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सरकार की आँखें मूँद, बाघ निगल रहे इंसान

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पिछले पाँच साल में रणथम्भौर और आसपास बाघों के हमलों में कई मौतें, लेकिन संसद में आंकड़ा ‘शून्य’। जमीनी हकीकत और सरकारी जवाब में चौंकाने वाला फ़ासला।

नवंबर 2024 में सवाई माधोपुर के उलियाना गांव के भरतलाल मीणा, जनवरी 2021 में रणथम्बोर के पास कानेटी गांव के पप्पू गुर्जर, जनवरी 2025 में 7 साल के कार्तिक सुमन, मई 2025 वन रेंजर देवेंद्र चौधरी, जून 2025 में त्रिनेत्र गणेश मंदिर की देखभाल करने वाले राधेश्याम सैनी और अक्टूबर 2023 में कोटा के अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के केयरटेकर रामदयाल की टाइगर हमलों में मौत हो गई. यह वो मौतें हैं जो पिछले पांच साल में हुईं हैं, लेकिन क्या हो जब सरकार इन सब की मौतों को ही झुठला दे? और वो भी संसद में !

लेकिन, ऐसा हुआ है. केंद्र सरकार का कहना है कि पिछले पांच साल में राजस्थान में वन्यजीवों के हमलों में किसी इंसान की मौत नहीं हुई है. मंत्री जी ने यह बात राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कही है. 8 अगस्त को राज्यसभा में सांसद संधोश कुमार यह सवाल किया था, इसके जवाब में वन पर्यावरण और जलवायु राज्यमंत्री कीरतवर्धन सिंह ने जो सूची सदन में प्रस्तुत की उसमें राजस्थान के सामने शून्य दर्ज था. और विडंबना यह कि केंद्र सरकार के इस जवाब से राजस्थान सरकार बिल्कुल ही अनजान है.राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा का कहना है कि उन्हें नहीं पता यह आंकड़ा केंद्र सरकार को किसने दिया। उनसे तो न ऐसी सूचना मांगी गई थी और न ही उन्होंने ऐसी कोई जानकारी साझा की है.

अगर पिछले पांच साल में टाइगर के हमलों में हुईं मौतों की बात की जाए तो अकेले रणथम्भौर नेशनल अभ्यारण के आसपास यह आंकड़ा 8 है. 3 मौतें तो साल 2025 में ही हुई हैं. वहीं कोटा में 1 टाइगर ने एक व्यक्ति को मौत के घाट उतारा था.

यह लोग आंकड़ों से तो ग़ायब हो गए, लेकिन इंसान और बाघों के संघर्ष में दोनों जान से हाथ धो रहे हैं. सवाई माधोपुर के उलियाना गांव में जब टाइगर टी-86 ने 50 साल के भरत लाल मीणा को अपना शिकार बनाया तो गुस्साए गांव वालों ने बाघ की ही हत्या कर दी और यह संघर्ष पिछले कुछ महीनों से लगातार बढ़ता ही जा रहा है. पर सवाल है कि इस सबका ज़िम्मेदार कौन है?

और सवाल यह भी है कि टूरिज्म को कितना बढ़ाना चाहिए, कि वो इस संघर्ष को बढ़ाने में मदद न करे. अगर सिर्फ रणथम्भौर की बात करें तो यहां बाघों की संख्या बेलगाम बढ़ रही है. इस समय रिज़र्व में 80 से ज़्यादा टाइगर हैं. टूरिज्म इंडस्ट्री का तो हिसाब है, जितनी अधिक बाघों की संख्या होगी, उतनी अधिक साइटिंग होगी और जितनी अधिक साइटिंग होगी उतने ही पर्यटक आएंगे। होटलों का कारोबार बढ़ेगा। इकॉनमी बढ़ेगी।

लेकिन इस ‘विकास’ की क़ीमत चुकाएंगे यहां के स्थानीय रहवासी। सरिस्का में कोर एरिया को कम करने की बात हो या फिर रणथंभोर में बाघों की संख्या को बढ़ाना, दोनों कहीं न कहीं स्थानीय पारस्थितिकी और प्रकृति के साथ खिलवाड़ है.

