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पुलिस सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि इंसानों का समूह है जिनकी भावनाएं, परिवार और सीमाएं हैं.

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हर जिले में स्थापित हो- Police Wellness Cell

हरियाणा में कुछ ही दिनों के अंतराल में एक आईपीएस अधिकारी और एक एएसआई की आत्महत्या की घटनाएं सामने आईं. ये खबरें सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि देशभर के पुलिस तंत्र में गहराते तनाव और अवसाद की तस्वीर हैं. वर्दी के पीछे का चेहरा, जिसे हम मजबूत, सख़्त और आदेश देने वाला समझते हैं, अब भीतर से टूटता और अकेला रह जाता है. यह अकेलापन कई बार पुलिसकर्मी को ज़िंदगी से हार मानने के लिए मजबूर कर देता है.पुलिस को समाज का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है, लेकिन क्या हमने कभी उसकी दरारों को देखने की कोशिश की है? 14 से 16 घंटे की ड्यूटी, त्यौहारों और रविवार को भी अवकाश नहीं, लगातार ऊपर से दबाव, राजनीतिक आदेशों की मार, परिवार से दूरी ये सब धीरे-धीरे उस वर्दीधारी को अंदर से तोड़ते हैं. मानसिक स्वास्थ्य की समस्या हमारे देश में आज भी टैबू है, लेकिन “वर्दी वाले” के लिए तो यह सोच और भी कठोर हो जाती है.

राजस्थान में भी पुलिसकर्मी मांग करते हैं कि उन्हें ड्यूटी के दबाव के बीच कुछ सहूलियत भी दी जाए, जो असल में उनका अधिकार भी है. प्रदेशभर के थानों में खाली पड़े पदों के चलते काम का अतिरिक्त बोझ भी है. इन्हें भरने के साथ ही सभी पुलिसकर्मियों को वीकली ऑफ दिया जाए और उनकी ड्यूटी आठ घंटे की जाए. साथ ही उन्हें ग्रेड पे का लाभ मिले. पुलिसकर्मियों को टाइम स्केल प्रमोशन और 3600 ग्रेड पे का लाभ मिले. प्रत्येक पुलिसकर्मी को वीकली ऑफ मिले.

यह आंकड़े डराने वाले…!

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक देश में हर साल औसतन 150 से ज्यादा पुलिसकर्मी आत्महत्या करते हैं. अधिकांश मामलों में कारण “तनाव” या “व्यक्तिगत वजह” बताया जाता है, लेकिन इन व्यक्तिगत दुखों के पीछे सिस्टम का दबाव, लंबी ड्यूटी, पदोन्नति में भेदभाव, अफसरों की गैर-वाजिब अपेक्षाएं, वरिष्ठों का व्यवहार छुपा रहता है. हरियाणा के आईपीएस की आत्महत्या यह मिथक तोड़ देती है कि वरिष्ठ अधिकारी सुरक्षित हैं. सच यह है कि हर रैंक पर दबाव बराबर बेकाबू है. प्रशासनिक उलझनों, राजनीतिक दखल और आंकड़ा-उन्मुख शासन ने पुलिस में सेवा की भावना को “संख्याओं की मशीन” बना दिया है.

दशकों से हो रही पुलिस सुधार पर बात, आयोग की सिफारिशें आज भी लंबित

पुलिस सुधारों पर बात दशकों से हो रही है. आयोग की सिफारिशें आज भी फाइलों में धूल फांक रही हैं. 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने सात सुधार निर्देश दिए थे, उनमें से अधिकांश लागू नहीं हुए. मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रकोष्ठ की बात कभी-कभी केवल कागज़ों में नज़र आती है, हकीकत में कभी नहीं.अब वक्त आ गया है कि वर्दी के भीतर के इंसान को भी समझा जाए. जिले में स्वतंत्र ‘Police Wellness Cell’ बने, जहां गोपनीय काउंसलिंग और प्रॉपर मनोवैज्ञानिक सहयोग मिले. 8 घंटे की ड्यूटी लागू हो, नेतृत्व प्रशिक्षण में मानवीय संवेदना को प्राथमिकता दी जाए, राजनीतिक दखल पर सख्त लगाम हो. समाज को भी पुलिस को सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि इंसानों का समूह समझना चाहिए जिनकी भावनाएं, परिवार और सीमाएं हैं.हर आत्महत्या सिस्टम का फेल्योर है. जब वर्दीधारी आत्महत्या करता है, तो पूरे शासनतंत्र को आत्ममंथन करना चाहिए. भारत की पुलिस अब अनुशासन और आदेशों की नहीं, बल्कि संवेदना और सुनने की ज़रूरत है. एक थका, टूटा पुलिसकर्मी जनता की सुरक्षा कैसे करेगा? वक्त है कि वर्दी के पीछे छुपे इंसान को भी इंसान की तरह देखा जाए.

झालावाड़ में सिर्फ एक स्कूल नहीं गिरा था, बल्कि खोखली हो चुकी व्यवस्था से पर्दा भी गिर गया.

