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बिजली चोरी का समर्थन किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है, लेकिन केवल उपभोक्ताओं पर उंगली उठाना संकीर्ण सोच है, क्योंकि ऊर्जा उपभोग किसी देश की आर्थिक प्रगति का बुनियादी पैमाना होता है। भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक बिजली खपत लगभग 1327 यूनिट है जबकि वैश्विक औसत 3700 यूनिट से अधिक है, अमेरिका में यह आँकड़ा 12,000 यूनिट और चीन में 6000 यूनिट तक पहुँच चुका है।

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ऐसे परिदृश्य में अखबारों द्वारा किसी इलाके में उपभोक्ताओं के बिल न चुकाने या चोरी की घटनाओं को बड़े मुद्दे की तरह उछालना वास्तविक तस्वीर का छोटा हिस्सा मात्र है। असल समस्या यह है कि उत्पादन से लेकर वितरण तक हर स्तर पर किस प्रकार वित्तीय हानि और संगठित चोरी हो रही है, इसका खुलासा शायद ही कभी होता है। राजस्थान सहित कई राज्यों की बिजली कंपनियों पर आज 1,60,000 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज़ है। कुछ साल पहले “चेंज इन लॉ” के नाम पर एक निजी कंपनी को केवल ब्याज की मद में 6000 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया गया, लेकिन अखबार खामोश रहे। बाड़मेर की लिग्नाइट परियोजना के कारण उपभोक्ताओं पर 12,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ डाला गया, और इसके आकलन के लिए कंपनी दस्तावेज़ तक उपलब्ध नहीं करा रही, मगर कहीं सुर्ख़ी नहीं बनती। हाल ही में 3200 मेगावाट बिजली की अनावश्यक खरीद के टेंडर पर भी मीडिया सन्नाटे में है, जबकि यह दीर्घकालिक वित्तीय बोझ उपभोक्ताओं की जेब से ही वसूला जाएगा। दूसरी तरफ भारत में ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लॉस 16–18% है जबकि विकसित देशों में यह केवल 5–7% है, राजस्थान जैसे राज्यों में तो यह आँकड़ा 20% तक पहुँच जाता है। इन बड़े सवालों पर अखबारों और मीडिया की चुप्पी उल्लेखनीय है, जबकि मोहल्ले स्तर पर बिजली चोरी की छोटी घटनाओं को लगातार उछाला जाता है ताकि यह धारणा बने कि असली समस्या आम जनता में है। जनप्रतिनिधि भी इस नैरेटिव का प्रतिकार नहीं करते क्योंकि बिल न चुकाने या चोरी से जुड़ी खबरें उन्हें अपने मतदाताओं के बीच संरक्षक की छवि देती हैं। इधर उपभोक्ता पेट्रोल और डीज़ल जैसे उत्पादों पर लागत से दोगुना टैक्स चुका रहा है जहाँ पेट्रोल की आधार कीमत 35–40 रुपए प्रति लीटर है और उपभोक्ता 100 रुपए से अधिक में भुगतान करता है इसी मानसिकता के चलते बिजली कंपनियाँ हर साल नए-नए फ्यूल सरचार्ज, फिक्स्ड कॉस्ट और वेरिएबल चार्ज जोड़कर जनता पर बोझ डालती जा रही हैं। स्मार्ट मीटर जैसे प्रयोग भी उपभोक्ता के स्तर पर उसी के द्वारा लागत-भुगतान मॉडल पर किए जा रहे है जबकि ग्रिड से लेकर पॉवर प्लांट तक सब खस्ताहाल पड़े है। और नियामक आयोग राजनीतिक कठपुतली बनकर केवल मुहर लगाने का काम कर रहे हैं। नतीजा यह है कि असली चोरी पर परदा डाल दिया जाता है, कॉर्पोरेट स्तर की गड़बड़ियाँ और नीतिगत विसंगतियाँ छुपा दी जाती हैं, और चोरी का ठप्पा आम जनता के माथे पर मढ़ दिया जाता है।

RPSC भर्ती परीक्षा में अब बरकरार रहेगा न्यूनतम अंक का नियम? 

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RPSC की राजनीति विज्ञान व्याख्याता भर्ती में न्यूनतम अंकों के चलते पद खाली रह गए थे. पिछले महीने परिणाम घोषित होने के बाद अब इस पर विवाद भी हुआ और पेपर के लेवल पर सवाल उठे. लेकिन न्यूनतम अंकों वाला यह फॉर्मूला अब आगे भी देखने को मिलेगा. राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक आचार्य (असिस्टेंट प्रोफेसर) परीक्षा-2025 की भर्ती प्रक्रिया शुरू हो गई है. परीक्षा के लिए 20 सितंबर से फॉर्म शुरू हो भी हो गए हैं और अंतिम तारीख 19 अक्टूबर है. नियम के मुताबिक, सभी तीनों पेपर में 36 प्रतिशत नंबर अलग-अलग लाने होंगे. साथ ही कुल मिलाकर न्यूनतम 40 प्रतिशत नंबर होने चाहिए. यह नियम जनरल कैटेगरी के लिए लागू रहेगा. आरक्षण वालों को पांच प्रतिशत की छूट दी गई है.

पहले नियम जान लें

आयोग लिखित परीक्षा और इंटरव्यू में प्राप्त कुल अंकों के आधार पर उम्मीदवारों की एक लिस्ट तैयार करेगा, जिन्हें वे संबंधित पदों पर नियुक्ति किया जाएगा. आयोग ऐसे किसी भी उम्मीदवार की का चयन नहीं करेगा, जो प्रत्येक पेपर में 36% से कम नंबर और लिखित परीक्षा में कुल 40% से कम नंबर प्राप्त करेगा. इससे कम नंबर लाने वाले उम्मीदवार असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती के लिए अयोग्य माने जाएंगे. परीक्षा में 200 अंकों में से 80 अंक (इंटरव्यू के नंबर छोड़कर) प्राप्त नहीं करने वाले अभ्यर्थी न केवल चयन से वंचित रह जाएंगे, बल्कि इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया जाएगा.

पिछले साल के आवेदन निरस्त, फिर से मांगे गए

नए नियमों के तहत अब 20 सितंबर से 19 अक्टूबर तक अभ्यर्थी इस भर्ती के लिए आवेदन कर सकते हैं. कैंडिडेट्स की उम्र एक जुलाई 2025 को न्यूनतम 21 साल और अधिकतम 40 साल से कम होनी चाहिए. पिछली बार करीब पौने दो लाख कैंडिडेट्स ने आवेदन किए थे. लेकिन उस नोटिफिकेशन को निरस्त कर।फिर से आवेदन मांगे गए हैं.

