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‘वोट चोरी’ से लेकर ‘जग्गा जासूस’ तक, राजस्थान की करोड़ों उम्मीदों के साथ मानसून में सत्र भी बह गया….

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और इसके जिम्मेदार पक्ष या विपक्ष नहीं है, हम जनता है, जिन्होंने इन जनप्रतिनिधियों से आस लगाई!

राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र महज 6 बैठकों और 20 घंटे से भी कम के समय में बीत गया. कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन जारी रहा तो सत्ता पक्ष का बिल पास कराना. हालांकि सदन में विमर्श का अभाव ही दिखा. विपक्षी दल ने’वोट चोरी’ के मुद्दे पर घमासान किया, फिर झालावाड़ हादसे पर शिक्षा मंत्री से इस्तीफा मांगने तक पहुंचा और अंत होते-होते ‘जग्गा जासूस’ के मामले पर पहुंचा. इस दौरान नगर निकाय चुनाव कराने की मांग के लिए तख्तियां लेकर भी पहुंचे.

विधानसभा की कार्यवाही के दौरान सदन के ‘‘ना पक्ष ब्लॉक’’ में तीसरी आंख का मामला उठाकर विपक्ष जासूसी के आरोप पर ही बात करते नजर आया. कुल मिलाकर राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र धुआं-धुआं हो गया. ना बहस, ना चर्चा, बस सत्ता पक्ष और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप और फिर उसमें ‘जग्गा जासूस’ का जिन्न

लोकतंत्र के प्रहरी सत्ताधारी दल और विपक्ष, दोनों के जिम्मेदारी भरे रवैए के चलते सदन की कार्यवाही की ही बलि चढ़ गई. ना सत्ता का फ्लोर मैनेजमेंट दिखा और ना ही सदन चलाने की इच्छाशक्ति. बस दिखा तो सदन का कैमरा, जिसके चलते विपक्ष की टेढ़ी निगाहें सत्ता पर रही और इन्हीं कैमरों से लाइव प्रसारण में जनता भी दोनों पक्ष को देखती रही.

ना बाढ़ की चिंता रही, ना बहते घरों और लोगों की मौतों की. ना स्कूल के ढहती दीवारों की गूंज सदन में सुनाई दी और ना किसान की फसलों का खराबा सदन की चौखट तक पहुंच पाया. इस मानसून की अतिवृष्टि ने सबकुछ बहा दिया- किसानों की मेहनत, लोगों के घर और कई जिंदगियां. साथ ही इस सत्र में वो उम्मीदें भी बह गईं, जिन्हें पूरा करने का जिम्मा 8 करोड़ राजस्थानियों ने जनप्रतिनिधियों को दिया था. बरहाल, कैमरे में क्या रिकॉर्ड हुआ यह विषय नहीं है, क्योंकि जनता की आंखों में सबकुछ कैद हो गया है.

अजमेर के 7 वंडर पार्क पर बुलडोजर संवेदनहीन शासन व्यवस्था पर चोट है, राजस्थान में प्रदूषित होती नदियों को कौन बचाएगा?

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विकास के नाम पर जो हम कर रहे है, वो आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाश साबित होगा. चाहे वो पहाड़ों से छेड़छाड़ की बात हो या वन क्षेत्र में खनन की अनुमति देने के लिए कई तरह के प्रावधान. कुछ ऐसा ही हुआ, जब अजमेर शहर को सुंदर बनाने के लिए वेटलैंड क्षेत्र से छेड़छाड़ की गई और नतीजा यह है कि 11 करोड़ से ज्यादा की लागत से बने सेवन वंडर्स पार्क पर बुलडोजर चला. स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के अधिकारियों तर्क देते रहे कि यह पार्क शहर की सुंदरता बढ़ाने के लिए बनाया गया है और इसके निर्माण में उच्च गुणवत्ता का ध्यान रखा गया. लेकिन आनासागर झील के वेटलैंड क्षेत्र में बने इस पार्क को कोर्ट ने वेटलैंड नियमों की अवहेलना ही माना. एनजीटी ने भी सुनवाई में चिंता जताई थी कि आनासागर झील के आसपास अनियोजित निर्माण से झील का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है. झील के वेटलैंड क्षेत्र को संरक्षित करने के लिए सख्त नियम हैं, जिनका उल्लंघन इस प्रोजेक्ट में हुआ. बरहाल, पर्यावरण से छेड़छाड़ कर कथित तौर पर किए गए विकास पर कानून के हथौड़े के बाद पीला पंजा भी चल गया.

वेटलैंड से छेड़छाड़ जलीय जीवन का खतरा बढ़ा देगा!

दरअसल, वेटलैंड (आर्द्रभूमि) निर्माण या उनके साथ छेड़-छाड़ से प्रदूषण बढ़ सकता है. इससे स्थानीय जल-प्रवाह बदल सकता है और जलीय जीवों व पक्षियों का विस्थापन भी हो सकता है. लेकिन इस और प्रशासन का कितना ध्यान है, ये सामने आ गया. वो भी ऐसे वक्त में जब प्रदेश में जोजरी नदी, द्रव्यवती नदी और आयड़ समेत कई नदियों के प्रदूषित होने पर चिंता जाहिर की जा रही है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के वर्ष 2016-17 के आकलन के अनुसार, देश में प्रदूषित नदी क्षेत्रों की संख्या बढ़कर 351 हो गई है, जो कि 2 साल पहले 302 थी और इस दौरान गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों की संख्या 34 से बढ़कर 45 हो गई.

