Home Blog Page 11

राजस्थान में परिवहन की भी बदली तस्वीर

0

तत्कालीन रेलमंत्री श्री जगजीवनराम द्वारा 10 जनवरी, 1961 उदयपुर से डूंगरपुर होते हुए हिम्मत नगर (गुजरात) तक जाने वाली मीटर गेज रेलवे लाईन का निर्माण कार्य शुरू किया गया. इससे डूंगरपुर के खनिज-व्यवसाय को एक दिशा मिली. 28 जनवरी, 1968 को पोकरण-जैसलमेर मीटर गेज रेलवे लाईन का उद्घाटन कर पश्चिमी राजस्थान के लोगों को सुलभ परिवहन की सौगात दी गई. 1 अक्टूबर, 1964 को ‘राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम’ (RSRTC) या ‘राजस्थान रोडवेज’ स्थापित किया गया.  हैंडीक्राफ्ट जैसे स्थानीय उद्योगों की भी पड़ी नींव हस्तकला उद्योग या हैंडीक्राफ्ट (Handicraft) भी राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पर्याप्त योगदान देने वाला क्षेत्र रहा है. 70 के दशक में ही इसकी नींव पड़ी. जयपुर के हीरे-जवाहरात, संगमरमर की मूर्तियां, पीतल पर खुदाई कार्य, मिट्टी राजस्थानी हस्तकला की प्रदर्शनियाँ लगाई गयी तथा कलाकारों एवं कुटीर उद्योग व्यवसायियों को  खिलौने, ऊनी कालीन, जोधपुर की बँधेज और कशीदाकारी, बगरू, सांगानेरी एवं बालोतरा वस्त्र प्रिण्ट, जयपुर की ब्लू पॉटरी, कोटा डोरिया साड़ी, उदयपुर के लकड़ी के खिलौने और जैसलमेर की पत्थर की जालियां जैसे उद्योगो को राह मिली.

आज जिस बूते हम 350 बिलियन डॉलर का सपना देख रहे, 70 के दशक में पड़ी थी राजस्थान की आधुनिक अर्थव्यवस्था की नींव

