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राजस्थान की अफसरशाही पर बड़ा सवाल! CAG रिपोर्ट में सामने आई आबकारी विभाग में गड़बड़ी की बात, राज्य को हुआ 195 करोड़ से ज्यादा का नुकसान

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अब CAG की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है. कर्जे के बोझ दबे राजस्थान में आबकारी विभाग में अनियमितता की बात सामने आई है. 31 मार्च 2022 तक की ऑडिट रिपोर्ट में ‘राज्य आबकारी शुल्क के आरोपण एवं संग्रहण’ पर ऑडिट की गई. राजस्थान राज्य आबकारी एवं मद्य निषेध नीति (नीति), 2020-21 के प्रावधानों के अनुपालन में पाई गई प्रमुख अनियमितताएं पाई गई हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश को 195.42 करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान हुआ है.

► जिला आबकारी अधिकारियों ने नीति के प्रावधानों का पालन नहीं किया, जिसके कारण देशी मदिरा और राजस्थान निर्मित मदिरा के कम उठाए गए मासिक गारंटी कोटे पर 23.88 करोड़ का राजस्व कलेक्शन कम हुआ.

► जिला आबकारी अधिकारियों द्वारा नीति के प्रावधानों का पालन न करने के कारण आबकारी शुल्क और मूल लाइसेंस शुल्क की अंतर राशि के 24.65 करोड़ का राजस्व कम संग्रहित हुआ. खुदरा और खुदरा लाइसेंसधारियों से IMFL और बीयर पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क की 72.88 करोड़ रुपये की अंतर राशि की वसूली नहीं हो पाई.

► जिला आबकारी अधिकारियों ने नीतिगत प्रावधानों को लागू नहीं किया और आबकारी आयुक्त के मौजूदा निर्देशों का पालन नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप आईएमएफएल और बीयर की कम उठाई गई मात्रा पर 15.25 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि की वसूली नहीं हो पाई.

► जिला आबकारी अधिकारियों द्वारा मौजूदा नियम/अधिसूचना का पालन न करने के परिणामस्वरूप रेस्टोरेंट बार लाइसेंसधारियों से 77.50 लाख रुपये के लाइसेंस शुल्क की कम वसूली हुई.

इधर, कर्ज के बोझ तले दब रहा राजस्थान

राजस्थान की वित्तीय स्थिति दबाव में है और वो भी इतनी की दैनिक खर्च के लिए भी कर्ज पर निर्भरता बढ़ गई है. इससे राज्य का राजकोषीय घाटा, कर्ज और ब्याज लागत निरंतर बढ़ रही है. CAG की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान उन 11 राज्यों में हैं (आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, केरल, मिजोरम, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल समेत), जिन्होंने अपने दैनिक खर्च को पूरा करने के लिए भी कर्ज का इस्तेमाल किया.राज्य को रोजमर्रा के खर्च के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है. वित्त वर्ष 2025-26 में राज्य को कुल व्यय (कर्ज चुकाने को छोड़कर) के लिए अनुमानित 3 लाख 79 हजार 617 करोड़ रुपए की जरूरत है, जबकि कर्ज की अदायगी के लिए 1 लाख 57 हजार 452 करोड़ रुपये अलग से खर्च किए जाएंगे.

कैग की चेतावनी को भी समझिए

यहीं नहीं, CAG रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि अगर राजस्थान और ऐसे राज्य अपनी राजकोषीय जिम्मेदारियों में सुधार नहीं करते हैं, तो भविष्य में वित्तीय संकट की स्थिति बन सकती. क्योंकि राज्य का पैसा तो कर्ज और उसका ब्याज चुकाने में ही जा रहा है. CAG की सलाह है कि सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन को बेहतर करना होगा.

आमदनी तो बढ़ी, लेकिन कर्ज भी

हालांकि राजस्थान की सालाना आय भी बढ़ रही है. 2025-26 के लिए राजस्थान की आमदनी (कर्ज को छोड़कर) अनुमानित 2,94,973 करोड़ रुपए है, जो पिछले साल के मुकाबले 12% ज्यादा है. लेकिन दिक्कत यह है कि कुल खर्च आमदनी से अधिक है, इसी के चलते वित्तीय घाटा अधिक रहता है. 2025-26 के लिए यह घाटा 31 हजार 9 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है. जबकि राज्य का राजकोषीय घाटा 2025-26 में 4.3% GSDP (रू. 84,644 करोड़) अनुमानित है, जो केंद्र सरकार की 3% सीमा से अधिक है. गैर-विकास मदों में कर्ज पर ब्याज अदायगी साल-दर-साल बढ़ रही है. 2025 में यह राशि पिछले साल के मुकाबले 15 फीसदी ज्यादा यानी 2 लाख 70 हजार 457 करोड़ रुपए रही.

बांसवाड़ा न्यूक्लियर पावर प्लांट के विरोध में देर रात 1 बजे तक धरने पर बैठे रहे आदिवासी, 2800 MW में से 1400 MW बिजली राजस्थान को मिलेगी