रणथंभौर टाइगर रिज़र्व का कुल क्षेत्रफल लगभग 1,334 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 392–394 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र (कोर ज़ोन) है, जबकि शेष लगभग 942 वर्ग किलोमीटर बफ़र या परिधि क्षेत्र में आता है। समय-समय पर कोर और बफ़र ज़ोन की सीमाएँ बदली जाती रही हैं, इसलिए विभिन्न स्रोतों में इसमें थोड़ी भिन्नता मिलती है। वन्यजीव प्राधिकरणों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में रणथंभौर में बाघों की संख्या उसकी वास्तविक क्षमता से अधिक हो चुकी है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस रिज़र्व में वयस्क बाघों की उपयुक्त संख्या लगभग 40-45 मानी जाती है, क्योंकि प्रत्येक बाघ को अपने अलग क्षेत्र की आवश्यकता होती है और क्षेत्र जितना सीमित होगा, बाघों के बीच टकराव की संभावना उतनी ही अधिक होगी। इस स्थिति से निपटने के लिए बाघों का स्थलांतरण (translocation), नए रिज़र्वों का विकास और जंगलों के बीच पारिस्थितिक गलियारों (ecological corridors) का निर्माण जैसे उपाय किए जा सकते हैं, ताकि बाघ और उनका आवास दोनों सुरक्षित रह सकें।

भाटी आपकी पॉलिटिक्स क्या है? ये सवाल शायद रविन्द्र भाटी से पूछा जाना चाहिए.

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क्या भाटी, पश्चिम राजस्थान में एक नई पार्टी का झंडा बुलंद करेंगे या बीजेपी के दरवाजे पर खड़े होकर ही दस्तक देते रहेंगे? कभी रेगिस्तान में सुनहरी रेत सी उम्मीद चमकी थी, लेकिन वो रेत धीरे- धीरे फीकी होने की आशंका से गुजर रही है. इसके लिए वो लगातार आंदोलन का झंडा भी बुलंद करता है, लेकिन रह- रहकर सत्ता के करीब जाने की भी कोशिश करता है. रविन्द्र भाटी, जिस युवा की राजनीतिक तकदीर में ‘निर्दलीय’ शब्द भी जुड़ सा गया. भाटी ने पश्चिम राजस्थान में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय (जेएनवीयू) में छात्र राजनीति से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, एबीवीपी के टिकट से इनकार के बाद, उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और जीत भी. जेएनवीयू के 57 साल के इतिहास में पहली बार कोई छात्रनेता स्वतंत्र चुनाव जीता. लेकिन बीजेपी या संघ परिवार से भाटी की निष्ठा खत्म नहीं हुई. इसी निष्ठा के चलते वो राजनीतिक के भंवर जाल में फंसे हुए नजर आते हैं. जब यूनिवर्सिटी से बाहर निकले और चुनावी मैदान में हाथ आजमाने की सोची तो भी उन्हें पहली सीढ़ी बीजेपी ही नजर आई. ये और बात है कि बीजेपी ज्वॉइन करने के बाद जब उन्हें टिकट नहीं मिला तो बागी होकर चुनाव लड़ गए, लेकिन शिव विधानसभा से टिकट घोषणा होने तक वो कर्तव्यनिष्ठ भाजपाई के तौर पर ही साल 2023 के चुनाव के लिए मेहनत कर रहे थे. बरहाल, जब टिकट का ऐलान हुआ तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों में बगावत के बाद मुकाबला पंचकोणीय हुआ और जीत रविन्द्र भाटी की हुई, वो भी महज 3950 वोट के अंतर से. हालांकि मैदान में दोनों पार्टी के कई दिग्गजों को उन्होंने शिकस्त दी. पार्टी भले ही उन्होंने ज्वॉइन नहीं की, लेकिन बतौर निर्दलीय वो विधानसभा में सत्ता पक्ष से यह कहते नज़र आए कि मैं तो आपका ही हूं. