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एम्स जैसे संस्थानों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के खाली पद: देश के स्वास्थ्य ढांचे पर गंभीर सवाल

22 जुलाई 2025 को संसद में राज्यसभा के एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में जो जानकारी सामने आई, वह देश के सबसे प्रतिष्ठित स्वास्थ्य संस्थानों की स्थिति पर चिंता बढ़ाने वाली है। एम्स जैसे संस्थानों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में पद खाली हैं और यह न सिर्फ संस्थान की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि देश के आम मरीज की उम्मीदों पर भी असर डालता है। स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने संसद को बताया कि देश भर के एम्स में स्पेशियलिटी और सुपर स्पेशियलिटी विभागों के संचालन के लिए पदों का सृजन और भर्ती एक सतत प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि रिक्त पदों को भरने के लिए हर एम्स में स्थायी चयन समिति बनाई गई है। मगर जो आंकड़े सामने आए, वे बताने के लिए काफी हैं कि ‘सतत प्रक्रिया’ के बावजूद हालात सुधर नहीं रहे।

उदाहरण के तौर पर देश का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित एम्स, दिल्ली जहां 1306 स्वीकृत पद हैं, लेकिन उनमें से केवल 844 पर ही डॉक्टर पदस्थापित हैं। यानी 462 पद अभी भी खाली हैं। सवाल यह है कि जब सरकार देश भर के एम्स में मॉडल और नजीर स्थापित करना चाहती है, तो एम्स दिल्ली में ही ये मानक क्यों नहीं बन पा रहे? राजस्थान के जोधपुर एम्स की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है यहां 405 में से 171 पद खाली हैं। इसी तरह भोपाल, भुवनेश्वर, ऋषिकेश, पटना, नागपुर, और अन्य कई नए एम्स संस्थानों में भी बड़ी संख्या में स्वीकृत पद खाली पड़े हैं।

जिला अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी की वजह से मरीजों की उम्मीदें अक्सर एम्स जैसे संस्थानों पर टिक जाती हैं। लेकिन जब एम्स में भी डॉक्टर नहीं मिलते, तो यह स्थिति सीधे-सीधे आम नागरिक की सेहत पर असर डालती है। भारत जैसे देश में, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है, वहां एम्स जैसे संस्थानों में डॉक्टरों के खाली पद यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम वास्तव में किस दिशा में जा रहे हैं। ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता अंतरराष्ट्रीय मानकों से बहुत पीछे है। ऐसे में, सरकारों के सामने यह जिम्मेदारी है कि स्वास्थ्य तंत्र को मज़बूत बनाने की ओर ठोस कदम उठाए जाएं।

देश को अब सिर्फ संस्थान बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें चलाने लायक पर्याप्त संसाधन और मानव संसाधन देने की ज़रूरत है ताकि हर नागरिक को समुचित इलाज और स्वास्थ्य का अधिकार मिल सके।

“रूस-चीन-भारत साथ आए, अब समय आ गया है….

चीन का मुखपत्र ‘Global Times’ भारत के साथ बेहतर रिश्तों के लिए वकालत कर रहा है. यह पूरा मामला दिलचस्प है!

ट्रंप की टैरिफ नीति के चलते पूरी दुनिया में समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं. इसका सबसे ज्यादा प्रभाव एशिया पर दिख रहा है. रूस के साझीदार देश भारत और चीन, अमेरिका के निशाने पर है. भारत पर भारी-भरकम टैरिफ के बावजूद भी रूस के साथ दोस्ती मजबूत होती जा रही है. ग्लोबल टाइम्स ने भी चीन-भारत के बीच रिश्तों में बेहतरी के साथ रूस-भारत-चीन (RIC) त्रिपक्षीय सहयोग के एक सिस्टम की वकालत की है. ग्लोबल टाइम्स के लेख के मुताबिक, भारत, चीन और रूस जैसी शक्तियों को अब न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए, बल्कि अधिक शांतिपूर्ण, न्यायसंगत और समतावादी विश्व को आकार देने के लिए भी सहयोग करना चाहिए.

ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि आरआईसी मंच केवल एक कूटनीतिक तंत्र नहीं है; यह एक ऐसी दुनिया के निर्माण का आह्वान है, जिस पर हमारी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियां गर्व कर सकें.