बांसवाड़ा में प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट का शिलान्यास करने कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आएंगे. इस योजना की रूपरेखा तैयार होने के करीब 14 साल से भी ज्यादा वक्त के बाद अब इसकी नींव पड़ रही है. हालांकि इस परियोजना को काफी विरोध झेलना पड़ा और कई साल से जारी उथल-पुथल अभी भी मची हुई है. आदिवासी परिवारों का धरना कल देर रात 1 बजे तक जिला मुख्यालय पर जारी रहा और प्रशासन की लिखित सहमति के बाद लोग आखिरकार मान गए.  साल 2011 में जब परमाणु संयंत्र के लिए भूमि अधिग्रहण का ऐलान हुआ तो स्थानीय भील आदिवासियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. उन्हें डर था- परियोजना से उनकी आजीविका, संस्कृति और पर्यावरण पर गहरा असर पड़ेगा. ग्रामीणों ने ‘आदिवासी किसान संघर्ष समिति’ का गठन किया, बैनरों के साथ धरना-प्रदर्शन, रैलियां, बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक, बंद और आमरण अनशन तक किया गया. कांग्रेस विधायक अर्जुनलाल बामनिया को बंधक बनाने का मामला भी सामने आया और फिर सरपंच की गिरफ्तारी से लेकर अदालती कार्रवाइयां तक, यह आंदोलन लगातार सुर्खियों में रहा. विरोध सिर्फ सांकेतिक नहीं था- महीनों तक लाइन में लगकर लोग अपनी जमीन, कुएं और पेड़ के बदले मुआवजे के लिए संघर्ष करते रहे. अवार्ड की सूचियों में ऐसे-ऐसे नाम निकल आए, जिनका ना कोई स्थानीय मकान था, ना ज़मीन. प्रशासन ने दावा किया कि करोड़ों रुपये का मुआवजा बांटा जा चुका है, जबकि आदिवासी समुदाय का आरोप था कि न तो सभी को सही पैकेज मिला और न ही पुनर्वास में स्कूल, हॉस्पिटल, आंगनबाड़ी की सुविधा पूरी हुई. बार-बार विस्थापन, सूचना की कमी और पुनर्वास में देरी ने आक्रोश को और भड़काया. बांसवाड़ा न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ी इस टाइमलाइन पर नजर डालिए 2011: परमाणु बिजलीघर के लिए बांसवाड़ा जिले में पहली बार भूमि अधिग्रहण का ऐलान हुआ.  2012: 1 जुलाई को प्लांट विरोध कर रहे ग्रामीणों ने विधायक अर्जुन सिंह बामनिया को कटुम्बी में बंधक बना लिया. 2013: 12 मई को आमरण अनशन और अनिश्चितकालीन धरना, जो सात दिनों तक जारी रहा.  2024: सरकारी वित्तीय स्वीकृति मिलने के बाद पुनर्वास की प्रक्रिया तेज करने का दावा. मार्च 2026 तक पुनर्वास का काम पूरा करने की योजना बनाई गई है.  सितंबर 2025: 23 सितंबर को शिलान्यास से दो दिन पहले विस्थापितों, आदिवासी प्रतिनिधियों और सांसद राजकुमार रोत के नेतृत्व में जिला कलेक्ट्रेट में धरना-प्रदर्शन. 25 सितंबर 2025: पावर प्लांट का शिलान्यास होगा. दिसंबर 2026: कंक्रीट ढांचे का निर्माण दिसंबर 2026 से शुरू होगा. 2033: करीब साढ़े छह साल बाद पहली यूनिट से बिजली उत्पादन की संभावना. देश के परमाणु ऊर्जा लक्ष्य में यह एक अहम हिस्सा बनेगा. 2036: परियोजना के अंतिम चरण में बांसवाड़ा से 2800 मेगावाट और राजस्थान में कुल परमाणु बिजली उत्पादन 5900 मेगावाट तक पहुंचने का अनुमान. अगले साल से शुरू होगी पुनर्वास की प्रक्रिया केंद्र सरकार की ओर से वित्तीय स्वीकृति मिलने के बाद मार्च 2026 से पुनर्वास प्रक्रिया को पूरा करने का प्लान है. जमीन अवाप्ति, कब्जा और साइट के मिट्टी परीक्षण समेत कई प्रक्रियाओं में देरी होने के बाद अब सरकार दावा कर रही है कि दिसंबर 2026 से रिएक्टरों के लिए अहम कंक्रीट ढांचे का निर्माण शुरू हो जाएगा. इसके साढ़े छह साल बाद यानी 2033 में पहली यूनिट से बिजली उत्पादन प्रारंभ करने की संभावना है. क्योंकि यह पूरा निर्माण कई अहम चरणों से से होकर गुजरेगा. जैसे भूमि पर शुरुआती कार्य (लेवलिंग, खुदाई), रिएक्टर भवन, टरबाइन हॉल, सुरक्षा बंकर का निर्माण, संयंत्र उपकरणों की स्थापना, परीक्षण, सिस्टम इंटीग्रेशन-ट्रायल रन, सुरक्षा निरीक्षण, आपात योजना, परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की अंतिम मंजूरी, बिजली उत्पादन और यूनीट को ग्रिड से जोड़ना.  2036 तक पूरी होगी परियोजना  राजस्थान के रावतभाटा स्टेशन के बाद यह प्लांट, 700-700 मेगावाट की चार यूनिट में कुल 2800 मेगावाट क्षमता के साथ, देश में आठवीं सबसे बड़ी परमाणु परियोजना बनेगा. 2036 तक पूरी परियोजना के चालू होने पर राजस्थान में न्यूक्लियर बिजली उत्पादन 5900 मेगावाट पहुंच जाएगा, जिससे राज्य की ऊर्जा जरूरतें आसानी से पूरी होंगी. साथ ही, नए सड़क, परिवहन और कर्मचारियों के प्रशिक्षण में आधारभूत ढांचे का उल्लेखनीय विकास होगा. एक तस्वीर यह भी: वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर देश का नया केंद्र अमेरिका,फ्रांस की तर्ज पर भारत भी परमाणु ऊर्जा में आगे बढ़ रहा है. बांसवाड़ा परियोजना भारत के 2031 तक 22,480 मेगावाट क्षमता के लक्ष्य की दिशा में निर्णायक भूमिका निभाएगी

बांसवाड़ा में पीएम मोदी के सभा स्थल तक पहुंचने के लिए 1.27 किमी गेमन पुल ही एकमात्र रास्ता, इसकी सेहत पर कई बार उठ चुके हैं सवाल

वागड़ का अहमदाबाद- दाहोद जैसे 5 अहम शहरों से सीधा जुड़ाव, हालात यह कि एक फोर लेन सड़क भी नहीं

आज बांसवाड़ा में देश की आठवीं परमाणु विद्युत परियोजना का शिलान्यास होगा. इससे राजस्थान की कुल बिजली जरूरत का 20 फीसदी उत्पादन का रास्ता साफ होगा. पानी, बिजली के साथ यह क्षेत्र मैंगनीज अयस्क, डोलोमाइट, चूना पत्थर, तांबा, क्वार्टजाइट जैसे खनिजों का भंडार है. इसमें एक चमक अब सोने की भी जुड़ने वाली है, जो देश के कुल सोने की आपूर्ति का 25% तक योगदान कर सकता है. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और झारखंड के बाद बांसवाड़ा चौथा क्षेत्र होगा, जहां सोने का खनन होगा. करीब 113.52 मिलियन टन स्वर्ण अयस्क के आंकलन के साथ देश को बड़ा भंडार मिलने का अनुमान है.