‘मिनिमम मार्क्स फार्मूले’ के चलते पद खाली रहने पर उठे सवाल

दरअसल, ऐसी परीक्षाओं में NET और NET-JRF क्लियर करने वाले अभ्यर्थियों के अलावा देश में कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में पढ़ रहे स्कॉलर भी आवेदन करते हैं. बावजूद इसके, पेपर में 10 फीसदी अभ्यर्थियों का भी पास ना कर पाना सवाल खड़ा करता है. बार- बार इस बात को कहा जाता है कि पेपर के लेवल को इतना कठिन भी नहीं बनाना चाहिए कि उस निर्धारित समय मेंमेहनती और तैयार अभ्यर्थी भी चयनित न हो पाए. परीक्षा को मॉडरेट स्तर पर रखा जाए, ताकि वास्तविक ज्ञान और तैयारी का सही आकलन हो सके.

  • कई विशेषज्ञों का तर्क है कि सामाजिक और आर्थिक विविधता पर असर: कई बार ग्रामीण या सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार न्यूनतम सीमा नहीं प्राप्त कर पाते, जिससे उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है.
  • कई बार कटऑफ बहुत अधिक या बहुत कम रख दी जाती है, जिससे योग्य उम्मीदवार बाहर रह सकते हैं.
  • जब उम्मीदवार मिनिमम मार्क्स नहीं ला पाते तो पद खाली रह जाते हैं, जिससे नौकरी या एडमिशन प्रक्रिया प्रभावित होती है. आयोग के संसाधन, समय और परीक्षा पर होने वाले खर्च के बावजूद जब सरकारी पद नहीं भर जाएंगे तो RPSC को यह भी सोचना होगा कि फिर योग्य उम्मीदवार की परिभाषा क्या है?

“ज़िंदगी इक हादसा है और कैसा हादसा, मौत से भी ख़त्म जिस का सिलसिला होता नहीं”

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जिगर मुरादाबादी का यह शेर सरकारी सिस्टम पर सटीक बैठता है, जहां बदहाली के चलते लोगों की मौत का सिलसिला खत्म ही नहीं होता. अमीर-गरीब की खाई में पटे इस समाज में आम आदमी जिंदगी में कितने दुख-दर्द झेलता है और विडंबना तो यह है कि जिस सरकारी व्यवस्था के भरोसे वह उम्मीद लगाकर बैठा है, वह उसकी मौत का इंतजाम कर देता है. एक ऐसी सरकारी व्यवस्था जो कभी स्कूल की छत के नीचे बैठे मासूम पर कहर बनकर टूट जाती है तो कभी कफ सिरप पिलाकर उन्हें मौत के घाट उतार देती है और कभी तो हॉस्पिटल में इलाज लेने आए घायलों की जान ही ले लेती है. एमएसएम हॉस्पिटल के हादसे में जान गंवाने वाले कई मरीज तो कोमा में थे और उनके परिजन जब सड़क पर लेकर उन्हें बैठ गए थे तो उनके साथ पूरा सरकारी तंत्र पर भी सड़क पर बिखरा पड़ा था. ऊंची इमारतों के ढह चुके सिस्टम से आस तो आम आदमी को भी शायद नहीं है, लेकिन आर्थिक बदहाली का मारा मरीज तो निजी हॉस्पिटल की लूट-खसोट से बचने के लिए सरकारी हॉस्पिटल में पहुंचता है. तमाम हादसों के बाद जांच कमेटी वाली खानापूर्ति इस मामले में भी हो चुकी है. जांच समिति गठित करने की औपचारिकता बंद कीजिए हादसे की जांच के लिए बनी कमेटी के अध्यक्ष चिकित्सा विभाग आयुक्त होंगे यानी जिम्मा उसी विभाग को दिया गया है, जिस विभाग पर स्वास्थ्य-व्यवस्था को मजबूत बनाने का भी जिम्मा था और वह नाकाम रही. अब उस नाकामी की जांच खुद विभाग ही करेगा, ये कैसा मजाक है? पीडब्ल्यूडी, एसएमएस हॉस्पिटल के डॉक्टर समेत कई नौकरशाह इस जांच को पूरा करेंगे. जाहिर तौर पर वह मामले में कड़ी कार्रवाई की बात कहकर औपचारिकता पूरी की गई है. जबकि जांच समिति गठित करने के इस पैटर्न को भी बदला जाना चाहिए, जिसमें कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ, इंजीनियर और रिटायर्ड अफसरों के साथ विपक्ष के सदस्यों और एक्टिविस्ट को लिया जाना चाहिए. ताकि एक निष्पक्ष जांच रिपोर्ट सामने आए और जवाबदेही तय हो. झालावाड़ स्कूल हादसे में प्रिंसिपल को जिम्मेदार ठहराने वाली सरकार को इस मामले में इमरेंजसी यूनिट के स्टाफ की जिम्मेदारी तय करने तक सीमित नहीं हो जाना चाहिए. बल्कि बात इस पर होनी चाहिए कि क्या बिजली उपकरणों समेत हॉस्पिटल के रखरखाव के लिए सावधानी बरती गई? क्योंकि हादसों की जिम्मेदारी तय करने के लिए कमेटी गठित तो होती है, लेकिन व्यवस्था को दुरुस्त रखने और इस पर मॉनिटरिंग के लिए समिति गठित नहीं होती. बहरहाल, फेस्टिवल सीजन में डूबी प्रदेश की जनता इस हादसे को भी दीवाली की रोशनी में भूल जाएगी और यह दर्द सिर्फ उन 8 या 10 परिवारों को होगा, जिन्होंने अपने परिजनों को खोया या फिर हादसे में गंभीर रूप से घायल परिवार के सदस्यों की देखभाल करनी है.

अंता उपचुनाव की घोषणा के बाद कुछ सवाल!

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क्या सचिन पायलट ने मुट्ठी भर बाजरे के लिए 2028 की बादशाहत खो दी?

महारानी की पसंद के आगे बीजेपी एक बार फिर सरेंडर करेगी?

क्या कांग्रेस में गोविंद सिंह डोटासरा की ही चल रही है?

विधायक के जेल जाने के बाद क्या बीजेपी फिर कह पाएगी- भाया रै भाया रै, भाया, पूरा गांव खाया?