अब इसके पीछे की वजह को समझिए-

तीनों देश ही एक वास्तविक बहुध्रुवीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के प्रमुख समर्थक हैं. अमेरिका के एकतरफा दबाव का सामना कर रही प्रमुख शक्तियों के वैश्विक आर्थिक स्थिरता को मजबूत करने के लिए साथ आने बात कही है. ट्रेड वॉर के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ज़ोर दिया, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “बहुध्रुवीयता” की खोज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है._

ग्लोबल टाइम्स के इस लेख में यह भी कहा गया, “आरआईसी को फिर से शुरू करने की कुंजी भारत के पास है, जो प्राथमिक चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करता है.”

आरआईसी का भविष्य अंततः इस बात पर निर्भर करता है कि क्या चीन और भारत ऊर्जा से परे व्यापक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए पर्याप्त आपसी विश्वास का निर्माण कर सकते हैं? चीन-भारत संबंधों में लगातार तनाव और पश्चिम के साथ भारत के घनिष्ठ संबंधों को देखते हुए, आरआईसी का आगे का रास्ता अनिवार्य रूप से सतर्क, व्यावहारिक और चुनौतियों से भरा होगा.

SCO समिट के लिए क्या कहा जा रहा है?

फिर भी, चीन-भारत संबंधों में मधुरता के संकेत सकारात्मक हैं- शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से पहले भारत के रक्षा और विदेश मंत्रियों की पारस्परिक यात्राएं, चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीज़ा की बहाली और सीधी उड़ानों की शीघ्र पुनः शुरुआत को एक बुनियादी राजनीतिक माहौल के तौर पर देखा जा रहा है

पिछले साल 2 लाख से अधिक भारतीयों ने छोड़ी नागरिकता

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साल 2024 में 2 लाख 6 हजार 378 भारतीयों ने नागरिकता छोड़ी. इससे पहले यह आंकड़ा साल 2023 में 2.16 लाख था. जबकि भारतीय नागरिकता छोड़ने वालों की संख्या 2020 में 85 हजार 256, 2021 में 1 लाख 63 हजार 370 और वर्ष 2022 में 2 लाख 25 हजार 620 थी. शुक्रवार को लोकसभा में विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सदन को यह जानकारी दी. कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने पूछा था कि पिछले 5 वर्षों में कितने लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ी और अन्य देशों की नागरिकता ली. उन्होंने यह भी बताया कि ऐसे मामले 2011 में 1 लाख 22 हजार 819, वर्ष 2012 में 1.20 लाख, साल 2013 में 1.31 लाख और 2014 में 1.29 लाख दर्ज किए गए थे. सरकार ने कहा कि नागरिकता छोड़ने या विदेशी नागरिकता लेने के कारण व्यक्तिगत होते हैं और केवल संबंधित व्यक्ति को ही ज्ञात होते हैं.

SI भर्ती पेपर लीक: समय का पहिया फिर घुमा है और सुई गहलोत की तरफ…!

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पेपर लीक मामले में हेड कांस्टेबल राजकुमार यादव और उसके बेटे भरत यादव की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर आग कांग्रेस तक पहुंच गई है. सीधे तौर पर किसी कांग्रेसी नेता के शामिल होने की बात सामने नहीं आई है. लेकिन गहलोत के पीएसओ रह चुके यादव की गिरफ्तारी ने बीजेपी समर्थकों को हमला बोलने का मौका दे दिया है. एसओजी की इस कार्रवाई के बाद एसआई भर्ती परीक्षा रद्द करने की मांग कर रहे अभ्यर्थियों के निशाने पर भी अशोक गहलोत आ गए हैं.

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का यह कहना कि किसी भी संवेदनशील पद पर व्यक्ति को रखने से पहले उसकी निष्ठा, आचरण और पृष्ठभूमि की पूरी तरह जांच होना अनिवार्य है, यह साफ तौर पर गहलोत के लिए निशाना है. वहीं, राजेंद्र राठौड़ ने भी गहलोत से पूछ ही लिया कि आखिरकार यह रिश्ता क्या कहलाता है?