11 करोड़ रुपए से ज्यादा की बर्बादी, जिम्मेदार कौन?

लेकिन, अजमेर के आना सागर वेटलैंड पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हो रही कार्रवाई ने पूरे राजस्थान में नदियों और वेटलैंड्स के भविष्य पर बहस जरूर खड़ी कर दी है. सेवन वंडर्स पार्क पर बुलडोजर चलना इस बात का प्रतीक है कि नदियां और वेटलैंड्स सिर्फ सौंदर्य या पर्यटन का जरिया नहीं, बल्कि हमारी लाइफलाइन है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर निर्माण की अनुमति दी क्यों गई? साथ ही नियमों की अनदेखी के बाद 11 करोड़ रुपए से ज्यादा के खर्च का जिम्मेदार कौन है?

आम लोगों के करोड़ों रुपये के टैक्स से डूब क्षेत्र में पार्क बनाया गया, जो अवैध होने के चलते टूट गया है. इससे पहले, अदालत ने सेवन वंडर पार्क को छह महीने के भीतर हटाने या किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित करने का आदेश दिया था.

कोटा रिवर फ्रंट को लेकर भी उठ रहे सवाल

कोटा में रिवर फ्रंट निर्माण पर भी सवाल उठ चुके हैं. चंबल रीवर फ्रंट का निर्माण सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के आदेशों का खुला उल्लंघन बताया गया था. जरूरी पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं लेने, चंबल घड़ियाल सेंचुरी व अन्य जलीय जीवों का जीवन संकट में डालने, नदी का बहाव क्षेत्र कम करने और वेट लैंड यानी बफर जोन में अवैध निर्माण करने को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में एक वाद दायर किया गया था, हालांकि NGT ने यूआईटी का पक्ष जानने और कमेटी गठित करने के बाद मामला खारिज कर दिया था.

जयपुर की लाइफलाइन पर भी संकट

वहीं, जयपुर की लाइफलाइन द्रव्यवती नदी भी शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण यह एक नाले में तब्दील हो गई. स 2018 में 17 किलोमीटर (47 किलोमीटर में से) हिस्से का उद्घाटन हुआ था. हालात यह है कि नदी किनारे रहने वाले लोग दुर्गंध से परेशान हैं. इसका प्रमुख उद्देश्य नदी का बहाव क्षेत्र संरक्षित करना और इसमें स्वच्छ पानी का बहाव सुनिश्चित करना था, लेकिन ना तो उद्देश्य पूरा हुआ और ना नदी का प्रदूषण खत्म हुआ.

जीवन जीने के मौलिक अधिकारों का भी हनन

अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण और प्रदूषण मुक्त जल आदि को जीवन के अधिकार के व्यापक दायरे के तहत संरक्षण प्रदान किया गया है. वहीं, अनुच्छेद 51-A (G) के तहत वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना व इसमें सुधार करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है. ऐसे में प्रशासनिक नदी तंत्र का उजड़ना सीधे तौर पर संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का भी हनन है.

दिसंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि किसी भी रिज़र्व की सीमा बदलने से पहले सरकार को ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी करना होगा और जनता से राय लेनी होगी. लेकिन सरिस्का के मामले में सरकार ने पहले मंजूरी ले ली और बाद में कहा कि आपत्तियां तो सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद ही ली जाएंगी, जो कि कोर्ट के आदेश का सीधा उल्लंघन था. अब जब मामला कोर्ट में पहुंचा, तो पर्यावरण मंत्रालय ने यू-टर्न लिया. मंत्रालय ने कहा कि वह अब जनता से आपत्तियां आमंत्रित करेगा, ड्राफ्ट नोटिफिकेशन निकालेगा और ज़रूरत पड़ी तो प्रस्ताव को फिर से NBWL के सामने लाएगा

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सुप्रीम कोर्ट में 11 सितंबर को हुई सुनवाई में मंत्रालय ने लिखित रूप से माना कि सार्वजनिक आपत्तियों को लेना अनिवार्य है. अब मंत्रालय को ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी करना होगा, लोगों की आपत्तियां आमंत्रित होंगी और फिर इस पर अंतिम निर्णय होगा.

सरकार से कुछ जरूरी सवाल

  • सरकार के लिए संगमरमर की खादानें ज़्यादा महत्व रखती हैं या जंगल?
  • क्या जंगलों को खत्म करके मानव जीवन के बाक़ी रहने की संभावनाओं को कम नहीं किया जा रहा?
  • क्या सरकार बाघों के इलाक़े को कम करके उसे खदान लॉबी को सौंप कर बाघ संरक्षण कर रही है?

अरावली पहले ही जगह-जगह से ज़ख्मों से पीड़ित है और खान माफियाओं ने उसकी पूरी पारस्थितिकी को ही बदल दिया. यही वजह रही की इस बार की बारिश में पूर्वी राजस्थान में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए. बफर जोन को कम करके वहां खनन करने से बाघ आसपास के गांवों में आ रहे हैं. बाघ लोगों का शिकार का रहे हैं, और लोग भी उन पर हमले कर रहे हैं. ऐसा रणथम्भौर में आये दिन होता है. बाघ आबादी क्षेत्र का रुख कर रहे हैं, वो या तो लोगों को मार रहे हैं या लोग उन्हें मार रहे हैं. सिर्फ मानव परिवार ही नहीं, बाघों के परिवार भी इस कथित विकास की मार झेल रहे हैं.

ऐसे तो सरिस्का के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाएगा! जरूरी सवाल- सरिस्का में बाघों की दहाड़ और खनन के धमाकों की आवाज़ों में से कौन बचेगा?  

