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अमेरिकी टैरिफ से हिला भारतीय बाज़ार, Make in India पर मंडराता खतरा!

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राजस्थान के नगीनों- मार्बल की भी फीकी पड़ेगी चमक, MSME को बचाने के लिए सरकार के पास क्या है उपाय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत का बाजार हिल सा गया है. इस टैरिफ से भारत के अमेरिका निर्यात का लगभग 67% (करीब 58 अरब डॉलर) प्रभावित होगा यानी जीडीपी का करीब 1.5%. भारत का ऑटो कंपोनेंट सेक्टर तेज़ी से बढ़ रहा है और अमेरिका इसका सबसे बड़ा निर्यातक है. 2024 में अमेरिका को 6.6 अरब डॉलर के पुर्जे भेजे गए, जिनमें कार व छोटे ट्रक के पुर्जों पर 25% और बड़े ट्रक व कृषि उपकरण के पुर्जों (कुल 3 अरब डॉलर) पर 50% टैरिफ लगेगा. इससे व्यावसायिक वाहन सेक्टर पर सीधा दबाव बढ़ेगा. वहीं, राजधानी जयपुर से लेकर राजस्थान का पूरा बाजार बुरी तरह प्रभावित होगा. प्रदेश के मार्केट का बूस्टर मार्बल, ज्वैलरी से लेकर गारमेंट उद्योग तक धीमा पड़ सकता है. राजस्थान का बाजार कैसे होगा प्रभावित, ऐसे समझिए ⦁राजस्थान के करीब 20 हजार करोड़ रुपए के निर्यात पर सीधा खतरा मंडरा रहा है. प्रदेश के रत्न एवं आभूषण कारोबार को भी झटका लगने की आशंका है. जयपुर रंगीन नगीनों और हीरों से जड़े आभूषणों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है. लेकिन ट्रंप टैरिफ ने इसकी तस्वीर बदल दी है. इसका सीधा नुकसान राजस्थान के रत्न और आभूषण व्यापारियों को उठाना होगा, हालांकि इसकी भरपाई के लिए नए बाजार तलाशने शुरू कर दिए हैं. ⦁टैरिफ की दरें 50% से 63.9% तक पहुंच गई हैं, जिससे टेक्सटाइल (Textiles), गारमेंट्स (Garments), जेम्स एंड ज्वेलरी, मार्बल, ग्रेनाइट-क्वार्ट्ज, हैंडीक्राफ्ट और कारपेट जैसे उद्योगों को चोट पहुंच सकती है. इस उद्योग से सीधे तौर पर 7 लाख से ज्यादा लोगों के रोजगार जुड़े हुए हैं. ⦁ट्रम्प की 25% अतिरिक्त टैरिफ घोषणा के बाद भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों के लिए परेशानी बढ़ गई है. वियतनाम (20% टैरिफ), इंडोनेशिया (19% टैरिफ) और तुर्किए (सिर्फ 10% टैरिफ) जैसे देशों पर कम टैरिफ होने के चलते राजस्थान के निर्यातकों के लिए बाजार में मुकाबला करना काफी भारी होगा. वहीं, जेम्स एंड ज्वेलरी, टेक्सटाइल, फर्नीचर, मार्बल और ग्रेनाइट उद्योगों के लिए तुर्किए अब सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. ⦁हालांकि ये तमाम तो दीर्घकालीन चुनौतियां हैं. लेकिन तात्कालिक तौर पर राजस्थान के व्यापारियों के सामने एक बड़ी चुनौती है. 25 फीसदी टैरिफ के अलावा अतिरिक्त 25% जुर्माना 28 अगस्त से लागू होगा. अगर व्यापारियों को अमेरिका में माल बेचना है तो उनके पास महज 14 दिन है. ऐसे में उनके लिए काफी कम समय में ज्यादा से ज्यादा सामान निर्यात करने के लिए चुनौती है. ⦁जोधपुर लकड़ी के फ़र्नीचर और धातु हस्तशिल्प का एक प्रमुख निर्यातक है, यहां से अमेरिका को सालाना 2500 करोड़ रुपए का सामान भेजा जाता है, जो उसके कुल निर्यात का आधे से भी ज़्यादा है. टैरिफ़ बढ़ोतरी से लगभग एक लाख कारीगरों और कामगारों की रोज़ी-रोटी पर ख़तरा मंडरा रहा है. जबकि इस मामले में तुर्की और मेक्सिको जैसे प्रतिस्पर्धियों पर सिर्फ़ 10% टैरिफ है, जाहिर तौर पर इससे मुकाबला कड़ा होगा. ⦁बीकानेर के प्रसिद्ध ऊन उद्योग में 250 यूनिट्स प्रतिदिन 1-1.5 लाख किलो धागा बनाती हैं. इस उद्योग में 1 लाख लोग जुड़े हुए हैं. उदयपुर के क्वार्ट्ज़ उद्योग के मामले में अमेरिका को निर्यात का 40-45% हिस्सा आपूर्ति करता है.

बेहतर अवसर की तलाश में विदेश पलायन, युवाओं में बढ़ते सुसाइड केस; विकसित भारत की कल्पना बिना युवा भारत के साकार होगी?

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भारत का ‘विकसित भारत 2047’ दृष्टिकोण सशक्त आर्थिक और मानव संसाधन विकास पर निर्भर करता है, लेकिन ताज़ा आंकड़े दो गंभीर चुनौतियां दिखाते हैं. एक तरफ देश का टैलेंट हैं, जो विदेश में पलायन कर रहा है और दूसरी तरफ मानसिक दबाव के चलते सुसाइड करते युवा. रहे हैं. राज्यसभा को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बताया कि वर्ष 2011 से 2022 के बीच कुल 16 लाख 63 हजार 440 भारतीय (जिनमें उच्च शिक्षित पेशेवर शामिल थे) बेहतर अवसरों की तलाश में विदेश चले गए. साल 2022 में ही 2 लाख 25 हजार 620 भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ दी, जो कि पिछले 12 वर्षों में रिकॉर्ड है.

आर्थिक विकास के लिए कुशल मानव संसाधन जरूरी है, लेकिन भारत इस मामले में भारी अभाव झेल रहा है. ये रिसर्च बताती है कि देश की बेहतरीन तकनीकी संस्थानों (जैसे IIT) के लगभग एक-तिहाई स्नातक विदेश काम के लिए चले जाते हैं और भारतीय शोधकर्ता विश्वभर के विश्वविद्यालयों में सक्रिय हैं. इस तरह देश में लगा निवेश (शिक्षा पर खर्च) तो जैसे निर्यात ही हो गया है. इसके परिणामस्वरूप घरेलू उद्योग और अनुसंधान संस्थानों को कामगारों की कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे नवाचार और व्यवसाय में तेजी नहीं आ पाती. सरकार ने इस पलायन को ‘ब्रेन गेन’ में बदलने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री अनुसंधान छात्रवृत्ति (PMRF) योजना में चुने हुए शोधकर्ताओं को प्रति माह ₹70,000 से अधिक की छात्रवृत्ति और अनुसंधान अनुदान दिया जाता है, जिससे उन्हें विदेश न जाकर भारत में पढ़ाई करने का प्रोत्साहन मिले.