कहानी यही खत्म नहीं हो रही. इस मामले में तार जुड़ते हुए एक और पूर्व कांग्रेसी नेता के करीबी तक पहुंच गए. आरोपी के बारे में बताया गया कि हेड कांस्टेबल राजकुमार पुलिस आयुक्तालय जयपुर में तैनात है. वह पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) रहने के अलावा राज्य में पूर्व कैबिनेट मंत्री महेंद्रजीत मालवीया के पीएसओ भी रह चुके हैं. हालांकि मालवीया, फिलहाल बीजेपी में हैं. अब ऐसे में मालवीया का मुद्दा ना कांग्रेस उठाएगी और ना ही बीजेपी.

अब इस पूरी कहानी को सिलसिलेवार ढंग से समझिए…

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, आरोपी राजकुमार यादव के तार कुंदन पंड्या से जुड़ रहे हैं. कुंदन पंड्या पूर्व कैबिनेट मंत्री महेंद्रजीत मालवीया का निजी सचिव है. यादव मालवीया का PSO रह चुका है, जिसकी वजह से कुंदन पांड्या को भी जानता था. कुंदन कुमार पंड्या पर आरोप है कि उसने आरपीएससी के पूर्व सदस्य बाबूलाल कटारा से पेपर हासिल किया और अपने साथी रविन्द्र सैनी व राजकुमार यादव को दिया.

इस पूरी कहानी का सार यही है कि जिसे पेपर की गोपनीयता रखने की जिम्मेदारी (RPSC) मिली, उसके सदस्य ने तिजोरी खोली. उसकी तिजोरी से निकला ‘जिन्न’ उसके करीबियों तक पहुंचा. उन लोगों की अपने परिचितों के प्रति ‘दरियादिली’ के बाद पेपर का प्रसाद बंटता भी चला गया और बिकता भी. बरहाल, पेपर मार्केट में आया और दलालों के हाथों से होता हुआ फर्जी अभ्यर्थियों तक. इस कहानी को कोर्ट भी मानता है, SOG भी और तमाम जांच एजेंसियां. लेकिन नहीं मानती तो सरकार और वह यह भी नहीं मानती कि पेपर लीक के चलते योग अभ्यर्थियों के साथ धोखा हुआ और पेपर रद्द किया जाना चाहिए.

अरुण चतुर्वेदी की नियुक्ति से बीजेपी का एक बड़ा धड़ा बेचैन भी है, इससे पार्टी के जातिगत समीकरण धराशाही होने का पूरा खतरा है. ऐसा क्यों है, पूरा मामला समझिए

लोकसभा चुनाव के दौरान आचार संहिता से ठीक पहले भजनलाल सरकार ने 7 बड़ी सियासी नियुक्तियां की थीं. लेकिन इन्हें आज तक मंत्री का दर्जा नहीं मिला. इस मामले में बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी बाजी मार गए. जबकि दिग्गज नेता और पूर्व सांसद सीआर चौधरी, जसवंत सिंह बिश्नोई को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिलने का इंतजार लम्बा हो चला है. इस लिस्ट में 5 और भी नाम है, जिन्हें भी राज्य मंत्री का दर्जा मिलने की उम्मीद तो थी, लेकिन अभी तक नहीं मिला है.

अब पार्टी के एक धड़े के भीतर असंतोष इस बात को लेकर है, “जहां अरुण चतुर्वेदी को नियुक्ति के तुरंत बाद ही कैबिनेट की सुविधाएं मिलनी शुरू हो गई है, वहीं जाट, बिश्नोई, गुर्जर, राजपूत और एससी समेत 7 समाज के प्रतिनिधियों को पद मिलने के बावजूद स्टाफ की कमी है. लोकसभा चुनाव में समाज का वोट बैंक भुनाने के इरादे से नियुक्तियां देने के बाद तो एक तरह से इन्हें भुला ही दिया गया.”

कुल मिलाकर, सियासी नियुक्ति की बात छिड़ने के साथ ही बीजेपी के भीतर के जातिगत समीकरण गड़बड़ाने लगे हैं .

फिलहाल तो बीजेपी की हालत ऐसी हो चली है- आसमान से गिरे, खजूर पर अटके.

