•रबी सीजन में रात के समय, राजस्थान डिस्कॉम्स के पास बिजली की अधिकता होती है और वे थर्मल प्लांटों का उत्पादन घटा देते हैं, अतः इस समय RTC बिजली की आवश्यकता नहीं होती। •दिन के समय, यदि किसी प्रकार की मांग उत्पन्न होती भी है तो वह सौर ऊर्जा के माध्यम से कहीं अधिक किफायती तरीके से पूरी की जा सकती है। •मानसून के मौसम में भी राजस्थान की मांग प्रोफ़ाइल ऐसी नहीं होती कि इस तरह की Dispatchable Renewable Energy उपयुक्त साबित हो। CEA (Central Electricity Authority) द्वारा राजस्थान के लिए वर्ष 2025-26 से 2035-36 तक की Resource Adequacy Plan जारी की गई है, जिसमें अप्रैल से जुलाई तक राजस्थान में अधिशेष बिजली उपलब्ध होने की बात कही गई है जिसे अन्य राज्यों/उपयोगकर्ताओं को बैंकिंग/बाइलैटरल व्यवस्था या PUSHP पोर्टल के माध्यम से साझा किया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठते है ? क्या राजस्थान डिस्कॉम्स की ज़रूरतों के बिना ली जा रही है 630 MW बिजली? क्यों सस्ती बिजली के ऑफर को ठुकराकर महंगे टैरिफ पर मंजूरी दी गई? क्या CEA की रिपोर्ट को दरकिनार किया गया है? महंगी दर पर 25 साल के लिए बिजली खरीद किसके लिए फायदेमंद है – जनता के लिए या कुछ ख़ास कंपनियों के लिए?•रबी सीजन में रात के समय, राजस्थान डिस्कॉम्स के पास बिजली की अधिकता होती है और वे थर्मल प्लांटों का उत्पादन घटा देते हैं, अतः इस समय RTC बिजली की आवश्यकता नहीं होती। •दिन के समय, यदि किसी प्रकार की मांग उत्पन्न होती भी है तो वह सौर ऊर्जा के माध्यम से कहीं अधिक किफायती तरीके से पूरी की जा सकती है। •मानसून के मौसम में भी राजस्थान की मांग प्रोफ़ाइल ऐसी नहीं होती कि इस तरह की Dispatchable Renewable Energy उपयुक्त साबित हो। CEA (Central Electricity Authority) द्वारा राजस्थान के लिए वर्ष 2025-26 से 2035-36 तक की Resource Adequacy Plan जारी की गई है, जिसमें अप्रैल से जुलाई तक राजस्थान में अधिशेष बिजली उपलब्ध होने की बात कही गई है जिसे अन्य राज्यों/उपयोगकर्ताओं को बैंकिंग/बाइलैटरल व्यवस्था या PUSHP पोर्टल के माध्यम से साझा किया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठते है ? क्या राजस्थान डिस्कॉम्स की ज़रूरतों के बिना ली जा रही है 630 MW बिजली? क्यों सस्ती बिजली के ऑफर को ठुकराकर महंगे टैरिफ पर मंजूरी दी गई? क्या CEA की रिपोर्ट को दरकिनार किया गया है? महंगी दर पर 25 साल के लिए बिजली खरीद किसके लिए फायदेमंद है – जनता के लिए या कुछ ख़ास कंपनियों के लिए?
जानिए राजस्थान ऊर्जा विकास के 630 मेगावाट बिजली ख़रीद पर क्यों उठ रहे हैं सवाल
RUVITL(राजस्थान ऊर्जा विकास और आईटी सर्विसेज लिमिटेड) को विभिन्न नवीकरणीय ऊर्जा कार्यान्वयन एजेंसियों से समय-समय पर प्रस्ताव प्राप्त होते रहे हैं, जिनमें सोलर, हाइब्रिड (सोलर + विंड), सोलर + ऊर्जा भंडारण प्रणाली (ESS), हाइब्रिड + ESS, FDRE (निरंतर व नियंत्रित नवीकरणीय ऊर्जा) और हाइड्रो परियोजनाओं के माध्यम से बिजली आपूर्ति की पेशकश की जाती है.
हालांकि, पूर्व में इन प्रस्तावों की व्यवहारिकता या आर्थिकता का मूल्यांकन करने की बजाय RUVITL ने कई बार गौण कारणों के आधार पर इन्हें अस्वीकार कर दिया है जैसे कि एजेंसी द्वारा प्रस्तावित ट्रेडिंग मार्जिन ₹0.007 प्रति यूनिट.
इस रवैये के चलते, RUVITL ने SECI द्वारा दी गई सस्ती सौर ऊर्जा की पेशकश ठुकरा दी और इसके स्थान पर 1000 मेगावाट की सौर ऊर्जा खरीद के लिए निविदा निकाली, जिसमें अंततः SECI के ऑफर से अधिक दर पर बिजली खरीदी गई। यह RUVITL द्वारा पूर्व में अपनाई गई नीति के भी विपरीत है.