इसी तरह रामानुजन फेलोशिप और VAJRA कार्यक्रम ने विदेश में रहे भारतीय वैज्ञानिकों को भारत में शोध करने के लिए आमंत्रित किया है. इन पहल के अलावा स्थानीय तकनीकी स्टार्टअप, उद्यमशीलता पर भी ध्यान दिया जा रहा है. रोजगार सृजन, निवेश बढ़ाना और टैक्स राहत जैसे उपायों से यह सुनिश्चित किया जाना है कि देश के युवा स्वदेश में ही रोजगार के अवसर और बेहतर जीवन-महसूस करें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो साल 2047 तक भारत का 10 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य भी अधूरा रह सकता है.

बढ़ते आत्महत्या के मामले चिंता का विषय

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताज़ा रिपोर्ट ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2022’ के मुताबिक, साल 2022 में देशभर में 13 हजार से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की, जो 2021 की 6,654 की संख्या से दोगुनी थी. यह आंकड़ा देश में दर्ज कुल आत्महत्याओं का लगभग 7.6% है, जो चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है. रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि परीक्षाओं में असफल होना छात्रों की आत्महत्या के प्रमुख कारणों में से एक है. 18 वर्ष से कम आयु के 1,123 छात्रों ने केवल परीक्षा में असफल होने की वजह से अपनी जान दी, जिनमें 578 लड़कियां और 575 लड़के शामिल थे.

अगर सभी आयु समूहों को देखा जाए तो 2,095 लोगों ने परीक्षा में असफल होने के बाद आत्महत्या की. इनमें महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा 378 मामले दर्ज हुए, इसके बाद मध्य प्रदेश में 277 और झारखंड में 174 मामले आए. कर्नाटक (162) और गुजरात (155) भी इस सूची में प्रमुख रहे. पूरे 2022 में 18 साल से कम उम्र के 10,295 बच्चों ने आत्महत्या का कदम उठाया. इनमें लड़कियों की संख्या (5,588) लड़कों (4,616) की तुलना में थोड़ी अधिक थी.

आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज़्यादा आत्महत्या करने वाले वे लोग थे, जिनकी शिक्षा माध्यमिक स्तर तक थी, यह कुल आत्महत्याओं का 23.9% था. वहीं, शिक्षा से वंचित लोगों की संख्या 11.5% रही.

विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड और प्रवेश परीक्षाओं जैसे CUET, JEE, NEET में तीव्र प्रतिस्पर्धा और कोचिंग सेंटरों के अनियंत्रित विस्तार से यह संकट और गहरा हो रहा है. अत्यधिक कोचिंग घंटे, रटंत प्रणाली और ऊंची अभिभावक अपेक्षाएं वास्तविक सीखने के बजाय केवल अंक प्राप्ति पर जोर देती हैं, जिससे तनाव का वातावरण बनता है.

विस्थापन बनाम विकास में उलझा डूंगरी बाँध का निर्माण, क्यों है ग्रामीणों में असंतोष ? जानिए

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कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने 10 हज़ार करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले डूंगरी बांध के संबंध में सवाई माधोपुर में कहा कि कुछ लोग इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर घटिया राजनीति कर रहे हैं. लोग 76 गांव विस्थापित होने की झूठी खबरें फैला रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि सिर्फ 7-8 गांव ही इस परियोजना से प्रभावित होंगे और इन गांवों के लोगों को सरकार पूरा मुआवजा और रहने के लिए बेहतर जगह देगी.

ERCP के तहत सवाई माधोपुर जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर डूंगरी बांध बनने की जैसे ही आहट हुई, और बांध की जगह का सर्वे हुआ तो लोगों ने कहा कि इसके डूब क्षेत्र में 76 गांव आ रहे हैं. इनमें से सबसे ज़्यादा सवाई माधोपुर विधानसभा के 34, बामनवास के 20, खण्डार के 4, सपोटरा के 13 और गंगापुर सिटी विधानसभा क्षेत्र के 5 गांव शामिल होंगे. और इसके लिए 22 जून को भूरी पहाड़ी गांव में महापंचायत भी बुलाई गई, जिसमें हज़ारों लोग शामिल हुए. जिसमें प्रह्लाद गुंजल समेत कांग्रेस के कई नेता शामिल हुए थे.

सरकार ने ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है. ERCP सवाई माधोपुर के उपमहाप्रबंधक ने पहले सभी तसीलदारों और सरकारी विभागों को पत्र लिख कर सरकारी भूमि का बांध निर्माण के लिए लेने पर आपत्तियां मांगी थीं, सभी ने कहा कि विभागों को कोई आपत्ति नहीं है. उसके बाद 10 जून को सपोटरा तहसीलदार, 2 जून को खण्डार तहसीलदार और उसी दिन मलारना डूंगर के तहसीलदार को पत्र लिख कर गांव के लोगों से ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही.

अगर इन सभी तहसीलदारों को भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने लिए के लिए कहा जा रहा तो जाहिर तौर पर गांवों की संख्या 7 से ज़्यादा है. ऐसा इसलिए भी, क्योंकि 30 जून को सवाई माधोपुर में ERCP के जनरल मैनेजर ने सवाई माधोपुर के जिला कलेक्टर को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें सवाई माधोपुर में बांध के लिए 6530 हेक्टेयर यानी क़रीब 25 हज़ार 817 बीघा ज़मीन का अधिग्रहण करना है. इसी पत्र में उन्होंने लगभग 38 गांवों के नाम लिखे.

हालांकि, अभी तक ज़मीन अधिग्रहण के लिए किसी गांव से संपर्क नहीं किया गया है, लेकिन सोशल मीडिया पर लगातर गांवों के नामों की लिस्ट तैर रही है. लोग नेताओं को ज्ञापन दे रहे हैं. इससे पहले ERCP का क्रेडिट लेने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों में लड़ाई शुरू दिन चल रही है. लेकिन अब इस मामले में विस्थापन का विरोध का रहे लोगों के साथ कांग्रेस खड़ी हो गई है, जिसका असर सीधे तौर पर 6 विधानसभाओं में होने वाला है.

ज्योति बसु वाली ऐतिहासिक भूल कभी राहुल गांधी भी कर चुके हैं!