0

जानिए कैसे मारवाड़ी घरानों की पहल और तत्कालीन सरकार के प्रयासों से बदली प्रदेश की तस्वीर आज राजस्थान की अर्थव्यवस्था करीब 220 बिलियन डॉलर यानी 19 लाख करोड़ रुपए है. अब राजस्थान को 350 बिलियन डॉलर का मुकाम पाने का इंतजार है. आज राजस्थान की जो प्रगतिशील अर्थव्यवस्था है, उसकी नींव 1970 के दशक में रखी गई थी. वो वक्त, जब देश को आजाद हुए और राजस्थान के गठन को डेढ़ या 2 दशक ही बीते थे. उस समय प्रदेश में एक भी आधुनिक औद्योगिक इकाई स्थापित नहीं थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया चाहते थे कि कोटा को कानपुर की तर्ज पर विकसित किया जाए, क्योंकि वहां पानी की प्रचुरता थी. बजाज, मित्तल, गोयनका और पीरामल समेत कई कारोबारियों का राज्य को मिला साथ राजस्थान जस्ता, तांबा, चांदी, जसपर, रॉक फास्फेट, फ्लोराइट, एसबेस्टस, तामड़ा, बैण्टोनाइट, अभ्रक, सोप स्टोन, टंगस्टन तथा जिप्सम उपलब्धता की दृष्टि से समृद्ध राज्य है. इसके चलते सुखाड़िया ने राजस्थान के प्रसिद्ध मारवाड़ी सेठों या यूं कहिए घरानों से बात की. उन्होंने बिड़ला, बजाज, मित्तल, रुइया, गोयनका, बांगड़, कानोड़िया, पीरामल, धूत, फिरोदिया, तोषनीवाल, खेतान, पोद्दार, सिंघानिया, केडिया, शोभासरिया, आबूसरिया और झुनझुनवाला से निरन्तर सम्पर्क बनाए रखा, नतीजा राज्य में छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां स्थापित होने लगी. सुखाड़िया के प्रयासों से चित्तौड़गढ़ में बिड़ला समूह, निम्बाहेड़ा में जेके समूह के सीमेंट प्लांट, कांकरोली (राजसमंद) में जेके टायर, उदयपुर में नेवटिया-बजाज सीमेण्ट (अब जेके), भरतपुर में सिमको, भीलवाड़ा में एलएन झुनझुनवाला की राजस्थान स्पिनिंग और वीविंग मिल, भवानीमण्डी में बिड़ला टेक्सटाईल और किशनगढ़ में कानोड़िया समूह की आदित्य मिल्स स्थापित हुई.  प्रदेश में स्पिनिंग मिल से लेकर चमड़ा कारखाना तक हुआ विस्तार  इसी दौर में चूरू, लाडनू, उदयपुर और बांसवाड़ा में स्पिनिंग मिल, बीकानेर में ऊनी मिल, टोंक में चमड़ा कारखाना, डबोक (उदयपुर) और चित्तौड़गढ़ में सीमेंट कारखाने लगे. सवाईमाधोपुर और चित्तौड़गढ़ में लगी सीमेण्ट फैक्ट्रियां एशिया में सबसे बड़ी फैक्ट्रियां थीं.  सुखाड़िया के शासनकाल में सन् 1963 में ‘हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड’ (HCL) के द्वारा खेतड़ी (झुंझुनूं) में ताम्बा खनन कार्य शुरू हुआ और हजारों लोगों को रोजगार मिला. उसी वर्ष डीडवाना (नागौर) में सोडियम सल्फेट का कारखाना स्थापित किया गया. सन् 1964 से सांभर साल्ट लिमिटेड शुरू हुआ. अगले ही साल 1965 में ‘हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड’ (HZL) ने देबारी (उदयपुर) में जिंक स्मेल्टर का कारखाना स्थापित किया गया. 1966 में डेगाना (नागौर) में डेगाना टंगस्टन परियोजना शुरू हुई. देश का उत्तम टंगस्टन इसी क्षेत्र में पाया जाता है. इसी तरह पलाना लिग्नाइट खान से ओपनकट विधि से कोयला खनन कर विद्युत परियोजना का  प्रारम्भिक चरण भी 70 के दशक में ही शुरू हुआ. कोटा में ‘उर्वरक कारखाना’ स्थापित होने के अलावा राज्य में चीनी, यूरिया, वनस्पति घी, रेलवे वैगन, पानी के मीटर, नायलॉन धागा, सूती वस्त्र, सूती धागा, संगमरमर, ग्रेनाइट, खनन कार्य तथा मशीनी उपकरणों के कई कारखाने स्थापित हुए, जिनसे राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिली. 10 साल के भीतर ही 4 गुना तक बढ़ गईं फैक्ट्रियों की संख्या आधुनिक राजस्थान के निर्माण के इस दौर में फैक्ट्रियों की संख्या 4 गुना तक पहुंच गईं. साल 1954 में राज्य में 324 फैक्ट्रियां थीं, जो सन् 1964 में 1238 तक हो गई. इसी बीच जयपुर में 28 मार्च, 1969 को ‘राजस्थान राज्य औद्योगिक एवं खनिज विकास निगम’ की स्थापना की गई, जिसके चलते 10 साल के भीतर ही इसी निगम में से कालान्तर (सन् 1979) में ‘राजस्थान राज्य खनिज विकास निगम लिमिटेड’ (RSMDC) और ‘राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं विनियोजन निगम लिमिटेड’ (RIICO) जैसी दो सरकारी कंपनियां अस्तित्व में आई. आज इसी ‘रीको’ के माध्यम से राजस्थान में सैकड़ों औद्योगिक क्षेत्र विकसित हुए हैं और हजारों कारखाने राजस्थान के विकास चक्र को गति दे रहे हैं. इसी दौरान कुछ कम्पनियों की राज्य के नियंत्रण में भी किया गया. 1945 से कार्यरत ‘द बीकानेर इण्डस्ट्रीज कॉर्पोरेशन लिमिटेड, बीकानेर, को 1 जनवरी, 1956 को राज्य स्वामित्व में लिया गया और ‘द गंगानगर शुगर मिल्स लिमिटेड’ नाम दिया, जो आज स्प्रिंट उत्पादन में राज्य की मुख्य फैक्ट्री है. सन् 1961 में ‘राजस्थान लघु उद्योग निगम लिमिटेड’, सन् 1965 में ‘राजस्थान राज्य होटल निगम लिमिटेड’ और, सन् 1969 में ‘स्टेट एग्रो इण्डस्ट्रीज कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ की स्थापना की गई।

सुस्त सिस्टम में कमजोर विजन नजर आता है, क्या राजस्थान को 350 बिलियन डॉलर की बुलंदियों तक पहुंचाना आसान है?