इन तमाम प्राकृतिक उपहारों के बावजूद यह इलाका आजादी के 78 साल बाद भी उपेक्षा का शिकार है. प्रधानमंत्री की सभा स्थल पर 1 लाख से ज्यादा लोग बांसवाड़ा जिले के नापला (छोटीसरवन) आएंगे. इस जगह तक जाने के लिए गेमन पुल ही एकमात्र रास्ता है. बांसवाड़ा-रतलाम रोड पर स्थित माही नदी पर बने इस 1.27 किलोमीटर पुल की सेहत पर भी कई बार सवाल खड़े हो चुके हैं. इसकी आयु बढ़ाने के लिए कई तरह की मशक्कत की जा रही है. बूढ़े होते इस पुल की मजबूती में कुछ कमी आने की स्थिति में ‘मास्टिक’ का काम किया गया, ताकि इसकी आयु करीब 10 से 15 साल और बढ़ जाए. इसके सभी 27 स्पान के क्षतिग्रस्त हुए हिस्सों की मरम्मत का प्लान भी साल 2017 में बनाया गया था.

वहीं, हवाई या रेल कनेक्टिविटी की बात छोड़िए, एक ऐसा जिला है जहां एक भी फोर-लेन नहीं है. जबकि बांसवाड़ा का नजदीकी 5 बड़े शहरों से सीधा जुड़ाव है. बावजूद इसके बांसवाड़ा से रतलाम, अहमदाबाद, उदयपुर, निम्बाहेड़ा और दाहोद तक जाने के लिए सिर्फ टू लेन है.

दिल्ली- मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से गुजरता तो 90 किमी से ज्यादा की दूरी होती कम

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे को लेकर पहले खबर आई कि यह बांसवाड़ा से गुजरेगा लेकिन इस मामले में भी निराशा हाथ लगी. यह एक्सप्रेसवे रतलाम जिले से 91 किलोमीटर की दूरी तक गुजरता है और जिले के लगभग 87 गांवों को कवर करता है. झाबुआ से तलावड़ा, महूड़ी का माल होते हुए सैलाना, रतलाम जिले में प्रवेश करता है. एक अनुमान के मुताबिक, अगर दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से होकर बनाया जाता तो कुल दूरी में लगभग 60-70 किलोमीटर की बचत होती. वर्तमान में यह एक्सप्रेसवे राजस्थान के कोटा, चित्तौड़गढ़, रतलाम होते हुए गुजरता है, जबकि बांसवाड़ा मार्ग भौगोलिक रूप से छोटा व सीधा पड़ता है और इससे गुजरात का प्रवेश क्षेत्र भी जल्दी आता. इससे ईंधन, समय, दोनों की और बचत होती, और राजस्थान के दक्षिणी यानी आदिवासी क्षेत्र को भी बड़ा आर्थिक फायदा मिलता.

परमाणु परियोजना को भी करना पड़ा लंबा इंतजार

आज से 13 साल पहले 3 जून 2011 के दिन डूंगरपुर-रतलाम वाया बांसवाड़ा रेलवे परियोजना का शिलान्यास हुआ था. तत्कालीन गहलोत सरकार के दौरान यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शिलान्यास किया था. योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से 200 करोड़ रुपए भी दे दिए गए थे, लेकिन यह परियोजना कई वजहों से ठंडे बस्ते में चली गई, जिसके बाद से ही यहा रेलवे परियोजना का काम ठप्प हो चला हा है. जिला मुख्यालय पर उप मुख्य अभियंता कार्यालय भी बंद हो गया.

बिजली चोरी का समर्थन किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है, लेकिन केवल उपभोक्ताओं पर उंगली उठाना संकीर्ण सोच है, क्योंकि ऊर्जा उपभोग किसी देश की आर्थिक प्रगति का बुनियादी पैमाना होता है। भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक बिजली खपत लगभग 1327 यूनिट है जबकि वैश्विक औसत 3700 यूनिट से अधिक