अब अपनी जमीन तलाशने के लिए एक बार फिर यात्रा पर निकल पड़ेंगे

बिहार में SIR को भुनाते विपक्ष का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी ने जोरदार तरीके से उठाया. ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाकर चुनाव आयोग को जमकर घेरते नजर आते हैं. वहीं, बीजेपी आरोप लगा रही है कि अपने कार्यकाल में 90 चुनाव हार चुके राहुल गांधी को संस्थाओं को बेवजह निशाना बनाने का बस बहाना चाहिए. इन सबके बीच, कांग्रेस पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के मुद्दे को पीछे छोड़ रही है, जिनके इस्तीफे से एक नरैटिव तैयार हुआ था. यह नरैटिव वोट चोरी जैसे सैद्धांतिक मुद्दों से कही ज्यादा इमोशनल इश्यू की तरह विपक्ष को बढ़त देता दिख रहा था. चुनाव प्रणाली पर बात करने को लेकर सवाल नहीं है, लेकिन जब सामने बिहार जैसे राज्य में चुनाव हो तो मुद्दों का चयन काफी अहम होता है.

बरहाल, ‘मस्तमौला’ राजनेता राहुल गांधी बिहार में वोटर अधिकार यात्रा पर निकल रहे हैं, जिसका रूटमैप भी आ गया है. 17 अगस्त से शुरू हो रही यात्रा के तहत राहुल गांधी 1 सितंबर तक बिहार में रहेंगे. इस दौरान 25 से अधिक जिलों को कवर करने का अनुमान है. भारत जोड़ो यात्रा की सफलता के बाद यात्राओं का दौर राहुल गांधी को राजनीति में अगले पड़ाव पर जाने का रास्ता नज़र आता है. उनके जीवन के राजनीतिक उद्देश्यों पर वो अक्सर जाहिर करते हैं कि राजा वाली ऑथोरिटी वो नहीं चाहते. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों मानते हैं कि वो विपक्ष के नेता रहते जिस तरह से खुद को साबित करने के लिए जूझ रहे हैं, वो शायद उन्हें जरूरत नहीं होती अगर वो 2009 के आसपास अपनी लोकप्रियता के वक्त पीएम का पद स्वीकार कर लेते.

2003 से 2013 तक राहुल गांधी की लोकप्रियता और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का सफर कई उतार-चढ़ाव भरा रहा. 2003 में युवा राजनेता के रूप में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय हुए राहुल गांधी ने 2004 के आम चुनाव में पहली बार अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीते. इसके बाद वे कांग्रेस के युवाओं के चेहरे के तौर पर उभरे. खासतौर से जब यूपी में पार्टी के पुनर्जीवन के प्रयासों में उनका बड़ा योगदान माना गया तो उनकी लोकप्रियता में भी काफी इजाफा हुआ. साल 2007-09 के दौरान उनकी अगुवाई में पार्टी को यूपी में कुछ हद तक मजबूती मिली और 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 21 सीटें मिलीं तो इसका श्रेय भी राहुल गांधी की रणनीति को ही दिया गया. एक वक्त ऐसा भी आया, जब उनके लिए उनके प्रशंसक तख्तियां लेकर खड़े नजर आते और उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहते थे, लेकिन उन्होंने उस वक्त दिलचस्पी नहीं दिखाई. कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि तब शायद वो पद स्वीकार करते तो राजनीति में कथित असक्षम होने का टैग उन पर नहीं लगता.

ये ठीक वैसा है, जैसा कभी दिग्गज कम्युनिस्ट नेता और भारत के लंबे समय तक सीएम रहने वाले ज्योति बसु के साथ हुआ. 1996 में प्रधानमंत्री बनने के बेहद करीब आ गए थे, उस समय लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी और संयुक्त मोर्चा सरकार बनाने की कोशिशें चल रही थीं. मोर्चे के कई घटक दलों और यहां तक कि कांग्रेस ने भी ज्योति बसु का नाम सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया. वे देश के पहले कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री बन सकते थे. लेकिन CPI(M) की केंद्रीय समिति ने विचारधारात्मक कारणों से यह प्रस्ताव ठुकरा दिया, यह कहते हुए कि सत्ता में शामिल होना पार्टी की नीति के खिलाफ है. पार्टी नेतृत्व का मानना था कि पूंजीवादी ढांचे के भीतर सरकार चलाकर वे अपनी नीतियों को लागू नहीं कर पाएंगे और यह पार्टी की विचारधारा से समझौता होगा. बसु, अनुशासित कम्युनिस्ट नेता होने के नाते, पार्टी के निर्णय के आगे झुक गए और प्रधानमंत्री नहीं बने. बाद में, अपनी आत्मकथा और कई इंटरव्यू में ज्योति बसु ने इसे “एक ऐतिहासिक भूल” कहा. उनका मानना था कि अगर पार्टी अनुमति देती, तो वे केंद्र में रहकर वामपंथ की नीतियों को व्यापक स्तर पर लागू कर सकते थे और देश की राजनीति की दिशा प्रभावित कर सकते थे. इस घटना ने न केवल बसु की निजी राजनीतिक यात्रा, बल्कि भारतीय वामपंथ की केंद्रीय राजनीति में संभावनाओं को भी प्रभावित किया.

एक ऐसा ही ऐतिहासिक मोड़ शायद राहुल गांधी और उनके इर्द गिर्द के लोग महसूस करते होंगे. कई बाद उनके लिए प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर पार्टी के भीतर और बाहर कई तरह की चर्चाएं रहीं. साल 2004 और 2009, दोनों मौकों पर राहुल गांधी ने खुद किसी कैबिनेट पद को लेने या प्रमुख जिम्मेदारी निभाने से दूरी बनाई और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाए रखने में भूमिका निभाई

ऑल वेदर चौड़ी सड़कों और टूटी पहाड़ी ढलानों के बीच पहाड़ हमें चेतावनी दे रहे हैं-अब ठहर जाओ।**

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“जब एक घंटे में एक महीने जितनी बारिश हो जाए, इलाके जलमग्न नहीं होते, वो ग़ायब हो जाते हैं।”

इस बार मानसून में पहाड़ों पर सिर्फ बारिश नहीं हुई, आसमान जैसे फट पड़ा हो। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में कुछ ही घंटों की मूसलाधार बारिश ने घाटियों को उजाड़ दिया, पुल ढहा दिए और पूरे-पूरे ज़िले को ठप कर दिया। जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में 14 अगस्त 2025 को अचानक आई भीषण बारिश ने तीर्थयात्रियों और ग्रामीणों को बहा दिया; अधिकारियों ने कम से कम 60 लोगों की मौत, 100 से अधिक घायल और करीब 200 लापता होने की पुष्टि की। हिमाचल में 16-17 अगस्त तक 300 से अधिक सड़कें बंद रहीं, बिजली और पानी की आपूर्ति ठप हो गई और नुकसान ₹2,000 करोड़ से अधिक आँका गया। 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली गाँव में आई बाढ़ ने दर्जनों लोगों को लापता कर दिया और एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया: क्या हम अपने ही विकास से आपदाओं को न्योता दे रहे हैं?

क्लाउडबर्स्ट आखिर है क्या?

