मस्वरूप की ओर लौटें। विचारों की भीड़ में अपना चेहरा न खोएँ, बल्कि अपने चिन्तन की विशिष्टता से भीड़ को दिशा दें। लोकप्रियता क्षणिक हो सकती है, पर सत्य का प्रभाव कालजयी होता है। संपादकीय का धर्म उसी सत्य के पक्ष में खड़ा होना है भले ही वह अलोकप्रिय क्यों न हो।