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झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद शिक्षा व्यवस्था से लेकर राजनीतिक जवाबदेही सबकुछ सवालों के घेरे में हैं. अगर राजस्थान हाईकोर्ट की कार्यवाही की विवेचना करेंगे तो पाएंगे कि सरकारी स्कूलों के प्रति सरकारें कितनी असवंदेनशील रही हैं. अब तो खुद मंत्री हीरालाल नागर ने ही सरकारी स्कूलों के निर्माण-गुणवत्ता पर सार्वजनिक सवाल उठाए हैं और स्वतंत्र जांच की मांग की है. इसे शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने विभागीय कमियां स्वीकारते हुए यह भीक कहा कि संयुक्त जिम्मेदारी जरूरी है, जांचें शुरू हो गई हैं, दोषियों पर कार्रवाई का वादा है. लेकिन अभी भी कोई दीर्घकालिक नीति या सख्त तंत्र ज़मीन पर नहीं दिखता. मंत्रालय और अफसरशाही एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर आगे बढ़ रहे हैं.

पहले जमीनी सच्चाई के बारे में जानिए

झालावाड़ के सरकारी स्कूल की बिल्डिंग गिरने की घटना ने पूरे प्रदेश की शिक्षा की बुनियाद और सरकारी जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. हादसे के बाद सरकारी दावों, बजट और ‘कागजों पर विकास’ की असलियत उजागर हो गई. जमीनी हकीकत यह है कि थोक में बजट आवंटन की घोषणा, एप्रूवल, टेंडरिंग सब होते हैं. लेकिन कागजों पर लिखी विकास की इबारत को हकीकत में उतार पाना काफी मुश्किल होता है. इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट भी सख्त टिप्पणी कर चुका है कि काम कागज पर नहीं, जमीन पर होना चाहिए.

राजस्थान में फिलहाल 5,500 से ज्यादा सरकारी स्कूल ऐसे हैं जिन्हें गंभीर जर्जर घोषित किया जा चुका है. राज्यभर के 63 हजार स्कूल भवनों के सर्वे में 9% स्कूल खतरे की सूची में बताए गए. इनमें कई सौ स्कूल ऐसे हैं जिनकी छतें या दीवारें बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं.

एक बार फिर वादा, मार्च-2026 तक सुधरेगी तस्वीर?

सरकार ने 2,000 से अधिक स्कूल भवनों की ‘मेजर रिपेयरिंग’ के लिए 175 करोड़ रुपये का बजट दिया है. साथ ही अगले फेज के लिए 7,500 स्कूलों पर 150 करोड़ रुपये अलग से देने का एलान है. सवाल यही है कि – क्या 5 लाख या 8 लाख रुपये में किसी जर्जर स्कूल का रियल रिपेयर हो सकता है? हाईकोर्ट ने भी इस पर तीखी टिप्पणी की है कि सरकारी दस्तावेज़, धरातल और बच्चों की हकीकत से बिलकुल कटे हैं.

इंजीनियरिंग कैडर ही नहीं, निर्माण कार्य किसके भरोसे?

स्कूल भवन निर्माण व मरम्मत के लिए राजस्थान सरकार के पास खुद का इंजीनियरिंग कैडर नहीं है. विभाग को अक्सर PWD, डेपुटेशन या अस्थायी ठेकेदारों पर निर्भर रहना पड़ता है. अब हालात ऐसे हैं कि शिक्षक या प्रयोगशाला सहायक जिनके पास BE (इंजीनियरिंग डिग्री) है , उनसे सुपरविजन करवाने की बात हो रही है. नतीजा- क्वालिटी कंट्रोल और तकनीकी जवाबदेही लगभग शून्य.

अब जरूरत है इस और ध्यान देने की-

  • स्कूल भवनों की सुरक्षा और गुणवत्तापूर्ण निर्माण के लिए तत्काल स्वतंत्र व तकनीकी ऑडिट एजेंसी की जरूरत है.
  • जब तक शिक्षा विभाग में खुद का इंजीनियरिंग कैडर, क्वालिटी सुपरविजन और रीयल टाइम ऑडिट लागू नहीं होगा, तब तक बच्चों की जान खतरे में रहेगी.
  • राजस्थान के लाखों बच्चों की जिंदगी इस अदूरदर्शिता की भेंट नहीं चढ़नी चाहिए. जवाबदेही तय होनी चाहिए और धरातल पर ‘असली सुधार’ दिखना चाहिए.

बेरोजगार युवा को रातों- रात अमीर होने का सपना दिखाने वाली MLM कंपनियों के खिलाफ आखिर सख्त कानून क्यों नहीं?

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कोटा, जयपुर, दिल्ली जैसे शहरों में छात्रों की जिंदगी बर्बाद करने का खेल चल रहा है!

सोशल मीडिया पर इन दिनों रवि शर्मा का एक वीडियो वायरल है, जिसमें वह मंच पर अपने नेटवर्क मार्केटिंग बिजनेस का 100 करोड़ रुपये महीना टर्नओवर, 6 लाख रुपये GST और रॉल्स रॉयस, Mercedes, BMW, Audi जैसी लग्जरी गाड़ियों का मालिकाना गर्व से बताता है. वह भीड़ से कहता है लोग जुटाओ, Rolls Royce या हेलीकॉप्टर से अगले प्रोग्राम में आऊंगा. छात्र और युवा ऐसे वीडियो देखकर MLM (मल्टीलेवल मार्केटिंग) के सपनों के टूटते-बनते जाल में उलझ जाते हैं. नेटवर्क मार्केटिंग, पिरामिड स्कीम्स और MLM की चमक-दमक के पीछे एक बड़ा टॉप-डाउन फ्रॉड छिपा है. जहां युवाओं को टास्क दिया जाता है कि वो अगले 3 लोग जुड़े और उन 3 को अगले 3 जोड़ने के लिए मोटिवेट करें. यही ‘चेन सिस्टम’ उनकी ग्रोथ का रास्ता बताया जाता है, जिसमें चेन का अंतिम आदमी अगर किसी को जोड़ेगा तो चेन के पहले शख्स को भी मुनाफा होगा. लेकिन इसकी असलियत कुछ और है.