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) इसे इस तरह परिभाषित करता है: एक घंटे में लगभग 100 मिमी या उससे अधिक बारिश किसी छोटे से क्षेत्र (20–30 वर्ग किलोमीटर) में होना। यह घटना बेहद दुर्लभ और स्थानीय होती है, लेकिन इतनी ताक़तवर कि पहाड़ों को पिघलाकर पत्थर और मलबे की नदियाँ बहा सकती है।
ख़तरा प्राकृतिक है, लेकिन तबाही इंसानी है। जो चीज़ इन अचानक बारिशों को हर साल और ज़्यादा घातक बनाती है, वह है हमारा अनियंत्रित निर्माण, हाईवे-टनल-डैम परियोजनाएँ और नाज़ुक भू-भाग पर कब्ज़ा, अक्सर उन्हीं नियमों को तोड़कर जिन्हें हमने ख़ुद बनाया था।

आँकड़े जिनसे नज़र नहीं हटाई जा सकती

हिमाचल प्रदेश में 16 अगस्त तक प्रशासन ने बताया कि 313 सड़कें बंद, 348 ट्रांसफ़ॉर्मर और 119 जल योजनाएँ प्रभावित, 136 मौतें और 37 लापता और कुल नुकसान ₹2,144 करोड़ से ज़्यादा का हुआ। पूरे मानसून सीज़न का आंकड़ा देखें तो मौतें 250 से ऊपर जा चुकी हैं।
जम्मू-कश्मीर में किश्तवाड़ की त्रासदी सबसे गंभीर रही। 15 अगस्त तक सरकार ने 60 से अधिक शव मिलने और करीब 200 लोगों के लापता होने की पुष्टि की।
उत्तराखंड के उत्तरकाशी (धराली) में 5 अगस्त को आई बाढ़ ने दर्जनों घर बहा दिए और कई ज़िंदगियाँ ले लीं। यहाँ बहस फिर वही है – क्या पहाड़ों में इंसानी दख़ल ही असली खतरा है?

हमने हालात और बदतर कैसे किए

1) चौड़ी सड़कें और खतरनाक ढलान कटाई
उत्तराखंड की चारधाम सड़क परियोजना इसका प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति (HPC) ने 5.5 मीटर चौड़ी सड़क (2018 के मानक) की सिफारिश की थी और क्यूम्युलेटिव असर (सामूहिक प्रभाव) का आकलन ज़रूरी बताया था। लेकिन राजनीतिक दबाव में कई हिस्सों में ज़्यादा चौड़ी सड़कें बनीं। हर अतिरिक्त मीटर की कटाई पहाड़ों को और अस्थिर बना देता है और मलबा नदियों को रोककर अचानक बाढ़ का कारण बनता है।

2) सुरंगें और जलविद्युत परियोजनाएँ
खनन सुरंगें (adits), मनमाना मलबा फेंकना (muck dumping), और भूमिगत जल निकासी प्रणाली में बदलाव, ढलानों के ढहने के तरीके को बदल देते हैं। परियोजना-दर-परियोजना किए गए पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), कैचमेंट-स्तर के मॉडलिंग के बिना, यह समझने में विफल रहते हैं कि किस तरह एक ही घाटी में कई हस्तक्षेप मिलकर बादल फटने जैसी बारिश के दौरान सामूहिक विफलता का कारण बन सकते हैं। राष्ट्रीय दिशा-निर्देश लंबे समय से जोखिम-आधारित स्थल चयन और संचयी आकलन पर ज़ोर देते रहे हैं, लेकिन इनका पालन टुकड़ों में ही होता है।

3) बाढ़ मैदानों और मलबा-प्रवाह पंखों पर रियल एस्टेट
कुल्लू से उत्तरकाशी और सोनमर्ग तक, निर्माण कार्य प्रवाही पंखों (alluvial fans) और संकरी बाढ़-धाराओं पर फैल चुका है। इसमें अक्सर नदी-तल खनन और क्षतिग्रस्त तटवर्ती बफ़र्स ने मदद की है। जब कोई खड़ी जलग्रहण क्षेत्र ढहता है, तो ठीक इन्हीं सतहों पर चट्टानों और लकड़ियों का मलबा फिर से फैलकर काबिज़ हो जाता है। धराली की घटना पर की गई रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशकों से ज्ञात मलबा-प्रवाह मार्गों पर लगातार निर्माण होता रहा है।

4) जलवायु परिवर्तन बड़ा फैक्टर
गर्म हवा अधिक नमी अपने में समेटती है; जब मानसूनी लहरें और पश्चिमी विक्षोभ खड़ी स्थलाकृति से टकराते हैं, तो अत्यधिक और अल्पकालिक वर्षा तेजी से बढ़ जाती है। पश्चिमी हिमालय के लिए की गई कई पीयर-रिव्यू समीक्षाएँ यह दर्शाती हैं कि ऐसी चरम घटनाओं का बढ़ता जोखिम सीधे–सीधे मौजूदा ऊष्मीकरण और वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव से जुड़ा है।
सभी बादल फटने की घटनाओं में रुझान देखने की ज़रूरत नहीं है; तर्क सीधा है।

सुनों छात्रों, विदेश में पढ़ने का सपना ना देखें…क्योंकि राजस्थान सरकार ऐसा नहीं चाहती है!