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के साथ बैठकों की उनकी तस्वीर की भी खूब चर्चा होती है. डिप्टी सीएम दिया कुमारी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी सार्वजनिक मंचों से उनकी तारीफ करते नहीं चूकते. वो खुद को युवा राजनीति की ‘Fantasy Politics’ में तो खुद को ढाल लेते हैं, लेकिन बतौर विचार वो खुद को पेश नहीं कर पाए. तीसरे (निर्दलीय) विकल्प के तौर पर सदन में तो पहुंचे, लेकिन बीजेपी से वो कहीं ना कहीं करीब ही दिखे. दो हैंडपंप वाला पत्र वायरल और लोकसभा चुनाव की पटकथा शुरू.. भाटी ने जल्द ही नज़रें शिव विधानसभा क्षेत्र पर टिकाईं और टीम तैयार करते हुए सामाजिक कार्यक्रम किए और जनता के बीच पैठ बनाई. 2023 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद कुछ ही महीनों में उनके लोकसभा चुनाव लड़ने की महत्वाकांक्षा को पंख मिल गया. उनकी विधानसभा को जब दो हैंडपंप नहीं मिले तो उनका सरकार को लिखा “दो हैंडपंप वाला पत्र” भी खूब वायरल हुआ और उन्होंने खुद को उपेक्षित जनप्रतिनिधि के तौर पर पेश किया. लेकिन इन सबके बीच लोकसभा चुनाव 2024 की पटकथा लिखी जा रही थी. लोकप्रियता और भारी जनसमर्थन के साथ लोकसभा चुनाव में 5.86 लाख वोट मिले और पूर्व केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी की बुरी हार हुई, हालांकि इस दौरान फायदा उम्मेदाराम बेनीवाल को हुआ और उनकी जीत हुई. उनका ठेठ राजनीति स्टाइल लोगो में खूब पसंद किया गया. लेकिन उन दो हैंडपंप समेत विधानसभा क्षेत्रों के काम की बात नहीं हुई, जिसके रुकने के लिए वो सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए लोकसभा चुनाव में छाती ठोंक रहे थे.  आंदोलन के पीछे पर्दे की कहानी राजनीति में कोई अचानक नहीं चमकता, हर चमक के पीछे संघर्ष, साहस और जोखिम की लंबी दास्तान होती है. इस कहानी में कई किरदार और भारी धनबल भी दिखा. जब चुनाव लड़ने उतरे तो प्रचार के दौरान ‘मास्टरजी का लड़का हूं’ कहते भी नजर आए उनके साथ लग्जरी गाड़ियों का लंबा काफिला भी रहा. अब वो लगातार आंदोलन भी कर रहे हैं. सोलर प्लांट के विरोध में आंदोलन कर रहे भाटी ने खूब सुर्खियां बटोरी. हालांकि आलोचक इसमें उनके हित जुड़े होने की बात कहते हैं. क्योंकि सोलर प्लांट लगने के साथ ही कई स्थानीय फर्म या छोटी कंपनियों का हित भी इससे जुड़ता है. आरोप तो ऐसे भी हैं कि इन कामों में भाटी के परिवार के किसी सदस्य की कंपनी का भी नाम होने की संभावना जताई जाती है, ताकि कंपनी के जरिए हित पूरे हो सके. लेकिन जो भी हो, थार के रेतीली धोरों में हाथ से सरकते रेत जैसे समय को भाटी ने हर बार बखूबी भांपा है और छात्र राजनीति से अब तक कामयाबी के कई किस्से लिखे. ये भी हकीकत है कि राजस्थान में अक्सर निर्दलीय या तीसरे मोर्चे की कोशिश हुई, लेकिन वो सत्ता के दरवाजे पर जाकर ही ठहर जाती है. ऐसे में भाटी नई पार्टी बनाते हैं या नहीं, ये भी देखने वाली बात होगी.