MLM का धोखा: सपनों के बाजार में फसा युवा

रवि शर्मा जैसे नेटवर्किंग स्टार्स अपने बिजनेस, लग्जरी कार, ब्रांडेड घड़ी, और “करोड़ों” के दावे के साथ युवाओं को महंगे होटल, सेमिनार और फटाफट फॉर्मूले की बाहरी चमक दिखाते हैं. इसका प्रमुख लक्ष्य कोचिंग-कॉलेज के बेरोजगार या पैसिव इनकम चाहते छात्रों को “आसान कमाई” के जाल में फंसाना होता है. स्टार्टअप जैसा पैकेज, दो नए लोगों को जोड़ो, कमिशन पाओयही पुराना ट्रिक है. Ebiz, Amway, Oriflame, RCM जैसी नेटवर्किंग कंपनियों के केस यही बताते हैं जहां लाखों युवाओं ने शुरुआती फीस, किट या “सब्सक्रिप्शन” देकर अपना पैसा डुबाया. और जब सिस्टम टूटता है, तो सिर्फ चेन के ऊपर के लोग बचते हैं, नीचे के लेवल वालों का पैसा, रिश्ते, समय और आत्म-विकास सब खत्म हो जाता है.

तकनीकी स्थिति: नेटवर्क मार्केटिंग की असलियत

MLM सिस्टम में इनकम का मूल स्रोत प्रोडक्ट या सर्विस की बिक्री नहीं, बल्कि नए लोगों को जोड़ने और उनसे फीस वसूलने में छिपा होता है. पिरामिड चेन में जैसे-जैसे नए सदस्य जुड़ते हैं, ऊपर के लोग लाभ में रहते हैं, नीचे वालों को रेफरल बोनस का झांसा मिलता है, लेकिन अंत में फंडिंग टूटते ही नीचे के लोग फंस जाते हैं.

भारत में MLM और कानून: क्या कहते हैं नियम?

भारत में Multi-Level Marketing, पिरामिड स्कीम्स और चेन मार्केटिंग किसी भी रूप में “Prize Chits and Money Circulation (Banning) Act, 1978” के तहत साफ तौर पर अवैध घोषित हैं. इस एक्ट के मुताबिक ऐसे बिजनेस मॉडल्स में सदस्यता शुल्क, इनकम या फ्रॉड पैसे स्वीकारना संज्ञेय अपराध है. पुलिस शिकायत या कानूनन कार्रवाई तय है.

RBI की जरूरी सलाह

“मल्टी-लेवल मार्केटिंग और पिरामिड चेन स्कीमें जल्दी/आसान पैसे कमाने का लालच देती हैं, असल में इनका सारा बिजनेस नए लोगों से भारी फीस लेने पर चलता है. नेटवर्क में ऊपर के सदस्य लाभकारी होते हैं, नीचे के लेवल के सदस्य ज्यादातर नुकसान उठाते हैं. चेन टूटने या रुकने पर पूरा पिरामिड ढह जाता है. ऐसे ऑफर्स से दूर रहे ऐसा लालच सीधा आर्थिक नुकसान है. किसी भी ऐसी स्कीम या शक की स्थिति में तुरंत राज्य पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं.”

क्यूं फंसता है युवा?

बेरोजगारी का फायदा उठाकर MLM कंपनियां बड़े-बड़े सपने दिखाती हैं. सेमिनार में महंगे कपड़े, कार और गाने बजते हैं युवाओं में “यूटोपिया” का माहौल बनता है. दोस्त या रिश्तेदार तक चैन में जुड़ते जाते हैं पैसा नहीं आता, तो सामाजिक नुकसान अलग होता है. असली नुकसान पैसे के साथ-साथ आत्मसम्मान, रिश्ते, और परिवार पर भी असर पड़ता है. शिकायत के बावजूद कई बार भटकाव, डर और शर्म के कारण पुलिस तक नहीं जाते. कंपनियों का “महंगा प्रोडक्ट”, संदिग्ध नेटवर्क और कमजोर सर्विस भी आम है.

Curriculum on AI to be introduced in all schools from Class 3 onwards.

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Artificial Intelligence and Computational Thinking (AI & CT) will reinforce the concept of learning, thinking, and teaching, and will gradually expand towards the idea of “AI for Public Good.” This initiative marks a nascent yet significant step towards the ethical use of AI to solve complex challenges, as the technology will be organically embedded from the foundational stage, beginning in Grade 3

इतिहास में सबसे कम पदों वाली शिक्षक भर्ती परीक्षा!