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– दो बातों से साफ है कि वर्तमान भाजपा सरकार नहीं चाहती है कि कम या मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे विदेश में पढ़ाई करे – 1.देश के संस्थानों के लिए पिछले साल 143 सीटें खाली थी जिसके बाद भी सरकार ने इस बार देश के संस्थानों के लिए सीटें 200 से बढ़ाकर 350 कर दी. 2. वहीं E-2 कैटेगरी (सालाना आय ₹8 लाख से ₹25 लाख) वाले अब देश के संस्थानों में भी अप्लाई कर सकते हैं…इससे पहले इस कैटेगरी वाले केवल विदेश के लिए ही पात्र थे. राजस्थान के छात्रों के लिए देश-विदेश की यूनिवर्सिटीज में पढ़ने के सपने को कैसे किश्तों में तोड़ा गया है इसका साक्षात उदाहरण ‘स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप योजना’ है जिसे पहले राजीव गांधी स्कॉलरशिप फॉर एकेडमिक एक्सीलेंस कहा जाता था. ऐसे में खुद स्वामी विवेकानंद अगर आज होते तो क्या सोचते, सोचिए जरा? अब सरकार ने स्कॉलरशिप-2025 के लिए आवेदन मांगे गए हैं लेकिन योजना में कई बदलाव किए गए हैं. अब स्कॉलरशिप में यूनिवर्सिटी की संख्या भी 150 से कम करके 50 कर दी गई है. कई महीनों से छात्र संबंधित विभाग के चक्कर लगा रहे थे कि नोटिफिकेशन जारी हो लेकिन हुआ तो ये जिसका उनको अंदाजा तक नहीं था. इस बार कुल 500 सीटों पर आवेदन मांगे गए हैं जिनमें से 150 सीटें विदेश के संस्थानों के लिए और 350 सीटें भारत के संस्थानों के लिए हैं. इससे पहले सरकार ने विदेशी संस्थानों के लिए 300 सीट की थी और देश के संस्थानों के लिए 200 सीटें रखी थीं. वहीं 2024-25 की बात करें तो कुल 500 स्कॉलरशिप दी गई थी जहां 365 छात्रों के चयन में से 308 विदेश और 57 देश में पढ़ाई के लिए गए थे और 143 सीटें देश में खाली थीं जिन्हें दोबारा खोलने की अनुमति दी गई. अब देश वाली सीटें खाली क्यों रही इसकी वजह है लेटलतीफी, संस्थानों में एडमिशन का समय आ गया इधर नोटिफिकेशन ही जारी नहीं हुआ. कितने ही छात्र हैं जिनका साल तक खराब हो गया. जिन देश की सीटों में 143 खाली थी उसी सेक्शन में सरकार ने अब इस बार 350 सीटें रखी है और विदेश वाली सीधी आधी कर दी गई है. वहीं इस बार की गाइडलाइन में बताया गया है कि अब E-2 कैटेगरी (वार्षिक आय ₹8 लाख से ₹25 लाख) वाले देश के संस्थानों में भी अप्लाई कर सकते हैं. इससे पहले इस कैटेगरी वाले केवल विदेश के लिए ही पात्र थे. डिप्टी सीएम बैरवा का विधानसभा में दिया एक भाषण है जिसमें उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के विकसित भारत 2047 के संकल्प को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार विकसित राजस्थान की दिशा में काम कर रही है जिसमें उच्च शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी…लेकिन दूसरी ओर सरकार ने उच्च शिक्षा लेने जाने वाले बच्चों की सीटों में हर साल कटौती की है. 25 लाख से ऊपर वालों पर चुप्पी! इस साल अप्रैल में सिरोही की 20 वर्षीय छात्रा मनजीत देवड़ा ने हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी जिस पप कोर्ट ने कहा था कि इस योजना का लाभ सम्पन्न विद्यार्थी ले रहे हैं और गरीब प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को सहयोग देने का मूल उद्देश्य गौण हो गया है. इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने कहा था कि करदाताओं की गाढ़ी कमाई लुटाने के इस मामले पर कोर्ट आंख नहीं मूंद सकता और सरकार से यह भी पूछा कि क्यों न इस योजना और उसके दुरुपयोग पर रोक लगाने का आदेश दिया जाए? कोर्ट ने 25 लाख रुपए से अधिक आय वालों को योजना का लाभ देने पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से लाभार्थियों का ब्यौरा मांगा था. हालांकि बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने एकलपीठ के 29 अप्रैल को दिए इस आदेश पर खंडपीठ ने रोक लगा दी थी जिसके तहत एकलपीठ ने स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप स्कीम के तहत 25 लाख रुपए सालाना आय वाले परिवार के अभ्यर्थी को ई3 वर्ग में दी जा ही छात्रवृत्ति पर रोक लगाई थी. वहीं अब वर्तमान नोटिफिकेशन में भी ई-3 कैटेगरी में सालाना आय 25 लाख या उससे ऊपर का प्रावधान रखा गया है और इसमें सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया है.

बीजेपी हो या कांग्रेस, एंट्री भी गहलोत ही तय करेंगे और एग्जिट भी!

राजकुमार की फिल्म है- सौदागर. इस मूवी का फेमस डायलॉग याद आता है- “जानी, हम तुम्हें मारेंगे, जरूर मारेंगे. पर बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी और वह वक्त भी हमारा होगा.” चलिए, इस डायलॉग को थोड़ा बदल देते हैं- “जानी, हम तुम्हें मात देंगे, जरूर देंगे. व्यक्ति भी हमारा होगा और तरीका भी. और वह वक्त भी हमारा होगा.” यही राजस्थान में अशोक गहलोत की राजनीति का स्टाइल है. उनकी राजनीति देखे तो उनके साथ खिलाफ गुटबाजी करने वाले नेता भी कभी उनके साथ खड़े दिखे और उनके साथ खड़े रहने वाले नेता उनके खिलाफ. चाहे वह राजेश पायलट हो, परसराम मदेरणा, शीशराम ओला, डॉ. सीपी जोशी हो, बीडी कल्ला या सचिन पायलट. गहलोत ने कई दिग्गजों को राजनीति में शिकस्त दी और सियासत में ‘जादूगर’ का खिताब हासिल किया. बीते दिनों अमीन खान की कांग्रेस पार्टी में वापसी में पूर्व सीएम अशोक गहलोत की अहम भूमिका रही है. पार्टी से सवा साल तक निष्कासित रहें अमीन खान पर लोकसभा चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप था. कई बार विवादों में रहने वाले और पूर्व मंत्री अमीन खान को गहलोत ने पार्टी में वापस लाने के लिए खास पहल की. वे काफी वक्त से इसके लिए कोशिश कर रहे थे, लेकिन कई तरह के रोड़े आए और इसमें देरी भी हुई. रेगिस्तान की राजनीति में अहम दखल रखने वाले अमीन खान गहलोत खेमे के एक मजबूत खिलाड़ी रहे हैं. वो खिलाड़ी, जिनके बूते गहलोत ने हरीश चौधरी को मौके दर मौके पछाड़ने की कोशिश की. हालांकि हरीश चौधरी हाईकमान की नजदीकियों के चलते पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी पाते चले गए तो गहलोत की चिंताएं भी बढ़ती चली गईं. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, गहलोत खेमे के होने के कारण अमीन खान की वापसी संभव हुई है. इससे गहलोत की पार्टी में पकड़ भी मजबूत हुई है. हरीश चौधरी की काट के लिए अमीन खान को लाए? अमीन खान की वापसी से कांग्रेस में कुछ गुटबाजी के संकेत भी मिले हैं, लेकिन गहलोत ने अपने प्रभाव से उन्हें पार्टी में फिर से शामिल करवाया है, ताकि पश्चिम राजस्थान में हरीश चौधरी के खिलाफ उनके समीकरण मजबूत हो सके. जैसेलमेर और बाड़मेर में मेवाराम जैन, सालेह मोहम्मद और अमीन खान की राजनीति के जरिए गहलोत ने हमेशा पकड़ बनाए रखी. बायतू विधायक हरीश चौधरी मारवाड़ में कांग्रेस की अहम धुरी बनने की लगातार कोशिश में हैं और इस मौके पर वो गहलोत से सीधे टकरा जाते हैं. यही वजह है कि गहलोत ने कांग्रेस के कई नेताओं को हरीश चौधरी के खिलाफ खड़ा किया और गुट को मजबूत किया. बात सिर्फ अमीन खान की नहीं है, बल्कि ऐसे नेताओं की फेहरिस्त लंबी है जो उनके मनमुताबिक पार्टी में मजबूत हुए, फिर बाहर भी हुए और बीजेपी ज्वॉइन कर खामोश भी हो गए. साइडलाइन होने के बावजूद भी ऐसे नेता बीजेपी में जाने के बाद पार्टी में बने हुए हैं. राजनीतिक एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ‘जादूगर’ अपने करीबियों को ऐसे ही मोहरा बनाते हैं और फिर जब चुनाव आते हैं या सरकार की वापसी होती है तो उन्हें वापस ले आते हैं. साल 2018 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान में 13 बागी जीतकर आए थे, जिन्होंने सचिन पायलट के सीएम बनने के मंसूबों पर पानी फेरा. तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष पायलट ने जब इन गहलोत के करीबियों के टिकट काटे तो ये पार्टी से बागी हो गए और निर्दलीय पर्चा भरा. 99 पर अटकी कांग्रेस के लिए गहलोत ने इन्हीं निर्दलीयों के सहारे बिसात बिछाई और कांग्रेस हाईकमान को ताकत भी दिखाई. नतीजा यह रहा कि गहलोत की तीसरी बार ताजपोशी हुई और संयम लोढा, रामकेश मीणा जैसे कांग्रेस के बागी सरकार में सलाहकार तक पहुंचे और दूदू विधायक बाबूलाल नागर, महादेव खंडेला, ओमप्रकाश हुड़ला समेत कई निर्दलीय भी पार्टी के समर्थन में दिखे. वो नेता, जो कभी गहलोत के करीबी थे और आज बीजेपी में हैं- ⦁लालचंद कटारिया – लालचंद कटारिया जयपुर ग्रामीण से पूर्व सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे. राजस्थान में जाट वोटबैंक पर उनकी अच्छी पकड़ थी. मार्च 2024 में बीजेपी में आए. लालचंद कटारिया के साथ उनके दामाद और डेगाना से पूर्व विधायक विजयपाल मिर्धा, उनके समधी पूर्व कांग्रेस विधायक रिछपाल मिर्धा ने भी बीजेपी ज्वॉइन की. दोनों ही समधियों को बीजेपी ने अभी तक ना तो संगठन में कोई जिम्मेदारी दी और ना ही सरकार में हिस्सेदारी. ⦁महेंद्रजीत सिंह मालवीया- वागड़ में कांग्रेस की मजबूत धुरी रहे. आदिवासी अंचल में मजबूत पकड़. गहलोत की सरकार में जल संसाधन जैसे भारी-भरकर विभाग संभाला. बीजेपी के पूर्व जिला अध्यक्ष लालचंद पटेल ने इनके खिलाफ करोड़ों रुपए के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत की सरकार पर सवाल खड़े हो गए. फिर लाभचंद पटेल ने ही