0

राजस्थान की अर्थव्यवस्था को 350 बिलियन डॉलर के मुकाम तक पहुंचाना दूर की कौड़ी है. इस लक्ष्य को पाने के लिए समाज की सामूहिक इच्छाशक्ति, शासन की दूरदृष्टि और उद्योग-व्यापार की आक्रामक भागीदारी जरूरी है. आज प्रदेश की जीडीपी लगभग 18 से 19 लाख करोड़ रुपए के आसपास है यानी करीब 220 से 230 अरब डॉलर के बीच. अब अगर राजस्थान को इसे 350 अरब डॉलर तक पहुंचाना है तो अगले 5 से 6 वर्षों में लगातार डबल डिजिट में विकास दर रखनी होगी, जो कि उतना आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं. राजस्थान की सबसे बड़ी ताक़त उसका भूगोल है. रेगिस्तान की बंजर जमीन पर सौर ऊर्जा का बड़ा खजाना मौजूद है. अगर दिशा सही हो तो दुनिया के सबसे सस्ते और बड़े सौर ऊर्जा पार्क राजस्थान में खड़े हो सकते हैं. अगले कुछ वर्षों में ग्रीन एनर्जी का वैश्विक बाज़ार रफ्तार से बढ़ने वाला है. ऐसे में थार की ऊर्जा को राजस्थान सही तरीके से उपयोग में ले पाया तो प्रदेश को ऊर्जा निर्यातक राज्य बनने से कोई रोक नहीं सकता. ऊर्जा उत्पादन से लेकर मॉड्यूल, बैटरी और इलेक्ट्रोलाइज़र तक की विनिर्माण श्रृंखला को खड़ा कर दिया जाए तो यह अकेला क्षेत्र 50 से 70 अरब डॉलर की अतिरिक्त अर्थव्यवस्था पैदा कर सकता है. राजस्थान के पास अवसरों का सुनहरा दौर है. यदि राज्य अपनी नीतियों को तेज़ी से लागू करे, वैश्विक पूंजी को आकर्षित करें और जनता को भागीदार बनाए तो 5 साल बाद राजस्थान की पहचान सिर्फ़ मरुस्थल, ऊंट और महलों की नहीं होगी, बल्कि भारत की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में होगी. 350 अरब डॉलर का आंकड़ा केवल किताबों में नहीं, बल्कि हर नागरिक के जीवन स्तर में बदलाव के रूप में दिखेगा. लेकिन ये कैसे संभव होगा…? खनन से लेकर खेती तक उठाने होंगे आविष्कारक कदम कृषि अभी भी लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी है. लेकिन केवल गेहूं-बाजरा काटकर मंडी तक सप्लाई कर लेने महज से समृद्धि नहीं आती. यहां ज़रूरत है वैल्यू एडिशन की, जिसमें फूड प्रोसेसिंग पार्क, कोल्ड चेन, अनुबंध खेती और निर्यातक कंपनियों की भागीदारी शामिल हो. ताकि किसानों की आय दोगुनी से ज़्यादा हो सके. यही अतिरिक्त आमदनी जीडीपी में भी भारी इज़ाफ़ा करेगी. खनिज और पत्थरों में राजस्थान की पकड़ पुरानी है, लेकिन खदान से कच्चा माल निकालकर बाहर भेज देने की आदत छोड़नी होगी. कटाई, पॉलिश, डिज़ाइन और उच्च मूल्य वाले उत्पादों का निर्यात ही हमें वास्तविक लाभ देगा. ग्रामीण टूरिज्म को पर्यटन के नक्शे पर लाना होगा पर्यटन राजस्थान की आत्मा है. किलों और महलों से आगे बढ़कर गांवों, लोककला, त्यौहारों और रेगिस्तानी अनुभवों को पैकेज किया जाए तो विदेशी पर्यटक का प्रवास एक दिन से 5 दिन तक बढ़ सकता है. ‘ग्रामीण टूरिज्म’ को बढ़ावा देने से रोजगार और आय में काफी बढ़ोतरी होगी. साथ ही शैक्षणिक सेवाओं, आईटी-आधारित कामों और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए राजस्थान को नया हब बनाया जा सकता है. जयपुर, उदयपुर और जोधपुर जैसे शहर केवल पर्यटन से नहीं बल्कि उच्च शिक्षा, अनुसंधान और आईटी सेवाओं से भी अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर आ सकते हैं. हालांकि इसके लिए शासन-व्यवस्था की सूरत बदलनी भी काफी जरूरी है. पारंपरिक कार्यशैली से बाहर निकलकर महीनों तक टेबल पर घूमने वाली फाइल को मंजिल तक पहुंचाना होगा. सिंगल विंडो की बात तो कही जाती है, लेकिन आज भी भूमि आवंटन, स्वीकृति और बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित नहीं पाती, अगर इन्हें 30 दिन के भीतर पूरा किया जाए तो विकास को गतिमान किया जा सकता है. स्किल डेवलपमेंट को भी कागजी प्रमाणपत्रों से इतर बाजार और उद्योग की मांग से जोड़ना होगा.

