लड्डू, चरण पादुका और स्टील फ्रेम का मौन

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देश में प्रशासन अब दो हिस्सों में बंट चुका है।
एक वह प्रशासन जो समस्याओं को हल करता है।
दूसरा वह जो समस्याओं के साथ फोटो खिंचवाता है।
खबर आई कि कुछ कलेक्टर “टॉप 100” में शामिल हो गए।
किसी ने घी-लड्डू खिलाए।
किसी ने चरण पादुका पहनाई।
किसी ने पेड़ों के लिए ऐप बना दिया।
अब पेड़ बचें या न बचें,
ऐप का लोगो बहुत सुंदर होना चाहिए।
पानी आए या नहीं,
लेकिन उसका डैशबोर्ड रंगीन होना चाहिए।
भारत में अब प्रशासन का मूल्यांकन समस्या सुलझाने से नहीं,
“इनोवेशन” नामक एक सरकारी शब्द से होता है।
और इनोवेशन का मतलब क्या है?
किसी सेठ-साहूकार से CSR का पैसा लेकर
कुछ चप्पलें बंटवा दीजिए,
दो किलो लड्डू बंटवा दीजिए,
एक ऐप लॉन्च कर दीजिए,
और प्रेस नोट जारी कर दीजिए ….“जिले में ऐतिहासिक पहल।”
आम आदमी बेचारा सोचता रह जाता है कि
जिस देश में नालियां हर बारिश में उफन पड़ती हों,
जहां सड़कें हर मानसून में गड्ढों में बदल जाती हों,
जहां सरकारी स्कूलों में बच्चे आज भी अंग्रेज़ी से ज्यादा पंखे का इंतजार करते हों,
वहां “ऐतिहासिक पहल” आखिर होती किसे कहते हैं?
भारतीय प्रशासनिक सेवा कभी इंडियन सिविल सर्विसेज कही जाती थी।
औपनिवेशिक काल की वह मशीनरी “स्टील फ्रेम” कहलाती थी।
कठोर थी, कई बार अमानवीय भी थी,
लेकिन उसकी एक छवि थी … फाइल पढ़ने वाले, अध्ययन करने वाले,
नीति समझने वाले अधिकारी।
आज़ादी के बाद उम्मीद थी कि यह स्टील फ्रेम
जनता के लिए झुकेगा।
साहब से सेवक बनेगा।
गांव की धूल समझेगा।
शहर की बदबू महसूस करेगा।
भ्रष्ट बाबुओं के बीच आम आदमी की घुटन पहचानेगा।
लेकिन हुआ क्या?
साहब की कुर्सी तो बची रही,
बस अंग्रेज़ी की जगह हिंदी के प्रेस नोट आ गए।
अब हर जिले में एक नया कलेक्टर आता है।
वह अपनी योजना लाता है।
नाम ऐसा कि लगे संयुक्त राष्ट्र ने योजना बनाई हो।
“मिशन मुस्कान”,
“ऑपरेशन उड़ान”,
“प्रोजेक्ट संबल”,
“जन-संवाद प्लस”।
फिर दूसरा कलेक्टर आता है।
पहले वाले की फाइलें स्टोर रूम में चली जाती हैं।
नई नेमप्लेट लगती है।
नई टैगलाइन छपती है।
पुरानी योजना मर जाती है।
जनता वहीं खड़ी रहती है।
राजस्थान में शायद ही कोई ऐसा जिला होगा जहां
किसी कलेक्टर की बनाई व्यवस्था
दस साल बाद भी उसी मजबूती से चल रही हो।
क्योंकि यहां व्यवस्था नहीं बनती,
इवेंट बनते हैं।
यहां स्थायी समाधान नहीं,
स्थायी प्रचार बनता है।
अगर सचमुच कोई जिला कलेक्टर महान कहलाना चाहता है,
तो वह ऐसा सिस्टम बनाए
जो उसके जाने के बाद भी चले।
ऐसी व्यवस्था जो भ्रष्टाचार कम करे।
ऐसी तकनीक जो जनता को बाबुओं के चक्कर से बचाए।
ऐसी जल निकासी कि शहर डूबे नहीं।
ऐसी शिक्षा व्यवस्था कि सरकारी स्कूल छोड़कर लोग भागें नहीं।
ऐसी बिजली-पानी व्यवस्था जो मंत्री के दौरे पर नहीं,
हर दिन चले।
लेकिन यह कठिन काम है।
क्योंकि इसमें रील नहीं बनती।
इसमें राष्ट्रपति भवन में इनाम वाली फोटो जल्दी नहीं मिलती।
इसलिए आसान रास्ता चुना जाता है।
लड्डू बांटो।
चप्पल पहनाओ।
फोटो खिंचवाओ।
अखबार में छप जाओ।
और जनता?
जनता अगले मानसून में फिर पानी में तैरती मिल जाएगी।
राजस्थान में तो दृश्य और भी अद्भुत है।
करीब 200 विधायक हैं।
मंत्रियों को छोड़ दें तो 175 की संख्या है जो
छोटे-छोटे फ्लैटों में रहते हैं।
लेकिन बड़े अफसरों के बंगले देखिए।
बंगले कम, सामंती स्मारक ज्यादा लगते हैं।
एक-एक, दो-दो बीघा में फैले हुए।
देश लोकतंत्र से चलता है या “साहब तंत्र” से…
कई बार समझना मुश्किल हो जाता है।
शायद इसलिए आम आदमी की समस्या
फाइल में सिर्फ “मामला” बनकर रह जाती है।
क्योंकि जिसने कभी पानी भराव में रात नहीं काटी,
वह ड्रेनेज को प्राथमिकता क्यों देगा?
जिसने कभी सरकारी अस्पताल की लाइन नहीं देखी,
उसे स्वास्थ्य व्यवस्था की बेचैनी कैसे समझ आएगी?
यूरोप, अमेरिका, जापान, चीन…
इन देशों की ब्यूरोक्रेसी का अध्ययन कीजिए।
वहां सिस्टम व्यक्ति से बड़ा होता है।
यहां व्यक्ति सिस्टम से बड़ा हो जाता है।
वक्त शायद सचमुच बदलाव का है।
वरना आने वाले वर्षों में भी
देश के अखबार ऐसे ही चमकते रहेंगे…
“कलेक्टर साहब ने आज 51 बच्चों को जूते पहनाए।”
“कलेक्टर मैडम ने देसी घी के लड्डू खिलाए।”
“कलेक्टर साहब ने पेड़ों के लिए नया ऐप लॉन्च किया।”
और उधर सड़क पर
एक बच्चा गड्ढे के पानी में
नंगे पैर चलता रहेगा।

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