अंता उपचुनाव सिर्फ एक स्थानीय चुनाव नहीं है, बल्कि यह कई नेताओं के लिए भविष्य की राह और द्वंद में फंसा इम्तिहान है. अंता सीट का ट्रैक रिकॉर्ड भी ऐसा है कि यहां लगातार दो बार कोई पार्टी नहीं जीत पाई. इस क्षेत्र को बपौती समझने वाली पार्टी और नेताओं को सबक मिला है. गुटबाजी, सामाजिक समीकरण, टिकाऊ चेहरों का मोह और भ्रष्टाचार के आरोप-तिलिस्म, ये सभी इस उपचुनाव में एक साथ टकरा रहे हैं.

कांग्रेस के लिए यह न केवल 2023 में हारी सीट वापस लेने का सवाल है, बल्कि आंतरिक खेमेबंदी की असली कसौटी भी बन गया है. टिकट के ऐलान के बाद सुगबुगाहट इस बात की है कि आखिर भाया को टिकट किसकी वजह से मिला? क्या सिर्फ इसलिए कि वो पार्टी के पुराने वफादार है या इसलिए कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का यह दमखम का नतीजा है या फिर अशोक गहलोत का जादू चल रहा है या सचिन पायलट खेमा यहां ज्यादा सक्रिय नहीं था.

जब प्रमोद जैन भाया को टिकट मिला तो एक तरफ कांग्रेस आलाकमान की रणनीति दिखी, दूसरी तरफ सचिन पायलट के बयान ने उनके कई पुराने समर्थकों खासतौर पर नरेश मीणा खेमे को खुले तौर पर नाराज कर दिया. जिस मीणा-गुर्जर समीकरण के बूते पायलट को ताकत मिलती है, उसमें नरेश मीणा नुकसान पहुंचाने की कोशिश में है. सोशल मीडिया पर नरेश मीणा के समर्थक ने तो यहां तक लिख दिया-“सचिन पायलट ने मुट्ठी भर बाजरे के लिए 2028 की बादशाहत खो दी?” यह टिप्पणी उस बेचैनी का प्रमाण है, तेजतर्रार युवा और स्थानीय नेतृत्व टिकट वितरण को लेकर खुद को हाशिये पर महसूस कर रहा है.

प्रमोद जैन भाया की यह राजनीति में पांचवीं पारी है. दो जीत, दो हार, और 22 साल से क्षेत्र में मजबूत पकड़—लेकिन क्या सिर्फ ‘स्थिरता’ और ‘पार्टी परंपरा’ के नाम पर बार-बार उन्हीं नेताओं को मौका मिलता रहेगा? कांग्रेस का यह फैसला इसी बात पर स्थानीय असंतोष को और बढ़ा रहा है. ठीक इसी वजह से अगर भाया हारते हैं तो पायलट खेमे के लिए बिना लड़े ही बहस का किरदार मिल जाएगा. अगर जीतते हैं तो जयपुर का मैसेज जाएगा कि “संकट में भी पुराने नामों पर ही भरोसा है.”

बीजेपी का गणित अंदर से ज्यादा उलझा हुआ है. अंता की राजनीति वसुंधरा राजे के इर्द-गिर्द घूमती रही है. हर बार वही समीकरण- वसुंधरा राजे, बेटे दुष्यंत सिंह की पसंद और कैंडिडेट की टिकट. इस बार भी भाजपा सीधे-सीधे बाहरी नेतृत्व के भरोसे बैठी है. कंवरलाल मीणा की सदस्यता रद्द और जेल जाना एक तरफ सहानुभूति फैक्टर जैसा दिखाया जा रहा है, दूसरी तरफ यह दल का नैतिक संकट भी है- क्या जेल गए विधायक की पत्नी को सपोर्ट करना जनता के बीच छवि संकट का कारण नहीं बनेगा? क्या बीजेपी सिर्फ सहानुभूति के आधार पर वोट मांग सकती है?

सबसे जरूरी बात यह है कि क्या सीएम भजनलाल शर्मा 2 साल के काम के आधार पर अंता में वोट मांग पाएंगे?

2023 में पीएम मोदी का “खाया रे, खाया भाया ने खाया” वाला तंज खूब चला था. यह सवाल काफी ट्रेंड हुआ और विपक्ष में बैठी बीजेपी ने भी इसे खूब दोहराया था. लेकिन आज बीजेपी की विडंबना यह है कि जिस तरह से बीजेपी के अपने विधायक खुद दोष सिद्ध होने के बाद जेल में हैं, क्या वैसा नैतिक आक्रोश और नैरेटिव भाजपा दोबारा खड़ा कर पाएगी?

असल में अंता का उपचुनाव कांग्रेस और बीजेपी—दोनों के लिए प्रतिष्ठा, नेतृत्व, आंतरिक लोकतंत्र, और नैतिकता का इम्तिहान है. कांग्रेस के भीतर पुरानी रंजिशें, स्थानीय बनाम बाहरी की बहस, नए चेहरे का संकट और टिकट वितरण की नाराज़गी पक्की है. बीजेपी में पुराने समीकरण, सिंपैथी कार्ड और छवि का संकट एक साथ चुनौती की तरह भी होंगे.

जयपुर समेत राजस्थान के बड़े शहरों का बढ़ेगा दायरा, पर प्राधिकरण का विस्तार बिल्डर लॉबी के दबाव में नहीं होना चाहिए

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राजस्थान के बड़े शहरों जयपुर, उदयपुर और कोटा के विकास प्राधिकरणों का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) अब कोटपूतली-बहरोड़ तक पहुंच गया है, जिसमें विराटनगर तहसील के 9 गांव और 17 तहसीलों के 632 गांव शामिल हो गए हैं. JDA का क्षेत्रफल करीब 6,000 वर्ग किलोमीटर तक विस्तार कर दिया गया है, जो करीब 3,000 वर्ग किलोमीटर था. उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) में 70 नए गांव जुड़कर कुल 206 गांव हो गए हैं, जबकि कोटा विकास प्राधिकरण (केडीए) के दायरे में बूंदी और कोटा के 289 गांव शामिल किए गए हैं. प्राधिकरणों का तर्क है कि बढ़ती आबादी के अनुरूप विस्तार जरूरी है ताकि मास्टर प्लान के तहत रिंग रोड, आवास योजनाएं, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित हो सके. दावा किया जा रहा है कि इससे गांवों में निवेश व रोजगार बढ़ेगा ओड नागरिक सुविधाओं में सुधार होगा. लेकिन इस चमकदार दावे के पीछे एक दूसरी तस्वीर भी है, जहां खेती की जमीनें धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगलों में बदल रही हैं. हरियाली की जगह कॉलोनियां और अवैध निर्माण बढ़ रहे हैं और स्थानीय लोगों के लिए विकास का अर्थ केवल ज़मीन अधिग्रहण और कागज़ी योजनाएं बनकर रह गया है.