क्या केवल कागजों में सिमट कर रह जायेगी जयपुर हाई टेक सिटी

0

फरवरी 2024 में जब भजनलाल सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया था तो उसमें जयपुर के पास एक हाई-टेक सिटी बनाने की घोषणा सबसे अहम बिंदुओं में थी. इसे राजस्थान के डिजिटल भविष्य और आईटी हब बनने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया. उस समय इसे रोजगार, निवेश और नवाचार के बड़े अवसर के रूप में पेश किया गया था. लेकिन आज, 16–17 महीने बाद, इस घोषणा की स्थिति पूछने पर जवाब केवल खामोशी है. न जगह का चयन हुआ है, न विस्तृत परियोजना रिपोर्ट बनी, न ही निवेशकों से ठोस संवाद हुआ. सवाल यह है कि क्या यह घोषणा सिर्फ़ बजट की गूंज बनकर रह जाएगी या राज्य सरकार इसे वाकई धरातल पर उतारने का इरादा रखती है. जयपुर की भौगोलिक स्थिति अपने आप में एक वरदान है. दिल्ली–मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, नई बनी बांदीकुई–जयपुर एक्सप्रेसवे और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की निकटता इस शहर को हाई-टेक निवेश के लिए आदर्श बनाते हैं. यहां आईटी पार्क, डेटा सेंटर, इनोवेशन लैब और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण जैसे क्षेत्रों की जबरदस्त संभावनाएँ हैं. जयपुर पहले से ही शिक्षा और पर्यटन का गढ़ है, लेकिन नई अर्थव्यवस्था का केंद्र बनने के लिए उसे ठोस औद्योगिक और तकनीकी निवेश की ज़रूरत है. हाई-टेक सिटी इस दिशा में मील का पत्थर हो सकती है बशर्ते सरकार इसे गंभीरता से ले. अब तक की स्थिति हालांकि उत्साहजनक नहीं है. सरकार ने घोषणा तो कर दी, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई रोडमैप नहीं है. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले एक special purpose vehicle (SPV) का गठन होना चाहिए. यह संस्था भूमि अधिग्रहण, आधारभूत ढाँचा तैयार करने और निवेशकों को आकर्षित करने का काम संभाले. इसके साथ ही, एकल खिड़की प्रणाली अनिवार्य है ताकि अनुमति और मंज़ूरियों की प्रक्रिया समयबद्ध हो. यदि शुरुआती छह महीने में साइट चयन और एक साल में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हो जाए तो निवेशकों का भरोसा बन सकता है. राज्य के पास समय बर्बाद करने की गुंजाइश नहीं है. राजस्थान की युवा आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और उसे रोजगार और अवसरों की तलाश है. अगर सरकार हाई-टेक सिटी जैसे वादों को समय पर पूरा नहीं करती तो यह केवल एक खोखला सपना रह जाएगा. याद रहे कि चीन और अन्य देशों ने योजनाबद्ध ढंग से नए शहरी केंद्र बनाकर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को गति दी है. भारत और खासकर राजस्थान के पास भी वैसा ही मौका है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब घोषणाओं को ज़मीन पर उतारने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई जाए. समाधान क्या है? सरकार को चाहिए कि वह इस परियोजना के लिए एक ठोस टाइमलाइन घोषित करे छह महीने में जमीन का चयन, बारह महीने में डीपीआर और अठारह महीने में आधारभूत ढाँचे का काम शुरू. साथ ही सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन और अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग जैसे उपाय अनिवार्य किए जाएँ ताकि शहर टिकाऊ और पर्यावरण-संतुलित बने. फिलहाल जनता का सबसे बड़ा सवाल यही है: बजट में किए गए वादों और धरातल पर सन्नाटे के बीच की खाई कब पाटी जाएगी? हाई-टेक सिटी केवल एक विकास योजना नहीं, बल्कि भजनलाल सरकार की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुकी है. अगर यह घोषणा केवल कागज़ पर ही रह गई तो आने वाले वर्षों में जनता इसे याद रखेगी एक खोए हुए अवसर और अधूरे वादे के प्रतीक के रूप में.

लेकिन पिछले 14 साल में यह हाल रहा कि जिन 300 सड़कों की योजना बनी, उनमें से अधिकांश की डिमार्केशन तक नहीं हुई. अप्रैल 2023 में जेडीए की मास्टरप्लान शाखा ने सभी ज़ोन से सड़कों की सूची मांगी थी, लेकिन इतनी धीमी प्रक्रिया रही कि महीनों बाद महज़ 225 सड़कों की जानकारी ही मिल पाई.