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तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2025: खाली पड़े पद, फिर भी REET में पद क्यों नहीं बढ़े? राजस्थान में तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती का इतिहास इस बार भी युवाओं के लिए उम्मीद तोड़ने वाला है. महज 7,500 पदों पर नई भर्ती हो रही है. जबकि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में हजारों पद पहले से ही रिक्त हैं. बीते एक दशक में कभी 50,000 से ज्यादा तो कभी 10,000 से नीचे भर्तियां हुईं. इस बार की लिमिटेड संख्या ने ना सिर्फ बेरोजगारों बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था दोनों को चिंता में डाल दिया है. वर्तमान में लेवल-2 (कक्षा 6-8) के करीब 5,000 पद इसलिए खाली हैं. क्योंकि सरकार ने समय पर पदोन्नति प्रक्रियाएं पूरी नहीं कीं. लंबे समय से प्रमोशन पेंडिंग रहने से बेसिक स्कूलों के सीनियर टीचर पद रिक्त हैं. जबकि नए उम्मीदवारों के चयन के लिए पद सीमित कर दिए गए हैं. यदि प्रमोशन समय पर होता, तो इन 5,000 पदों की सीधी भर्ती के द्वार भी खुल सकते थे. इससे बेरोजगार युवाओं और शिक्षा दोनों को राहत मिलती. सरकार ने दावा किया कि 2027 तक दोहराई जाने वाली प्रक्रिया और राज्य में 50% तक पदों के इजाफे की तैयारी की जा रही है. ताकि भविष्य में रिक्तियों की भरपाई हो सके. यह दीर्घकालिक प्लानिंग तो है. लेकिन फिलहाल जिन जिलों और स्कूलों में शिक्षकों की सख्त जरूरत है, वहां न तो भर्ती हो रही, न पदोन्नति. हालांकि इसमें एक मामला कोर्ट में लंबित प्रक्रिया का भी है. भर्ती प्रक्रिया का शॉर्ट नोटिफिकेशन जुलाई 2025 में जारी हुआ जिसमें केवल 7,759 पद हैं. REET मेन्स की परीक्षा जनवरी 2026 में, रिजल्ट जुलाई 2026 में और फाइनल नियुक्तियां 2027 तक पहुंच सकती हैं. तब तक सैकड़ों पद और खाली हो जाएंगे या फिर शिक्षा की क्वालिटी प्रभावित होगी. भर्तियों की संख्या में गिरावट और प्रमोशन की लेटलतीफी से सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण क्षेत्रों और सरकारी स्कूलों को हो रहा है. लाखों बीएड, BSTC पास युवा नौकरी के लिए भटक रहे हैं. वहीं बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर हो रहा है. पुरानी भर्ती प्रक्रिया में अगर सिस्टम सजग रहता, तो नए युवाओं को और मौका मिल सकता था. सरकार की 2027 तक की दीर्घकालिक नीति और 50% पद बढ़ाने का वादा सराहनीय तो है. मगर मौजूदा पूरी भर्ती की तस्वीर से साफ है कि अभी भी भर्ती और पदोन्नति, दोनों व्यवस्थाओं के परस्पर समन्वय की बेहद कमी है. नतीजा ये युवाओं में नाराजगी, स्कूलों में खाली पद और ग्रामीण शिक्षा पर गहरा असर. अगर समय रहते पदोन्नति प्रक्रिया पेंडिंग न रहती, तो इस साल के भर्ती ग्राफ में बड़ी राहत जरूर दिखती.

स्कूल एजुकेशन का Future अब AI! आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की एंट्री से स्कूल के सिलेबस में बड़ा बदलाव हो सकता है