जिस नदी के तट पर 4 हजार साल पुरानी सभ्यता विकसित हुई, उसका हमारी व्यवस्था ने क्या हश्र किया वो देखिए!!!!

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उदयपुर की आयड़ नदी के प्राकृतिक बहाव को रोककर निर्माण कार्य करना कितना सही? अजमेर की तरह इस मामले में भी संज्ञान लिया जाना चाहिए. आज से करीब 4 हजार साल पुरानी आहाड़ सभ्यता के निशान आज भी उदयपुर में मिलते हैं. आयड़ नदी के तट पर विकसित हुई सभ्यता का अपना इतिहास है. इस नदी को गंगाजी पांचवां पाया (बुनियाद) माना जाता रहा है. लेकिन दुर्भाग्य है कि स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने पुनर्वास की आड़ में नदी तंत्र का विनाश किया और सांस्कृति विरासत को मिटाने की कोशिश की. आयड़ नदी आज प्रशासनिक दूरदर्शिता के अभाव और दृष्टिकोण की कमी का शिकार हो गई. स्मार्ट सिटी के नाम पर आयड़ नदी के किनारे बाढ़ संभावित क्षेत्र जहां नदी में लाखों टन मलबा, पत्थर, सीमेंट, रेत, कंक्रीट से सौंदर्यीकरण किया गया. मकसद था- वेनिस नदी की तरह पर सौंदर्यीकरण. लेकिन मानसून की बारिश में सब कुछ बहा दिया. नगर निगम के माध्यम से 75 करोड़ों रुपए के बजट में से कई काम कराए जाने का दावा किया गया. नदी में निर्माण कार्य कर उसकी चौड़ाई ही कम करवा दी, जिससे इस नदी ने नाले जैसा आकार धारण कर लिया हैं. जोरदार बारिश के चलते सबकुछ बह गया और दुनिया के इस खूबसूरत शहर ने प्रकृति का रौद्र रूप देखा.  3 साल पहले दी थी चेतावनी, अब शहर ने देखी बाढ़  करीब 3 साल पहले छपी एक खबर के मुताबिक, उदयपुर शहर के पंचरत्न, नवरत्न,फतेहपुरा, रेलवे ट्रेनिंग स्कूल, न्यू फतेहपुरा, पंचवटी, सरदारपुरा, भूपालपुरा, अलीपुरा, न्यू भूपालपूरा, अशोक नगर, पुराना रेलवे स्टेशन (रेलवे कॉलोनी) को जल संसाधन विभाग द्वारा बाढ़ संभावित क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया था और इस बार उदयपुर ने बाढ़ का खतरा महसूस भी किया. 75 करोड़ रुपए का क्या हुआ? आयड़ नदी 30 किलोमीटर लंबी है, जो उदयपुर शहर में 5 किलोमीटर एरिया में बहती हुई निकलती है. यह नदी पिछले कुछ दशक से राजनीति का बड़ा केंद्र रही. नगर निगम से लेकर विधानसभा चुनावों में आयड़ नदी को सुधारने की बातें होती रही. उदयपुर में निगम का छठा बोर्ड है और अब इस बोर्ड में इस नदी की सूरत बदल रही है. स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत इसमें सौंदर्यीकरण का काम चल रहा है.  हालात यह है कि नदी के पेटे में सीवर लाइन डाल कर इसे प्रदूषित किया जा रहा है. जगह-जगह से मल-मूत्र का रिसाव हो रहा है और नदी को खूबसूरती से विकसित करने के नाम पर नगर निगम बोर्ड और अधिकारियों ने इसका स्वरूप ही बिगाड़ कर रखा दिया. सवाल तो यह भी है कि आखिर 75 करोड़ रुपए का हुआ क्या, जिसे नदी के सौंदर्यीकरण के लिए आवंटित किया गया था. नदी के बहाव के बीच निर्माण कार्य कितना सही? दरअसल, नदी के प्राकृतिक बहाव और पेटे को अव्यवस्थित करवाकर उसमें बीचोबीच पक्के नाले का निर्माण करवाया गया. नदी में फुटपाथ सहित कई सारे जमीनी निर्माण कार्य करवाया गया हैं, जिस पर कई बार सवाल भी खड़े हुए. हाल ही में अजमेर के 7 वंडर पार्क के ध्वस्त करने के कोर्ट के आदेश को देखे तो इस लिहाज से आयड़ नदी के तो पेटे में हुआ निर्माण कार्य ही सवालों के घेरे में है. विशेषज्ञों का कहना है कि नदी में हुए निर्माण नदी की मूल प्रकृति व मूल बहाव के प्रति अत्याचार है. नदी तल पर पक्की फर्श ने प्रवाह को तीव्र किया है, जिससे भी समस्याएं पैदा हो रही है. पेटे में भराव से नदी तल ऊपर हो गया, जिससे शहर के शमशान स्थलों सहित कई कॉलोनियों में दूर दूर तक पानी फैल गया.

जनता की भागीदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी, राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र में जो भी हुआ वो इन शब्दों के विपरीत ही था.

