अस्तित्व बचाने के लिए तरस रही है अरावली हिल्स

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अरावली पर्वत श्रृंखला, जो भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, वर्तमान में कई चुनौतियों का सामना कर रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अवैध खनन अरावली पर्वतमाला के लिए एक प्रमुख खतरा बन चुका है। 1975 से 2019 के बीच, अरावली पहाड़ियों का लगभग 8% हिस्सा गायब हो गया है, जिसमें से 5% भाग बंजर भूमि में बदल गया है और 1% भाग बस्तियों में।

भारत की भौगोलिक संरचना में अरावली को प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला माना गया है और यह विश्व की भी प्राचीनतम श्रृंखलाओं में शामिल है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान को उत्तर से दक्षिण दो भागों में विभाजित करती है। अरावली का सर्वोच्च शिखर गुरुशिखर (1727 मीटर) सिरोही जिले के माउंट आबू में स्थित है। अरावली पर्वतमाला की कुल लंबाई गुजरात से दिल्ली तक 692 किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 80% भाग राजस्थान में आता है। अरावली की औसत ऊँचाई लगभग 930 मीटर है, और इसकी दक्षिणी ऊँचाई व चौड़ाई सर्वाधिक मानी जाती है।

अरावली पर्वतमाला प्राकृतिक संसाधनों एवं खनिजों से परिपूर्ण है तथा यह पश्चिमी मरुस्थल के विस्तार को रोकने में सहायक है। यह बाना, लूनी, साखी एवं साबरमती जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है।

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने 2017 में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि हरियाणा में अरावली पर्वतमाला के जंगल अब भारत के सबसे संकटग्रस्त वन बन चुके हैं। यहाँ अधिकांश देशी पौधों की प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं। तेज़ी से हो रही वनों की कटाई और विकासात्मक गतिविधियाँ इसके लैंडस्केप को नष्ट कर रही हैं, जिनके तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है।

दिल्ली-NCR से लेकर राजस्थान के एक दर्जन से अधिक जिलों में फैली अरावली पर्वतमाला का अस्तित्व अवैध खनन की वजह से आने वाले वर्षों में संकट में आ सकता है। लोकसभा में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, राजस्थान राज्य में अरावली में बीते पाँच वर्षों में 27,000 से अधिक अवैध खनन, परिवहन व भंडारण के मामले दर्ज किए गए, जिनमें से मात्र 13% मामलों में ही एफआईआर दर्ज की गई। सरकार का कहना है कि इस अवधि में 244 करोड़ रुपए का जुर्माना वसूला गया है, लेकिन क्या इस जुर्माने से अरावली के अस्तित्व को बचाया जा सकेगा?

क्या उच्चतम न्यायालय द्वारा खनन अनुमत करना पड़ा भारी?

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा टी. एन. गोदावर्मन बनाम भारत सरकार व अन्य के मामले में, वर्ष 1995 की रिट याचिका संख्या (C) 202 की विभिन्न अंतरिम याचिकाओं में दिनांक 29 एवं 30 अक्टूबर, 2002 और 16 दिसम्बर, 2002 को अपने आदेश के तहत समूची अरावली पहाड़ी श्रृंखला में सभी खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया था।

किन्तु बाद में, दिनांक 08 अक्टूबर, 2009 को अपने आदेश द्वारा न्यायालय ने कतिपय शर्तों सहित अरावली पहाड़ी क्षेत्र में कुछ क्षेत्रों में खनन कार्य की अनुमति प्रदान की। उन शर्तों में से एक प्रमुख शर्त यह थी कि खनन गतिविधियाँ वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अंतर्गत पूर्व अनुमोदन तथा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत स्वीकृति प्राप्त करने के पश्चात ही प्रारंभ की जा सकती थीं।

ऐसे में, भारत की संसद में वर्ष 2017 के बजट सत्र के दौरान जब अरावली क्षेत्र को लेकर विशेष नीति की मांग उठी, तब सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णयों का हवाला देते हुए किसी प्रकार की नई नीति लाने की आवश्यकता नहीं मानी।

अरावली के जंगल नहीं रहे तो क्या दिल्ली-NCR पर खड़ा होगा गंभीर पर्यावरण संकट?

अतिक्रमण, शहरीकरण, अनधिकृत विकासात्मक गतिविधियाँ और पर्यावरणीय उल्लंघन अरावली की पहाड़ियों में नाज़ुक पारिस्थितिकीय संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं। जब इस विषय में केंद्र सरकार से सवाल पूछा जाता है, तो वह 29 नवम्बर 1999 की एक अधिसूचना का हवाला देती है जिसके तहत अरावली क्षेत्र में पर्यावरण की गुणवत्ता की सुरक्षा और सुधार हेतु सभी अधिकार हरियाणा और राजस्थान की राज्य सरकारों को सौंपे गए थे।

इस अधिसूचना के अनुसार, संबंधित राज्य सरकारों के पर्यावरण विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति तथा हरियाणा के गुड़गांव व राजस्थान के अलवर जिलों में जिला अधिकारी की अध्यक्षता में एक मॉनिटरिंग समिति के गठन का प्रावधान था जो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के उल्लंघनों पर कार्यवाही करेगी।

मगर वास्तविकता यह है कि ये समितियाँ कागज़ों में ही धूल फांक रही हैं। ऐसे में, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा अरावली में खुदाई को जघन्य अपराध घोषित करने और पर्यावरण संरक्षण को लेकर सख्त दिशा-निर्देश देने के बावजूद, हजारों वर्ष पुरानी आसमान छूती अरावली श्रृंखला पर आज गंभीर संकट मंडरा रहा है।

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