लोकसभा चुनाव के दौरान राजपूत समाज का विरोध झेलने वाली बीजेपी के खिलाफ गुर्जरों का भी गुस्सा फूटा. यह तूफान थमा भी नहीं था कि जाट समाज ने भूचाल ला दिया, इस भूकंप का केंद्र तो दिल्ली था, लेकिन झटके अब राजस्थान में भी महसूस किए जाने लगे हैं. प्रदेश प्रवक्ता कृष्ण कुमार जानू ने जगदीप धनखड़ के इस्तीफे और सतपाल मलिक की अंत्येष्टि की प्रक्रिया सम्मानपूर्वक नहीं किए जाने का सवाल उठाया और इसके बाद बीजेपी ने डैमेज कंट्रोल की बजाय जब केके जानू को ही पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया तो जाट महासभा भी मैदान में आ गई.

बीजेपी का यही बिगड़ता तालमेल दूसरे समाज के साथ भी है. विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी की ओर से 9 अक्टूबर 2023 को प्रत्याशियों की पहली सूची जारी हुई तो राजेंद्र नायक ने बगावत कर दी थी. पूर्व IAS अफसर और SC समाज के प्रमुख चेहरों में से एक नायक ने निर्दलीय चुनाव भी लड़ा. जब उन्हें राजस्थान राज्य अनुसूचित जाति वित्त और विकास आयोग के अध्यक्ष बनाया गया तो समाज के एक हिस्से में नाराजगी इस बात की है कि अभी भी उचित सम्मान नहीं मिला.

वहीं, राजपूत वोट बैंक साधने के लिए माटी कला बोर्ड का गठन किया गया है. वसुंधरा राजे के करीबी पूर्व विधायक प्रेम सिंह बाजौर सैनिक कल्याण बोर्ड़ के अध्यक्ष हैं. प्रहलाद राय टांक को भी सियासी नियुक्ति दी गई है. लेकिन हालात यह है कि सरकार ने दफ्तर भी दिया है, लेकिन स्टाफ पर्याप्त नहीं है. देवनारायण बोर्ड के अध्यक्ष ओमप्रकाश भडाणा और श्री विश्वकर्मा कौशल विकास बोर्ड के अध्यक्ष रामगोपाल सुथार को भी एक साल से उन्हें भी मंत्री पद का दर्जा मिलने का इंतजार है. जाहिर तौर पर अंदरखाने नेताओं की बेचैनी बढ़ रही है तो उनके समर्थकों का गुस्सा.

जगदीप धनखड़ का इस्तीफा जाटों को करेगा नाराज, सोशल इंजीनियरिंग का हथियार ही बीजेपी के लिए बना चक्रव्यूह!

साल 2023 में राजस्थान विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद, भाजपा से उम्मीद की जा रही थी कि वह एक ऐसे मुख्यमंत्री का चयन करेगी जो राजस्थान के जटिल सामाजिक ताने-बाने का प्रतिनिधित्व कर सके. वसुंधरा राजे को पद से दूर रखना, दिग्गजों की उठापटक और जातिगत समीकरण के बीच एक समझौतावादी उम्मीदवार के तौर पर मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की नियुक्ति हुई. इस नियुक्ति के बाद विभिन्न समाजिक गुटों (खासकर मीणा समुदाय) में भारी असंतोष पनपना शुरू हुआ. तमाम बड़ी जातियों और दिग्गजों को नकारते हुए उस जाति से नेता का चयन किया गया, जिसका राजस्थान में ऐतिहासिक तौर कोई खास राजनीतिक प्रभाव नहीं रहा है.

सोशल इंजीनियरिंग की बात करने वाली बीजेपी उसी चक्रव्यूह में फंसती नजर आ रही है. देशभर की तरह राजस्थान में भी ‘मोदी फेक्टर’ ही एकमात्र वजह है, जिसके चलते सरकार का संचालन हो रहा है. दिल्ली की डोर अगर छूट जाए तो जयपुर में बैठे मुखिया अस्थिर ही नजर आते हैं. राजपूत, गुर्जर, जाट और मीणा जैसी जातियों और जनजातियों के प्रभुत्व वाले प्रदेश में बीजेपी के पास जातिगत चेहरे या तो नजर नहीं आते हैं या दिखते भी हैं तो वह रूठे हुए हैं. किरोड़ीलाल मीणा सरीखे नेता के तेवर ने डेढ़ साल तक सरकार को परेशान कर दिया था. हालांकि अब दिल्ली की मान-मनौव्वल कहिए या दवाब, गाड़ी पटरी पर आ चुकी है. मीणा समाज में इसे लेकर फिर भी अच्छा संदेश नहीं गया है.