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ऐसे परिदृश्य में अखबारों द्वारा किसी इलाके में उपभोक्ताओं के बिल न चुकाने या चोरी की घटनाओं को बड़े मुद्दे की तरह उछालना वास्तविक तस्वीर का छोटा हिस्सा मात्र है। असल समस्या यह है कि उत्पादन से लेकर वितरण तक हर स्तर पर किस प्रकार वित्तीय हानि और संगठित चोरी हो रही है, इसका खुलासा शायद ही कभी होता है। राजस्थान सहित कई राज्यों की बिजली कंपनियों पर आज 1,60,000 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज़ है। कुछ साल पहले “चेंज इन लॉ” के नाम पर एक निजी कंपनी को केवल ब्याज की मद में 6000 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया गया, लेकिन अखबार खामोश रहे। बाड़मेर की लिग्नाइट परियोजना के कारण उपभोक्ताओं पर 12,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ डाला गया, और इसके आकलन के लिए कंपनी दस्तावेज़ तक उपलब्ध नहीं करा रही, मगर कहीं सुर्ख़ी नहीं बनती। हाल ही में 3200 मेगावाट बिजली की अनावश्यक खरीद के टेंडर पर भी मीडिया सन्नाटे में है, जबकि यह दीर्घकालिक वित्तीय बोझ उपभोक्ताओं की जेब से ही वसूला जाएगा। दूसरी तरफ भारत में ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लॉस 16–18% है जबकि विकसित देशों में यह केवल 5–7% है, राजस्थान जैसे राज्यों में तो यह आँकड़ा 20% तक पहुँच जाता है। इन बड़े सवालों पर अखबारों और मीडिया की चुप्पी उल्लेखनीय है, जबकि मोहल्ले स्तर पर बिजली चोरी की छोटी घटनाओं को लगातार उछाला जाता है ताकि यह धारणा बने कि असली समस्या आम जनता में है। जनप्रतिनिधि भी इस नैरेटिव का प्रतिकार नहीं करते क्योंकि बिल न चुकाने या चोरी से जुड़ी खबरें उन्हें अपने मतदाताओं के बीच संरक्षक की छवि देती हैं। इधर उपभोक्ता पेट्रोल और डीज़ल जैसे उत्पादों पर लागत से दोगुना टैक्स चुका रहा है जहाँ पेट्रोल की आधार कीमत 35–40 रुपए प्रति लीटर है और उपभोक्ता 100 रुपए से अधिक में भुगतान करता है इसी मानसिकता के चलते बिजली कंपनियाँ हर साल नए-नए फ्यूल सरचार्ज, फिक्स्ड कॉस्ट और वेरिएबल चार्ज जोड़कर जनता पर बोझ डालती जा रही हैं। स्मार्ट मीटर जैसे प्रयोग भी उपभोक्ता के स्तर पर उसी के द्वारा लागत-भुगतान मॉडल पर किए जा रहे है जबकि ग्रिड से लेकर पॉवर प्लांट तक सब खस्ताहाल पड़े है। और नियामक आयोग राजनीतिक कठपुतली बनकर केवल मुहर लगाने का काम कर रहे हैं। नतीजा यह है कि असली चोरी पर परदा डाल दिया जाता है, कॉर्पोरेट स्तर की गड़बड़ियाँ और नीतिगत विसंगतियाँ छुपा दी जाती हैं, और चोरी का ठप्पा आम जनता के माथे पर मढ़ दिया जाता है।

पिछले दिनों राजस्थान में 50 हजार से अधिक पदों पर चपरासी भर्ती परीक्षा हुई, जिसमें सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे लगभग हर अभ्यर्थी ने हिस्सा लिया। बड़ी खबर यह रही कि इसमें पीएचडी धारकों की भी बड़ी संख्या शामिल हुई। रिसर्च और इनोवेशन करने वाले ये युवा भी अब सरकारी नौकरी तलाश रहे

राजस्थान के विश्वविद्यालयों में पीएचडी शोधार्थियों की स्थिति पर CAP राजस्थान के हालिया सर्वे ने उच्च शिक्षा तंत्र की वास्तविकता उजागर की। इसमें यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान, जयपुर; महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय (MSBU), भरतपुर; पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय (PDSU), सीकर; मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (MLSU), उदयपुर; और बनस्थली विद्यापीठ, टोंक शामिल हैं।

राज्य में शोध और अकादमिक प्रशिक्षण में गंभीर खामियाँ हैं। पीएचडी अब शोधार्थियों के लिए करियर, आर्थिक संघर्ष और मानसिक दबाव का प्रतीक बन गया है। सर्वे में 48% से अधिक शोधार्थी पीएचडी को नौकरी व सामाजिक प्रतिष्ठा के साधन के रूप में देखते हैं, जबकि रिसर्च उनकी प्राथमिकता से पीछे है।

पीएचडी गाइड के साथ संबंधों पर 62% शोधार्थी संतुष्ट थे, 17.5% असंतुष्ट और बाकी मिश्रित। कुछ विश्वविद्यालयों में पर्यवेक्षक शोध को दिशा देते हैं, लेकिन कई जगह यह औपचारिकता बन जाता है, जिससे देरी, मनोबल गिरावट और अधूरे शोध होते हैं।

शोध सुविधाओं में भी निराशा है: 79% शोधार्थी अपनी यूनिवर्सिटी से पीएचडी न करने की सलाह देते हैं। MSBU, भरतपुर के 61% ऐसा ही कहते हैं। पुस्तकालय में सामग्री की कमी, पत्रिकाओं-डेटाबेस का अभाव और सेमिनारों की अनुपलब्धता प्रमुख कारण हैं, जिससे शोधार्थी बाहरी संसाधनों पर निर्भर होकर समय-धन बर्बाद करते हैं।

आर्थिक सहायता में भी चुनौतियाँ: 48% को UGC/CSIR से मदद मिलती है, 8% को राज्य/विश्वविद्यालय से, जबकि 43% को कोई सहायता नहीं। छात्रवृत्ति व संसाधनों की कमी से कई पार्ट-टाइम नौकरियाँ करने को मजबूर हैं।

जब दुनिया नवाचारों व रिसर्च में निवेश कर रही है, वहीं हमारे संस्थानों के रिसर्च विभाग बद से बदतर हो रहे हैं। यह दिशाहीनता है, जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है।

RPSC की राजनीति विज्ञान व्याख्याता भर्ती परिणाम का एक ही रिजल्ट है- कोचिंग सिस्टम को बढ़ावा, सामाजिक न्याय पर चोट और मेहनतकश विद्यार्थियों के साथ धोखा?

“RPSC एक गूंगी-बहरी संस्था बन गई है, जिसे प्रदेश की युवाओं की कोई चिंता नहीं है…”

आरपीएससी पेपर लीक के संदर्भ में राजस्थान हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सार्वभौमिक सी लगती है. मामला चाहे जो हो, हर संदर्भ में यह बात सही लगती है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग की व्यवस्था युवाओं के साथ खिलवाड़ करने के लिए ही है. हाल का मामला ही देखिए, जब RPSC की राजनीति विज्ञान व्याख्याता भर्ती परिणाम में 45,674 अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी, लेकिन 225 पदों के लिए पास हुए- महज 6 कैंडिडेट! परिणाम घोषित होने के बाद युवा हैरान हैं. दरअसल, 16 सितंबर 2025 को नियमों में बदलाव किया गया था. इसके अनुसार, परीक्षा में 200 अंक (इंटरव्यू के मार्क्स हटाकर) में से 80 अंक से कम हासिल करने वाले अभ्यर्थियों का चयन नहीं किया जाएगा.

