माँ का दूध ही ज़हर बन रहा है यह सिर्फ़ मातृत्व का नहीं, हमारे सिस्टम का संकट है। यह सिर्फ़ ग्रामीण या ग़रीब तबके की समस्या नहीं है।शहरी, शिक्षित और मध्यम वर्गीय महिलाएं भी इस संकट से जूझ रही हैं। यह एक सार्वजनिक नीति संकट है, जिसकी जड़ें खाद्य नीति, कृषि नियंत्रण, स्वच्छता व्यवस्था और स्वास्थ्य निगरानी की लापरवाही से जुड़ी हैं।

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जरूरत है एक समग्र सार्वजनिक नीति की जिसमे- 1. स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए टॉक्सिकोलॉजी जांच अनिवार्य की जाए। 2. जल स्रोतों की ज़हर मुक्त मानिटरिंग नीति लागू की जाए। 3. गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए कीटनाशक मुक्त पोषण किट शुरू की जाए। 4. दूध, अन्न और घरेलू जल के लिए स्थानिक रासायनिक विश्लेषण प्रयोगशालाएं स्थापित हों। 5. मातृत्व और बाल स्वास्थ्य कार्यक्रमों को रसायन जागरूकता अभियान से जोड़ा जाए। 6. घरेलू उपयोग में लाए जा रहे डिटर्जेंट/कीटनाशकों के लिए सुरक्षित भंडारण नियमों के साथ प्लास्टिक फ़ूड पैकेजिंग को रोकने की जनजागरूकता हो।