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भारत का शिक्षा तंत्र इन दिनों एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. चर्चा का विषय है – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का स्कूली शिक्षा में आना. शिक्षा मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा NCF-SE 2023 के तहत 2026-27 से कक्षा 3 से ही AI और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग (CT) शुरू करने का फैसला लिया है. सवाल यह है कि इसकी जरूरत क्यों है, हमारे बच्चे इसके लिए कितने तैयार हैं और इसका भविष्य क्या आकार ले सकता है. भारत की नई शिक्षा नीति अब रटने की शिक्षा से हटकर समस्या-समाधान, रचनात्मकता और नैतिक तकनीक के उपयोग पर जोर देती है. दुनियाभर के देशों में AI पाठ्यक्रम आम बात होती जा रही है, खासकर चीन, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में. डिजिटल इंडिया के सपने के लिए हमारे बच्चों को केवल किताबें नहीं, बल्कि तकनीक-साक्षर बनाना जरूरी है. AI अब सिर्फ जॉब या रिसर्च का विषय नहीं रहा, बल्कि बच्चों की डिजिटल नागरिकता का बुनियादी हिस्सा बन रहा है.  करिकुलम किस तरह से डिजाइन हो रहा है, वो जानिए – कक्षा 3 से AI और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग का नया पाठ्यक्रम शुरू होगा.  – इसको CBSE, NCERT, KVS, NVS समेत राज्य शिक्षा बोर्ड्स के सहयोग से लागू किया जाएगा.  – शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण निष्ठा पोर्टल व वीडियो मॉड्यूल्स पर होगा.  – AI को पढ़ना, गणित की तरह सार्वभौमिक स्किल होगा: न सिर्फ रोबोटिक्स-कोडिंग, बल्कि समस्या-समाधान, तर्कशक्ति, डिजाइन थिंकिंग तक. – दिसम्बर 2025 तक सभी जरूरी डिजिटल हैंडबुक्स, पाठ्यक्रम और शिक्षण सामग्री तैयार की जा रही है. – पूरे रोलआउट का मकसद बच्चों को तकनीक-साक्षर, आलोचनात्मक, और नैतिक नागरिक बनाना है. – CBSE की विशेषज्ञ समिति (प्रो. कार्तिक रमन के नेतृत्व में) ‘हमारे आसपास की दुनिया’ थीम पर पाठ्यक्रम तैयार कर रही है, जिससे रोजमर्रा के अनुभव से AI जोड़ सकें. इसकी जरूरत क्यों है? – वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे रहना है तो AI स्किल्स होना ही पड़ेगा.  – AI-powered इकोनॉमी अगले दशक में करोड़ों नौकरियों का लैंडस्केप बदल देगी: नीति आयोग रिपोर्ट कहती है कि परंपरागत नौकरियां घटेंगी, लेकिन AI में लाखों नई नौकरियां आएंगी.  – बच्चे पहले ही ‘AI-संचालित’ प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उन्हें तकनीक का नैतिक और जागरूक उपयोग सिखाने की सिस्टमेटिक जरूरत है.  – बड़ी आबादी के लिए पर्सनलाइज्ड लर्निंग, हरेक बच्चे की जरूरत के हिसाब से कंटेंट: यही AI-अधारित शिक्षा की ताकत होगी. – आलोचनात्मक सोच, जिज्ञासा, जिम्मेदार तकनीकी उपयोग, डेटा प्राइवेसी — ये सब अब Core Skills का हिस्सा बनेंगे. हमारे बच्चे कितने तैयार? यह सवाल सबसे जरूरी है. भारत में 50% स्कूल अब भी बुनियादी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (इंटरनेट, बिजली, कम्प्यूटर) से जूझ रहे हैं. अधिकतर शिक्षक खुद AI या CT में प्रशिक्षित नहीं हैं, नया सिस्टम लागू करने के लिए बड़े स्तर पर शिक्षक ट्रेनिंग, सामग्री, हैंड्स-ऑन वर्कशॉप्स की जरूरत होगी. युवा पीढ़ी तकनीक में एक हद तक सहज है. यूनिसेफ और यूथ सर्वे बताते हैं करीब 88% छात्र पहले से पढ़ाई के लिए किसी AI टूल या एप का इस्तेमाल करता है. लेकिन बिना मार्गदर्शन के यह प्लेटफॉर्म केवल शॉर्टकट या उत्तर देने का जरिया बन सकते हैं. बच्चों को AI के नैतिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष पर पक्का संवाद और व्यावहारिक शिक्षा देनी होगी. गांव-देहात के स्कूलों में डिजिटल डिवाइड सबसे बड़ा चैलेंज रहेगा.  स्कूली एजुकेशन का भविष्य  – रियल वर्ल्ड इंटीग्रेशन: तीसरी से पांचवी तक बच्चों को प्रकृति, समाज और तकनीक के कनेक्शन के प्रैक्टिकल उदाहरण देकर AI सिखाएं.  – मॉड्यूलर रोलआउट: धीरे-धीरे – पहले AI की बेसिक्स, फिर मिडिल स्कूल में थ्योरी और रचनात्मक उपयोग, हाई स्कूल में कोडिंग, पायथन, डेटा एनालिटिक्स जैसे टेक्निकल टॉपिक्स.  – संसाधनविहीन स्कूलों के लिए ‘Unplugged’ एआई शिक्षा: टेबल टॉप गेम्स, पिक्चर कार्ड, तर्क और नैतिकता पर चर्चाएं, ताकि डिजिटल डिवाइड कम हो सके. – जटिलता और अपडेट: पाठ्यक्रम को समय के साथ अपडेट करना जरूरी होगा. AI फील्ड इतनी तेज बदलती है कि आज की स्किल कल अप्रासंगिक हो सकती है. – नैतिकता, डेटा प्राइवेसी, Algorithimic Bias की शिक्षा: बच्चों को सिखाया जाए कि AI टूल्स का इस्तेमाल जिम्मेदारी और जागरूकता से करना है. – शिक्षक प्रशिक्षण: इसके लिए सबसे पहले शिक्षकों को प्रशिक्षित कर तैयार करना, यही टेक्नोलॉजी रोलआउट की रीढ़ है.

भारत की स्कूली शिक्षा की हकीकत : सरकारी स्कूल का खर्च ₹2,863 है तो प्राइवेट स्कूल में यह ₹25,002 तक है यानी दस गुना. शहरी स्कूल के कोर्स फीस का औसत ₹15,143, जबकि ग्रामीण में यह ₹3,979.