इस लिस्ट में दूसरे नेता है- विजय बैंसला. साल 2023 के चुनाव में भीलवाड़ा की आसींद सीट से टिकट मांग रहे थे, सीट मिली देवली-उनियारा. पहली ही लिस्ट में बैंसला का नाम रखकर गुर्जर जाति साधने की कोशिश की गई. लेकिन वसुंधरा खेमा कहे या पूर्व विधायक के खेमे, बैंसला को भीतरघात का सामना करना पड़ा. इस चुनाव में हार के बाद बैंसला ने क्षेत्र नहीं छोड़ा. जब उपचुनाव का मौका आया तो फिर देवली-उनियार में तैयारी शुरू की, लेकिन इस बार पार्टी ने टिकट ही नहीं दिया. फिर ‘बोल गुर्जर मन की बात’ के जरिए समाज को एकजुट किया और हाल ही में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के जरिए पार्टी को ताकत भी दिखाई और तेवर भी.

अब इस लिस्ट में एक नाम और जुड़ गया है, वो है- पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़. सीधे तौर पर ना सही, लेकिन उनके इस्तीफे ने जाट समाज, खास तौर पर शेखावाटी क्षेत्र में आक्रोश पैदा कर दिया है. पार्टी के आंतरिक कलह और राहुल कस्वां जैसे प्रमुख जाट नेताओं को टिकट न दिए जाने के कारण बीजेपी को लोकसभा के चुनावी नतीजों में भारी गिरावट देखने को मिली थी. अब धनखड़ के मुद्दे ने परेशानी जरूर बढ़ा दी है. उच्च जातियों के वर्चस्व की धारणा ने जाट मतदाताओं को अलग-थलग कर दिया है. धनखड़ के इस्तीफे से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सामने जाट समाज के प्रतिनिधित्व का बड़ा संकट खड़ा हो गया है. अब पार्टी के पास केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर ऐसा कोई मजबूत जाट चेहरा नहीं है, जो पूरे समाज को जोड़ सके. यह खाई भरना अब बीजेपी की प्राथमिकता बन गया है. यह संकट सतीश पूनिया की चुनावी हार के बाद से ही बदस्तूर जारी है. इन सबके बीच कांग्रेस इस घटनाक्रम को भुनाती नजर आ रही है. पिछले कुछ वर्षों में डोटासरा सहित कांग्रेस के कई जाट नेता फ्रंटफुट पर खेलते दिख रहे हैं.

विधानसभा चुनाव में भले ही बीजेपी जीती हो, लेकिन चुनाव जीतने वाले जाट विधायक की संख्या कांग्रेस में ज्यादा रही.

अब ये समझिए कि प्रमुख जातियों का प्रभाव कहां है?

जाट समाज:

  • 60 विधानसभा सीटों पर असर
  • हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकानेर, चुरू, झुंझनूं, नागौर, जयपुर, चित्तोड़गढ़, अजमेर, बाड़मेर, टोंक, सीकर, जोधपुर और भरतपुर जाट बहुल इलाके
  • मारवाड़ या शेखावाटी के अलावा भरतपुर-धौलपुर संसदीय क्षेत्र का जाट भी बीजेपी से नाराज

मीणा समाज:

प्रदेश की 200 में करीब एक चौथाई यानी पचास सीटें या तो मीणा बाहुल्य हैं या वहां इतने ज्यादा मीणा वोट है जो चुनावी हार जीत तय करते है.

MBC:

गुर्जर आरक्षण आंदोलन के जरिए राज्य में 5 अति पिछड़ी जातियों बंजारा, गाड़िया लोहार, गुर्जर, गडरिया और रेबारी को साथ लाते हुए राजनीतिक परिदृश्य खड़ा किया गया. अब राजनीतिक तौर पर ना सिर्फ गुर्जर, बल्कि MBC समाज की बात होती है. करीब 75 विधानसभा सीटों पर एमबीसी समाज निर्णायक भूमिका में हैं. पूर्वी राजस्थान के धौलपुर से बाड़मेर बॉर्डर तक लगते जिलों में 37 फीसदी सीटें ऐसी है, जहां भले ही उम्मीदवार किसी भी समाज से हो, एमबीसी समाज का वोट बेहद जरूरी हो जाता है.