JDA का 7 हजार वर्ग किमी तक बढ़ता दायरा, किसे फायदा देगा?

जयपुर, उदयपुर और कोटा जैसे शहर, जो अपने पर्यावरणीय और सांस्कृतिक सौंदर्य के लिए जाने जाते हैं, अब अवैध कटान और अतिक्रमण के बढ़ते दबाव में हैं. ग्रामीणों के लिए यह स्थिति दुविधाजनक है न वे गांव का विकास देख पा रहे हैं, न ही शहर की सुविधाओं का लाभ उठा पा रहे हैं. जेडीए का दायरा अब करीब सात हजार वर्ग किलोमीटर तक फैल चुका है, जिसमें कुल 1,418 राजस्व गांव शामिल हो गए हैं, पर सवाल यही है कि क्या इतना विशाल विस्तार वास्तव में आम नागरिक के लिए सुलभ और लाभकारी होगा या यह केवल शहरीकरण के नाम पर ग्रामीण जीवन और प्रकृति के क्षरण की नई कहानी लिखेगा.

पेराफेरी में आ रही पंचायतों का दर्द भी समझना होगा

प्राधिकरण की पेराफेरी में आने वाली पंचायतों में असंतोष बढ़ रहा है, क्योंकि ग्राम पंचायतों की शक्तियां घटती जा रही हैं. पहले जहां छोटे पट्टे और स्थानीय समस्याएं पंचायत स्तर पर ही सुलझ जाती थीं, अब ग्रामीणों को एनओसी, सेटलमेंट या किसी भी निर्माण की अनुमति के लिए प्राधिकरण के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जहां फाइलें महीनों अटकी रहती हैं. अफसरशाही की लेट-लतीफी, पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही का अभाव, इन प्राधिकरणों को आम आदमी से दूर कर रहा है. इसी के साथ, मास्टर प्लान की लैंड यूज़ नीतियों को वन, पहाड़ी और झील क्षेत्रों में लागू करना बेहद मुश्किल है, जिससे प्राकृतिक और पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा बढ़ता जा रहा है. ऐसे में पेराफेरी और पहाड़ी क्षेत्र के लिए यह संकट सिर्फ विकास नीति का नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक, पर्यावरण और प्रशासनिक चुनौती बनता जा रहा है.

बिल्डर लॉबी को फायदा पहुंचाने के लिए बदनाम प्राधिकरण गांवों का समुचित विकास कर पाएंगे?

विकास का कही विरोध नहीं हो रहा, लेकिन बहस यही है कि कागजों पर विकास दिखाकर जमीनी हकीकत में अव्यवस्था नजर आती है. बिल्डर लॉबी और भूमाफिया को तो सब सुविधाएं, किसान और आम ग्रामीण के लिए मुश्किलें ही बढ़ती हैं. अधिक गांव जोड़ने के नाम पर पारंपरिक व्यवस्था हाशिए पर, प्रशासनिक बोझ और विसंगतियां बढ़ती हैं.

क्योंकि जेडीए और अन्य प्राधिकरणों का मास्टर प्लान, वास्तविक ज़मीनी जरूरतों के मुकाबले बिल्डर लॉबी को फायदा पहुंचाने के लिए ज्यादा बदनाम हो चुका है. शहर का प्राकृतिक विस्तार जहां शहरी नियोजन के हवाले होना चाहिए, वहां बेतरतीब कॉलोनियां, जमीन अधिग्रहण की राजनीति और खेती लायक भूमि की जगह कंक्रीट ज्यादा दिखती है.

खेती-बाड़ी और हरे भरे इलाके, कांक्रीट के जंगल और अवैध कॉलोनियों में बदल जाते हैं. ऐसे में ग्रामवासियों के पास विकल्प सीमित रह जाते हैं- ना तो वे गांव का विकास देख पाते हैं, ना शहर की सुविधाओं का लाभ.
साथ ही जो जयपुर, उदयपुर, कोटा जैसे इलाके पहाड़ियों, वन क्षेत्रों, झीलों के लिए विख्यात हैं, वहां वन क्षेत्र की लैंड यूज पॉलिसी को लागू कराना बेहद मुश्किल है. यहां अतिक्रमण और अवैध कटान के खतरे बढ़ने की भी आशंका है.

वादा तेरा चुनावी वादा, दिवाली की सौगात के नाम पर बच्चों से सरकार ने किया धोखा?