वहीं दूसरी ओर, RUVITL ने SECI द्वारा चयनित 490 मेगावाट पम्प्ड स्टोरेज परियोजना (PSP) का प्रस्ताव यह कहकर स्वीकार कर लिया कि यह हाइड्रो परचेज ऑब्लिगेशन (HPO) पूरा करने में सहायक होगी। लेकिन इसके विपरीत, L&T का एक अन्य प्रस्ताव यह कहकर खारिज कर दिया गया कि राजस्थान डिस्कॉम्स के पास पहले से ही पर्याप्त हाइड्रो क्षमता मौजूद है। यह दोहरा मापदंड दर्शाता है कि प्रस्तावों का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठता के बजाय “पसंद और नापसंद” के आधार पर किया जा रहा है.
SECI की 630 मेगावाट FDRE की यह निविदा मूलतः दिल्ली के डिस्कॉम्स की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लाई गई थी जिसमें 625 मेगावाट BSES राजधानी(BRPL) और BSES यमुना (BYPL), तथा 5 मेगावाट गुजरात के GIFT पावर कंपनी लिमिटेड (GIFT PCL) के लिए निर्धारित था। यह निविदा विशेष रूप से दिल्ली क्षेत्र की मांग के अनुरूप डिज़ाइन की गई थी.
जब दिल्ली डिस्कॉम्स ने यह बिजली खरीदने से इनकार कर दिया, तो SECI ने इसे अन्य राज्यों को ऑफर किया। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर यह बिजली वाकई सस्ती थी, तो दिल्ली डिस्कॉम्स ने इसे क्यों नहीं खरीदा?
बैटरी स्टोरेज लागत में गिरावट
SECI की FDRE निविदा की अंतिम तिथि 3 जुलाई 2024 थी। इसके बाद एक वर्ष से अधिक बीत चुका है और इस दौरान बैटरी स्टोरेज की लागत में उल्लेखनीय गिरावट आई है, जिसका प्रमाण देशभर की विभिन्न BESS निविदाओं से मिलता है.
बैटरी की लागत में गिरावट और निविदाकारों के बढ़ते आत्मविश्वास के चलते, भविष्य में FDRE की अगली निविदाओं में और अधिक भागीदारी और प्रतिस्पर्धी दरों की संभावना है। यह उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य की निविदाओं में खोजी गई दर ₹4.98/यूनिट से भी कम हो सकती है.
RUVITL द्वारा Battery Energy Storage System (BESS) की भी खरीद की जा रही है, जिसका सीधा अर्थ है कि राजस्थान डिस्कॉम्स के पास ऐसे समय स्लॉट होने चाहिए जब ये बैटरियाँ चार्ज हो सकें। अन्यथा, बैटरी घटक के चलते जो अतिरिक्त लागत बढ़ेगी, वह व्यावसायिक दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहरेगी.
सरकार की स्वीकृति नहीं ली गई
RUVITL ने FDRE बिजली खरीदने से पहले राजस्थान सरकार से कोई पूर्व स्वीकृति प्राप्त नहीं की.
CEA द्वारा FY 2031-32 तक राजस्थान के लिए तैयार की गई Resource Adequacy Plan में सभी तकनीकी व प्रशासनिक प्रतिबंधों (जैसे कि स्टार्टअप टाइम, रैम्प अप/डाउन लिमिट, इंटरकनेक्शन, RPO लक्ष्यों आदि) को ध्यान में रखते हुए स्रोतवार आवश्यकताओं का उल्लेख किया गया है(ग्राफ़िक्स में)
राजस्थान सरकार ने दिनांक 4.9.2023 को F(15)/Energy/2021 के अंतर्गत RUVITL के प्रबंध निदेशक की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी ताकि राज्य का Resource Adequacy Plan तैयार किया जा सके। इस समिति ने 14.03.2024 को आयोजित बैठक में CEA की RAP को अपनाने की सिफारिश की.
इसके पश्चात, 16.05.2025 को हुई Energy Assessment Committee (EAC) की बैठक में CEA द्वारा तैयार की गई RAP को राजस्थान के लिए अपनाया गया.
इस योजना में स्रोतवार विद्युत आवश्यकता में FDRE को किसी भी श्रेणी के तहत शामिल नहीं किया गया, इसके बावजूद RUVITL ने 26 मई 2025 को आयोजित 67वीं बोर्ड बैठक में SECI द्वारा प्रस्तुत 630 मेगावाट FDRE बिजली की 25 वर्षों के लिए ₹4.98-4.99 प्रति यूनिट (SECI को ₹0.07/यूनिट का ट्रेडिंग मार्जिन छोड़कर) दर पर खरीद को स्वीकृति दे दी वह भी बिना राजस्थान की आवश्यकताओं व आर्थिकता का उचित विश्लेषण किए.