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राजस्थान के अलवर ज़िले में अरावली की गोद में बसा सरिस्का टाइगर रिज़र्व सिर्फ़ एक जंगल नहीं है, बल्कि भारत के बाघ संरक्षण आंदोलन की सबसे अहम कड़ियों में से एक है. लेकिन आज सरिस्का एक ऐसे विवाद के केंद्र में खड़ा है, जिसने सरकार, अदालत, खनन कंपनियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को आमने-सामने खड़ा कर दिया है. सवाल सीधा है- क्या बाघों की ज़मीन को बचाया जाएगा, या खदान माफियाओं की ताक़त इस दहाड़ को दबा देगी?

10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा कि Sariska Tiger Reserve’s Critical Tiger Habitat (CTH) की सीमा का निर्धारण आसपास के गांव वालों और ग्राम सभाओं से पूछकर किया जाएगा. उनकी सहमति और आपत्तियों के बाद ही सीमा का निर्धारण किया जा सकता है. दरअसल, सरिस्का को 1978 में टाइगर रिज़र्व का दर्जा मिला. लेकिन रिज़र्व के चारों ओर खनन का दबाव हमेशा बना रहा. अरावली की पहाड़ियों में मार्बल, डोलोमाइट और चूना पत्थर जैसी खदानें बड़े पैमाने पर फैली हैं. लंबे समय से ये खदानें बाघों के इलाके के इतने करीब चल रही थीं कि उनका असर सीधे जंगल और वन्यजीवों पर पड़ रहा था.

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में इस पर सख़्ती दिखाई और आदेश दिया कि जंगल के इतने नज़दीक 57 सक्रिय खदानें तुरंत बंद हों, क्योंकि वे सरिस्का की क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (CTH) सीमा से महज़ 1 किलोमीटर के भीतर हैं. यह फैसला खनन लॉबी के लिए यह बड़ा झटका साबित हुआ.

लेकिन खनन रुकते ही नया खेल शुरू हुआ, सरकार एक योजना लाई, जिसे कहा गया कि Boundary Rationalisation Plan. इसके तहत सरिस्का का पूरा नक़्शा ही बदलने की कवायद शुरू हो गई. इस योजना का मक़सद रिज़र्व की सीमा को “पुनर्गठित” करना था यानी यह कि सीमा को थोड़ा पीछे खिसकाकर कई खदानों को रिज़र्व के दायरे से बाहर कर दिया जाए. ताकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बंद हुई खदानें फिर से चालू हो सकें.

इस पूरे मामले में चौंकाने वाली बात ये रही कि यह पूरी प्रक्रिया बिजली की रफ़्तार से पूरी कर दी गई, 23 जून को राजस्थान राज्य वन्यजीव बोर्ड ने मंजूरी दी, 48 घंटे के भीतर ही NTCA ने भी हरी झंडी दिखा दी और 26 जुलाई को NBWL की स्थायी समिति ने भी इस योजना पर मुहर लगा दी. महज चार दिन में ही देश के सबसे संवेदनशील टाइगर रिज़र्व का नक्शा बदलने का फ़ैसला ले लिया गया.

NBWL की स्थायी समिति की 84वीं बैठक में राजस्थान सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी, जिसमें सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट को 881 वर्ग किमी से 924 वर्ग किमी तक बढ़ाया गया और बफर क्षेत्र को 245 से घटाकर 203 वर्ग किमी कर दिया गया. बफर जोन भी वन्यजीवों के लिए बेहद अहम हैं, क्योंकि वे बाघ जैसे जानवरों को घूमने और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ाव का रास्ता मुहैया करते हैं.

याद कीजिए, जब सरिस्का में नहीं बचा था एक भी बाघ

सरिस्का का इतिहास बताता है कि कभी यहां से बाघ पूरी तरह लुप्त हो गए थे और 2004 तक एक भी बाघ नहीं बचा था. मई- 2005 में दुनिया तब हैरान रह गई, जब तत्कालीन केंद्रीय मंत्री नमो नारायण मीना ने भारतीय संसद को बताया था कि अरावली के मुकुट सरिस्का में अब कोई बाघ नहीं बचा है. 2003 और 2004 टाइगर की हत्याओं के लिए बदनाम रहा और हमने सरिस्का में इस प्रजाति को खो दिया. इसके बाद शुरू हुआ रणथंभौर से लाए गए बाघों का पुनर्वास. सरिस्का अभयारण्य के वन क्षेत्र की सीमा तथा सुरक्षा को बढ़ाया गया, जिसके कारण वर्तमान में यहां लगभग 50 बाघ आबाद हो चुके हैं.

अब जब सरकार बफर जोन की सीमा निर्धारण का प्रस्ताव लाई तो पर्यावरण कार्यकर्ताओं और संगठनों ने इस प्रस्तावित बदलाव का कड़ा विरोध जताया. टाइगर ट्रेल्स ट्रस्ट की स्नेहा सोलंकी और ‘पीपल फॉर अरावलीज़’ की नीलम अहलुवालिया नाकरा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते हुए कहा कि यह फैसला बाघ संरक्षण के खिलाफ है और इससे केवल खनन कंपनियों को फायदा होगा. उनका आरोप था कि न तो स्थानीय ग्राम सभाओं से राय ली गई और न ही जनता से आपत्तियां मांगी गईं. कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप था कि यह जंगल बेचने की साज़िश है और असल विवाद यहीं से गहराया.