सोचिए, परीक्षा के इंतज़ाम में सरकारी मशीनरी सहित लाखों करोड़ों रुपयों को स्वाहा कर दिया गया और 225 पदों पर योग्य अभ्यर्थी भी नहीं मिले. ऐसा भी नहीं है कि इस परीक्षा में बैठे अभ्यर्थियों की योग्यता पर सवाल हो. सैकड़ों नेट एग्जाम क्वालीफाई, कई JRF समेत हजारों अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पेपर सेटर्स को इस बात का अंदाजा होता है कि जिस प्रश्न पत्र को तैयार किया जा रहा है, उसे कितने अभ्यर्थी पास कर पाएंगे या यूं कहिए कि उसके अनुसार आयोग की भर्ती परीक्षा के सभी पद भर पाएंगे या नहीं. क्योंकि पेपर सेटिंग के पैरामीटर्स के तहत 30% सरल, 40% मध्यम और 30% कठिन प्रश्नों का संतुलित अनुपात होता है. पेपर में अवधारणात्मक समझ और विश्लेषणात्मक क्षमता वाले प्रश्नों का संतुलित समावेश के साथ तथ्यात्मक प्रश्नों की अधिकतम सीमा का निर्धारण होता हैं. राजनीति विज्ञान व्याख्याता भर्ती परीक्षा के प्रश्न पत्र में इसका अभाव दिखा. इससे राजस्थान के उन हजार अभ्यर्थियों का मेहनत और उनके पीछे आस लगाए बैठे उनके गरीब परिवारों को।भी झटका लगा.

ऐसा पहली बार भी नहीं हुआ….

हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब इस तरह का विवाद सामने आया हो. 8 अप्रैल को RPSC की जारी लाइब्रेरियन ग्रेड-II के परिणाम में भी TSP क्षेत्र के लिए निर्धारित 45 पदों में से 21 पद खाली रह गए थे. तब भी सिर्फ 24 अभ्यर्थी ही क्वालीफाई कर पाए हैं. तब भी मिनिमम पासिंग मार्क्स के नियम के मुताबिक, दोनों पेपर में अलग-अलग 40% अंक लाना अनिवार्य किया गया था. अगर एक पेपर में भी 40% से कम अंक आते हैं तो चाहे दूसरे पेपर में कितने ही अधिक अंक क्यों न हो उसे क्वालीफाई नहीं माना जाता है. TSP क्षेत्र के अधिकतर अभ्यर्थी दोनों पेपर में 40% अंक नहीं ला पाए और इस वजह से सिर्फ 24 अभ्यर्थी ही क्वालीफाई कर पाए हैं.

परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल….!

  • क्या राजस्थान में राजनीति विज्ञान में महज 1 ही फीसदी योग्य अभ्यर्थी हैं? और 99 फीसदी अयोग्य, जो एक परीक्षा में 40 फीसदी अंक भी ला सकते. अगर ऐसा है तो यह राजस्थान की कॉलेज शिक्षा की गुणवत्ता पर ही सवाल है, जो राज्य की भर्ती परीक्षा के लिए भी छात्रों को योग्य नहीं बना पाई.
  • RPSC की इस परीक्षा में संभवतः देश के मामी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी परीक्षा दी, जिसमें केंद्रीय विश्वविद्यालय के भी कई विद्यार्थी शमिल हैं. क्या यह उनकी योग्यता पर भी सवाल है?
  • क्या इस तरह के कठिन पेपर सेट करके कोचिंग व्यवस्था को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा, ताकि एक आम छात्र सेल्फ स्टडी के बूटे परीक्षा पास ही ना कर पाए?
  • क्या इस तरह के पैमाने के बाद आरक्षण- व्यवस्था के साथ न्याय हो पाएगा? सवाल तो यह भी उठ रहे हैं कि इस तरह की परीक्षा प्रणाली सामाजिक न्याय की अवधारणा पर चोट है.

तो फिर उपाय क्या है?

  • पेपर के स्तर और नियमावली को ध्यान में रखते हुए पेपर सेटर को संतुलन बनाना होगा.
  • प्रश्न पत्र तैयार करते वक्त परीक्षा का निर्धारित समय भी ध्यान रखा जाए.
  • विश्वविद्यालय स्तर की किताबों के आधार पर पेपर तैयार हो, ना कि किसी एक गाइड या कोचिंग सेंटर के मॉक टेस्ट के पैटर्न के आधार पर.
  • मिनिमम मार्क्स के नियमों पर फिर से मंथन करने की आवश्यकता है.

हर राज्य में युवाओं का एक जैसा ख्वाब और भर्ती परीक्षा में एक जैसी गड़बड़ी- यह सबकुछ परीक्षा एजेंसियों की बेकाबू सत्ता का नतीजा है