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जनरल के साथ ओबीसी वर्ग के छात्रों को नहीं मिलेंगे यूनिफॉर्म के लिए पैसे वादा था 1200 रुपए का, लेकिन जिन बच्चों को दिए भी, उनके खाते में आए- महज 600 रुपए 13 अक्टूबर केंद्रीय गृह व सहकारिता मंत्री अमित शाह जयपुर आए तो प्रदेशवासियों के लिए दिवाली का तोहफा देने की बात हुई. एक तोहफा राजस्थान में बच्चों के लिए भी था, स्कूल यूनिफॉर्म के लिए सालाना खाते में जमा होने वाली राशि. लेकिन यह तोहफा आधा- अधूरा था और भेदभाव से भरा. क्योंकि बीजेपी का चुनावी वादा था कि सरकार में आने के बाद बच्चों को खाते में सीधे 1200 रुपए दिए जाएंगे, लेकिन दिए गए- महज 600 रुपए. 40 लाख बच्चों के खाते में सीधे 240 करोड़ रुपए पहुंचे.  इसी साल 27 मार्च को घोषणा हुई कि कक्षा 1 से 8 तक के छात्रों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए 800 रुपए दिए जाएंगे. साथ ही, कक्षा 9 से 12 की छात्राओं को ही यूनिफॉर्म और बैग की राशि दी जाएगी यानी इसमें भी छात्रों को बाहर कर दिया गया. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भरतपुर से इसकी शुरुआत की. इस योजना को राजस्थान सरकार ने स्कूल शिक्षा में बड़ा कदम बताते हुए ढिंढोरा पीटा, लेकिन जब बजट की कमी हुई तो नया सर्कुलर ले आए.  राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद ने नए आदेश में सामान्य और ओबीसी बच्चों को बाहर कर दिया है. अब यह लाभ सिर्फ एससी, एसटी, बीपीएल वर्ग के छात्रों और सभी वर्ग की छात्राओं को मिलेगा. वहीं, 9वीं से 12वीं के बच्चों को योजना का लाभ देने वाले वादे से सरकार मुकर गई. अब उन्हें, इस दायरे से बाहर रखा गया. झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद स्कूल संसाधन और जर्जर भवन से छुटकरा पाने के लिए सरकार को घेरा गया. अब आम तो यह कि बिल्डिंग छोड़िए, स्कूल यूनिफॉर्म के लिए भी सरकार के पास पैसे नहीं है. और बजट संकट से बचने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. दरअसल, पूर्ववर्ती गहलोत सरकार के समय पहली से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को साल में दो यूनिफॉर्म मुफ्त मिलते थे. कपड़े अलग, सिलाई का भत्ता अलग. बच्चों को यूनिफॉर्म खरीदना नहीं पड़ता, सब स्कूल से मिल जाता. बाद में 9वीं से 12वीं की छात्राओं को भी शामिल किया गया. यूनिफॉर्म वितरण में कपड़े मिलते और सिलाई के लिए 200 रुपए अलग मिल जाते, जिससे गरीब से गरीब बच्चा भी शालीनता से स्कूल के माहौल में रहता. भजनलाल सरकार ने नई स्कीम में बच्चों के खाते में सीधे 800 रुपए खाते ट्रांसफर करने का ऐलान किया, जिससे उन्हें यूनिफॉर्म और बैग खुद खरीदने में आसानी हो. सरकार का दावा था कि इससे बच्चों की खरीददारी में सहूलियत बढ़ेगी और सत्र के अंत तक आर्थिक बोझ घटेगा. असलियत यह है कि साल भर के इंतजार के बाद सत्र आधा बीत गया तो नीतिगत विफलता के चलते बच्चों के खाते में पैसे नहीं पहुंचे. शिक्षा विभाग अब आदेश की नई कॉपियां निकालने में लगा है. समावेशी सिद्धांत पर कुठाराघात  इस प्रक्रिया में असल संकट ये है कि राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद ने पिछले आदेश में सामान्य, ओबीसी वर्ग के बच्चों को बाहर कर दिया. अब यूनिफॉर्म की राशि सिर्फ एससी, एसटी, बीपीएल वर्ग के बच्चों और सभी वर्ग की छात्राओं के लिए है. सामान्य और ओबीसी वर्ग के बच्चे इस योजना से पूरी तरह बाहर हैं. यानी बजट की कमी की आड़ में सबसे पहले कुठाराघात शिक्षा के समावेशी सिद्धांत पर हुआ. कक्षा एक से आठ के सामान्य वर्ग और ओबीसी बच्चों का डाटा सूची से हटाने की तैयारी खुले तौर पर बजट कटौती और भेदभाव को दिखाती है. कक्षा 9-12 की छात्राएं भी अब योजना से बाहर हो गई हैं. आदेश साफ कहता है—अब राशि सिर्फ शेष बचे पात्र बच्चों के लिए ही खाते में आएगी. राजकीय विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने का सरकारी लक्ष्य यूनिफॉर्म बजट पर कैंची चला कर खुद कमजोर हो चुका है. सत्र शुरू होने के तीन महीने बाद बजट जारी करके, सबसे बड़ी कैंची सामान्य और ओबीसी वर्ग के छात्रों पर चलाना दिखाता है कि सरकारी योजना का मकसद सिर्फ आंकड़ों में साल-दर-साल कामयाबी दिखाना है, असली हक हर गरीब, जरूरतमंद विद्यार्थी तक नहीं पहुंच पा रहा. यह मामला बजट, नीति और शिक्षा के अधिकार का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की परीक्षा है. सरकारी योजनाओं में बार-बार वर्गीय कटौती करना सबसे कमजोर, हाशिये पर खड़े बच्चे की उम्मीदों पर सीधा वार है.  बजट की कमी से पार पाने का ये कैसा तरीका बजट की कमी के बाद शिक्षा विभाग ने नामांकन बढ़ाने की जगह खुद योजना पर कैंची चला दी है. पढ़ाई शुरू होने के तीन महीने बाद, सामान्य और ओबीसी बच्चों को स्कीम से बाहर कर देना कहीं से भी समावेशी शिक्षा का संकेत नहीं देता. साफ है कि अफसरों ने कटौती के लिए सबसे पहले आम बच्चों का नाम सूची से हटाया. 9 से 12 की छात्राएं भी अब पात्र नहीं हैं. अब सिर्फ कुछ वर्ग के बच्चों को ही यूनिफॉर्म राशि दी जाएगी. स्कीम की सबसे बड़ी विफलता यही है कि गरीब, जरूरतमंद और आम विद्यार्थी का अधिकार वर्गीय कटौती और ‘बजट बचाओ’ नीति में गुम हो गया है. यह मुद्दा सिर्फ यूनिफॉर्म भत्ते का नहीं, सामाजिक न्याय और असली शिक्षा की परीक्षा है. प्रशासनिक लापरवाही, बजट की खोज में बार-बार बच्चों को हाशिये पर डालना, और हर साल नई स्कीम आते ही कटौती शुरू, यही सरकारी स्कीम का असली चेहरा है

सिर्फ दिवाली पर क्यों, पूरे साल सरकारी स्कूलों में रौनक और जगमग क्यों ना रहे? अब तो हाईकोर्ट भी पूछ रहा है कि जर्जर भवन की हालत कैसे सुधारोगे?

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राजस्थान में दीपावली से पहले सरकारी स्कूलों को सजाने, रंग-रोगन और लाइटिंग से चमकाने का अभियान चलाया जा रहा है. शिक्षा विभाग का विद्यालय सौंदर्यीकरण एवं कायाकल्प अभियान बैनर के तहत प्रशासन जिलों में विज्ञापन, नोटिस और रंगीन तस्वीरें जारी कर रहा है, जिसमें हर स्कूल परिसर को त्योहार के रंग और रोशनी से जगमगाने की तैयारी का विवरण मिलता है. दीवाली जैसे त्योहार पर हमारे स्कूलों को जगमग करने की ये सोच अच्छी है. लेकिन सच्चाई यह है कि स्कूल भवनों की हालत, सुरक्षा, सुविधाओं और मरम्मत पर जब सिस्टम की असली परीक्षा आती है, तो आंकड़े और घटनाएँ सामने आते ही सरकारी मॉडल की पोल खुल जाती है.