जोधपुर एम्स का ट्रॉमा ब्लॉक गंभीर व्यवहारिक खामियों के साथ हाई टेंशन लाइन के खतरे से भी जूझ रहा है
जोधपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में करोड़ों की लागत से निर्माणाधीन ट्रॉमा ब्लॉक और क्रिटिकल केयर ब्लॉक (CCB) न केवल डिज़ाइन और निर्माण से जुड़ी गंभीर व्यवहारिक कमियों से जूझ रहा है, बल्कि अब यह विद्युत की हाई टेंशन लाइन के बेहद निकट होने के कारण और अधिक चिंताओं का विषय बन गया है।इस परियोजना में न मेडिकल और सर्जिकल स्टोर के लिए समुचित स्थान तय किया गया है, न ही ब्लड बैंक की व्यवस्था है और न ही आपदा प्रबंधन (डिज़ास्टर एरिया) के लिए पृथक स्थान निर्धारित किया गया है। इन कमियों के चलते यह निर्माण कार्य पहले ही विशेषज्ञों और चिकित्सा कर्मियों के बीच आलोचना का विषय बना हुआ है।
चिंता की बात यह है कि निर्माणाधीन ट्रॉमा ब्लॉक के बिल्कुल पास से विद्युत की हाई टेंशन लाइन गुजर रही है, जिससे न केवल चिकित्सा उपकरणों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, बल्कि निर्माण कार्य के दौरान श्रमिकों और अन्य लोगों की जान को भी गंभीर खतरा बना रहता है।ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि इतने संवेदनशील संस्थान के निर्माण में ये बुनियादी बातें कैसे नजरअंदाज की गईं? क्या नियोजन से लेकर निर्माण तक जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसियों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया? यह लापरवाही अब नीयत पर भी सवाल खड़े कर रही है।

कर्मचारी चयन आयोग (SSC) परीक्षाओं में हालिया अव्यवस्थाओं को लेकर कटघरे में है.
देशभर में SSC परीक्षाएं या तो रद्द कर दी गई या कई घंटे देरी से शुरू हुईं. कई परीक्षा केंद्र समय पर नहीं खुले, कहीं स्टाफ नदारद रहे, और छात्रों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.
गड़बड़ियों के लिए पूर्व वेंडर कंपनी TCS (Tata Consultancy Services) कटघरे में है. हालांकि टीसीएस ने इन आरोप को झूठा और निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है.
तो आखिर समाधान क्या है
SSC परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित की जाए.
घोषित परिणामों की पुनः समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र तकनीकी समिति का गठन हो.
सभी परीक्षा एजेंसियों की भूमिका की जांच और दोषियों पर जवाबदारी तय की जाए.
छात्रों की सुरक्षा से संबंधित घटनाओं की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाए.

Russia is Just an Excuse, The Global South Will Pay for Trump’s Tariff War
During the Republican Party’s nomination for the presidency in 2016, Donald Trump declared, “Anyone who thinks my story is over is mistaken.” Only Trump knows what story he has in mind. But now, as U.S. President, he has imposed a 25% tariff on all Indian imports, effective August 1, 2025. This hardline strategy is part of a broader U.S. effort to shore up its waning dominance in a world where alliances like BRICS (including Brazil, Russia, India, China, South Africa, and its new members) are accelerating calls for a multipolar global order.Washington’s anxieties have been compounded by growing discussions around “de-dollarization” at BRICS summits and high-profile collaboration among Asian powers India, China, and Russia that increasingly sideline U.S. influence. The move has shocked policymakers in New Delhi, with concerns mounting over its potential to undercut India’s export-led growth and job creation.For context, Trump’s tariff regime is part of a broader global shift: earlier this year, the U.S. dramatically increased tariffs on China—reaching as high as 145% before negotiating a temporary reduction to 30%. These China tariffs are expected to remain in place until fresh agreements are reached by mid-August 2025. India’s exports to the U.S., valued at nearly $79–90 billion, span sectors from technology and pharmaceuticals to automobiles and garments. With the U.S. being one of India’s largest export destinations, the 25% tariff is projected to shave at least 20–40 basis points off India’s GDP growth for the year.Simultaneously, American multinationals like Apple, which have shifted production to India, now face new operational uncertainties. Washington’s explicit goal remains the defense of U.S. “economic sovereignty” in a world increasingly shaped by BRICS and emerging multipolar alliances. Meanwhile, China’s negotiated reduction means Beijing currently faces a less severe U.S. tariff regime (30%) compared to India’s 25% plus additional penalties. This relative advantage weakens India’s competitive edge in global manufacturing chains at least in the short term until, or unless, India can negotiate similar tariff relief. These developments underscore a volatile phase in global commerce, where headline tariffs are no longer just tools of trade, but levers in a wider contest for influence among the world’s largest economies.

अस्तित्व बचाने के लिए तरस रही है अरावली हिल्स
अरावली पर्वत श्रृंखला, जो भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, वर्तमान में कई चुनौतियों का सामना कर रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अवैध खनन अरावली पर्वतमाला के लिए एक प्रमुख खतरा बन चुका है। 1975 से 2019 के बीच, अरावली पहाड़ियों का लगभग 8% हिस्सा गायब हो गया है, जिसमें से 5% भाग बंजर भूमि में बदल गया है और 1% भाग बस्तियों में।
भारत की भौगोलिक संरचना में अरावली को प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला माना गया है और यह विश्व की भी प्राचीनतम श्रृंखलाओं में शामिल है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान को उत्तर से दक्षिण दो भागों में विभाजित करती है। अरावली का सर्वोच्च शिखर गुरुशिखर (1727 मीटर) सिरोही जिले के माउंट आबू में स्थित है। अरावली पर्वतमाला की कुल लंबाई गुजरात से दिल्ली तक 692 किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 80% भाग राजस्थान में आता है। अरावली की औसत ऊँचाई लगभग 930 मीटर है, और इसकी दक्षिणी ऊँचाई व चौड़ाई सर्वाधिक मानी जाती है।
अरावली पर्वतमाला प्राकृतिक संसाधनों एवं खनिजों से परिपूर्ण है तथा यह पश्चिमी मरुस्थल के विस्तार को रोकने में सहायक है। यह बाना, लूनी, साखी एवं साबरमती जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है।
वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने 2017 में अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि हरियाणा में अरावली पर्वतमाला के जंगल अब भारत के सबसे संकटग्रस्त वन बन चुके हैं। यहाँ अधिकांश देशी पौधों की प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं। तेज़ी से हो रही वनों की कटाई और विकासात्मक गतिविधियाँ इसके लैंडस्केप को नष्ट कर रही हैं, जिनके तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है।
दिल्ली-NCR से लेकर राजस्थान के एक दर्जन से अधिक जिलों में फैली अरावली पर्वतमाला का अस्तित्व अवैध खनन की वजह से आने वाले वर्षों में संकट में आ सकता है। लोकसभा में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार, राजस्थान राज्य में अरावली में बीते पाँच वर्षों में 27,000 से अधिक अवैध खनन, परिवहन व भंडारण के मामले दर्ज किए गए, जिनमें से मात्र 13% मामलों में ही एफआईआर दर्ज की गई। सरकार का कहना है कि इस अवधि में 244 करोड़ रुपए का जुर्माना वसूला गया है, लेकिन क्या इस जुर्माने से अरावली के अस्तित्व को बचाया जा सकेगा?