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राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र भी खत्म हो गया. लेकिन, आप किसी थोड़े से भी जागरूक नागरिक से यह पूछें कि इस सत्र में क्या प्रोडक्टिव हुआ? तो शायद आपको हंगामे और हो हल्ला की अख़बारी खबरों की कतरनों से पढ़ी लाइनों के अलावा कोई जवाब मिल सके. विधानसभा सत्र कानून बनाने के लिए बुलाये जाते हैं. जनता के मुद्दों, उनकी समस्याओं, प्रदेश के भविष्य की रचना करने के लिए सर जोड़ कर बैठने के लिए कॉल किये जाते हैं, लेकिन क्या इन सबका वही हासिल है, जिसकी उम्मीद और जिस वजह से प्रदेश के सारे जनप्रतिनिधि इकट्ठा होते हैं? 1 से 10 सितम्बर 2025 तक चले इस सत्र में 10 बिल पास हुए, लेकिन कौन जानता है कि उन कानूनों में क्या है? क्योंकि इन बिलों पर सदन में कोई चर्चा ही नहीं हुई. देश के सबसे बड़े प्रदेश में सत्ता और विपक्ष ने मिल कर जवाबदेही, ज़िम्मेदारी और लोकतंत्र का ऐसा मज़ाक बनाया कि महज़ 33 मिनट में 9 करोड़ लोगों के लिए 3 क़ानून पास कर डाले। राजस्थान विनियोग विधेयक-2025, राजस्थान वस्तु एवं सेवा कर विधेयक-2025 और महिलाओं को कारखानों में नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति देने वाला फैक्ट्रीज़ विधेयक-2025 पर सिरे से कोई डिस्कशन ही नहीं हुआ. शायद लॉ-मेकर्स ने यह समझ लिया है कि ब्यूरोक्रेट्स से क़ानून का ड्राफ्ट बनवा कर पास करवा दो, लेकिन वह क़ानून जनता के लिए कितना उपयोगी है, इस बात पर सिरे से पूरा विमर्श ही ग़ायब है. हद तो यह है कि विधानसभा में नए कैमरा लगने की बात पर विपक्ष ने वॉक आउट कर दिया। और सत्ता? उसने भी माहौल का फायदा उठा कर धड़ाधड़ कचौरी की तरह क़ानून छान दिए. पूरा असेंबली हॉल गली नुक्कड़ की तू तू-मैं-मैं बन गया. जब भी कोई नया क़ानून बनाया जाता है या पुराने में संशोधन किया जाता है, तो उसकी ज़रूरतें ध्यान में रखीं जाती हैं। या फिर किसी समस्या के समाधान या लगाम लगाने के लिए क़ानूनों का निर्माण होता है. लेकिन इस सत्र में ऐसे बिल भी लाये गए जिनको लाने के पीछे जनता का हित ग़ायब दिखा। सरकार ने Anti-Conversion बिल को ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ रोकने के मक़सद से पेश किया, पर सरकार के अपने दावे बताते हैं कि राज्य में लव जेहाद या जबरन धर्मांतरण जैसे मामले दर्ज ही नहीं हैं। फिर भी बिल में भारी सज़ाएँ, DM-inquiry जैसे प्रशासनिक अधिकार और अनिवार्य प्री-नोटिफिकेशन जैसी व्यवस्थाओं को शामिल किया गया. कोचिंग सेंटर रेगुलेशन बिल इसका अगला उदाहरण है। सरकार का दावा है कि यह छात्रों के हित में है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि यह बिल संस्थानों को ज्यादा सुरक्षा देता है, जबकि छात्रों की फीस, मानसिक दबाव और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं पर ठोस समाधान नहीं लाता। सवाल यह है कि क्या इस कानून का असली मक़सद छात्रों की सुरक्षा है या संस्थानों पर महज़ दिखावटी लगाम लगाना? असल समस्या यही है कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों ने विधानसभा को गंभीर विमर्श का मंच नहीं बनाने की पूरी कोशिश की और इसका नतीजा यह हुआ कि छात्रों, आम नागरिकों, महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों को सीधे प्रभावित करने वाले कानून ऐसे पास हो गए जैसे किसी बोर्डरूम की मीटिंग हो। इसके अलावा, जवाबदेही और अपनी ज़िम्मेदारी से ग़फ़लत का आलम यह कि पिछले 3 सत्रों में विधानसभा में सरकार से पूछने के लिए 11000 सवाल लगाए गए, उनमें से केवल 1300 सूचीबद्ध हुए और सदन के भीतर उनमें से महज़ 6 फीसदी जवाब ही दिए गए. बाक़ी के सवालों को या तो गोलमोल कर दिया गया या फिर वो डाक से विधायक आवास भेज दिए गए. सवाल यह कि क्या विधानसभा में पूछे गए सवाल और उनके जवाब जनता के सामने नहीं आने चाहिए? विधानसभा तो जनता की ही पंचायत है, लेकिन ऐसा नहीं होता। हालत यह कि इस मानसून सत्र के सवाल जवाब अभी तक विधानसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं. अगर विधायकों द्वारा पूछे गए सवालों का नेचर और संबंधित क्षेत्र देखा जाए तो लगेगा ‘पढ़ते जा शर्माते जा’. ऐसे सवालों की एक लंबी फहरिस्त है, जिनका सीधा जनता से कोई लेना देना तक नहीं होता। उनमें जनहित की जगह नेताहित समाहित रहता है. लोकतंत्र के मज़बूत बने रहने के लिए सर्वाधिक ज़रूरी होता है, जनता का पार्टिसिपेशन। लेकिन सवाल यह कि क्या क़ानून बनाने ने पहले क्या पब्लिक ओपिनियन की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं? क्या हंगामों, धरनों और सदन न चलने देने की यह ‘परम्परा’ रुक पाएगी? कहीं यह लोकतांत्रिक संस्था एक रबर स्टाम्प और ड्रामों की जगह तो नहीं बन जायेगी?