0

लेकिन पिछले 14 साल में यह हाल रहा कि जिन 300 सड़कों की योजना बनी, उनमें से अधिकांश की डिमार्केशन तक नहीं हुई. अप्रैल 2023 में जेडीए की मास्टरप्लान शाखा ने सभी ज़ोन से सड़कों की सूची मांगी थी, लेकिन इतनी धीमी प्रक्रिया रही कि महीनों बाद महज़ 225 सड़कों की जानकारी ही मिल पाई. चौंकाने वाली बात तो यह है कि इंजीनियरिंग शाखा के पास अब तक पूरी सूची ही नहीं है और जेडीसी की बैठकों में साफ़ हुआ कि जिन सड़कों का डेटा दिया गया है, उनमें कई की ज़मीन मौके पर मौजूद ही नहीं है.

सिस्टम के ढीला रवैए ने मास्टर प्लान की बलि चढ़ा दी

असलियत यह है कि मास्टर प्लान का पूरा खाका जेडीए की सुस्ती, विभागीय असमन्वय और राजनीतिक टालमटोल की भेंट चढ़ गया है. इसका सीधा असर जयपुर की जीवन-गुणवत्ता, ट्रैफिक व्यवस्था और शहरी स्वरूप पर पड़ा है. जिन सेक्टर सड़कों को समय रहते बना दिया जाता, वहां आज कॉलोनियों की गलियों में वाहनों की बेतहाशा आवाजाही न होती और मुख्य मार्गों पर जाम का दबाव कम हो चुका होता. सड़कें न बनने से अवैध कब्जे पक्के हो गए, और जो कभी “स्लम प्रिवेंशन प्लान” होना चाहिए था, वह उल्टा “स्लम प्रमोशन प्लान” साबित हो गया.

जाग जाओ!!! जयपुर की सड़कों का प्लान कागजों से बाहर नहीं निकला तो पिंक सिटी स्लम बन जाएगा