क्या उच्चतम न्यायालय द्वारा खनन अनुमत करना पड़ा भारी?
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा टी. एन. गोदावर्मन बनाम भारत सरकार व अन्य के मामले में, वर्ष 1995 की रिट याचिका संख्या (C) 202 की विभिन्न अंतरिम याचिकाओं में दिनांक 29 एवं 30 अक्टूबर, 2002 और 16 दिसम्बर, 2002 को अपने आदेश के तहत समूची अरावली पहाड़ी श्रृंखला में सभी खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया था।
किन्तु बाद में, दिनांक 08 अक्टूबर, 2009 को अपने आदेश द्वारा न्यायालय ने कतिपय शर्तों सहित अरावली पहाड़ी क्षेत्र में कुछ क्षेत्रों में खनन कार्य की अनुमति प्रदान की। उन शर्तों में से एक प्रमुख शर्त यह थी कि खनन गतिविधियाँ वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के अंतर्गत पूर्व अनुमोदन तथा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत स्वीकृति प्राप्त करने के पश्चात ही प्रारंभ की जा सकती थीं।
ऐसे में, भारत की संसद में वर्ष 2017 के बजट सत्र के दौरान जब अरावली क्षेत्र को लेकर विशेष नीति की मांग उठी, तब सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णयों का हवाला देते हुए किसी प्रकार की नई नीति लाने की आवश्यकता नहीं मानी।
अरावली के जंगल नहीं रहे तो क्या दिल्ली-NCR पर खड़ा होगा गंभीर पर्यावरण संकट?
अतिक्रमण, शहरीकरण, अनधिकृत विकासात्मक गतिविधियाँ और पर्यावरणीय उल्लंघन अरावली की पहाड़ियों में नाज़ुक पारिस्थितिकीय संतुलन को प्रभावित कर रहे हैं। जब इस विषय में केंद्र सरकार से सवाल पूछा जाता है, तो वह 29 नवम्बर 1999 की एक अधिसूचना का हवाला देती है जिसके तहत अरावली क्षेत्र में पर्यावरण की गुणवत्ता की सुरक्षा और सुधार हेतु सभी अधिकार हरियाणा और राजस्थान की राज्य सरकारों को सौंपे गए थे।
इस अधिसूचना के अनुसार, संबंधित राज्य सरकारों के पर्यावरण विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति तथा हरियाणा के गुड़गांव व राजस्थान के अलवर जिलों में जिला अधिकारी की अध्यक्षता में एक मॉनिटरिंग समिति के गठन का प्रावधान था जो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के उल्लंघनों पर कार्यवाही करेगी।
मगर वास्तविकता यह है कि ये समितियाँ कागज़ों में ही धूल फांक रही हैं। ऐसे में, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा अरावली में खुदाई को जघन्य अपराध घोषित करने और पर्यावरण संरक्षण को लेकर सख्त दिशा-निर्देश देने के बावजूद, हजारों वर्ष पुरानी आसमान छूती अरावली श्रृंखला पर आज गंभीर संकट मंडरा रहा है।

हार्वर्ड के वैज्ञानिक ने यह कहकर चौंका दिया है- एलियन हमारी तरफ बढ़ रहे हैं या शायद उनका बनाया कोई जांच उपकरण, एलियन की एक बार फिर चर्चा क्यों होने लगी है, यह जानिए
स्टीफन हॉकिंग ने (एलियन) से संपर्क करने की कोशिशों को लेकर बार-बार चेतावनी दी थी कि यह मानवता के लिए खतरनाक हो सकता है. उन्होंने यह कहा था कि जबकि हम परग्रही जीवन (एलियन) की खोज में सुनना (सिग्नल सुनना) जारी रख सकते हैं, लेकिन हमें अपनी स्थिति या संदेश सक्रिय रूप से अंतरिक्ष में नहीं भेजना चाहिए क्योंकि उन्नत एलियन प्रजातियां हमारे लिए दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम ला सकती हैं, जैसा कि इतिहास में शक्तिशाली सभ्यताओं और कमज़ोर सभ्यताओं के टकराव में देखा गया है.