CBSE दो दशक में कई बार बोर्ड परीक्षाओं में बदलाव कर चुका है, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड किस तलाश में है?

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CBSE ने एक बार फिर बोर्ड परीक्षाओं में बदलाव किया गया है. जिनमें 2026 से लागू हो रही दो बार बोर्ड परीक्षा सबसे नई पहल है. 2026 में, CBSE दोनों कक्षाओं की परीक्षाएं 17 फरवरी से शुरू करेगा, और दसवीं के विद्यार्थियों को साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने का विकल्प मिलेगा. ऐसा जैसा कि NEP-2020 की अनुशंसा के चलते किया जा रहा है. CBSE ने पिछले दो दशकों में शिक्षा प्रणाली में बोर्ड परीक्षाओं के स्वरूप में कई बड़े प्रयोग किए हैं. 2026 में कक्षा 10 और 12 के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षा कराने का ऐलान NEP-2020 की सिफारिशों के बाद सबसे नया और बड़ा कदम है. पर क्या इतने बार और इतने बड़े पैमाने पर बदलाव सही हैं? यह समीक्षा इसी सवाल पर केंद्रित है

बोर्ड परीक्षाओं के प्रमुख प्रयोग और सुधार पर नजर डालिए

  • 2009 में CCE (Continuous and Comprehensive Evaluation) लागू हुआ, जहां साल में कई मूल्यांकन होते थे और बोर्ड परीक्षा कक्षा 10 के लिए वैकल्पिक बना दी गई थी.
  • 2017 से कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा फिर से अनिवार्य की गई, CCE हटा दिया गया.
  • 2020 में NEP-2020 के अनुसार परीक्षा पैटर्न में बड़े बदलावों की प्रक्रिया शुरू हुई. इसमें मूल दक्षताओं पर आधारित पेपर, कोर-सब्जेक्ट्स का फोकस के अलावा इस बात पर जोर दिया गया कि कोचिंग केंद्रित रटन विद्या वाला कल्चर खत्म हो.
  • अब अगले साल से कक्षा 10 के लिए साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने की योजना. पहली मुख्य परीक्षा और दूसरी ‘इंप्रूवमेंट’ परीक्षा होगी. दोनों का स्कोर ‘best of two’ के सिद्धांत पर मान्य रहेगा और छात्रों को एक ही अकादमिक सत्र में दो अवसर मिलेंगे.

CCE एक क्रांतिकारी कदम बताया गया था, लेकिन 10 साल भी नहीं चला सिस्टम

अगर बात करें 2009 की तो CCE (Continuous and Comprehensive Evaluation) की शुरुआत में बोर्ड परीक्षा वैकल्पिक कर दी गई और छात्रों का मूल्यांकन पूरे साल किया जाने लगा. इसके ज़रिए पढ़ाई का दबाव कम करने, समग्र कौशल पर ध्यान देने और आउटकम-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने का लक्ष्य था. परन्तु, इसकी कार्यवाही अधूरी और शिक्षकों की कमी के कारण कमजोर साबित हुई.

तकनीकी रूप से इसे सफलतापूर्वक लागू नहीं किया जा सका और फिर साल 2017 में इसे खत्म कर दिया गया. इसके बाद 2017 से पारंपरिक बोर्ड परीक्षा पुनः अनिवार्य हुई, जिससे विद्यार्थियों और अभिभावकों में स्थिरता आई. लेकिन NEP-2020 ने फिर से लचीलापन और व्यावहारिकता की मांग की और अब 2026 में CBSE ने साल में दो बार बोर्ड परीक्षा देने की योजना घोषित की.

लेकिन सवाल यह है कि क्या एजुकेशन सिस्टम में इस तरह बार-बार प्रयोग सही है? एक पक्ष यह है कि लंबे समय तक एक ही परीक्षा प्रणाली को बनाए रखना जरूरी होता है, ताकि सभी पक्ष उसके अनुसार खुद को ढाल सकें. साथ ही नए बदलाव के परिणामों का मूल्यांकन कर सुधार करने के लिए भी पर्याप्त समय चाहिए. बिना पर्याप्त परीक्षण के लगातार बड़े पैमाने पर बदलाव शिक्षा प्रणाली को अस्थिर बनाते हैं. इसलिए, बोर्ड परीक्षाओं के सुधार में जरूरी है कि एक संतुलित योजना बनाई जाए. एक ऐसा खाका तैयार हो, जहां बदलाव की गति तो कम से कम नियंत्रित हो और उनकी गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाए.