0

जयपुर मास्टरप्लान की 80 फीसदी सड़कें अधूरी है चौड़ी गलियों और 300 वर्षों की नियोजित विरासत वाला शहर जयपुर आज एक निर्माणाधीन कॉलोनी की तरह जाम और अव्यवस्था में घिरता शहर बन चुका है. जिस तरह से शहर के निर्माण कार्य हो रहे हैं, अगर यह सबकुछ बदस्तूर ऐसे ही जारी रहा तो जयपुर को स्लम बनने से कोई नहीं रोक सकता. इसलिए जरूरी है कि JDA जैसे सरकारी संस्थाओं के हर निर्माण कार्य की स्थिति, लागत और समयसीमा सार्वजनिक हो. बात सिर्फ़ इंफ्रास्ट्रक्चर का सवाल नहीं, बल्कि शहर की संस्कृति, निवेश और भविष्य की लड़ाई है और यही समय है जब जयपुर की धरोहर को ईमानदार नियोजन और सख़्त क्रियान्वयन से बचाया जा सकता है. कुछ ऐसा ही हाल जयपुर के मास्टरप्लान और रिंग रोड का है, जो अब शहर की सबसे बड़ी शहरी विडंबना बन चुके हैं. कागज़ पर योजनाएं चमकती रहीं, लेकिन ज़मीन पर उनका अता-पता तक नहीं. जेडीए ने 15 साल पहले तैयार किए गए मास्टर प्लान-2025 में यह सपना दिखाया था कि नए विकसित इलाकों में 24 से 60 मीटर चौड़ी लगभग 300 सेक्टर सड़कों का जाल बिछाया जाएगा. इसके मकसद था- ट्रैफिक का दबाव कम हो और बाहरी इलाकों की नई बसावटों को सीधी कनेक्टिविटी मिले. लेकिन हकीकत यह है कि 226 सड़कें अब तक कागज़ से बाहर नहीं निकलीं और 50 से 60 सड़कें अधूरी पड़ी हैं, महज़ कुछ गिनी-चुनी सड़कें ही तैयार हो पाईं. सीधे तौर पर मास्टरप्लान की 80 फीसदी सड़कें अधूरी रह गईं. आज टोंक रोड, सांगानेर, शिकारपुरा, डिग्गी रोड, मुहाना मंडी, वैशाली नगर, जगतपुरा, खो-नागोरियन, मानसरोवर, अजमेर रोड, भांकरोटा जैसे प्रमुख इलाकों में मास्टरप्लान में चिन्हित सड़कें न बनने से मौजूदा सड़कों पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है. हालत यह है कि हर रोज़ हजारों लोग घंटों जाम में फंसते हैं और मुख्य मार्ग बंद होने पर वैकल्पिक रास्ते ही नहीं मिलते. 2011 में जब यह योजना बनी थी, तब इन सेक्टर सड़कों के लिए जमीनें लगभग खाली थीं. लेकिन जेडीए की जमीन अवाप्ति की प्रक्रिया इतनी सुस्त रही कि सड़कें बनने से पहले ही गृह निर्माण सहकारी समितियों और कॉलोनाइज़र्स ने पट्टे बांटकर कॉलोनियां खड़ी कर दीं. नतीजा यह कि सांगानेर एसडीएम कोर्ट के बाहर टोंक रोड को सीधे मानसरोवर और डिग्गी-मालपुरा रोड से जोड़ने वाली 100 फीट चौड़ी सड़क आज भी नहीं बनी, जबकि उस पर 20 से अधिक कॉलोनियां बस चुकी हैं. मुआवजा तक बांट दिया, लेकिन एक भी सड़क का काम शुरू नहीं हुआ रिंग रोड से जुड़ने वाली सेक्टर सड़कों की हालत भी यही है. 2022 में जेडीए ने जगतपुरा, रामचन्द्रपुरा, खातीपुरा, प्रहलादपुरा, शिवदासपुरा, सांगानेर, साईंपुरा, डिग्गी-मालपुरा रोड, बक्सावाला, कपूरावाला, बालावाला, महेन्द्रासेज और अजमेर रोड से जुड़े लगभग 30 किलोमीटर एरिया में 24 से 60 मीटर चौड़ी सड़कों का प्लान बनाया था. इसके लिए जमीन अवाप्त कर मुआवजा तक बांट दिया गया, लेकिन एक भी सड़क पर निर्माण शुरू नहीं हुआ. बासड़ी जोगियान पहाड़िया तक प्रस्तावित 200 फीट चौड़ी सेक्टर रोड की 80% जमीन अधिग्रहीत हो चुकी है, लेकिन निर्माण की प्लानिंग तक शुरू नहीं हुई. जगन्नाथपुरा से सांगानेर डिग्गी रोड तक की 100 फीट चौड़ी सड़क अधूरी है. मानसरोवर रीको कांटे से सांगानेर टूटी पुलिया तक 160 फीट चौड़ी सड़क, मुहाना मंडी से प्रतापनगर तक 160 फीट सड़क, बम्बाला पुलिया से सांगानेर एसडीएम कोर्ट तक 150 फीट सड़क और वाटिका से डिग्गी रोड को जोड़ने वाली 160 फीट सड़क सभी अधूरी हैं. कपूरावाला से पवालियां तक की 200 फीट सड़क तो केवल नक्शे में ही है, जबकि वहां आज भी 40 फीट की संकरी डामर सड़क से ही लोग गुजर रहे हैं. वंदेमातरम सर्कल से सांगानेर रेलवे लाइन तक 200 फीट सड़क का “मिसिंग लिंक” आज तक पूरा नहीं हुआ, जिसकी वजह से लोग इसे इस्तेमाल ही नहीं कर पाते. अजमेर रोड स्थित Mahindra SEZ (महिंद्रा सेज) को जोड़ने वाली 200 फीट रोड धौलाई में अटकी पड़ी है. भांकरोटा से गांधीपथ-पश्चिम होते हुए सिरसी रोड तक प्रस्तावित 200 फीट रोड 5 साल से अधूरी है और सड़क सीमा क्षेत्र में अब भी खेती हो रही है. इसी तरह सांगानेर रेलवे स्टेशन से इस्कॉन रोड को जोड़ने वाली 160 फीट सड़क पर जगह-जगह अवैध कब्जे हैं और रोज़ लगभग 40 हजार लोग परेशानी झेल रहे हैं. JDA के इंजीनियर के पास तो सड़कों की लिस्ट भी नहीं! मास्टर प्लान-2025 की मियाद खत्म होने में महज़ तीन महीने बचे हैं और जेडीए नए मास्टर प्लान-2047 की तैयारी में जुट गया है.

According to the Ministry of Jal Shakti (data 2024), India is facing alarming levels of groundwater stress, with the national average groundwater extraction at 60.5% of available resources.

0

Most Stressed States: •Punjab – 156.9% (highest extraction) •Rajasthan – 149.9% •Haryana – 136.0% •Delhi – 100.8% Moderately Stressed States: •Tamil Nadu – 74.3% •Gujarat – 54.2% •Kerala – 53.8% •Odisha – 48.2% The data highlights that Punjab and Rajasthan are the most over-exploited, extracting significantly more groundwater than their annual recharge potential.