सरकार की आँखें मूँद, बाघ निगल रहे इंसान

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पिछले पाँच साल में रणथम्भौर और आसपास बाघों के हमलों में कई मौतें, लेकिन संसद में आंकड़ा ‘शून्य’। जमीनी हकीकत और सरकारी जवाब में चौंकाने वाला फ़ासला।

नवंबर 2024 में सवाई माधोपुर के उलियाना गांव के भरतलाल मीणा, जनवरी 2021 में रणथम्बोर के पास कानेटी गांव के पप्पू गुर्जर, जनवरी 2025 में 7 साल के कार्तिक सुमन, मई 2025 वन रेंजर देवेंद्र चौधरी, जून 2025 में त्रिनेत्र गणेश मंदिर की देखभाल करने वाले राधेश्याम सैनी और अक्टूबर 2023 में कोटा के अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के केयरटेकर रामदयाल की टाइगर हमलों में मौत हो गई. यह वो मौतें हैं जो पिछले पांच साल में हुईं हैं, लेकिन क्या हो जब सरकार इन सब की मौतों को ही झुठला दे? और वो भी संसद में !

लेकिन, ऐसा हुआ है. केंद्र सरकार का कहना है कि पिछले पांच साल में राजस्थान में वन्यजीवों के हमलों में किसी इंसान की मौत नहीं हुई है. मंत्री जी ने यह बात राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कही है. 8 अगस्त को राज्यसभा में सांसद संधोश कुमार यह सवाल किया था, इसके जवाब में वन पर्यावरण और जलवायु राज्यमंत्री कीरतवर्धन सिंह ने जो सूची सदन में प्रस्तुत की उसमें राजस्थान के सामने शून्य दर्ज था. और विडंबना यह कि केंद्र सरकार के इस जवाब से राजस्थान सरकार बिल्कुल ही अनजान है.राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा का कहना है कि उन्हें नहीं पता यह आंकड़ा केंद्र सरकार को किसने दिया। उनसे तो न ऐसी सूचना मांगी गई थी और न ही उन्होंने ऐसी कोई जानकारी साझा की है.

अगर पिछले पांच साल में टाइगर के हमलों में हुईं मौतों की बात की जाए तो अकेले रणथम्भौर नेशनल अभ्यारण के आसपास यह आंकड़ा 8 है. 3 मौतें तो साल 2025 में ही हुई हैं. वहीं कोटा में 1 टाइगर ने एक व्यक्ति को मौत के घाट उतारा था.

यह लोग आंकड़ों से तो ग़ायब हो गए, लेकिन इंसान और बाघों के संघर्ष में दोनों जान से हाथ धो रहे हैं. सवाई माधोपुर के उलियाना गांव में जब टाइगर टी-86 ने 50 साल के भरत लाल मीणा को अपना शिकार बनाया तो गुस्साए गांव वालों ने बाघ की ही हत्या कर दी और यह संघर्ष पिछले कुछ महीनों से लगातार बढ़ता ही जा रहा है. पर सवाल है कि इस सबका ज़िम्मेदार कौन है?

और सवाल यह भी है कि टूरिज्म को कितना बढ़ाना चाहिए, कि वो इस संघर्ष को बढ़ाने में मदद न करे. अगर सिर्फ रणथम्भौर की बात करें तो यहां बाघों की संख्या बेलगाम बढ़ रही है. इस समय रिज़र्व में 80 से ज़्यादा टाइगर हैं. टूरिज्म इंडस्ट्री का तो हिसाब है, जितनी अधिक बाघों की संख्या होगी, उतनी अधिक साइटिंग होगी और जितनी अधिक साइटिंग होगी उतने ही पर्यटक आएंगे। होटलों का कारोबार बढ़ेगा। इकॉनमी बढ़ेगी।

लेकिन इस ‘विकास’ की क़ीमत चुकाएंगे यहां के स्थानीय रहवासी। सरिस्का में कोर एरिया को कम करने की बात हो या फिर रणथंभोर में बाघों की संख्या को बढ़ाना, दोनों कहीं न कहीं स्थानीय पारस्थितिकी और प्रकृति के साथ खिलवाड़ है.

रणथंभौर टाइगर रिज़र्व का कुल क्षेत्रफल लगभग 1,334 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 392–394 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र (कोर ज़ोन) है, जबकि शेष लगभग 942 वर्ग किलोमीटर बफ़र या परिधि क्षेत्र में आता है। समय-समय पर कोर और बफ़र ज़ोन की सीमाएँ बदली जाती रही हैं, इसलिए विभिन्न स्रोतों में इसमें थोड़ी भिन्नता मिलती है। वन्यजीव प्राधिकरणों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में रणथंभौर में बाघों की संख्या उसकी वास्तविक क्षमता से अधिक हो चुकी है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस रिज़र्व में वयस्क बाघों की उपयुक्त संख्या लगभग 40-45 मानी जाती है, क्योंकि प्रत्येक बाघ को अपने अलग क्षेत्र की आवश्यकता होती है और क्षेत्र जितना सीमित होगा, बाघों के बीच टकराव की संभावना उतनी ही अधिक होगी। इस स्थिति से निपटने के लिए बाघों का स्थलांतरण (translocation), नए रिज़र्वों का विकास और जंगलों के बीच पारिस्थितिक गलियारों (ecological corridors) का निर्माण जैसे उपाय किए जा सकते हैं, ताकि बाघ और उनका आवास दोनों सुरक्षित रह सकें।

भाटी आपकी पॉलिटिक्स क्या है? ये सवाल शायद रविन्द्र भाटी से पूछा जाना चाहिए.