ध्यान यह भी रखा जाना चाहिए कि छोटे-छोटे पायलट प्रोजेक्ट्स के माध्यम से नीतियों का परीक्षण होना और फिर सफलतापूर्वक सिद्ध होने पर ही व्यापक स्तर पर लागू करना चाहिए. बावजूद इसके शिक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन इसके क्रियान्वयन में विद्यार्थियों का हित और शिक्षकों की दक्षता का भी ख्याल रखा जाना चाहिए.v

एफ़आईआर में जीआईएस लोकेशन क्यों ज़रूरी है: राजस्थान पुलिसिंग को 21वीं सदी में ले जाने का समय

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राजस्थान में हर बड़े हादसे, झगड़े, चोरी या सड़क दुर्घटना के बाद एक सवाल बार–बार उठता है क्या हमारी पुलिसिंग वाकई उतनी आधुनिक है, जितनी हो सकती है? जवाब असहज कर देने वाला है। टेक्नोलॉजी के दौर में भी हमारी एफ़आईआर व्यवस्था घटना स्थल की सही लोकेशन तक नहीं दर्ज करती। नतीजा यह होता है कि न अपराध का असली हॉटस्पॉट पता चलता है, न पुलिस की तैनाती वैज्ञानिक तरीके से हो पाती है। सोचिए, अगर हर एफ़आईआर में घटना का सटीक जियो-लोकेशन यानी लैटिट्यूड और लॉन्गिट्यूड अनिवार्य हो जाए तो क्या बदल सकता है? सबसे पहले, अपराध के असली पैटर्न सामने आएंगे। हम सिर्फ़ अनुमान या शिकायतकर्ता की याददाश्त पर निर्भर नहीं रहेंगे। चोरी, छेड़छाड़, दुर्घटना कौन सा अपराध किन इलाकों में बार-बार हो रहा है, इसका डिजिटल नक्शा बनेगा। पुलिस की तैनाती, पेट्रोलिंग और रोकथाम सब डेटाबेस से तय हो पाएँगे। दूसरी बात, जवाबदेही बढ़ेगी। SHO से लेकर जिला स्तर तक हर अधिकारी यह देख सकेगा कि किस थाने ने किन इलाकों में अपराध पर पकड़ बनाई और कहाँ कमी रह गई। ड्यूटी अब सिर्फ़ काग़ज़ी न रहकर ज़मीनी होगी।तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात नागरिकों का भरोसा बढ़ेगा। जब लोग देखेंगे कि पुलिस की गश्त और कार्रवाई किसी फोन कॉल या संपर्क पर नहीं, बल्कि वास्तविक डेटा पर आधारित है, तो पुलिसिंग की छवि बदल जाएगी। सुरक्षा का एहसास बढ़ेगा। सबसे अच्छी बात यह सुधार न खर्चीला है, न जटिल। हर पुलिसकर्मी के पास स्मार्टफ़ोन या टैबलेट पहले से मौजूद है। CCTNS में एक छोटा-सा अपडेट, और एफ़आईआर सिस्टम स्वतः लोकेशन-टैगिंग सक्षम कर सकता है। बस एक क्लिक, और घटनास्थल का पिन मैप पर दर्ज।राजस्थान अगर एक केन्द्रीयकृत क्राइम मैपिंग डैशबोर्ड विकसित कर ले, तो पूरे राज्य का अपराध-मानचित्र पुलिस मुख्यालय में रियल-टाइम दिख सकता है किस जिले में किस किस्म की घटनाएँ बढ़ रही हैं, कहाँ रोकथाम तेज़ करनी है, कहाँ संसाधन बढ़ाने हैं। हम अक्सर पुलिसिंग को बदलने की बात करते हैं, पर बदलाव वहीं से शुरू होता है जहाँ डेटा ईमानदार हो, साफ़ हो और वैज्ञानिक हो। एफ़आईआर में जीआईएस लोकेशन टैगिंग, एक छोटा-सा कदम राजस्थान पुलिस को पूरी तरह डेटा-ड्रिवन, आधुनिक और नागरिक-केंद्रित बना सकता है।ज़रूरत है कि राज्य सरकार इस सरल लेकिन क्रांतिकारी सुधार को जल्द लागू करे क्योंकि सटीक जानकारी ही सबसे बड़ा हथियार है।

Two-Minute Delivery Is Dead. Long Live the Headline and Optics

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Two-minute delivery did not die a natural death. It was executed swiftly, decisively, and with full political ceremony because it dared to outrun the comfort zone of India’s political economy. What should have been celebrated as a breakthrough in logistics, urban efficiency, and youth employment became a victim of that one thing the state truly excels at: headline management.The official narrative was noble on the surface. Delivery executives were unsafe. Traffic was chaotic. Citizens were alarmed. But stripped of theatrics, the truth is far simpler: innovation moved too fast, and the system panicked.