स्टूडेंट्स में आत्महत्या के बढ़ते मामले चिंताजनक! नियम के बावजूद हर ब्लॉक स्तर पर क्यों नहीं हो रही साइकोलॉजिस्ट की नियुक्ति?

0

आज विश्व आत्महत्या रोकथाम (World Suicide Prevention Day) पर जरूरी है कि बढ़ते युवाओं और खासकर स्टूडेंट्स में आत्महत्या पर बात हो. स्कूल या कॉलेज में अक्सर मनोवैज्ञानिक विकास या काउंसलिंग के लिए साइकोलॉजिस्ट नियुक्त करने पर काफी चर्चा होती है, लेकिन हकीकत साकार नहीं होती. नई शिक्षा नीति में भी इसका प्रावधान है, लेकिन 5 साल बीत जाने के बाद भी इस पर काम नहीं हुआ. इसी नई शिक्षा नीति के तहत यह प्रावधान किया गया था कि देश के हर ब्लॉक में काउंसलर नियुक्त किए जाएंगे, जो छात्रों की रुचि और क्षमता के अनुसार विषय चुनने में मदद करेंगे. साथ ही उनके भावनात्मक विकास का ध्यान रखेंगे.  महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं काउंसलर नई शिक्षा नीति (NEP) के संदर्भ में मनोवैज्ञानिकों की भूमिका समग्र छात्र विकास और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण है. दरअसल, NEP 2020, 5+3+3+4 शैक्षिक संरचना के साथ, आधारभूत चरण (Foundational Stage) पर ज़ोर देती है. इस चरण में मनोवैज्ञानिक छात्र के संज्ञानात्मक, सामाजिक और व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. इन काउंसलर को छात्रों के लिए परामर्श प्रदान करने के लिए नियुक्त किया जाएगा, जिससे उन्हें सही रास्ता मिल सके इससे करियर के रास्ते भी खुलेंगे  NEP 2020 के अनुसार, एक छात्र अपनी स्नातक की डिग्री की अवधि के आधार पर मनोविज्ञान में 2 साल या 1 साल की मास्टर डिग्री हासिल कर सकता है, जिससे करियर से संबंधित स्पष्टता आती है. जाहिर तौर पर इस नियुक्ति से करीब 300 नए काउंसलर के तौर पर भर्तियों के रस्ते भी खुलेंगे. आंकड़े बताते हैं कि क्यों जरूरी है इस पर गौर करना  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताज़ा रिपोर्ट ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2022’ के मुताबिक, साल 2022 में देशभर में 13 हजार से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की, जो 2021 की 6,654 की संख्या से दोगुनी थी. यह आंकड़ा देश में दर्ज कुल आत्महत्याओं का लगभग 7.6% है, जो चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि परीक्षाओं में असफल होना छात्रों की आत्महत्या के प्रमुख कारणों में से एक है. 18 वर्ष से कम आयु के 1,123 छात्रों ने केवल परीक्षा में असफल होने की वजह से अपनी जान दी, जिनमें 578 लड़कियां और 575 लड़के शामिल थे. आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज़्यादा आत्महत्या करने वाले वे लोग थे, जिनकी शिक्षा माध्यमिक स्तर तक थी, यह कुल आत्महत्याओं का 23.9% था. वहीं, शिक्षा से वंचित लोगों की संख्या 11.5% रही.

15 साल से ज्यादा की नौकरी कर चुके लाखों सरकारी शिक्षकों पर छाया संकट? अगर अब एग्जाम पास नहीं किया तो शिक्षकों को देना होगा इस्तीफा