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क्या भाटी, पश्चिम राजस्थान में एक नई पार्टी का झंडा बुलंद करेंगे या बीजेपी के दरवाजे पर खड़े होकर ही दस्तक देते रहेंगे? कभी रेगिस्तान में सुनहरी रेत सी उम्मीद चमकी थी, लेकिन वो रेत धीरे- धीरे फीकी होने की आशंका से गुजर रही है. इसके लिए वो लगातार आंदोलन का झंडा भी बुलंद करता है, लेकिन रह- रहकर सत्ता के करीब जाने की भी कोशिश करता है. रविन्द्र भाटी, जिस युवा की राजनीतिक तकदीर में ‘निर्दलीय’ शब्द भी जुड़ सा गया. भाटी ने पश्चिम राजस्थान में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (जेएनवीयू) में छात्र राजनीति से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, एबीवीपी के टिकट से इनकार के बाद, उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और जीत भी. जेएनवीयू के 57 साल के इतिहास में पहली बार कोई छात्रनेता स्वतंत्र चुनाव जीता. लेकिन बीजेपी या संघ परिवार से भाटी की निष्ठा खत्म नहीं हुई. इसी निष्ठा के चलते वो राजनीतिक के भंवर जाल में फंसे हुए नजर आते हैं. जब यूनिवर्सिटी से बाहर निकले और चुनावी मैदान में हाथ आजमाने की सोची तो भी उन्हें पहली सीढ़ी बीजेपी ही नजर आई. ये और बात है कि बीजेपी ज्वॉइन करने के बाद जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो बागी होकर चुनाव लड़ गए, लेकिन शिव विधानसभा से टिकट घोषणा होने तक वो कर्तव्यनिष्ठ भाजपाई के तौर पर ही साल 2023 के चुनाव के लिए मेहनत कर रहे थे. बरहाल, जब टिकट का ऐलान हुआ तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों में बगावत के बाद मुकाबला पंचकोणीय हुआ और जीत रविन्द्र भाटी की हुई, वो भी महज 3950 वोट के अंतर से. हालांकि मैदान में दोनों पार्टी के कई दिग्गजों को उन्होंने शिकस्त दी. पार्टी भले ही उन्होंने ज्वॉइन नहीं की, लेकिन बतौर निर्दलीय वो विधानसभा में सत्ता पक्ष से यह कहते नज़र आए कि मैं तो आपका ही हूं. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के साथ बैठकों की उनकी तस्वीर की भी खूब चर्चा होती है. डिप्टी सीएम दिया कुमारी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी सार्वजनिक मंचों से उनकी तारीफ करते नहीं चूकते. वो खुद को युवा राजनीति की ‘Fantasy Politics’ में तो खुद को ढाल लेते हैं, लेकिन बतौर विचार वो खुद को पेश नहीं कर पाए. तीसरे (निर्दलीय) विकल्प के तौर पर सदन में तो पहुंचे, लेकिन बीजेपी से वो कहीं ना कहीं करीब ही दिखे. दो हैंडपंप वाला पत्र वायरल और लोकसभा चुनाव की पटकथा शुरू.. भाटी ने जल्द ही नज़रें शिव विधानसभा क्षेत्र पर टिकाईं और टीम तैयार करते हुए सामाजिक कार्यक्रम किए और जनता के बीच पैठ बनाई. 2023 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कुछ ही महीनों में उनके लोकसभा चुनाव लड़ने की महत्वाकांक्षा को पंख मिल गया. उनकी विधानसभा को जब दो हैंडपंप नहीं मिले तो उनका सरकार को लिखा “दो हैंडपंप वाला पत्र” भी खूब वायरल हुआ और उन्होंने खुद को उपेक्षित जनप्रतिनिधि के तौर पर पेश किया. लेकिन इन सबके बीच लोकसभा चुनाव 2024 की पटकथा लिखी जा रही थी. लोकप्रियता और भारी जनसमर्थन के साथ लोकसभा चुनाव में 5.86 लाख वोट मिले और पूर्व केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी की बुरी हार हुई, हालांकि इस दौरान फायदा उम्मेदाराम बेनीवाल को हुआ और उनकी जीत हुई. उनका ठेठ राजनीति स्टाइल लोगो में खूब पसंद किया गया. लेकिन उन दो हैंडपंप समेत विधानसभा क्षेत्रों के काम की बात नहीं हुई, जिसके रुकने के लिए वो सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए लोकसभा चुनाव में छाती ठोंक रहे थे.  आंदोलन के पीछे पर्दे की कहानी राजनीति में कोई अचानक नहीं चमकता, हर चमक के पीछे संघर्ष, साहस और जोखिम की लंबी दास्तान होती है. इस कहानी में कई किरदार और भारी धनबल भी दिखा. जब चुनाव लड़ने उतरे तो प्रचार के दौरान ‘मास्टरजी का लड़का हूं’ कहते भी नजर आए उनके साथ लग्जरी गाड़ियों का लंबा काफिला भी रहा. अब वो लगातार आंदोलन भी कर रहे हैं. सोलर प्लांट के विरोध में आंदोलन कर रहे भाटी ने खूब सुर्खियां बटोरी. हालांकि आलोचक इसमें उनके हित जुड़े होने की बात कहते हैं. क्योंकि सोलर प्लांट लगने के साथ ही कई स्थानीय फर्म या छोटी कंपनियों का हित भी इससे जुड़ता है. आरोप तो ऐसे भी हैं कि इन कामों में भाटी के परिवार के किसी सदस्य की कंपनी का भी नाम होने की संभावना जताई जाती है, ताकि कंपनी के जरिए हित पूरे हो सके. लेकिन जो भी हो, थार के रेतीली धोरों में हाथ से सरकते रेत जैसे समय को भाटी ने हर बार बखूबी भांपा है और छात्र राजनीति से अब तक कामयाबी के कई किस्से लिखे. ये भी हकीकत है कि राजस्थान में अक्सर निर्दलीय या तीसरे मोर्चे की कोशिश हुई, लेकिन वो सत्ता के दरवाजे पर जाकर ही ठहर जाती है. ऐसे में भाटी नई पार्टी बनाते हैं या नहीं, ये भी देखने वाली बात होगी.