अब, एक बार एलियन की चर्चा हो रही है. दरअसल, 3I/ATLAS नामक 7-मील चौड़ा एक वस्तु 150,000 मील/घंटा की रफ्तार से हमारे सौरमंडल में आ रही है. यह ऑब्जेक्ट 2025 के अक्टूबर में सूर्य के सबसे नज़दीक आएगा, लेकिन इसका पथ पृथ्वी से काफी दूर है. यह पृथ्वी के लिए कोई खतरा नहीं है. यह ऑब्जेक्ट वास्तव में एक इंटरस्टेलर (सौरमंडल से बाहर से आया) धूमकेतु है और वैज्ञानिकों ने इसकी कक्षा का विश्लेषण कर बताया है कि यह पृथ्वी के काफी दूर लगभग 1.8 खगोलीय इकाई (AU), यानी 270 मिलियन किमी से गुजरेगा.
हालांकि अधिकांश खगोलविद इसे धूमकेतु मानते हैं, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवि लोएब ने यह संभावना जताई है कि 3I/ATLAS वास्तव में एलियनों द्वारा बनाया गया जांच-उपकरण (probe) भी हो सकता है.
लोएब और उनके शोध दल ने इसके असामान्य रास्ते, तेज गति, और ग़ैर-परंपरागत विशेषताओं का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि संभवतः यह सिर्फ़ एक औसत धूमकेतु नहीं है. लोएब का कहना है कि जब तक पूरे साक्ष्य नहीं मिल जाते, कोई भी संभावना खारिज नहीं की जा सकती, चाहे वह स्वाभाविक रूप से बना पिंड हो या किसी तकनीकी सभ्यता का उपकरण. हालांकि वर्तमान में कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है कि यह वस्तु एलियन जांच है; यह विचार वैज्ञानिक समुदाय में विवादित और बहुत हद तक अटकलों पर आधारित है. हार्वर्ड के इन वैज्ञानिक का दावा है कि उन्होंने पहले भी एलियन जीवन के प्रमाण देखे हैं और उन्हें संदेह है कि यह वस्तु एलियन मूल की हो सकती है.
“एक विजिटर से ब्लाइंड डेट”
उनकी यह पूरा दावा बेहद ही दिलचस्प है. वह उसे ब्लाइंड डेट की तरह बताते हैं. प्रोफेसर लोएब का कहना है, “मुझे लगता है कि जब किसी दूसरे स्टार के विज़िटर से हमारी ब्लाइंड डेट होती है, तो सारी शर्तें खत्म हो जाती हैं. हमें कुछ भी मानकर नहीं चलना चाहिए और हमें अपने पास मौजूद आंकड़ों के आधार पर जोखिम का आकलन करना चाहिए.”
आखिर वैज्ञानिक एलियन पर अपने दावे को इतना पुख्ता क्यों बता रहे हैं, वो भी समझिए
एलियंस पर प्रोफेसर लोएब ने कहा, “हम कॉस्मिक स्ट्रीट पर बहुत सारे घर देखते हैं जो बिल्कुल हमारे जैसे दिखते हैं, पृथ्वी के सौर मंडल के अनुरूप. और मुझे लगता है कि यह मान लेना कि उनके कोई निवासी नहीं है, यह बिल्कुल गलत है.”

अमेरिका के टैरिफ वॉर, चीन की बढ़ती ताकत के बीच एक यह भी सवाल अब वैश्विक समुदाय में उठ रहा है कि भारत किस प्रकार की महान शक्ति बनेगा?
सवाल यह भी कि 4 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की इकोनॉमी, तेज़ी से बढ़ती रक्षा क्षमता और ‘ग्लोबल साउथ’ के कई देशों पर प्रभाव वाले भारत की अगली रणनीति क्या होगी?
अनुमान है कि 2040 तक भारत की जीडीपी 10 ट्रिलियन डॉलर तक हो जाएगी, जो प्रगतिशील परिवर्तन की ओर इशारा करता है. हालांकि चीन के मामले में भारत के लिए चुनौतियां बहुत हैं सीमा-विवाद, अस्थिर व्यापार घाटा, भारतीय उपमहाद्वीप और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, पाकिस्तान के लिए व्यापक चीनी सैन्य और राजनयिक समर्थन और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित बहुपक्षीय संस्थानों में चीन का कड़ा विरोध
वहीं, टैरिफ वॉर के लिहाज से बात करें तो रूस के अलावा, भारत के अन्य निकटतम वैश्विक साझेदार, ऑस्ट्रेलिया, जापान, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ सहित सभी पारंपरिक अमेरिकी सहयोगी हैं. अब चिंता नई दिल्ली में संशय की नहीं, बल्कि वाशिंगटन में संशय की है.
चीन के साथ भारत संबंध रखते हुए सतर्क भी है, जो तनाव कम करने और प्रतिरोध दोनों पर आधारित है यानी एक ऐसा फॉर्मूला, जो संघर्ष को आमंत्रित किए बिना प्रतिस्पर्धा को प्रबंधित करने का प्रयास करता है. QUAD जैसा सुरक्षा गठबंधन, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं.