0

सोचिए, साल 2010 या उससे पहले से आप सरकारी नौकरी में हैं. भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के बाद सरकारी सेवा के लिए आपका चयन हुआ था, लेकिन अब कहा जाए कि या तो इस्तीफा दीजिए या रिटायरमेंट ले लीजिए, जबकि आपका कार्यकाल अभी भी करीब 15 साल से ज्यादा वर्ष के लिए बाकी हो. ऐसी स्थिति में क्या होगा? देश के लाखों सरकारी शिक्षकों के सामने अब ऐसा ही सवाल खड़े होने वाला है. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने साफ कर दिया है कि कक्षा पहली से 8वीं तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टेट एग्जाम न केवल नई नियुक्ति, बल्कि पदोन्नति के लिए भी अनिवार्य होगा. इस आदेश का सीधा असर राजस्थान के हजारों शिक्षकों पर पड़ने जा रहा है. 1998 तक नियुक्त करीब 1 लाख तृतीय श्रेणी शिक्षकों पर यह नियम लागू होगा. इसके चलते साल 2010 से पहले जो शिक्षक लगे हैं, उन्हें अब टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट यानी टेट एग्जाम देना होगा. नई शिक्षा नीति-2020 के तहत टेट एग्जाम को अनिवार्य कर दिया गया था, अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संबंध में आदेश सुनाया है. नई शिक्षा नीति के मुताबिक, यह एग्जाम प्रमोशन और नियुक्ति, दोनों के लिए अनिवार्य है. पूरा मामला समझिए 2011 के बाद कक्षा पहली से 5वीं और 6वीं से 8वीं तक शिक्षकों की भर्ती टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET एग्जाम) से भर्ती होती थी. इसे बात में हटाकर REET एग्जाम के तहत शिक्षकों की भर्ती की जाने लगी. लेकिन अब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि TET एग्जाम के आधार पर ही शिक्षकों की नियुक्ति और उनका प्रमोशन भी किया जाए. साथ ही जो ऐसा करने में असफल रहते हैं, उनकी सेवा समाप्ति मानते हुए ऐच्छिक सेवानिवृत्ति दी जाए. खास बात यह है कि इस फैसले का आधार नई शिक्षा नीति- 2020 को माना गया है. जबकि 5 साल बीत जाने के बाद भी राजस्थान में इसकी पालना नहीं हुई. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, जिन टीचर्स की नौकरी को 5 साल से ज्यादा बचे हैं, उन्हें टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) क्वालिफाई करना जरूरी होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो उन्हें इस्तीफा देना होगा या फिर कंपल्सरी रिटायरमेंट लेना होगा. ये है सुप्रीम कोर्ट का आदेश  – 2010 से पहले जो शिक्षक लगे हैं, उन्हें यह एग्जाम देना होगा. – जिन शिक्षकों के कार्यकाल में 5 साल या उससे कम का समय बाकी है, उन्हें छूट दी गई है. – 2 साल के भीतर एग्जाम पास नहीं किए तो शैक्षिक सेवानिवृत्ति दी जाएगी. – यह एग्जाम प्रमोशन और नियुक्ति, दोनों के लिए अनिवार्य है. नई शिक्षा नीति-2020 में है प्रावधान दरअसल, राजस्थान में वर्ष 1999 से 2004 के बीच कोई भर्ती नहीं निकली थी. जबकि 2005, 2008 और 2010 की बड़ी भर्तियों के शिक्षक भी टेट लागू होने से पहले नियुक्त हुए थे. फैसले के अनुसार, यदि कोई शिक्षक 55 वर्ष से अधिक आयु का है और पदोन्नति नहीं चाहता तो उसे टेट देना अनिवार्य नहीं होगा. वहीं, कक्षा 9 से 12 तक पढ़ाने वाले वरिष्ठ अध्यापक और व्याख्याता पर यह नियम लागू नहीं होगा. यानी टेट की बाध्यता केवल कक्षा एक से आठ तक के शिक्षकों के लिए रहेगी. अब इसे लागू करने में कई तरह की चुनौतियां सरकार को झेलनी होगी. वरिष्ठ शिक्षकों के एक वर्ग का विरोध झेलने पड़ सकता है. भर्ती और प्रमोशन के लिए शिक्षा नीति क्या कहती है, वो जानिए नई शिक्षा नीति के मुताबिक, शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) सामग्री और शिक्षाशास्त्र दोनों के संदर्भ में बेहतर परीक्षण सामग्री को विकसित करने के लिए मजबूत किया जाएगा. – स्कूल शिक्षा के सभी स्तरों (बुनियादी, प्रारंभिक, मिडिल और माध्यमिक) के शिक्षकों को शामिल करते हुए भी टीईटी को विस्तृत किया जाएगा. – विषय शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में उनके संबन्धित विषय में प्राप्त टीईटी या एनटीए परीक्षा के अंको को भी शामिल किया जाएगा. – शिक्षण के प्रति जोश और उत्साह को जांचने के लिए साक्षात्कार या कक्षा में पढ़ाने का प्रदर्शन करना, स्कूल या स्कूल कॉम्प्लेक्स में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग होगा. – इन साक्षात्कारों का उपयोग स्थानीय भाषा में शिक्षण में सहजता और दक्षता का आकलन करने के लिए किया जाएगा, जिससे प्रत्येक स्कूल में कम से कम कुछ शिक्षक हों, जो स्थानीय भाषा और छात्रों की अन्य प्रचलित घरेलू भाषाओं में छात्रों के साथ बातचीत कर सकें. – निजी स्कूलों में शिक्षकों को भी टीईटी, कक्षा में पढ़ाने का प्रदर्शन/साक्षात्कार और स्थानीय भाषा के ज्ञान के माध्यम से समान रूप से योग्य होना चाहिए.