जिस नदी के तट पर 4 हजार साल पुरानी सभ्यता विकसित हुई, उसका हमारी व्यवस्था ने क्या हश्र किया वो देखिए!!!!

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उदयपुर की आयड़ नदी के प्राकृतिक बहाव को रोककर निर्माण कार्य करना कितना सही? अजमेर की तरह इस मामले में भी संज्ञान लिया जाना चाहिए. आज से करीब 4 हजार साल पुरानी आहाड़ सभ्यता के निशान आज भी उदयपुर में मिलते हैं. आयड़ नदी के तट पर विकसित हुई सभ्यता का अपना इतिहास है. इस नदी को गंगाजी पांचवां पाया (बुनियाद) माना जाता रहा है. लेकिन दुर्भाग्य है कि स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने पुनर्वास की आड़ में नदी तंत्र का विनाश किया और सांस्कृति विरासत को मिटाने की कोशिश की. आयड़ नदी आज प्रशासनिक दूरदर्शिता के अभाव और दृष्टिकोण की कमी का शिकार हो गई. स्मार्ट सिटी के नाम पर आयड़ नदी के किनारे बाढ़ संभावित क्षेत्र जहां नदी में लाखों टन मलबा, पत्थर, सीमेंट, रेत, कंक्रीट से सौंदर्यीकरण किया गया. मकसद था- वेनिस नदी की तरह पर सौंदर्यीकरण. लेकिन मानसून की बारिश में सब कुछ बहा दिया. नगर निगम के माध्यम से 75 करोड़ों रुपए के बजट में से कई काम कराए जाने का दावा किया गया. नदी में निर्माण कार्य कर उसकी चौड़ाई ही कम करवा दी, जिससे इस नदी ने नाले जैसा आकार धारण कर लिया हैं. जोरदार बारिश के चलते सबकुछ बह गया और दुनिया के इस खूबसूरत शहर ने प्रकृति का रौद्र रूप देखा.  3 साल पहले दी थी चेतावनी, अब शहर ने देखी बाढ़  करीब 3 साल पहले छपी एक खबर के मुताबिक, उदयपुर शहर के पंचरत्न, नवरत्न,फतेहपुरा, रेलवे ट्रेनिंग स्कूल, न्यू फतेहपुरा, पंचवटी, सरदारपुरा, भूपालपुरा, अलीपुरा, न्यू भूपालपूरा, अशोक नगर, पुराना रेलवे स्टेशन (रेलवे कॉलोनी) को जल संसाधन विभाग द्वारा बाढ़ संभावित क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया था और इस बार उदयपुर ने बाढ़ का खतरा महसूस भी किया. 75 करोड़ रुपए का क्या हुआ? आयड़ नदी 30 किलोमीटर लंबी है, जो उदयपुर शहर में 5 किलोमीटर एरिया में बहती हुई निकलती है. यह नदी पिछले कुछ दशक से राजनीति का बड़ा केंद्र रही. नगर निगम से लेकर विधानसभा चुनावों में आयड़ नदी को सुधारने की बातें होती रही. उदयपुर में निगम का छठा बोर्ड है और अब इस बोर्ड में इस नदी की सूरत बदल रही है. स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत इसमें सौंदर्यीकरण का काम चल रहा है.  हालात यह है कि नदी के पेटे में सीवर लाइन डाल कर इसे प्रदूषित किया जा रहा है. जगह-जगह से मल-मूत्र का रिसाव हो रहा है और नदी को खूबसूरती से विकसित करने के नाम पर नगर निगम बोर्ड और अधिकारियों ने इसका स्वरूप ही बिगाड़ कर रखा दिया. सवाल तो यह भी है कि आखिर 75 करोड़ रुपए का हुआ क्या, जिसे नदी के सौंदर्यीकरण के लिए आवंटित किया गया था. नदी के बहाव के बीच निर्माण कार्य कितना सही? दरअसल, नदी के प्राकृतिक बहाव और पेटे को अव्यवस्थित करवाकर उसमें बीचोबीच पक्के नाले का निर्माण करवाया गया. नदी में फुटपाथ सहित कई सारे जमीनी निर्माण कार्य करवाया गया हैं, जिस पर कई बार सवाल भी खड़े हुए. हाल ही में अजमेर के 7 वंडर पार्क के ध्वस्त करने के कोर्ट के आदेश को देखे तो इस लिहाज से आयड़ नदी के तो पेटे में हुआ निर्माण कार्य ही सवालों के घेरे में है. विशेषज्ञों का कहना है कि नदी में हुए निर्माण नदी की मूल प्रकृति व मूल बहाव के प्रति अत्याचार है. नदी तल पर पक्की फर्श ने प्रवाह को तीव्र किया है, जिससे भी समस्याएं पैदा हो रही है. पेटे में भराव से नदी तल ऊपर हो गया, जिससे शहर के शमशान स्थलों सहित कई कॉलोनियों में दूर दूर तक पानी फैल गया.