अब लेटलतीफ सरकार ने आवेदन भी मांगे तो छात्रवृत्ति में उच्च आय वर्ग के बच्चों को भी शामिल कर लिया?

‘स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप योजना’ के आवेदन लंबे समय के बाद 21 अगस्त से शुरू कर दिए हैं. भले ही सरकार आवेदन ले रही है, लेकिन यह सीधे तौर पर गरीब बच्चों के साथ कुठाराघात भी है. क्योंकि अल्प आय वर्ग के लिए जब यह योजना लाई गई थी तो इसमें संशोधन क्यों किया गया? क्या सरकार नहीं चाहती है कि गरीब परिवारों के बच्चे यूरोप-अमेरिका समेत विश्व के प्रतिष्ठित संस्थानों में उच्च शिक्षा ले? सरकार ने स्कॉलरशिप के लिए आवेदन तो मांग लिए, अब यूनिवर्सिटी की संख्या भी 150 से कम करके 50 कर दी गई है. कई महीनों से छात्र संबंधित विभाग के चक्कर लगा रहे थे कि नोटिफिकेशन जारी हो, लेकिन जब हुआ तो कई शर्तों के साथ. शर्तें भी ऐसी कि यह योजना नहीं, बल्कि मेधावी छात्रों के लिए परेशानी बन जाए. उच्च शिक्षा विभाग ने साल 2025-26 के गाइडलाइन जारी की है. इस योजना में E-2 कैटेगरी (सालाना आय ₹8 लाख से ₹25 लाख) जोड़ी है. इस कैटेगरी के परिवार के बच्चे भी अब देश के संस्थान के लिए अप्लाई कर सकते हैं. इससे पहले इस कैटेगरी वाले केवल विदेश के लिए ही पात्र थे. अब सवाल यह है कि जब यह योजना गरीब बच्चों के लिए हैं तो देश के संस्थान में योग्यता के लिए आय सीमा को बढ़ाकर गरीब बच्चों के लिए मुकाबला कड़ा क्यों किया जा रहा है? साथ ही नए नियमों के मुताबिक, विदेश में 150 और देश में 350 सीटों पर छात्रवृत्ति मिलेगी. पहले नए सत्र के लिए गाइडलाइन जान लीजिए ⦁प्रथम चरण के लिए आवेदन की सीमा 21 अगस्त से 20 सितंबर 2025 ⦁इस बार कुल 500 सीटों पर आवेदन लिए जाएंगे. ⦁150 सीटें विदेश के संस्थानों में अध्ययन के लिए. ⦁350 सीटें भारत के प्रतिष्ठित संस्थानों में पढ़ाई के लिए. ⦁30% सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित. ⦁पिछले वर्षों की तुलना में इस बार विदेश की सीटों में कटौती की गई है. राजस्थान में नौकरी की अनिवार्यता क्यों? मामला सिर्फ यही तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़ाई पूरी करने के बाद इन स्टूडेंट्स को राजस्थान में नौकरी करना जरूरी होगा. देश के किसी कोने या विदेश में पढ़ने के बाद छात्र क्यों राजस्थान में ही नौकरी करें? क्या विदेश में उसे करियर का अच्छे करियर का अवसर मिल रहा है तो सरकार की यह गाइडलाइन उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं? पिछले साल के मुकाबले ये बदलाव साल 2024-25 की बात करें तो कुल 500 स्कॉलरशिप दी गई थी, जहां 365 छात्रों के चयन में से 308 विदेश और 57 देश में पढ़ाई के लिए गए थे. हालांकि 143 सीटें देश में खाली थीं, जिन्हें दोबारा खोलने की अनुमति दी गई. इस बार कुल 500 सीटों पर आवेदन मांगे गए हैं, जिनमें से 150 सीटें विदेश के संस्थानों के लिए और 350 सीटें भारत के संस्थानों के लिए हैं. क्या ऐसे पूरा होगा पीएम मोदी के ‘विकसित भारत-2047′ के संकल्प? इस मौके पर उच्च शिक्षा विभाग की कमान संभाल रहे डिप्टी सीएम डॉ. प्रेमचंद बैरवा का विधानसभा में दिया एक भाषण याद किया जाना चाहिए है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पीएम मोदी के ‘विकसित भारत-2047’ के संकल्प को पूरा करने के लिए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राज्य सरकार विकसित राजस्थान की दिशा में काम कर रही है, जिसमें उच्च शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी. सरकार अब इस संकल्प को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में छात्रवृत्ति लेने वाले मेधावी छात्र-छात्राओं की सीटों में हर साल कटौती क्यों कर रही है? हाईकोर्ट की टिप्पणी भी नजरंदाज कर गई सरकार? इस साल अप्रैल में सिरोही की 20 वर्षीय छात्रा मनजीत देवड़ा ने हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी. याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि इस योजना का लाभ सम्पन्न विद्यार्थी ले रहे हैं और गरीब प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को सहयोग देने का मूल उद्देश्य गौण हो गया है. हाईकोर्ट ने कहा था कि करदाताओं की गाढ़ी कमाई लुटाने के इस मामले पर कोर्ट आंख नहीं मूंद सकता. साथ ही सरकार से यह भी पूछा कि क्यों न इस योजना और उसके दुरुपयोग पर रोक लगाने का आदेश दिया जाए? कोर्ट ने 25 लाख रुपए से अधिक आय वालों को योजना का लाभ देने पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार से लाभार्थियों का ब्यौरा मांगा भी था. हालांकि बाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने एकलपीठ के 29 अप्रैल को दिए इस आदेश पर खंडपीठ ने रोक लगा दी थी, जिसके तहत एकलपीठ ने स्वामी विवेकानंद स्कॉलरशिप स्कीम के तहत 25 लाख रुपए सालाना आय वाले परिवार के अभ्यर्थी को ई3 वर्ग में दी जा ही छात्रवृत्ति पर रोक लगाई थी. वहीं अब वर्तमान नोटिफिकेशन में भी ई-3 कैटेगरी में सालाना आय 25 लाख या उससे ऊपर का प्रावधान रखा गया है और इसमें सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया है.