लेकिन इसे Isolation में नहीं देखा जा सकता है, पूरी दुनिया में महाशक्तियों के कम होते असर में भी भारत के नए समीकरण को समझना होगा. अमेरिका यूरोप में अपनी सुरक्षा गारंटियों, दक्षिण कोरिया में सैनिकों की संख्या, जापान को रक्षा योगदान और ऑस्ट्रेलिया को पनडुब्बी टेक्नोलॉजी ट्रांसफऱ की शर्तों पर पुनर्विचार कर रहा है. दूसरी ओर, अमेरिकी रक्षा उपसचिव एल्ब्रिज कोल्बी ने पिछले सितंबर में लिखा था- भारत पुराने अर्थों में एक सहयोगी है, जिसे एक स्वतंत्र और स्वायत्त साझेदार माना जाता है. यानी एशिया या मध्य पूर्व के कई अन्य साझेदारों के विपरीत, भारत संयुक्त राज्य अमेरिका से सहायता, अड्डे या सैनिक नहीं चाहता है.
जब दुनिया संकट से जूझ रही है तो भारत के सामने कई अवसर हैं
यूरोप में रक्षा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि तो हुई है बावजूद इसके अधिकांश एडवांस इकोनॉमी वाले देश अर्थव्यवस्थाएं बढ़ती उम्र और घटती आबादी, इमिग्रशेन पॉलिसी पर विवाद, वेलफेयर मॉडल यानी कल्याणकारी प्रणालियों पर दबाव, धीमे नवाचार और अमेरिका पर सैन्य निर्भरता से जूझ रहे हैं. संयुक्त राज्य अमेरिका के अलावा, जी-7 के छह अन्य सदस्यों (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और यूनाइटेड किंगडम) की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी 1991 के बाद से 42 प्रतिशत से घटकर महज 18 प्रतिशत रह गई है.

दम तोड़ती RTI को हाइकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से मिलेगा ऑक्सीजन, तानाशाही संस्थाओं के मुंह पर करारा तमाचा यह निर्णय
अफसरशाही के लिए ‘नॉन कोर’ हो चुके RTI एक्ट के लिए राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है.
सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के लागू होने के 2 दशक में ऐतिहासिक फैसला है. संभवतः यह पहली बार है जब RTI एक्ट के तहत राशि राजकोष में ना जाकर आवेदक को दी जाएगी. यह फैसला राजस्थान हाईकोर्ट ने राजसमंद जिले के देवगढ़ – मदारिया निवासी गोपाल कंसारा को सूचना का अधिकार अधिनियम-2006 के तहत सुनाया है जिसमे आवेदक को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19(8)(बी) के तहत प्रताड़ना पर मुआवजा दिलाया जाएगा. हाईकोर्ट की जयपुर बेंच में ने प्रतिवादी को अनावश्यक रूप से परेशान करने की वजह से विश्वविद्यालय पर जुर्माना ठोका है और जुर्माने की राशि को राजकोष की बजाय आवेदक को अदा करने का निर्णय दिया है
गोपाल कंसारा ने 21 अगस्त 2008 को सूचना की अधिकार अधिनियम- 5 की धारा 6 में राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (RUHS) जयपुर से जानकारी मांगी थी. उन्होंने RTI के तहत वर्ष 2008 की राजस्थान प्री मेडिकल टेस्ट से संबंधित सूचना मांगी थी. लेकिन RUHS की ओर से सूचना नहीं दी गई. इसके लिए कंसारा की ओर से पहली और दूसरी अपील का जवाब नहीं मिलने पर राजस्थान राज्य सूचना अयोग में परिवाद दिया गया.
सूचना आयुक्त के फैसले के खिलाफ कोर्ट में लगी थी याचिका
तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त श्रीनिवासन ने 12 दिसंबर 2011 को बी. जैन उप कुलसचिव पर 10 हजार रुपए पेनल्टी लगाई. इसके खिलाफ राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय-जयपुर के रजिस्ट्रार ने हाई कोर्ट- जयपुर में वर्ष 2012 में रिट फाईल की.
क्यों अहम है यह फैसला?
दरअसल, आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के तहत, यदि किसी लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर जुर्माना लगाया जाता है, तो वह जुर्माना सरकारी खजाने में जमा किया जाता है. कभी भी इस राशि को याचिकाकर्ता को नहीं दिया गया. फैसले को सिर्फ इस लिहाज से नहीं देखा जाए कि यह राशि किसके खाते में जाएगी. बल्कि अहम बात यह है कि सूचना को सार्वजनिक ना करने या जनता तक सूचना ना पहुंचाने वाली संस्थाओं के लिए यह सबक है. सबक इसलिए भी क्योंकि ऐसी कई सूचनाएं दबाने के साथ ही भ्रष्ट तंत्र की जानकारियां छुपी रह जाती हैं.
अब नियम भी जानिए
आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के तहत, यदि कोई लोक सूचना अधिकारी (PIO) बिना किसी उचित कारण के सूचना देने से इनकार करता है या जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक जानकारी देता है, तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है. जुर्माना 250 रुपये प्रतिदिन हो सकता है, जिसकी अधिकतम सीमा 25,000 रुपए है.
कोर्ट ने इस शक्ति का किया उपयोग
कोर्ट का यह फैसला अधिनियम की धारा 19(8)(बी) के तहत दिया गया है, जिसमें सूचना आयोग के लिए प्रावधान है कि आवेदक को भी मुआवजा देने निर्देश दिया जा सकता है. लेकिन ऐसा तब होता है, “जब आवेदक को यह साबित करता है कि सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा सूचना उपलब्ध कराने में विफलता या आरटीआई आवेदन के दौरान उत्पीड़न के कारण उन्हें हानि या नुकसान हुआ है.”