जनता की भागीदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी, राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र में जो भी हुआ वो इन शब्दों के विपरीत ही था.

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राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र भी खत्म हो गया. लेकिन, आप किसी थोड़े से भी जागरूक नागरिक से यह पूछें कि इस सत्र में क्या प्रोडक्टिव हुआ? तो शायद आपको हंगामे और हो हल्ला की अख़बारी खबरों की कतरनों से पढ़ी लाइनों के अलावा कोई जवाब मिल सके. विधानसभा सत्र कानून बनाने के लिए बुलाये जाते हैं. जनता के मुद्दों, उनकी समस्याओं, प्रदेश के भविष्य की रचना करने के लिए सर जोड़ कर बैठने के लिए कॉल किये जाते हैं, लेकिन क्या इन सबका वही हासिल है, जिसकी उम्मीद और जिस वजह से प्रदेश के सारे जनप्रतिनिधि इकट्ठा होते हैं? 1 से 10 सितम्बर 2025 तक चले इस सत्र में 10 बिल पास हुए, लेकिन कौन जानता है कि उन कानूनों में क्या है? क्योंकि इन बिलों पर सदन में कोई चर्चा ही नहीं हुई. देश के सबसे बड़े प्रदेश में सत्ता और विपक्ष ने मिल कर जवाबदेही, ज़िम्मेदारी और लोकतंत्र का ऐसा मज़ाक बनाया कि महज़ 33 मिनट में 9 करोड़ लोगों के लिए 3 क़ानून पास कर डाले। राजस्थान विनियोग विधेयक-2025, राजस्थान वस्तु एवं सेवा कर विधेयक-2025 और महिलाओं को कारखानों में नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति देने वाला फैक्ट्रीज़ विधेयक-2025 पर सिरे से कोई डिस्कशन ही नहीं हुआ. शायद लॉ-मेकर्स ने यह समझ लिया है कि ब्यूरोक्रेट्स से क़ानून का ड्राफ्ट बनवा कर पास करवा दो, लेकिन वह क़ानून जनता के लिए कितना उपयोगी है, इस बात पर सिरे से पूरा विमर्श ही ग़ायब है. हद तो यह है कि विधानसभा में नए कैमरा लगने की बात पर विपक्ष ने वॉक आउट कर दिया। और सत्ता? उसने भी माहौल का फायदा उठा कर धड़ाधड़ कचौरी की तरह क़ानून छान दिए. पूरा असेंबली हॉल गली नुक्कड़ की तू तू-मैं-मैं बन गया. जब भी कोई नया क़ानून बनाया जाता है या पुराने में संशोधन किया जाता है, तो उसकी ज़रूरतें ध्यान में रखीं जाती हैं। या फिर किसी समस्या के समाधान या लगाम लगाने के लिए क़ानूनों का निर्माण होता है. लेकिन इस सत्र में ऐसे बिल भी लाये गए जिनको लाने के पीछे जनता का हित ग़ायब दिखा। सरकार ने Anti-Conversion बिल को ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ रोकने के मक़सद से पेश किया, पर सरकार के अपने दावे बताते हैं कि राज्य में लव जेहाद या जबरन धर्मांतरण जैसे मामले दर्ज ही नहीं हैं। फिर भी बिल में भारी सज़ाएँ, DM-inquiry जैसे प्रशासनिक अधिकार और अनिवार्य प्री-नोटिफिकेशन जैसी व्यवस्थाओं को शामिल किया गया. कोचिंग सेंटर रेगुलेशन बिल इसका अगला उदाहरण है। सरकार का दावा है कि यह छात्रों के हित में है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि यह बिल संस्थानों को ज्यादा सुरक्षा देता है, जबकि छात्रों की फीस, मानसिक दबाव और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं पर ठोस समाधान नहीं लाता। सवाल यह है कि क्या इस कानून का असली मक़सद छात्रों की सुरक्षा है या संस्थानों पर महज़ दिखावटी लगाम लगाना? असल समस्या यही है कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों ने विधानसभा को गंभीर विमर्श का मंच नहीं बनाने की पूरी कोशिश की और इसका नतीजा यह हुआ कि छात्रों, आम नागरिकों, महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों को सीधे प्रभावित करने वाले कानून ऐसे पास हो गए जैसे किसी बोर्डरूम की मीटिंग हो। इसके अलावा, जवाबदेही और अपनी ज़िम्मेदारी से ग़फ़लत का आलम यह कि पिछले 3 सत्रों में विधानसभा में सरकार से पूछने के लिए 11000 सवाल लगाए गए, उनमें से केवल 1300 सूचीबद्ध हुए और सदन के भीतर उनमें से महज़ 6 फीसदी जवाब ही दिए गए. बाक़ी के सवालों को या तो गोलमोल कर दिया गया या फिर वो डाक से विधायक आवास भेज दिए गए. सवाल यह कि क्या विधानसभा में पूछे गए सवाल और उनके जवाब जनता के सामने नहीं आने चाहिए? विधानसभा तो जनता की ही पंचायत है, लेकिन ऐसा नहीं होता। हालत यह कि इस मानसून सत्र के सवाल जवाब अभी तक विधानसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं. अगर विधायकों द्वारा पूछे गए सवालों का नेचर और संबंधित क्षेत्र देखा जाए तो लगेगा ‘पढ़ते जा शर्माते जा’. ऐसे सवालों की एक लंबी फहरिस्त है, जिनका सीधा जनता से कोई लेना देना तक नहीं होता। उनमें जनहित की जगह नेताहित समाहित रहता है. लोकतंत्र के मज़बूत बने रहने के लिए सर्वाधिक ज़रूरी होता है, जनता का पार्टिसिपेशन। लेकिन सवाल यह कि क्या क़ानून बनाने ने पहले क्या पब्लिक ओपिनियन की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं? क्या हंगामों, धरनों और सदन न चलने देने की यह ‘परम्परा’ रुक पाएगी? कहीं यह लोकतांत्रिक संस्था एक रबर स्टाम्प और ड्रामों की जगह तो नहीं बन जायेगी?