“घटिया सिस्टम में परीक्षार्थी फंसे— ब्लैकलिस्टेड कंपनियों को मिल रहा परीक्षा कराने का ठेका  पिछले 5 वर्षों में देशभर में पेपर लीक से जुड़े कम से कम 48 बड़े मामले, सीधे 1.4 करोड़ से अधिक अभ्यर्थी प्रभावित हाल ही में हुए SSC परीक्षा के विरोध प्रदर्शनों के बाद एक परीक्षा संचालित करने वाली एजेंसी सवालों के घेरे में हैं. अब एसएससी परीक्षा के अभ्यर्थियों का विरोध मुख्य रूप से SSC Phase 13 परीक्षा में हुई तकनीकी गड़बड़ियों, सर्वर डाउन होने, परीक्षा रद्द होने, परीक्षा केंद्रों के गलत आवंटन, खराब प्रबंधन और परीक्षा कराने वाली नई कंपनी Eduquity की अक्षमता के कारण सामने आया. एडुक्विटी का नाम कई बार पेपर लीक और धोखाधड़ी के मामलों से जुड़ा है और यह पहली एजेंसी भी नहीं है, जिसके खिलाफ लामबंदी हुई हो या जिस पर आरोप लगे हो. पिछले 5 वर्षों में देशभर में पेपर लीक से जुड़े कम-से-कम 48 बड़े मामले सामने आए हैं, जिनमें 1.4 करोड़ से अधिक अभ्यर्थी प्रभावित हुए. इन मामलों में मुख्य भूमिका जिन कंपनियों की रही, उनमें एडुक्विटी (Eduquity), एप्टेक (Aptech), सातवत इन्फोसोल (Satvat Infosol), एडुटेस्ट (Edutest) और एनएसईआईटी (NSEIT) जैसी एजेंसियां शामिल हैं. इनका सार्वजनिक चेहरा “परीक्षा संचालन में विशेषज्ञता, कॉर्पोरेट अनुभव, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर” के रूप में पेश होता है. लेकिन, इनका दूसरा चेहरा बार-बार घोटाले, पेपर लीक, कोर्ट में केस, और ब्लैकलिस्टिंग से सना मिलता है. इन कंपनियों का इतिहास भी विवादों से भरा रहा. इन कंपनियों का कई राज्यों में जुड़ा विवाद – एडुक्विटी बताती है कि उसने 10 करोड़ अभ्यर्थियों का मूल्यांकन किया, 25 साल की विरासत है, सरकारी-शैक्षणिक-प्राइवेट हर क्षेत्र में ग्राहक हैं. लेकिन 2020 में केंद्र के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ ट्रेनिंग ने इसे ब्लैकलिस्ट किया. इसके बावजूद, एडुक्विटी को SSC, व्यापमं (मप्र), NTA, महाराष्ट्र CET, राजस्थान समेत कई राज्यों में रोक के बावजूद भी ठेके मिलते रहे. – MP-TET पेपर लीक (2022): परीक्षा कॉन्ट्रैक्ट के बाद एडुक्विटी ने राजस्थान की साईं एजुकेयर को ठेका दे दिया. प्रश्न-पत्र सोशल मीडिया पर वायरल; राज्य में भारी विरोध, इसे ‘व्यापमं-3’ कहा गया. – पटवारी परीक्षा (MP 2023): फिर एडुक्विटी के पास कॉन्ट्रैक्ट गया. इस बार भी ग्वालियर के एक कॉलेज से टॉपरों का क्लस्टर, बड़ी हेराफेरी, मुख्यमंत्री को भर्ती रोकनी पड़ी. – महाराष्ट्र MBA CET (2024): एडुक्विटी, उसी इतिहास के साथ, एमबीए परीक्षा में लीक की शिकायतों पर बॉम्बे हाईकोर्ट में पीआईएल भी दायर हुईं. – इसके अलावा ptech, Satvat Infosol, Edutest और NSEIT, ये सभी कंपनियां यूपी, राजस्थान, हरियाणा में ब्लैकलिस्ट हुई. फिर भी 2023 में केन्द्रीय विश्वविद्यालय की तीनों परीक्षाएं इन्हीं के जिम्मे; सारे पेपर लीक. रेलवे भर्ती, जल निगम भर्ती, पुलिस भर्ती—हर जगह इनका नाम विवादों में रहा. – सातवत इन्फोसोल के खिलाफ तो CBI ने FIR दर्ज की, रक्षा मंत्रालय की परीक्षा में धोखाधड़ी का आरोप; रेलवे, ONGC तक ने ब्लैकलिस्ट कर दिया, लेकिन दूसरी परीक्षाओं में ठेके जारी रहे. खराब रिकॉर्ड की फेहरिस्त लंबी, फिर भी ठेके क्यों? जब इस सवाल को पूछा जाता है तो सरकारी सिस्टम के पास शायद यही तर्क होता है कि टेक्निकल स्कोर अच्छा है, या अनुभव है. लेकिन हकीकत यह है कि iइन कंपनियों को आउटसोर्सिंग या सब-कॉन्ट्रैक्ट की आड़ में, कमजोर मॉनिटरिंग, और राजनीतिक संरक्षण का गठजोड़ का फायदा मिलता रहा है. कई बार परीक्षा एजेंसी ने जो परीक्षा आयोजन का ठेका लिया, उसे कमीशन पर दूसरी क्षेत्रीय कंपनी को बेच दिया. उदाहरण के लिए, व्यापमं घोटाले के दौरान विवादों में रही जिस कंपनी को एग्जाम का कांट्रैक्ट मिला है, उसे तो केंद्र सरकार ने इस काम के योग्य भी नहीं माना है. बेंगलुरू की इस कंपनी को PEB ने ऑनलाइन परीक्षा कराने का काम सशर्त सौंपा. पीईबी ने एजेंसी को परीक्षा के लिए एग्जाम सेंटर से बुकिंग लेकर परीक्षा कराने तक का काम खुद ही करने की शर्त रखी थी, लेकिन एडुक्विटी ने वर्क ऑर्डर की शर्तों को दरकिनार कर काम राजस्थान के जयपुर से संचालित साईं एजुकेयर को दे दिया. मिनिस्ट्री ऑफ स्किल डेवलपमेंट के डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ ट्रेनिंग (डीजीटी) ने एडुक्विटी कॅरियर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड बेंगलुरू को ऑनलाइन एग्जाम के लिए अपात्र घोषित किया है.

पूब की पहरेदारी’ और किरोड़ी लाल मीणा बनाम नरेश मीणा की लड़ाई में सचिन पायलट की इतनी चर्चा के मायने क्या हैं ?