*नई शिक्षा नीति (NEP) में आदिवासियों के इतिहास को जगह नहीं!!!*

बीजेपी राज में SCERT ने कालीबाई का इतिहास किताब से किया गायब

डूंगरपुर ज़िले के रास्तापाल गांव की 13 साल की आदिवासी समाज की छात्रा कालीबाई का इतिहास राजस्थान से मिटाने की साजिश हो रही है. उदयपुर स्थित राज्य शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने नई शिक्षा नीति के अनुसार पाठयपुस्तक तैयार की है. लेकिन कक्षा 5वीं की किताब से वीर कालीबाई कलासुआ की शहादत का पाठ हटा दिया गया है.

कालीबाई को सिर्फ आदिवासी समाज के प्रतीक के तौर पर नहीं, बल्कि शिक्षा के लिए लड़ने वाली क्रांतिकारी के तौर प्रन्यास किया जाता है. ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों में, डूंगरपुर रियासत के महारावल लक्ष्मण सिंह और अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर आदिवासी बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का आदेश दिया गया. 19 जून 1947 को, राज्य की पुलिस ने स्कूल बंद कराने के लिए दबाव डाला और विरोध करने पर शिक्षक सेंगाभाई को एक ट्रक से बांधकर घसीटना शुरू कर दिया. तभी वहां मौजूद 13 साल की भील समाज की छात्रा कालीबाई ने हंसिया लेकर दौड़ी और अपने शिक्षक सेंगाभाई की रस्सी काट दी. शिक्षक की जान तो बच गई, लेकिन पुलिस ने कालीबाई पर गोलियां चला दीं. 20 जून 1947 को कालीबाई ने चोटों के कारण दम तोड़ दिया

लेकिन आज उसी वीरांगना कालीबाई कलासुआ की शहादत का पाठ को स्कूली शिक्षा की किताबों से हटाया दिया गया है. वो चैप्टर, जिसमें कालीबाई की शहादत का जिक्र कर बच्चों को भक्ति, साहस और दूसरों की सेवा के लिए प्रेरित किया गया था, उसका नामोनिशान मिटा दिया गया है.

13 अगस्त से उपलब्ध होंगी नई किताबें

जानकारी के मुताबिक, नई किताब का निर्माण NCERT की किताबों के आधार पर किया गया है. इसी के तहत पाठ्यक्रम समिति के निर्णयानुसार नया पाठ्यक्रम लागू किया गया है. अब विद्यार्थी 13 अगस्त से नई किताबों से पढ़ाई करेंगे. लेकिन उसमें कालीबाई का इतिहास नहीं होगा.

देश भर के AIIMS से नौकरी छोड़ रहे हैं डॉक्टर्स, तीन वर्षों में 429 फैकल्टी के इस्तीफे