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राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (NSS) की 80वें राउंड के “Comprehensive Modular Survey: Education” की रिपोर्ट भारत की स्कूली शिक्षा के हकीकत को बयां करती हैं. इसमें सरकारी और निजी स्कूलों में साफ अंतर नजर आता है, जिसका सीधा असर कई परिवारों के जेब पर पड़ता है. इस सर्वे में 52 हजार 85 परिवारों और 57 हजार 742 छात्रों के साक्षात्कार को शामिल किया गया. इसके रिजल्ट स्कूल एजुकेशन की संरचना में बदलाव की दिशा, अवसर और गहराते सामाजिक-आर्थिक अंतर पर नई बहस पैदा करते हैं. सर्वे में सामने आए आंकड़े बतलाते हैं कि अगले दशक में भारत को शिक्षा नीति में कड़े और व्यवहारिक परिवर्तन जरूरी हैं. भविष्य की नींव के लिए शिक्षा के क्षेत्र में सही बजट, पारदर्शिता, सोशल ऑडिट, लोक भागीदारी और सशक्त सरकारी शिक्षा प्रणाली ही सही कदम होगा. इस सर्वे के आंकड़ों पर नजर डालिए…. अहम सवाल- सरकारी बनाम निजी स्कूलों की व्यवस्था किसके लिए? देश के 55.9% बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में है. ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 66% तक है यानी हर दो में एक बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ता है. लेकिन शहरी इलाकों में 30.1% नामांकन ही सरकारी स्कूलों में है. एक औसत सरकारी स्कूल का खर्च ₹2,863 है तो प्राइवेट स्कूल में यह ₹25,002 तक है यानी दस गुना. शहरी स्कूल के कोर्स फीस का औसत ₹15,143, जबकि ग्रामीण में यह ₹3,979. निजी स्कूल की फीस, किताब, स्टेशनरी, यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट, हर मद में खर्च ग्रामीण के मुकाबले शहरी स्कूलों में कई गुना ज़्यादा है. ऐसा ही कुछ मामला कोचिंग संस्थानों का भी है. करीब 27% छात्र (30.7% शहरी और 25.5% ग्रामीण) निजी कोचिंग ले रहे हैं. शहरी उच्च माध्यमिक में कोचिंग खर्च ₹9,950 तक पहुंच जाता है, जो ग्रामीण में ₹4,548 तक है. रिपोर्ट दर्शाती है कि आस-पास संसाधन और गुणवत्ता की कमी से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले अभिभावक भी प्राइवेट कोचिंग को प्राथमिकता दे रहे हैं. जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए यह कड़ी चुनौती और असमानता का कारण बन रहा है. 1.2 फीसदी विद्यार्थियों को ही मिल पाती है छात्रवृत्ति शिक्षा के क्षेत्र में स्कॉलरशिप जैसी सुविधाएं भी देश के 95 फीसदी बच्चों को नहीं मिलती. इन बच्चों का खर्च परिवार के कंधों पर ही होता है. जबकि 1.2% छात्र सरकारी या संस्थागत स्कॉलरशिप का लाभ ले पाते हैं. अमूमन ग्रामीण-शहरी दोनों में यही रुझान दिखता है. जाहिर तौर पर सरकारी योजनाएं, छात्रवृत्ति या अन्य बेनिफिट्स का लाभ अब भी बहुत सीमित दायरे तक सीमित हैं. इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि शिक्षा खर्च में असमानता, शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों में खाई, निजी कोचिंग के बढ़ते खर्च, सरकारी स्कॉलरशिप की सीमाएं और डिजिटल संसाधन के अभाव स्कूल एजुकेशन में चुनौती हैं. अगर सरकार स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निवेश, शिक्षकों की गुणवत्ता, मुफ्त किताब और यूनिफॉर्म, समावेशी नीति, डिजिटल लर्निंग, और कोचिंग कल्चर की विसंगति जैसी चुनौतियों को प्राथमिकता दे तो स्कूलों की भूमिका नए सिरे से परिभाषित की जा सकती है.

केरल आने वाले वर्षों में शिक्षा के मामले में ग्लोबल स्टैंडर्ड सेट कर सकता है, इसके लिए रोड़मैप तैयार करते हुए ‘एजुकेशन विजन- 2031’ लॉन्च भी कर दिया है. आखिर राजस्थान का एजुकेशन मॉडल क्या है और क्या केरल के इन मॉडल से हम कुछ सीख सकते हैं?

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चलिए, बात आज इसी मुद्दे पर…

सिर्फ केरल नहीं बल्कि देश के हर राज्य के लिए ये बेहतर मॉडल हो सकता है. भारतीय शिक्षा क्षेत्र की सबसे बड़ी जरूरत समावेशी, तकनीकी, क्रिएटिव और डेटा-सक्षम नीति का परिचायक है. अपने राज्य की सीमाओं से परे, यह मॉडल देशभर के लिए एक नई राह खोल सकता है. यही शिक्षा की असली लोकतांत्रिक पहचान है, जिसमें हर बच्चा, हर वर्ग, हर क्षेत्र है और सबको समान अवसर मिलेगा.

शिक्षा के क्षेत्र की कमियों को दूर करना सबसे पहली प्राथमिकता है. जाहिर तौर पर अब सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम, रोबोटिक लैब्स कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि मूलभूत जरूरत है. इसका सीधा फायदा तमाम वर्गों दिव्यांग, आदिवासी, तटीय, प्रवासी बच्चों को मिलेगा. नामांकन को गति देने के लिए डीप डेटा विश्लेषण का इस्तेमाल किया जाएगा. स्कूल के प्रत्येक बच्चे की लिंग, जाति, वर्ग, विकलांगता जैसी विविधताओं को ध्यान में रखते हुए परिणाम तय करने का प्रयास होगा.