किरोड़ी लाल मीणा का पूरा राजनीति करियर नरेश मीणा की आज की सियासी स्टाइल का अक्स दिखेगा। पूर्वी राजस्थान में इस तर्ज़ की सियासत की शुरुआत किरोड़ी लाल मीणा ने ही की थी। जब तक वो अपने चरम पर थे, तब तक उनके समानांतर कोई नेता इस अंदाज़ का अपना नहीं पाया। कुछ ने कोशिश भी की, लेकिन वो सीमित दायरे में ही सिमट कर रह गए।

लेकिन इस ज़िद, भिड़ंत, साम-दाम-दंड की राजनीति का हासिल क्या है? इसका जवाब ढूँढने पर यह मिला कि इसका सबसे बड़ा हासिल है ‘जनाधार की आत्मनिर्भरता’। यह जनाधार किसी विचारधारा और पार्टी से बिल्कुल अलग एक नेता की छवि से गढ़ा जाता है। जिसे इन दिनों राजनीतिक भाषा में ‘संघर्ष’ कहा जाता है। राजस्थान की सियासत की बड़ी संस्था प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसे ‘रगड़ाई’ का नाम देते हैं।

नरेश मीणा, किरोड़ी लाल मीणा के शिष्य रहे हैं और उनकी ‘विरासत’ को लगभग छीनने की कोशिश कर रहे हैं, बिल्कुल उन्हीं की स्टाइल में। मीणा समुदाय को हमेशा एक मज़बूत और वोकल नेता की ज़रूरत रही है, जो प्रदेश की हर सीट पर अपना दबदबा क़ायम रखने का माद्दा रखता हो। जो चाहे कुछ करे ना करे, लेकिन उसमें ‘भिड़’ जाने की क़ुव्वत हो।

इन दिनों सोशल मीडिया पर सचिन पायलट के नरेश मीणा का साथ ना देने की बहस जारी है। लेकिन यह बहस बिल्कुल ऊपरी है।15 दिन तक आमरण अनशन पर बैठे नरेश मीणा से मिलने पायलट क्यों नहीं गए? इसकी पायलट के पास राजनीतिक मजबूरी भी है, उसका ज़िक्र आगे, लेकिन एक और वजह पूर्वी राजस्थान में एक और किरोड़ी के पैदा होने का डर भी है।

यह लड़ाई सीधे-सीधे किरोड़ी लाल मीणा बनाम नरेश मीणा है। समरावता में उपचुनाव के बाद हुई हिंसा के बाद किरोड़ी लाल मीणा वहां पहुंचे थे। उसके बाद वो नरेश मीणा से मिलने जेल भी गए। किरोड़ी पर ‘समाज’ का भारी दबाव था। अपने ही समाज में ज़मीन खिसकने की चिंता थी। इसके बावजूद नरेश मीणा के समर्थक किरोड़ी लाल मीणा पर ‘वादाखिलाफ़ी’ करने का आरोप लगाते रहे हैं। वो कहते रहे हैं ‘किरोड़ी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, उनकी कथनी और करनी में अंतर है।’ डूंगरी बांध मामले में भी लोग किरोड़ी पर सरकार के साथ काम करने का आरोप लगा रहे हैं। डूंगरी बांध प्रभावित लोगों में से सबसे ज़्यादा मीणा और गुर्जर समुदाय के लोग हैं। किरोड़ी लाल मीणा के सामने बड़ी दुविधा है कि वो सरकार के साथ रहें या फिर अपनी ‘रॉबिनहुड’ की छवि को बरक़रार रखें। यह दुविधा तब और बढ़ जाती है, जब उन्हें व्यक्तिगत तौर पर बड़ी चुनौती का सामना हो।

नरेश मीणा के बहाने सचिन पायलट और गुर्जर समुदाय को टारगेट करने के पीछे की वजह बिल्कुल साफ़ है, वो यह कि मीणा-गुर्जर समुदाय का साथ आना। मीणा और गुर्जर समुदाय को राजनीतिक पंडित ‘प्रतिद्वंदी’ के तौर पर पेश करते हैं। लेकिन 2007 में आरक्षण आंदोलन के समय बनी खाई को छोड़ दें तो इस ‘प्रतिद्वंद्विता’ की जड़ें गहरी नहीं हैं। यह टकराव जाट और राजपूतों से काफ़ी लग है। राजेश पायलट का राजनीतिक उत्थान दौसा से ही हुआ, जहां मीणा समुदाय सबसे अधिक है। हां, यह ज़रूर है कि परंपरागत तौर पर मीणा कांग्रेस और गुर्जर भाजपा के मतदाता रहे हैं।

राजस्थान में 40 गुर्जर प्रभाव वाली सीटों में से 16 सीटें ऐसी हैं, जहां मीणा आबादी भी निर्णायक भूमिका निभाती है। 2008 में कांग्रेस ने इन सीटों पर बढ़त बनाई थी और 16 में से 6 सीटें जीती थीं। लेकिन समग्र तौर पर भाजपा गुर्जर प्रभाव वाली सीटों में आगे रही थी और 40 में से 18 सीटें उसके खाते में गईं। 2013 में तस्वीर पलटी। इस बार भाजपा ने गुर्जर-मीणा प्रभाव वाली सीटों पर दबदबा बनाया और 16 में से 10 सीटें उसके खाते में गईं, जबकि कुल मिलाकर 40 में से 29 सीटों पर जीत मिली।
2018 में समीकरण फिर बदले। जब गुर्जर और मीणा, दोनों समुदाय कांग्रेस के साथ खड़े हुए, तो पार्टी ने इन 16 में से 11 सीटों पर जीत दर्ज की और कुल 40 में से 24 सीटों पर कब्ज़ा कर लिया।
लेकिन फिर पासा पलटा और 2023 के चुनाव में कांग्रेस ने 10 गुर्जर चेहरों को टिकट दिया जिसमें से सचिन पायलट और अशोक चांदना समेत सिर्फ 3 उम्मीदवार ही चुनाव जीत पाए. और पूरे इलाके में से इस बार हालात उलट गए, और सीटों की संख्या 25 से घटकर 17 रह गई। और कांग्रेस के 10 मंत्री इस क्षेत्र से चुनाव हार गए।
भाजपा यह अच्छी तरह जानती है कि परंपरागत मतों का छिटकना उसे सत्ता से बाहर कर सकता है। और इसी लिए कहीं ना कहीं साल एक खाई बनाने की जद्दोजहद है।

मेहरानगढ़ दुखांतिका की बरसी आज, सरकारें क्यों टाल रही हैं जस्टिस चौपड़ा आयोग की रिपोर्ट का खुलासा?