हाल ही में स्कूल के जर्जर भवन के सुधार कार्य के मामले में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी आई कि काम सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि हकीकत में भी उतरने चाहिए. झालावाड़ हादसे में एक स्कूल भवन ढह गया और बच्चों की जान पर बन आई. उसके बाद हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सरकार से सख्त सवाल पूछा कि कागजों में मरम्मत-रंग-रोगन के काम की बजाय वास्तव में स्कूलों की सुरक्षा, भवन की मजबूती और आधारभूत सुविधाओं को प्राथमिकता मिले. अदालत ने रिपेयरिंग के काम की स्वतंत्र निरीक्षण एजेंसी से जांच की बात कही, साथ में सभी पक्षों को नाम सुझाने के निर्देश दिए. उच्च न्यायालय ने कहा कि जो बजट पांच लाख रुपये प्रति स्कूल तय किया गया है, उसमें महज रंग-रोगन ही हो सकता है; जबकि हजारों स्कूलों की छतें टूटी हैं, दीवारें कमजोर हैं, बच्चों की क्लास टीन शेड या अस्थायी ढांचे के नीचे चलती हैं.

ऐसा इसलिए, क्योंकि प्रदेश में करीब 1,21,000 सरकारी/मान्यता प्राप्त स्कूल हैं. इनमें शिक्षा विभाग और UDISE+ 2025 के आंकड़ों के अनुसार 7,800 स्कूल भवन जर्जर या असुरक्षित श्रेणी में हैं. 5,100 स्कूलों में आज भी शौचालय नहीं है. 3,300 स्कूलों में पक्की छत नहीं, जगह-जगह टीन शेड हैं. 18,000+ स्कूल ऐसे हैं, जहां कई कक्षाएं एक साथ पढ़ाई करती हैं या बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर अनुपस्थित है. सफाई, पानी, बिजली, डेस्क-बेंच, टॉयलेट जैसी सुविधाओं की स्थिति 20 फीसदी प्राथमिक-उच्च प्राथमिक स्कूलों में न्यूनतम स्तर पर है.

सत्र की शुरुआत होती है तो भवन की मरम्मत, छत की मजबूती, शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था अक्सर कागज पर या मॉडल फाइलों में रह जाती है. दीपावली पर सौंदर्यीकरण की सरकारी तस्वीरों में हल चल दिखती है, पर सैकड़ों-हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां रंग-रोगन सिर्फ उधार ली गई दीवारों तक ही सीमित है. बाकी जगह अंदरूनी जर्जर हालत, दीवारों में दरारें, बरसात में टपकता पानी, टूटे-फूटे गेट बच्चों की सुरक्षा रोज़ खतरे में रहती है.

हाईकोर्ट ने हाल में जो कहा, वो सोते सिस्टम पर करारा तमाचा है!

हाईकोर्ट पांच लाख रुपये प्रति स्कूल का बजट तय किया; क्या इससे ठोस मरम्मत हो पाएगी? लाखों रुपये सिर्फ रंग-सफेदी में चले जाते हैं, क्या जर्जर छत, दीवारें और आधारभूत कमियां इससे ठीक होंगी? महाधिवक्ता ने कहा कि जरूरत पड़ी तो बजट बढ़ाया जाएगा, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि मरम्मत-अवलोकन का काम स्वतंत्र एजेंसी से कराया जाए, न कि ठेकेदार-पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट के भरोसे.

सरकारी रिपोर्ट में दावा है कि सबसे जर्जर स्कूल भवनों में सुधार मार्च 2026 तक कर लिया जाएगा; बाकी में काम नवंबर 2026 तक. पर अदालत ने कहा रिपोर्ट सतही न हो, हर जिले, ब्लॉक और गांव के स्कूल की असली हालत का परीक्षण होना चाहिए. कोर्ट की निगरानी में सरकार को रोडमैप देना है कि कितनी संख्या में जर्जर स्कूल हैं, मरम्मत कब पूरी होगी, किस स्कूल में क्या-क्या समस्या है.

इस बीच सैकड़ों-हजारों बच्चों की पढ़ाई प्रतिदिन खतरे में है. एक तरफ सरकारी बजट की सीमाएं; दूसरी तरफ मेरिट, मॉनीटरिंग और बेसिक सुविधाओं की सच्चाई. सरकार प्रत्येक स्कूल को दीपावली पर सजाने की घोषणा कर ही है, लेकिन हजारों स्कूलों के बच्चे अभी भी टीन शेड, अस्थायी छत, बिना बाथरूम और बगैर पानी के रोज पढ़ाई कर रहे हैं. शिक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान के ग्रामीण प्राथमिक-उच्च प्राथमिक स्कूलों में लगभग 30% में लड़कियों/बालिकाओं के लिए अलग टॉयलेट नहीं है जिससे सुरक्षा, स्वास्थ्य और बच्चियों की शिक्षा पर सीधा असर है.

1 लाख से ज्यादा एकल स्कूल देश में सबसे बड़ा मजाक है, सरकारी स्कूलों की यह तस्वीर कब बदलेगी?

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देश की शिक्षा नीति की सबसे गहरी और खामोश चुनौती एकल शिक्षक स्कूलों की हकीकत है, जो ‘सबको शिक्षा’ के वादे का सबसे बड़ा मज़ाक बन चुकी है. शिक्षा मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 शैक्षणिक वर्ष में पूरे भारत में 1,04,125 स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक ही शिक्षक है, और इनमें 33,76,769 छात्र नामांकित हैं. यानी हर स्कूल में औसतन 34 छात्र हैं और उन पर सिर्फ एक शिक्षक की जिम्मेदारी है. सबसे ज्यादा ऐसे स्कूल आंध्र प्रदेश (12,912), उत्तर प्रदेश (9,508), झारखंड (9,172), महाराष्ट्र (8,152), कर्नाटक (7,349), मध्य प्रदेश और लक्षद्वीप (7,217-7,217), पश्चिम बंगाल (6,482), राजस्थान (6,117), छत्तीसगढ़ (5,973), तेलंगाना (5,001) में हैं. दिल्ली में ऐसे सिर्फ नौ स्कूल हैं, और कई केंद्र शासित प्रदेशों में एक भी नहीं.