CBSE दो दशक में कई बार बोर्ड परीक्षाओं में बदलाव कर चुका है, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड किस तलाश में है?

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CBSE ने एक बार फिर बोर्ड परीक्षाओं में बदलाव किया गया है. जिनमें 2026 से लागू हो रही दो बार बोर्ड परीक्षा सबसे नई पहल है. 2026 में, CBSE दोनों कक्षाओं की परीक्षाएं 17 फरवरी से शुरू करेगा, और दसवीं के विद्यार्थियों को साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने का विकल्प मिलेगा. ऐसा जैसा कि NEP-2020 की अनुशंसा के चलते किया जा रहा है. CBSE ने पिछले दो दशकों में शिक्षा प्रणाली में बोर्ड परीक्षाओं के स्वरूप में कई बड़े प्रयोग किए हैं. 2026 में कक्षा 10 और 12 के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षा कराने का ऐलान NEP-2020 की सिफारिशों के बाद सबसे नया और बड़ा कदम है. पर क्या इतने बार और इतने बड़े पैमाने पर बदलाव सही हैं? यह समीक्षा इसी सवाल पर केंद्रित है

बोर्ड परीक्षाओं के प्रमुख प्रयोग और सुधार पर नजर डालिए

  • 2009 में CCE (Continuous and Comprehensive Evaluation) लागू हुआ, जहां साल में कई मूल्यांकन होते थे और बोर्ड परीक्षा कक्षा 10 के लिए वैकल्पिक बना दी गई थी.
  • 2017 से कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा फिर से अनिवार्य की गई, CCE हटा दिया गया.
  • 2020 में NEP-2020 के अनुसार परीक्षा पैटर्न में बड़े बदलावों की प्रक्रिया शुरू हुई. इसमें मूल दक्षताओं पर आधारित पेपर, कोर-सब्जेक्ट्स का फोकस के अलावा इस बात पर जोर दिया गया कि कोचिंग केंद्रित रटन विद्या वाला कल्चर खत्म हो.
  • अब अगले साल से कक्षा 10 के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने की योजना. पहली मुख्य परीक्षा और दूसरी ‘इंप्रूवमेंट’ परीक्षा होगी. दोनों का स्कोर ‘best of two’ के सिद्धांत पर मान्य रहेगा और छात्रों को एक ही अकादमिक सत्र में दो अवसर मिलेंगे.

CCE एक क्रांतिकारी कदम बताया गया था, लेकिन 10 साल भी नहीं चला सिस्टम

अगर बात करें 2009 की तो CCE (Continuous and Comprehensive Evaluation) की शुरुआत में बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक कर दी गई और छात्रों का मूल्यांकन पूरे साल किया जाने लगा. इसके ज़रिए पढ़ाई का दबाव कम करने, समग्र कौशल पर ध्यान देने और आउटकम-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने का लक्ष्य था. परन्तु, इसकी कार्यवाही अधूरी और शिक्षकों की कमी के कारण कमजोर साबित हुई.

तकनीकी रूप से इसे सफलतापूर्वक लागू नहीं किया जा सका और फिर साल 2017 में इसे खत्म कर दिया गया. इसके बाद 2017 से पारंपरिक बोर्ड परीक्षा पुनः अनिवार्य हुई, जिससे विद्यार्थियों और अभिभावकों में स्थिरता आई. लेकिन NEP-2020 ने फिर से लचीलापन और व्यावहारिकता की मांग की और अब 2026 में CBSE ने साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने की योजना घोषित की.

लेकिन सवाल यह है कि क्या एजुकेशन सिस्टम में इस तरह बार-बार प्रयोग सही है? एक पक्ष यह है कि लंबे समय तक एक ही परीक्षा प्रणाली को बनाए रखना जरूरी होता है, ताकि सभी पक्ष उसके अनुसार खुद को ढाल सकें. साथ ही नए बदलाव के परिणामों का मूल्यांकन कर सुधार करने के लिए भी पर्याप्त समय चाहिए. बिना पर्याप्त परीक्षण के लगातार बड़े पैमाने पर बदलाव शिक्षा प्रणाली को अस्थिर बनाते हैं. इसलिए, बोर्ड परीक्षाओं के सुधार में जरूरी है कि एक संतुलित योजना बनाई जाए. एक ऐसा खाका तैयार हो, जहां बदलाव की गति तो कम से कम नियंत्रित हो और उनकी गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाए.

ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि छोटे-छोटे पायलट प्रोजेक्ट्स के माध्यम से नीतियों का परीक्षण होना और फिर सफलतापूर्वक सिद्ध होने पर ही व्यापक स्तर पर लागू करना चाहिए. बावजूद इसके शिक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इसके क्रियान्वयन में विद्यार्थियों का हित और शिक्षकों की दक्षता का भी ख्याल रखा जाना चाहिए.v