28 अगस्त, 2025….राजस्थान के इतिहास में काला दिन- कोर्ट ने कहा “जब घर का भेदी लंका ढाए”, तो फिर RPSC को कौन बचाए?

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जब राजस्थान लोक सेवा आयोग पर ही सवालिया निशान है तो उसके द्वारा कराई गई भर्ती का क्या? RPSC को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी इस संस्था की कार्यशैली नहीं, बल्कि इसके अस्तित्व पर सीधा सवाल खड़ा करती है. साथ ही संस्था से जुड़े रहे सदस्य रामूराम राईका, बाबूलाल कटारा के साथ RPSC के तत्कालीन अध्यक्ष संजय श्रोत्रिय और आरपीएससी के अन्य सदस्य मंजू शर्मा, संगीता आर्य और पूर्व अध्यक्ष जसवंत राठी भी सवालों के घेरे में हैं. यह मामला सिर्फ 6 सदस्यों का नहीं है, कोर्ट ने सीधे तौर पर RPSC के पूरे ढांचे को कटघरे में खड़ा किया है. न्यायालय ने कहा कि आरपीएससी की ओर से हर स्तर पर पेपर कराने में चूक हुई. हाईकोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के बाद अब सवाल यह है कि क्या इस संस्था के पुर्नगठन पर बात नहीं होनी चाहिए, जिसे कांग्रेस के राज में बीजेपी ने उठाया और बीजेपी के सत्तासीन होने के बाद कांग्रेस के हलकों में आवाजें सुनाई दीं.  कोर्ट की ये लाइनें, RPSC के काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई “अदालत ने साफ कहा है कि आयोग का पूरा ढांचा एक फार्स यानी ढकोसला साबित हुआ है. आयोग का संवैधानिक कर्तव्य था कि राज्य में भर्ती प्रक्रियाओं को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए, लेकिन इसके सदस्य ही लीक और भ्रष्टाचार के खेल में शामिल पाए गए. अदालत ने कहा कि जब शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ही अपनी शपथ और कर्तव्यों से छल करेगा, तो यह पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर चोट है.” अब समझिए पूरी साजिश की कहानी, जो युवाओं के भविष्य के पहरेदारों ने ही रची सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा 2021 के दौरान पेपर लीक की साजिश आयोग के ही सदस्यों बाबूलाल कटारा और रामुराम राईका ने मिलकर रची, वो भी उस समय जब प्रश्नपत्र छपाई प्रेस तक नहीं पहुंचे थे. आरोप पत्र के मुताबिक, कई अन्य सदस्यों मंजू शर्मा, संगीता आर्या और जसवंत राठी की संलिप्तता भी दर्ज हुई है. इन सबकी जानकारी आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष संजय श्रोतिया को भी थी, जिन्होंने अपने बेटे-बेटी के इंटरव्यू तक प्रभावित किए और पैनल का हिस्सा बने.   न्यायालय ने खुद कहा- मेहनतकश परीक्षार्थी हार गया हाईकोर्ट ने आगे कहा कि मेहनतकश परीक्षार्थी सबसे बड़ा हारा हुआ है. लाखों उम्मीदवार, जो बेहतर भविष्य और समाज की सेवा के सपने लेकर परीक्षा देते हैं, उनकी मेहनत भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. आयोग ने अपनी साख का जो ढिंढोरा पीटा था, वह अब पूरी तरह से गिर चुका है. पेपर लीक और इंटरव्यू में धांधली की पूरी व्यवस्था मकड़ी के जाले की तरह थी, जिसमें आयोग के सदस्य और बाहरी गिरोह मिलकर व्यवस्था को खोखला कर रहे थे. अदालत ने 2nd ग्रेड टीचर भर्ती (2022), सीनियर टीचर भर्ती (2022), राजस्व अधिकारी और कार्यकारी अधिकारी भर्ती (2023), यहां तक कि 2018 की RAS भर्ती तक के उदाहरण भी दिए, जहां गंभीर अनियमितताएं सामने आईं. बार-बार पेपर लीक, गलत उत्तर कुंजी, मार्क्स नॉर्मलाइजेशन में गड़बड़ी और पारदर्शिता की कमी ने आयोग को नाकाम साबित किया है. विशेष जांच दल (SIT) की 2024 की रिपोर्ट ने भी यही कहा कि पेपर लीक तो छपाई से पहले ही आयोग के अंदर से हुआ और सुरक्षा इंतज़ाम महज़ नाम के थे.  *जब बाड़ ही खेत को खा जाए*  कोर्ट ने याद दिलाया कि आयोग द्वारा बाद में अपनाए गए कदम– जैसे परीक्षा रद्द करना, उम्मीदवारों का पुनः सत्यापन, सुरक्षा उपाय – सब महज़ दिखावा थे. असल समस्या यह है कि परीक्षा की ईमानदारी को नुकसान केवल बाहरी असामाजिक तत्वों से नहीं, बल्कि आयोग के ही सदस्यों से हुआ. यह भरोसे का ह्रास इतना गहरा है कि अब हर भर्ती प्रक्रिया पर भ्रष्टाचार का साया मंडरा रहा है. हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में उन सभी बिंदुओं को रेखांकित किया – परीक्षा केंद्रों से कम करना , निजी स्कूलों और इनविजिलेटरों का प्रयोग, कमजोर सुरक्षा उपाय, ड्यूटी का गैर-रैंडमाइज्ड बंटवारा, पेपर लीक, अंक सामान्यीकरण में असमानता और सूचना छुपाना – जो इस संस्थान की खोखली हकीकत को उजागर करते हैं. न्यायालय ने इस पूरे परिदृश्य को देखते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि अदालत स्वयं स्वतः संज्ञान लेकर RPSC की इन व्यवस्थागत खामियों पर जनहित याचिका शुरू करे. यह न केवल आयोग की जवाबदेही तय करेगा, बल्कि राज्य में भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता बहाल करने के लिए जरूरी कदम भी साबित होंगे.  *अब आगे क्या होना चाहिए?*  – सुधार की रूपरेखा में सबसे पहले आवश्यकता है कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया को ही बदला जाए, ताकि भ्रष्ट और पक्षपातपूर्ण व्यक्तियों की नियुक्ति न हो सके. 