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) 30:1 (कक्षा 1-5) और 35:1 (कक्षा 6-8) तय करता है. मगर भारत के लाखों दूरदराज़, ग्रामीण, आदिवासी और छोटे शहरों के स्कूलों में सिर्फ एक ही अध्यापक होता है, उस पर न सिर्फ पढ़ाई, बल्कि प्रशासन, मिड-डे मील, सर्वे, डाटा फीडिंग, स्कूल खुलाने-बंद करने, खेल आयोजनों और हर सरकारी आदेश को लागू करवाने की जिम्मेदारी भी डाल दी जाती है.

स्कूली बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़!

यह शिक्षा की गुणवत्ता, बच्चों की व्यावहारिक सामर्थ्य और बाकी सपनों पर सीधा हमला है. सवाल है, यह जड़ समस्या कैसे सिस्टम के हर हिस्से में घर कर गई? सबसे बड़ा कारण राज्य सरकारों का बजट में कटौती और शिक्षा को प्राथमिकता न देना है. अक्सर स्कूल खोले जाते हैं, लेकिन पद सृजित नहीं होते. भर्ती नहीं होती. कई जगह मान्यता सिर्फ कागज़ पर ही रहती है. ट्रांसफर पॉलिसी, शिक्षकों की नियुक्ति की जटिलता और ग्रामीण-सीमांत क्षेत्रों में पोस्टिंग को लेकर चुनावी/प्रशासनिक राजनीति, बेरोजगारी और अप्रशिक्षित स्टाफ का संकट भी बढ़ता है.

एकल शिक्षक स्कूलों का सीधा नुकसान यह है कि बच्चों के पास न विषय-विशेषज्ञता का विकल्प रहता है, न व्यक्तिगत मार्गदर्शन का मौका. एक ही शिक्षक सब विषय गणित, विज्ञान, हिंदी, सामाजिक विज्ञान, अंग्रेज़ी सब पढ़ाता है, लेकिन उसका काम महज बेसिक पढ़ाई या किताब के शब्द सुनाने तक सीमित रह जाता है. क्लास 1-5 के बच्चों का एक ही रूम में बैठना, सिर्फ बोर्ड बदलना मल्टीग्रेड टीचिंग का नाम तो है, पर हकीकत में ऐसे बच्चों की नींव कमजोर रह जाती है.

बच्चों की पढ़ाई का स्तर, अनुशासन, तर्क, सृजनात्मकता सब एकल विद्यालयों में कम होना तय है. ग्रामीण और सीमांत गाँवों में पढ़ाई, टीचर की अनुपस्थिति, छुट्टियों, मौसम या परेशानी पर क्लास बंद. कई जगह महीने में कुछ ही दिन नियमित पढ़ाई. ऐसे में शिक्षा का अधिकार, समावेशी शिक्षा, विशेष बच्चों, बालिकाओं, प्रवासी बच्चों के लिए किसी तरह की अतिरिक्त सुविधा या सलाह लगभग असंभव हो जाती है.

प्रभाव साफ दिखता है, जब देश के सबसे बड़े राज्यों में स्कूली ड्रोपआउट, पढ़ाई में पीछे रहना, और उच्च शिक्षा के लिए तैयार करने का माहौल कम हो जाता है. परीक्षा पास करना, अंकों के लिए काम करना या भर्ती का इंतजार करना एकल शिक्षक सिस्टम का मुख्य उद्देश्य बन जाता है. बच्चों पर मानसिक दबाव, सामाजिक व्यवहार का अभाव, शिक्षक के काम का बोझ, और पढ़ाई की गुणवत्ता में लगातार गिरावट ये देश के लाखों स्कूलों की सच्चाई है.

मानकों को लागू किया जाए तो रोजगार भी बढ़ेगा

अगर शिक्षा मंत्रालय के दिए गए PTR (30:1 या 35:1) अनुसार सभी स्कूलों में शिक्षकों की पूर्ण भर्ती हो तो सीधे तौर पर लाखों सरकारी नौकरियों का सृजन संभव है. एकल स्कूलों में तो कम से कम एक और शिक्षक तत्काल निर्धारित किया जाए, बाकियों में हर विषय के लिए अलग शिक्षक हो. इसपर काम हो तो देश की युवा बेरोजगारी बड़ी मात्रा में घट सकती है, और शिक्षा का आधार ही बदल जाएगा.

राजस्थान जैसे राज्यों में तो यह समस्या और गंभीर है. रेगिस्तानी, आदिवासी, सुदूर ग्राम पंचायत क्षेत्रों में बच्चे एक शिक्षक के सहारे पूरी पढ़ाई करते हैं. ट्रांसफर या अवकाश के मामले में स्कूल बंद पड़े रहते हैं. बालिका शिक्षा, समावेशी काउंसलिंग, तकनीक या डिजिटल शिक्षा सब हाशिये पर चली जाती है. एकल विद्यालयों की वजह से न केवल विद्यार्थी बल्कि समाज भी शिक्षा के अधिकार से वंचित रह जाता है.

सरकार, शिक्षा विभाग और नीति निर्माताओं को अब ध्यान देना चाहिए यह संकट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य के लिए खतरे की घंटी है. बजट, भर्ती और शिक्षा का नियमन सुधार कर हर स्कूल में क्वालिटी शिक्षा की गारंटी जरूरी है. बच्चों को सक्षम, जिम्मेदार और रचनात्मक नागरिक बनाने के लिए शिक्षकों की संख्या बढ़ाना, PTR का पालन और मल्टी-टीचर बहाली जरूरी है.

भारत की शिक्षा व्यवस्था का सबसे क्रिटिकल मोड़ यही है ‘सबको शिक्षा’ का सपना तभी पूरा होगा, जब हर बच्चे के पास पर्याप्त शिक्षक, बेहतर पढ़ाई, और पूर्ण अधिकार होंगे. एकल शिक्षक स्कूलों का संकट अब तंत्र और सरकार की प्राथमिक परीक्षा है.