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एम्स में पिछले तीन वर्षों में कुल 429 फैकल्टी सदस्यों (डॉक्टरों) ने अपने पद से इस्तीफा दिया है। इनमें से 52 इस्तीफे AIIMS नई दिल्ली से हुए हैं।राज्यसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने बताया कि वर्ष 2022 से 2024 के बीच ये इस्तीफे दर्ज किए गए।  आंकड़ों से पता चलता है कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के विभिन्न केंद्रों में बीते तीन वर्षों के दौरान डॉक्टरों के इस्तीफों का सिलसिला चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है।संसद में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 से 2024 के बीच कुल 429 फैकल्टी सदस्यों (डॉक्टरों) ने अपने पदों से इस्तीफा दिया। इनमें सबसे अधिक 52 इस्तीफे एम्स नई दिल्ली से दर्ज हुए, जो देश का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित केंद्र है। इसके बाद एम्स ऋषिकेश में 38, एम्स रायपुर में 35 और एम्स बिलासपुर में 32 फैकल्टी सदस्यों ने नौकरी छोड़ी। आँकड़े बताते हैं कि यह रुझान केवल पुराने और स्थापित केंद्रों तक सीमित नहीं है आंध्र प्रदेश स्थित एम्स मंगलगिरी से 30, एम्स भोपाल से 27 और एम्स जोधपुर से 25 डॉक्टरों ने त्यागपत्र दिया। वहीं, अपेक्षाकृत नए केंद्रों जैसे एम्स कल्याणी (पश्चिम बंगाल) और एम्स बठिंडा (पंजाब) से भी 22-22 इस्तीफे आए हैं। छोटे केंद्रों मदुरै, विजयपुर और गुवाहाटी में इस्तीफों की संख्या भले ही सीमित हो, लेकिन प्रवृत्ति वही चिंता जगाती है। डॉक्टरों के इस्तीफों के पीछे निजी और पेशेवर कारण राज्यसभा में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने जानकारी दी कि मंत्रालय को इन इस्तीफों के पीछे व्यक्तिगत और पेशेवर, दोनों तरह के कारण बताए गए हैं। हालांकि, इन कारणों का विस्तृत विश्लेषण सार्वजनिक नहीं किया गया है और न ही इस पर कोई व्यापक राष्ट्रीय अध्ययन कराया गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टरों का निजी क्षेत्र की ओर बढ़ता रुझान कई गहरे मुद्दों की ओर इशारा करता है जैसे कार्यस्थल की परिस्थितियाँ, करियर प्रगति की सीमाएँ, अनुसंधान के अवसरों की कमी और सरकारी वेतनमान का प्रतिस्पर्धी न होना। चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खतरा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अनुभवी फैकल्टी का संस्थान छोड़ना सिर्फ मानव संसाधन का नुकसान नहीं है, बल्कि इससे शिक्षण, अनुसंधान और मरीजों की देखभाल, तीनों क्षेत्रों की गुणवत्ता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। एम्स जैसे संस्थान, जिन्हें विश्वस्तरीय चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। यदि यह प्रवृत्ति समय रहते नहीं रोकी गई, तो न केवल चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता घट सकती है, बल्कि ग्रामीण और दूरदराज़ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी गंभीर रूप से प्रभावित होगी।नीतिगत हस्तक्षेप और ठोस रणनीतियाँ अब अनिवार्य हो चुकी हैं चाहे वह कार्यस्थल के वातावरण में सुधार हो, प्रतिस्पर्धी वेतनमान की पेशकश हो, या शोध और प्रशिक्षण के बेहतर अवसर उपलब्ध कराना। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि सरकार और संस्थान स्तर पर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो यह रुझान और तेज हो सकता है, जो अंततः भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की मजबूती और स्थिरता को कमजोर कर देगा।

शिक्षा संकट के दौर में – प्राथमिक शिक्षा में गिरावट, लाखों रिक्तियां और B.El.Ed. हटाने की जल्दबाज़ी?