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जोधपुर स्थित मेहरानगढ़ किले में नवरात्रा के अवसर पर वर्ष 2008 में हुई भीषण दुखांतिका में 216 युवाओं की जान गई थी। उस समय की सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए, लेकिन कुछ ही महीनों बाद सत्ता बदल गई। नई सरकार ने भी पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने का आश्वासन दिया, मगर सच्चाई यह है कि आज तक न तो इस त्रासदी के दोषियों के नाम सामने आए और न ही किसी के खिलाफ ठोस कार्यवाही हुई।घटना की जांच के लिए जस्टिस चौपड़ा आयोग गठित किया गया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई। सवाल यह है कि इतने बड़े हादसे की जांच रिपोर्ट को छुपाने का औचित्य क्या है? भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सरकारों ने इसे उजागर करने से परहेज़ किया। ऐसे में सरकारों की नीयत और नीति पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। यह था मामला मेहरानगढ़ दुखांतिका 30 सितंबर 2008 को जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में स्थित चामुंडा देवी मंदिर में हुई भगदड़ थी, जिसमें 200 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना की जांच के लिए गठित जस्टिस जसराज चोपड़ा आयोग ने 2011 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी, लेकिन सरकार ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया और न ही विधानसभा में पेश किया। रिपोर्ट के सार्वजनिक न होने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिसमें सरकार की ओर से इसे सार्वजनिक करने से इनकार किया गया है अब सवाल यह है कि इतनी मौतों के गुनहगारों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं?

NSUI की तरह राजस्थान कांग्रेस को वैचारिक संघर्ष से परहेज क्यों? 2028 के लिए गुटबाजी की जमीन तैयार करने में व्यस्त दिग्गज नेताओं ने जमीन पर उतरने का हर मौका छोड़ा

दो दिन पहले, 30 सितंबर की शाम NSUI के कार्यकर्ताओं ने RSS के कार्यक्रम का विरोध किया तो उनके घायल होने और हॉस्पिटल में भर्ती होने की तस्वीरें भी सामने आई. इस मामले को वैचारिक संघर्ष के तौर पर देखा गया, लेकिन यह संघर्ष उसके मातृ संगठन यानि कांग्रेस में नजर नहीं आता. राजस्थान में तमाम मुद्दों के बीच बीजेपी के खिलाफ माहौल तैयार करने की बजाय कांग्रेस के दिग्गज सोशल मीडिया पर धड़ल्ले एक्टिव हैं. यह बात राजनीतिक चर्चा का विषय है कि NSUI का पोस्टर फाड़ना सही था या गलत. लेकिन सोचकर देखिए, जब NSUI के साथ ऐसा हुआ तो कांग्रेस की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए थी? जब ABVP या संघ के साथ बंगाल या केरल में घटनाएं हुई तो बीजेपी समेत तमाम दक्षिणपंथी संगठनों ने पिछले 10 वर्षों के दौरान देशभर में जमकर विरोध- प्रदर्शन किए और होना भी चाहिए, तभी कैडर आधारित पार्टी जिंदा रहती है. लेकिन मृत विपक्ष के तौर पर काम कर रही राजस्थान कांग्रेस को सोचना होगा कि हॉस्पिटल में भर्ती NSUI कार्यकर्ताओं की आवाज सिर्फ सोशल मीडिया पर उठाने से क्या होगा? क्या प्रदेशभर में सांकेतिक प्रदर्शन करके कांग्रेस को समर्थन नहीं देना था. ना राजस्थान और ना देश के किसी कोने में, ऐसे प्रदर्शन की स्थिति दिखी.  राजस्थान में मुद्दों की भरमार भी कांग्रेस में जान नहीं फूंक पा रहे झालावाड़ स्कूल हादसा हो, समरावता हिंसा का मामला हो, कपासन में सूरज माली की पिटाई या डूंगरी बांध के चलते विस्थापन का मुद्दा, प्रदेश में तमाम मुद्दों की गुंजाइश है. हनुमान बेनीवाल और नरेश मीणा जैसे नेता इन मुद्दों को जमकर भुना रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के नेता 2028 के ताज को अपने सिर पर सजाने के लिए गुटबाजी के ही रथ में सवाल है. जबकि कांग्रेस का छात्र संगठन NSUI, राजस्थान में अक्सर ही सीमित आंदोलन तक सक्रिय रहता था. लेकिन हाल के कुछ महीनों में एनएसयूआई ने संगठन को मजबूत किया और आंदोलन का झंडा भी बुलंद किया. प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा कह रहे हैं कि NSUI कार्यकर्ताओं को जब RSS के कार्यकर्ताओं ने पीटा तो दौरान पुलिस मूकदर्शक बनकर देखती रही. लेकिन क्या कांग्रेस भी मूकदर्शक नहीं बनी हुई? अपने कार्यकर्ताओं के लिए सड़क पर उतरने की बजाय गहलोत महज घटनाक्रम की निंदा तक सीमित रहे. यही हाल सचिन पायलट का भी है. सेवादल कहां है……? प्रदेश हो या राष्ट्रीय स्तर की बात, कांग्रेस का मुख्य संगठन वहां भी प्रदर्शन को विरोध-प्रदर्शन को जमीन पर उतार पाने में नाकाम रहा है. राहुल गांधी के साल 2019 में अध्यक्षीय भाषण को याद किया जाना चाहिए, जब उन्होंने अजमेर में कांग्रेस सेवादल के कार्यक्रम में कहा था कि आपको जो आदर, जो सम्मान मिलना चाहिए था, वो नहीं मिला. उन्होंने कहा था कि आगे से ऐसा नहीं होगा और कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री से आपको सम्मान मिलेगा. राजस्थान में दिए गए इस भाषण की खास बात यह थी कि तब प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस थी. लेकिन उन 5 सालों में भी कांग्रेस के सेवादल ऊर्जावान नजर नहीं आए और अब हालत ऐसी है कि शायद ही किसी सिर पर कांग्रेस सेवादल की टोपी नजर आती हो. इन तमाम विसंगतियों को दूर करने के लिए एनएसयूआई की कार्यशैली की तरह ही कांग्रेस के संगठन में जान फूंकने की जरूरत है. यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि जितना एक सरकार लोकतांत्रिक सिस्टम को बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उससे कही ज्यादा सरकार पर दबाव बनाए रखते हुए लोकतंत्र की पहरेदारी की जिम्मेदारी विपक्ष पर है.