राजस्थान जैसे राज्यों को क्या सीखना चाहिए?

राजस्थान जैसे राज्य जहां शिक्षा की सामाजिक विविधता, ग्रामीण-शहरी अंतर, बजट की कमी, और संस्थागत असमानता की समस्याएं हैं, वहां केरल का विजन एक आदर्श मॉडल है. समावेश, शिक्षक ट्रेनिंग, डिजिटल क्लासरूम, खेल-समावेश, जीवन कौशल पर निवेश और डेटा आधारित शिक्षा नीति को राजस्थान भी अपनाए तो सरकारी स्कूलों की हालत पूरी तरह बदल सकती है. यहाँ भी शिक्षा का स्तर, समाज की भागीदारी और बच्चे का विकास मजबूती पा सकता है.

अब विस्तृत तौर पर जानिए, आखिर केरल एजुकेशन का अगला रोडमैप है क्या?

राज्य स्तरीय ‘विजन 2031’ के बाद पाठ्यक्रम, मूल्यांकन, शिक्षक व्यावसायिकता में तमाम बुनियादी कमियां पहचानी गईं. अब शिक्षक ट्रेनिंग, क्लासरूम टेक्नोलॉजी, जीवन कौशल और नवाचार पर सबसे ज्यादा निवेश किया जा रहा है. केरल सरकार ने पिछले दो वर्षों में सार्वजनिक शिक्षा संरक्षण अभियान और विद्याकिरणम मिशन के तहत 5000 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया है. 55,000 हाईटेक क्लासरूम तैयार किए हैं, 597 किताबों का समयानुसार संशोधन किया गया है.

अगर यह मॉडल देशभर में लागू किया जाए तो इस शिक्षा नीति के जरिए सामाजिक विविधता, सबको समान अवसर और डिजिटल क्रांति का उदाहरण बन सकती है. समावेशी शिक्षा, डिजिटल क्लासरूम, पाठ्यक्रम में नवाचार, और शिक्षक प्रशिक्षण का राष्ट्रीय विस्तार किया जाए तो भारत की शिक्षा व्यवस्था छवि, गुणवत्ता और रोजगार में अद्वितीय हो जाएगी. छात्र केवल रटने के बजाय, क्रिएटिविटी, नवाचार, खेल और जीवन-प्रबंधन में दक्ष होंगे.

एक्सपर्ट्स की राय है कि यह किसी भी राज्य की शिक्षा प्रणाली के विकास, शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम संशोधन, पेशेवर दक्षता और सार्वजनिक भागीदारी की जरूरतों को सामने रखती है. उनका मानना है कि डिजिटल, रचनात्मक और कौशल विकास आधारित शिक्षा ही आज के दौर में सफलता की कुंजी बनेगी.

विश्व विख्यातसांभर झील में प्रवासी पक्षियों की मृत्यु होना झील के संरक्षण को लेकर किए जा रहे तमाम सरकारी दावों को फेल साबित करते है |

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विश्व विख्यातसांभर झील में प्रवासी पक्षियों की मृत्यु होना झील के संरक्षण को लेकर किए जा रहे तमाम सरकारी दावों को फेल साबित करते है | 2019 में यहां देश की सबसे बड़ी पक्षी त्रासदी हुई और अब फिर सांभर झील में एक बार फिर प्रवासी पक्षियों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया है। हर साल सर्दियों के मौसम में देश-विदेश से हजारों प्रवासी पक्षी इस झील में आते हैं और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार इस बार भी फ्लेमिंगो, पेलिकन, पिंटेल और एवोसेट जैसी प्रजातियाँ यहां पहुंची लेकिन अचानक बड़ी संख्या में इनकी मौत से झील का पर्यावरणीय संतुलन और संरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठ गए हैं । प्रारंभिक जांच में आशंका जताई जा रही है कि जल में प्रदूषण, रासायनिक असंतुलन या किसी विषाक्त संक्रमण के कारण यह घटना हुई हो सकती है मगर राजनेताओं के संरक्षण में झील क्षेत्र में अवैध नमक उत्पादन, औद्योगिक अपशिष्ट और प्लास्टिक कचरे का फैलाव भी लगातार बढ़ना पक्षियों की मौत का प्रमुख कारण है जिससे न केवल पक्षियों बल्कि झील की जैव विविधता पर भी बुरा असर पड़ रहा है | वर्ष 2019 में 20,000 से अधिक प्रवासी पक्षियों की मौत यहीं पर हुई और उस घटना के बाद झील संरक्षण और निगरानी के कई दावे किए गए थे, लेकिन मौजूदा हालात यह दिखा रहे हैं कि वे दावे अब भी अधूरे हैं।

बाढ़ के चलते घरों में घुसा केमिकल वाला पानी! मामला सिर्फ जोजरी का नहीं है, पूरे राजस्थान में नदियां प्रदूषित हो गई है