उत्तरकाशी की घटना का जिम्मेदार हमारा ‘विकास का मॉडल’ है! ऐसी आपदाएं हमारे डेवलपमेंट प्लान के लिए खतरे की घंटी होती हैं, लेकिन सरकारों के लिए यह मुख्य मुद्दा ही नहीं है?*
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बादल फटने (Cloudburst) की घटना ने तबाही का जो मंजर दिखाया, वो खौफनाक है. खासकर धराली गांव और यमुनोत्री हाईवे के पास सिलाई बैंड इलाके में जिस तरह नदियों और नालों में अचानक बाढ़ आ गई और मलबा बस्तियों और सड़कों में घुस गया, उसे देखकर तो जैसे रूह भी कांप जाए. ऐसा तबाही का मंजर इसलिए है क्योंकि हमारा ‘विकास का मॉडल’ अव्यवस्थित है. ना तो निर्माण कार्य में कोई वैज्ञानिक सोच दिखती है और ना ही जंगलों की कटाई रुक रही है. नदियों के किनारे हो रहे अनियंत्रित विकास ने जोखिम और तबाही की तीव्रता को भी बढ़ा दिया है. उदाहरण के तौर पर, उत्तरकाशी की घटना की वजह पर बात करें तो वजह है- उत्तरकाशी समेत उत्तराखंड के कई हिस्सों में वनों के कटान से जलस्रोतों का प्रवाह का घटना. कुछ क्षेत्रों में तो 30% जलस्रोत मौसमी रह गए और 17% पूरी तरह सूख गए. रिसर्च के अनुसार, जिन क्षेत्रों के बांज के जंगल कट गए वहां जल की उपलब्धता घटी है, जिससे किसानों और ग्रामीणों को भारी दिक्कत हुई.
जब टिहरी बांध परियोजना लाई गई तो 1970 के दशक में इसका काफी विरोध हुआ, जो एक बड़े आंदोलन में तब्दील हुआ था. विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभावों और भूकंप जोखिमों की आशंका की वजह से इस आंदोलन ने काफी जोर पकड़ा था. हालांकि बावजूद इसके काम, 2006 में पूरा हुआ. अब बादल फटने की वजह को इसे भी कारण बताया जा रहा है. दरअसल, जिस भागीरथी नदी का जलग्रहण क्षेत्र पहले काफी सीमित था, बांध बनने के बाद वह बहुत बढ़ गया है. इतनी बड़ी मात्रा में एक जगह पानी इकट्ठा होने से बादल बनने की प्रक्रिया तेज हो गई है. मानसून सीजन में ये बादल इस पानी को ‘सह’ नहीं पाते और फट जाते हैं.
सन् 1983-98 के दौरान टिहरी और उत्तरकाशी के कई वन क्षेत्रों (जैसे– गोमुख, जांगला, नेलंग, हर्षिल, मोरी, आदि) में वन माफियाओं और विभाग की मिलीभगत से रातों-रात हरे पेड़ काटे गए. इससे जंगलों में पेड़ की संख्या तेजी से घटी और जलस्रोतों पर बुरा असर पड़ा.
एक वजह, उत्तरकाशी जिले में यमुना तट और अन्य नदियों के किनारे हो रेत और पत्थर का अवैध खनन भी है. इस पर कई कंपनियों और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ जांच और एनजीटी द्वारा दंड की कार्यवाही भी हो चुकी है. ऐसे खनन के मामले में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी सामने आई, जिससे नदियों का स्वरूप, प्रवाह और आस-पास की भूमि बुरी तरह प्रभावित हुई.
चारधाम यात्रा मार्ग, गंगोत्री हाईवे, आदि सड़क परियोजनाओं में भारी संख्या में पेड़ों की कटाई की गई. क्षेत्र के विशेषज्ञों और ग्रामीणों ने चेताया कि इससे भूस्खलन और आपदाओं का खतरा और बढ़ गया है.
इन सबके, बीच कुछ सालों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पूरे मानसून सीजन में बारिश तो लगभग समान ही रिकॉर्ड हो रही है, लेकिन ‘रेनी डे’ (किसी एक स्थान पर एक दिन में 2.5 मिमी या उससे अधिक बारिश दर्ज होने को ‘रेनी डे’ कहा जाता है) की संख्या में कमी आई है. अब बारिश पहले के मुकाबले 7 दिनों की बजाय केवल 3 दिनों में ही हो जा रही है, जिससे हालात बिगड़ रहे हैं. मानसून सीजन भी जून से सितंबर तक फैला होता था, वह अब सिकुड़कर केवल जुलाई-अगस्त तक सिमट गया है.