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देश के स्कूलों में सीखने के नतीजे चिंताजनक हैं। कक्षा-6 के आधे से ज़्यादा बच्चे बुनियादी गणित-भाषा नहीं संभाल पा रहे, कक्षा-5 के केवल आधे बच्चे कक्षा-2 के स्तर का पाठ पढ़ पाते हैं। इसी बीच सरकार अध्यापक प्रशिक्षण प्रणाली को ITEP/एकीकृत अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम (आईटीईपी) की ओर मोड़ते हुए B.El.Ed. को हटाने का मसौदा लेकर आया, जबकि संसद की स्थायी समिति कुछ और ही कह रही है। *आंकड़े जो चौंकाते हैं* शिक्षा मंत्रालय के “PARAKH राष्ट्रीय सर्वेक्षण” (पूर्व NAS) के मुताबिक कक्षा 6 के 43% छात्र पाठ के मुख्य विचार नहीं समझ पाते, जबकि कक्षा 9 के 63% छात्र संख्याओं में साधारण पैटर्न पहचान ने या भिन्न और पूर्णांक जैसी बुनियादी संख्यात्मक अवधारणाएं नहीं समझ पाते। कक्षा 6 के 54% छात्र पूर्णांकों की तुलना या बड़ी संख्याएं पढ़ने में भी असमर्थ हैं। सर्वे दिसंबर 2024 में 36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 21.15 लाख छात्रों पर हुआ। ASER-2024 की तस्वीर भी अलग नहीं : सरकारी स्कूलों में केवल 23.4% कक्षा 3 के छात्र ही कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ने में सक्षम हैं। ASER 2024 के अनुसार, कक्षा 3 के 76.6% छात्र 19 भाषाओं में उपलब्ध पाठ्य सामग्री को पढ़ने में असमर्थ रहे। विश्व बैंक के लर्निंग पॉवर्टी इंडेक्स (आधारभूत पाठ पढ़ने में असमर्थ 10 वर्ष के बच्चों का प्रतिशत) के अनुसार, भारत की लर्निंग पॉवर्टी दर वर्ष 2019 में 55% से बढ़कर कोविड-19 के बाद 70% हो गई। *समस्या की जड़* पिछले सप्ताह संसद में रखी गई रिपोर्ट में संसदीय स्थायी समिति (अध्यक्ष: दिग्विजय सिंह) ने बताया कि स्कूलों में करीब 10 लाख शिक्षकों की रिक्तियां हैं। विशेषकर प्राथमिक स्तर पर। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर करीब 7.5 लाख पद खाली हैं। समिति ने कहा कि राज्य सरकारों के SSA द्वारा वित्तपोषित स्कूलों में रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरने की उसकी बार-बार की सिफारिशों के बावजूद कोई सुधार नहीं हुआ है। इसके उलट, स्थायी भर्ती नीति के अभाव और शिक्षकों के सेवानिवृत्त होने के कारण यह स्थिति दिन-ब-दिन और खराब होती जा रही है। रिपोर्ट में ठेका/कॉन्ट्रैक्ट नियुक्तियों पर रोक (क्योंकि यह सरकारी नौकरियों में SC/ST/OBC के संवैधानिक आरक्षण को कमज़ोर करती है), NCTE में 2019 से रुकी नियमित नियुक्तियां फिर शुरू करना, और DIETs का विस्तार व सशक्तिकरण , NCTE 2025 ड्राफ्ट विनियमों की व्यापक समीक्षा शामिल हैं, ताकि वर्तमान इंटीग्रेटेड टीचर एजुकेशन प्रोग्राम (ITEP) के माध्यम से अध्यापक शिक्षा के ‘बहुत अधिक विषय-आधारित प्रशिक्षण और कोर्स को कई छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने (hyperspecialisation and segmentation)’ वाली व्यवस्था से हटकर सुधार किए जा सकें। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी इन मुख्य सिफारिशों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट (X) पर साझा किया। *ITEP बनाम B.El.Ed.: क्या हम सफल मॉडल छोड़ रहे हैं?* NCTE के ड्राफ्ट नियम (2025) के अनुसार 1994-95 से चला आ रहा चार वर्षीय B.El.Ed. कार्यक्रम 2026-27 से बंद कर ITEP (BA/BSc/BCom-B.Ed. एकीकृत) पर पूर्ण निर्भरता का प्रस्ताव है। समिति ने इसे “शॉर्ट-साइटेड” बताते हुए कहा – समस्या है तो पाठ्यक्रम उन्नयन कीजिए, पर सिद्ध-प्रमाणित कार्यक्रम को बंद न कीजिए; राज्यों को B.El.Ed. जारी रखने दें और उसके संकाय/इन्फ्रास्ट्रक्चर को संरक्षित करें। मंत्रालय ने समिति को बताया कि B.El.Ed. में 50 छात्रों के लिए 16 फैकल्टी की ज़रूरत पड़ती है जबकि ITEP में इसे 9 तक लाया गया है। यही “उच्च फैकल्टी मांग” तर्क हटाने के पक्ष में रखा गया। समिति का मत: फैकल्टी घटाकर लागत बचाने की दृष्टि, सीखने की गुणवत्ता पर उल्टा असर डाल सकती है, खासकर जब कक्षा-कक्ष में सीखने का संकट स्वयं सरकार के सर्वे से उजागर है। एक ओर बच्चे बुनियादी पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ रहे हैं, दूसरी ओर शिक्षक प्रशिक्षण प्रणाली को एक ही टेम्पलेट (ITEP) में समेटने की जल्दी दिखती है। समिति का तर्क है-रिक्तियां भरें, स्थायी शिक्षक लाएँ, DIETs मज़बूत करें, NCTE को संसाधन दें, (B.El.Ed.) जैसे सफल कार्यक्रमों को उन्नत करके साथ-साथ चलाएँ। यही रास्ता सीखने की खाई पाटने और स्कूल-स्तर पर गुणवत्ता सुधारने का व्यावहारिक समाधान है।