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जोजरी नदी के प्रदूषण ने पश्चिम राजस्थान में जो दर्दनाक तस्वीर पेश की, उसकी चर्चा पूरे देश में हुई. लेकिन यह मामला सिर्फ जोजरी तक सीमित नहीं है. जोजरी से लूणी तक के ज़हरीले बहाव, बनास और चम्बल की बढ़ती बीओडी मात्रा और जयपुर की द्रव्यवती का नाले में तब्दील होना, राजस्थान की लाइफलाइन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. ये नदियां फैक्ट्री के दूषित पानी, शहरी सीवेज और खनन कचरे के बोझ के तले अपने अस्तित्व को खोती जा रही है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े, बनास को प्रायोरिटी-III (बीओडी लगभग 13 mg/L) और चम्बल को कोटा के पास प्रायोरिटी-V में रखते हैं. वहीं द्रव्यवती की मिट्टी में क्रोमियम जैसे भारी धातु और जोजरी की ज़हरीली धारा से लगभग 1.6 करोड़ लोग प्रभावित हैं. अब यह मामला सिर्फ पर्यावरण तक नहीं रह गया, बल्कि जनजीवन और स्वास्थ्य पर संकट गहरा गया है.

प्रशासन के नोटिस के बाद लोग बेघर होने की कगार पर

जोधपुर के कुछ गांवों में बाढ़ के चलते घरों में केमिकल भर गया है. इसके बाद प्रशासन ने नोटिस जारी कर लोगों को बाहर निकलने के लिए कहा है. जोधपुर और बाड़मेर के कई ग्राम पंचायतों ने हाल ही में एक नोटिस जारी करते हुए कहा कि जोजरी नदी से बाढ़ का पानी घरों में घुसने से लोग परेशान हैं, इसलिए वे कुछ समय के लिए वहां से निकल जाएं.

जोधपुर सांसद और केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने हाल ही में कहा था कि जोजरी नदी में आ रहे दूषित पानी से जोधपुर और बालोतरा ज़िले के क़रीब 16 लाख लोगों के प्रभावित हो रहे हैं. अब ज़्यादा समस्या इसलिए आ रही है, क्योंकि जोधपुर के सीईटीपी (इंडस्ट्रीज़ के पानी का ट्रीटमेंट प्लांट) की कैपेसिटी कम है. जोधपुर में अभी दो सौ एमएलडी क्षमता के सीईटीपी प्लांट की आवश्यकता है.

करोड़ों रुपए खर्च हुए और नाले में तब्दील हुई द्रव्यवती नदी

वसुंधरा राजे के नेतृत्व वाली राज्य की पिछली भाजपा सरकार ने अमानीशाह नाले को द्रव्यवती नदी में बदलने की अवधारणा तैयार की थी. इस परियोजना के लिए लगभग 1,300 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, फिर भी द्रव्यवती एक दूषित जलमार्ग बनी हुई है, जो बीमारियों और प्रदूषण को पनाह दे रही है. इसकी हालत इस हद तक बिगड़ गई है कि दिल्ली की यमुना नदी जैसा जहरीला झाग इसके पानी में दिखाई देने लगा है.

वेनिस बनने के सपने दिखाए, 25 साल से राजनीति का केंद्र है आयड़

ऐसी ही कुछ कहानी उदयपुर की आयड़ नदी की भी है. इस 30 किलोमीटर लंबी नदी को वेनिस की तर्ज पर सुंदर बनाने का सपना शहरवासियों के सामने परोसा गया. यह नदी शहर में 5 किलोमीटर क्षेत्र से गुजरती है. दशकों तक राजनीति करने वाले पूर्व विधायक और वर्तमान में राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने बार-बार वेनिस नदी की कल्पना के भाषण भी दिए, लेकिन यह नदी पिछले कुछ दशक से राजनीति का बड़ा केंद्र रही. चाहे नगर निगम हो या विधानसभा, बीजेपी का गढ़ रहे मेवाड़ में आयड़ की हालत नहीं सुधरी. सीवेज को आयड़ नदी में बहाया जा रहा है, जो उदयसागर झील में बह रहा है. इसके चलते आसपास के क्षेत्र में यह दुर्गंध का कारण भी बनी हुई है.

मरूगंगा का दर्द भी किसी को नहीं दिख रहा!

मरूगंगा के नाम से विख्यात जिले की एकमात्र लूणी नदी भी दिनों दिन प्रदूषित होती जा रही है. औद्योगिक कारखानों से निस्तारित प्रदूषित पानी लूनी नदी में लगातार घुल रहा है. हर साल 2 से 3 बार इस प्रदूषित पानी को लूणी नदी में छोड़ा जाता है. सर्दी खत्म होने के बाद से नदी में प्रदूषित पानी की आवक 1-2 महीने से शुरु हो गई है.

भीलवाड़ा की कोठारी नदी का मामला भी कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने 18 नवंबर, 2024 को राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई करने को भी कहा. कोर्ट के आदेश में नदी किनारे कचरा, केमिकल और बेकार दवाइयों को डंप करने का भी उल्लेख किया गया है.

पाली ने पेश किया शानदार उदाहरण

पाली की बांडी नदी देश की सबसे प्रदूषित 150 नदियों में शामिल थी और साथ ही राजस्थान में दूसरी सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी. सर्वे में बांडी नदी में भराव क्षेत्र में बीओडी यानी बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड सामान्य स्तर से पांच गुना अधिक पाई गई थी. इसका सबसे बड़ा कारण शहर की औद्योगिक इकाइयों से छोड़े जाना वाला रंगीन घातक केमिकलयुक्त पानी बताया गया था. लेकिन आज हालात सुधर गए है.