मैदानी क्षेत्रों से वन गायब
अतिवृष्टि के लिए वन क्षेत्र का मैदानी इलाकों से खत्म होना भी बड़ी वजह है. उत्तराखंड के 70% से अधिक क्षेत्र में वन हैं, लेकिन मैदानी क्षेत्रों में वन नाममात्र के ही हैं. ऐसे में मानसूनी हवाओं को मैदानों में बरसने के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिल पाता और पर्वतीय क्षेत्रों में घने वनों के ऊपर पहुंचकर मानसूनी बादल अतिवृष्टि के रूप बरस जाते हैं. आज जरूरत सिर्फ पर्वतीय क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि मैदानी क्षेत्रों में भी तीव्र वनीकरण की आवश्यकता है.उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बादल फटने (Cloudburst) की घटना ने तबाही का जो मंजर दिखाया, वो खौफनाक है. खासकर धराली गांव और यमुनोत्री हाईवे के पास सिलाई बैंड इलाके में जिस तरह नदियों और नालों में अचानक बाढ़ आ गई और मलबा बस्तियों और सड़कों में घुस गया, उसे देखकर तो जैसे रूह भी कांप जाए. ऐसा तबाही का मंजर इसलिए है क्योंकि हमारा ‘विकास का मॉडल’ अव्यवस्थित है. ना तो निर्माण कार्य में कोई वैज्ञानिक सोच दिखती है और ना ही जंगलों की कटाई रुक रही है. नदियों के किनारे हो रहे अनियंत्रित विकास ने जोखिम और तबाही की तीव्रता को भी बढ़ा दिया है. उदाहरण के तौर पर, उत्तरकाशी की घटना की वजह पर बात करें तो वजह है- उत्तरकाशी समेत उत्तराखंड के कई हिस्सों में वनों के कटान से जलस्रोतों का प्रवाह का घटना. कुछ क्षेत्रों में तो 30% जलस्रोत मौसमी रह गए और 17% पूरी तरह सूख गए. रिसर्च के अनुसार, जिन क्षेत्रों के बांज के जंगल कट गए वहां जल की उपलब्धता घटी है, जिससे किसानों और ग्रामीणों को भारी दिक्कत हुई.
जब टिहरी बांध परियोजना लाई गई तो 1970 के दशक में इसका काफी विरोध हुआ, जो एक बड़े आंदोलन में तब्दील हुआ था. विस्थापन, पर्यावरणीय प्रभावों और भूकंप जोखिमों की आशंका की वजह से इस आंदोलन ने काफी जोर पकड़ा था. हालांकि बावजूद इसके काम, 2006 में पूरा हुआ. अब बादल फटने की वजह को इसे भी कारण बताया जा रहा है. दरअसल, जिस भागीरथी नदी का जलग्रहण क्षेत्र पहले काफी सीमित था, बांध बनने के बाद वह बहुत बढ़ गया है. इतनी बड़ी मात्रा में एक जगह पानी इकट्ठा होने से बादल बनने की प्रक्रिया तेज हो गई है. मानसून सीजन में ये बादल इस पानी को ‘सह’ नहीं पाते और फट जाते हैं.
सन् 1983-98 के दौरान टिहरी और उत्तरकाशी के कई वन क्षेत्रों (जैसे– गोमुख, जांगला, नेलंग, हर्षिल, मोरी, आदि) में वन माफियाओं और विभाग की मिलीभगत से रातों-रात हरे पेड़ काटे गए. इससे जंगलों में पेड़ की संख्या तेजी से घटी और जलस्रोतों पर बुरा असर पड़ा.
एक वजह, उत्तरकाशी जिले में यमुना तट और अन्य नदियों के किनारे हो रेत और पत्थर का अवैध खनन भी है. इस पर कई कंपनियों और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ जांच और एनजीटी द्वारा दंड की कार्यवाही भी हो चुकी है. ऐसे खनन के मामले में पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी सामने आई, जिससे नदियों का स्वरूप, प्रवाह और आस-पास की भूमि बुरी तरह प्रभावित हुई.
चारधाम यात्रा मार्ग, गंगोत्री हाईवे, आदि सड़क परियोजनाओं में भारी संख्या में पेड़ों की कटाई की गई. क्षेत्र के विशेषज्ञों और ग्रामीणों ने चेताया कि इससे भूस्खलन और आपदाओं का खतरा और बढ़ गया है.
इन सबके, बीच कुछ सालों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पूरे मानसून सीजन में बारिश तो लगभग समान ही रिकॉर्ड हो रही है, लेकिन ‘रेनी डे’ (किसी एक स्थान पर एक दिन में 2.5 मिमी या उससे अधिक बारिश दर्ज होने को ‘रेनी डे’ कहा जाता है) की संख्या में कमी आई है. अब बारिश पहले के मुकाबले 7 दिनों की बजाय केवल 3 दिनों में ही हो जा रही है, जिससे हालात बिगड़ रहे हैं. मानसून सीजन भी जून से सितंबर तक फैला होता था, वह अब सिकुड़कर केवल जुलाई-अगस्त तक सिमट गया है.
मैदानी क्षेत्रों से वन गायब
अतिवृष्टि के लिए वन क्षेत्र का मैदानी इलाकों से खत्म होना भी बड़ी वजह है. उत्तराखंड के 70% से अधिक क्षेत्र में वन हैं, लेकिन मैदानी क्षेत्रों में वन नाममात्र के ही हैं. ऐसे में मानसूनी हवाओं को मैदानों में बरसने के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिल पाता और पर्वतीय क्षेत्रों में घने वनों के ऊपर पहुंचकर मानसूनी बादल अतिवृष्टि के रूप बरस जाते हैं. आज जरूरत सिर्फ पर्वतीय क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि मैदानी क्षेत्रों में भी तीव्र वनीकरण की आवश्यकता है.