आज के भारतीय शहरों की हालत देश की विकासगाथा पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है।

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बढ़ती आबादी, जाम, पानी की कमी, प्रदूषण, कचरे के ढेर और बेतरतीब विस्तार ने शहरी जीवन को असुरक्षित और अव्यवस्थित बना दिया है। यह केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि आर्थिक क्षति, सामाजिक असमानता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का कारण भी है। विश्व बैंक और अन्य संस्थानों के आकलन बताते हैं कि भारत को अगले दो दशकों में कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब ₹83–85 लाख करोड़) का निवेश अपने शहरों के पुनर्निर्माण और विस्तार के लिए चाहिए। यह केवल सड़कें या मेट्रो बनाने की बात नहीं है, बल्कि जलवायु-प्रतिरोधी, ऊर्जा-कुशल और नागरिक-केंद्रित शहरों की रचना का सवाल है। अनुमान है कि 2050 तक भारत की शहरी जनसंख्या लगभग दोगुनी होकर 950 मिलियन तक पहुँच जाएगी, यानी हमें अगले 25 वर्षों में लगभग 400–500 मिलियन नए शहरी निवासियों के लिए रहने, काम करने और आवागमन की व्यवस्था करनी होगी। यदि अभी बड़े पैमाने पर निवेश नहीं हुआ तो भविष्य में यह संकट आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय त्रासदी का रूप ले लेगा। देरी का मतलब है महंगे सुधार, असमानता में वृद्धि और जलवायु जोखिम का गहराना। 1 ट्रिलियन डॉलर का यह निवेश सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि बचाव और पुनरुत्थान दोनों है; यह रोज़गार सृजन, आर्थिक उत्पादकता, सार्वजनिक परिवहन, हरित अवसंरचना और किफायती आवास के जरिए आने वाले दशकों की स्थिरता का आधार बनेगा। स्थानीय निकायों के वित्तीय सुधार, भूमि उपयोग नीति, ग्रीन बॉन्ड, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और क्लाइमेट-रेज़िलिएंट डिजाइन को इस निवेश रणनीति में शामिल करना होगा। यह निवेश भारत की वृद्धि कहानी का सबसे निर्णायक अध्याय हो सकता है एक ऐसा अध्याय जो शहरों को भीड़ और अव्यवस्था से निकालकर उन्हें मानव गरिमा, अवसर और जीवन की गुणवत्ता का केंद्र बना दे। अब यह सवाल नहीं कि हम इसे वहन कर सकते हैं या नहीं; सवाल यह है कि क्या हम इसके बिना अपने भविष्य को वहन कर पाएंगे?

हम बदलते क्यों नहीं

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लगातार बदलती दुनिया और माहौल के बावजूद आप हमारे आस पास और ख़ास कर सरकार से जुड़े मसलों में बदलाव देखने को नहीं मिलता है। विशेषकर राजस्थान जैसे प्रदेश जिसमे मतदाता लगातार बदलाव करते पर उसके अनुरूप इसकी झलक प्रशासन-नीतियों में क़तई नहीं दिखती है। बदलाव के नाम पर कुछ ट्रांसफ़र डेपुटेशन और अस्थायी कर्मचारियों को हटा कर सरकारें बड़ा दम भरती है जबकि इससे धरातल पर कोई आमूलचूल परिवर्तन देखने को नहीं मिलता। हमें ज़रूरत है नीतिगत बदलावों व आम जीवन में सकारात्मक परिवर्तन दिखने की। साढ़े सात करोड़ जनसंख्या के प्रदेश में रोज़गार के नाम पर केवल कुछ दशमलव सरकारी नौकरी के अलावा कोई और चर्चा नहीं होती। हम नहीं बदल पा रहे क्योंकि बुनियादी रूप में हम उन सवालों से भाग रहे है जो आम राजस्थानी की प्रगति के लिए आवश्यक है। शहरी विकास से पर्यावरण तक और रोज़गार से दैनिक जीवन के सामान्य संघर्ष जैसे ट्रैफिक-सफ़ाई पर हम यथास्थिति को अंगीकार कर चुके है।

पर हमे बदलना चाहिए क्योंकि हमारे शहरों की आबोहवा लगातार बद से बदतर हो रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अनुसार राजस्थान के बड़े शहरों के साथ कस्बों में बढ़ा वायु प्रदूषण लगातार विकराल रूप ले रहा है। स्वच्छ वायु कार्यक्रम के बावजूद न केवल गैर-लक्ष्य प्राप्ति वाले शहरों में बल्कि राजस्थान के छोटे शहरों और कस्बों में भी वायु की गुणवत्ता खराब हो रही है। वायु गुणवत्ता में समयबद्ध सुधार के लिए उद्योग, वाहन और परिवहन, स्वच्छ ऊर्जा, अपशिष्ट प्रबंधन, निर्माण और हरियाली सहित प्रदूषण के सभी प्रमुख क्षेत्रों में प्रणालियों और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए राज्यव्यापी कार्रवाई की आवश्यकता है। बेरोज़गारी में देश में अव्वल स्थानों पर होने के बावजूद हमारे पास इससे पार पाने के लिए कोई कार्यायोजना नहीं है। हमारे ट्रैफिक यातायात दयनीय हालत में है हम नये सुसज्जित शहरों की बजाय सरकारी ज़मीन पर घालमेल के तरीक़ों से ज़मीन के पट्टों से वोट लेने तक सीमित हो चले हैं। आर्थिक उदारवादी दौर के बाद राजस्थान की राजनीति आज सबसे उदारवादी आकार में है जहाँ बिना पूर्वाग्रह के एक नए चेहरे के हाथ में प्रदेश की कमान है सुधार के लिए इससे बेहतर कोई संयोजन नहीं हो सकता है। हमे बदलना चाहिए क्योंकि दो दशक पूर्व आई सूचना प्रोद्योगिकी क्रांति में हम बेंगलूरू पुणे हैदराबाद मुंबई गुड़गाँव से पिछड़ चुके है, हमारे शहरों के खूबसूरत हैरिटेज वास्तुकला को सहेजने और आगे बढ़ाने में हम नाकामयाब रहे है। हमे बदलना चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया हमारे पुरातत्व-पर्यटन में काफ़ी सरोकार और संभावना देखती है। हमारी विविध संस्कृति भौगिलिकी स्थिति और स्थापत्य कला समन्वेषण की नई परिभाषा तय कर सकती है। हमारी परिधान संस्कृति और ब्लॉक प्रिंटिंग कला प्रेमियों में उत्तेजना पैदा करती है इसके संवर्द्धन के लिए हमे बदलना चाहिए। एक ऐसे नये कल के लिये जिसमें आशाओं का अम्बर संभावनाओं का सागर और सुनहरे भविष्य की संरचना हो के लिए हमें बदलना चाहिए।