स्ट्रीट वेडिंग एक्ट देश के लिए Retail क्रांति का हथियार है:, लेकिन संसद के बनाए इस कानून की 11 साल बाद भी ठीक से पालना नहीं हो रही!

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स्ट्रीट वेंडिंग एक्ट 2014 (आजीविका संरक्षण और स्ट्रीट वेंडिंग का विनियमन अधिनियम, 2014), एक ऐसा कानून, जो ना सिर्फ करीब 70 लाख रेहड़ी-पटरी वालो के लिए रोजगार के रास्ते खोलता है, बल्कि उनकी सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है. लेकिन कैसे संसद के द्वारा बनाए गए कानून का मखौल बना दिया जाता है, यह उसका जीता-जागता उदाहरण है. नगर निकाय या शहरी सरकार पर जिम्मा है कि वह इस कानून की पालना कराए, लेकिन यह स्ट्रीट वेंडर्स को उनके हक दिए जाने से ज्यादा सिर्फ और सिर्फ उन्हें अतिक्रमणकारी बताकर बेदखली के प्रयास या फिर ‘डंडा कानून’ में तब्दील हो गया है. साथ ही साथ जिन लोगों से नगर निकाय शुल्क भी वसूलता है, उन्हें भी सामाजिक सुरक्षा मिले. यह सब ‘स्ट्रीट वेडिंग एक्ट- 2014’ के प्रावधानों में है.

शहर में इस व्यवसाय को बढ़ावा देने की बजाय रेहड़ी-पटरी वालों को अतिक्रमणकारी बताकर नगर निकायों की ओर से उनकी बेदखली की योजना ही तैयार की जाती है. शहरों में ‘नो वेंडिंग जोन’ तो बना दिए गया, लेकिन वेंडिंग जोन की पहचान करने के मामले में तेजी नहीं लाई जाती. जबकि इसी एक्ट के मुताबिक, स्ट्रीट वेंडरों को पहचान पत्र और वेंडिंग सर्टिफिकेट जारी करना प्रशासन की जिम्मेदारी है.”

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने स्ट्रीट वेंडर संबंधित एक मामले की सुनवाई में कहा था- “भारत, मूल रूप से गांवों और शहरों से आने वाले लोगों का देश है, जो हरियाली के लिए कस्बों की ओर ग्रामीणों के आंदोलन से बना है, यह एक कृषि प्रधान समाज बना हुआ है. वास्तव में, किसी भी शहर का विकास गांवों से शहरों और कस्बों से शहरों में लोगों के आंदोलन के कारण होता है.”

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को भी पढ़ा जाना चाहिए

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्ट्रीट वेंडर्स को केवल वेंडिंग सर्टिफिकेट न होने के कारण बेदखल नहीं किया जा सकता है और चंडीगढ़ नगर निगम को सामाजिक सुरक्षा योजनाएं प्रदान करने की संस्तुति की है.

जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मीनाक्षी आई मेहता की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा,
“यह एक्ट स्ट्रीट वेंडिंग के लिए बनाए गए हैं, जिसमें टाउन वेंडिंग कमेटी को प्रत्येक 5 वर्ष बाद सर्वे करने का दायित्व दिया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सर्वेक्षण किए गए सभी लोगों को कुछ शर्तों के अधीन वेंडिंग जोन में समायोजित किया जाए. सर्वेक्षण पूरा होने और सभी स्ट्रीट वेंडर्स को वेंडिंग सर्टिफिकेट जारी किए जाने तक किसी भी स्ट्रीट वेंडर को बेदखल या स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए.”

2020 के ये आंकड़े काफी अहम हैं

साल 2020 में SBI की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 7.8 लाख रेहड़ी पटरी वाले हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में इनकी संख्या 5.5 लाख है. देश के कुल रेहड़ी पटरी वालों में दोनों राज्यों की सामूहिक हिस्सेदारी 27 प्रतिशत है. जबकि बिहार में 5.3 लाख रेहड़ी पटरी वाले, राजस्थान में 3.1 लाख, महाराष्ट्र में 2.9 लाख, तमिलनाडु में 2.8 लाख, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में 2.1 लाख, गुजरात में दो लाख, केरल और असम में 1.9 लाख, ओडिशा में 1.7 लाख, हरियाणा में 1.5 लाख और मध्य प्रदेश तथा पंजाब में 1.4 लाख रेहड़ी पटरी वाले हैं.

इस एक्ट के तहत यह जरूरी है कि-

⦁ एक्ट की पालना कराने के साथ ही विक्रेताओं पर किसी भी तरह की गैर कानूनी कार्रवाई करने का आदेश देने और उनकी बेदखली पर रोक लगाई जाए.
⦁ विक्रेताओं के पहचान सर्वे में हुई अनियमितताओं को दूर किया जाए और सर्वे में छूटे हुए सभी प्रकार के पथ विक्रेताओं का सर्वे करवाएं.
⦁ एक अच्छा उपाय यह भी है कि रात्रि बाजार, फूड हब, महिला बाजार और बुक बाजार को भी चिन्हित कर उसे डेवलप किया जा सकता है.
⦁ एक्ट के मुताबिक, टाउन वेंडिंग कमिटी को ही पूरे अधिकार दिए जाएं. इसी कमेटी के माध्यम से ही सर्वे हो और क्रियान्वन के लिए निगरानी कमेटी गठित करने के आदेशों की भी पालना हो
⦁ सभी शहरी क्षेत्र में विभिन्न आवश्यक सुविधा और भंडारण की व्यवस्था के साथ वेंडिंग जोन का निर्माण व विकास हो.विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में पथ विक्रेताओं का समावेश सुनिश्चित करना और कर्मचारी राज्य बीमा योजना के साथ पथ विक्रेताओं को जोड़ने का प्रयास शुरू किया जाए.
⦁ कई बार सुझाव दिया जाता है कि हालांकि पथ विक्रेता कानून सिर्फ शहरी क्षेत्र में लागू किया जाता है, ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में स्ट्रीट वेंडर्स के लिए भी योजनाएं बनाई जाए और इसके लिए बजट का प्रावधान रखा जाए.