And no panic is complete without hypocrisy.

After all, nothing says “we care for delivery boys” like taxing them 45–50 percent on every litre of petrol they buy for their scooters. Nothing says “pro-worker” like extracting indirect taxes from individuals earning barely Rs 18,000–22,000 a month. And nothing says “public safety” like ignoring potholes big enough to swallow small automobiles while policing the speed at which a grocery order travels.But if India’s reaction feels bizarre, it becomes even more striking when compared to how other major economies approach similar disruptions.

In the United States, disruptive ideas are not strangled at birth. Uber, DoorDash, and Instacart did not face moral panic; they faced tough debates, lawsuits, and regulatory reform but never a political crusade designed to suffocate them for optics. Innovation came first, adjustments later.

In Europe, quick-commerce faced zoning issues, worker-protection debates, and urban planning challenges. But Berlin didn’t shutter the model because riders looked too fast on CCTV. Paris didn’t eliminate hyperlocal delivery because it generated uncomfortable news cycles. They regulated, negotiated, corrected and kept the industry alive.

In China, rapid delivery is a national capability. The state built e-scooter lanes, battery-swapping networks, and digital logistics infrastructure. Delivery workers are not treated as a problem to be contained but as partners in a hyper-efficient economy. The guiding question was: “How do we scale this safely?” not “How do we make this disappear before prime-time news?”

And then there is India, where innovation is tolerated only if it behaves slowly and doesn’t embarrass bureaucratic pace.

Here, the moment an idea becomes too visible, too fast, or too job-creating, it is framed as a national threat. The same ecosystem that never hesitates to collect taxes from low-income gig workers suddenly transforms into their self-declared guardian angel the minute a disruptive model threatens old narratives. Regulation becomes a weapon, not a tool.While other countries ask how to make innovation safer, India asks how it might look on television tonight.

This is tragic, because India actually needs such innovations more than any of these economies. We have the youngest workforce among major nations. We have dense, chaotic cities begging for efficient logistics. We have millions seeking flexible, entry-level employment. Quick-commerce including ultra-fast delivery was one of the few models where technology and job creation rose together.But in a system where optics dominate outcomes, the wrong thing dies first.The message has now been broadcast to every entrepreneur in the country:
Innovate, but not too fast.
Create jobs, but not too visibly.
Disrupt industries, but never the political narrative.
And whatever you do, do not deliver anything faster than the bureaucracy itself can think.

Two-minute delivery is dead.
But the real casualty is our credibility as a nation that claims to champion innovation. If we continue killing ideas that other economies regulate, refine, and celebrate, we will keep pretending that headlines are progress and mistaking political comfort for national growth.

ज़रूरत या ज़बरदस्ती? राजस्थान की 3,200 मेगावाट कोयला योजना

राजस्थान ऊर्जा विकास और आईटी सर्विसेज लिमिटेड (RUVITL) ने नियामक आयोग के 18 नवंबर 2025 के आदेश पर पुनर्विचार माँगा है, क्योंकि 25 वर्षों तक 3,200 मेगावाट कोयला खरीद की अनुमति नहीं मिली। समीक्षा याचिका का मुख्य तर्क यह है कि भविष्य की बिजली मांग आयोग ने “ठीक से देखी नहीं।” मगर याचिका पढ़ने के बाद लगता है कि शायद याचिका लिखने वालों ने खुद अपने ही दस्तावेज ठीक से नहीं देखे।

सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि जिस 1,350 मेगावाट की “संभावित रिटायरमेंट” दिखाकर कोयला खरीद को जरूरी बताया जा रहा है, उसी में 850 मेगावाट कोटा TPS की यूनिटें भी शामिल हैं।
ये वही यूनिटें हैं, जिनके बारे में दूसरी फाइलों में RVUNL केंद्र सरकार को बड़े गर्व से लिख रहा है कि बहुत कुशल हैं, बहुत सस्ती हैं, बहुत बढ़िया चल रही हैं।
कुछ फाइलों में ये यूनिटें रिटायर,
कुछ में “राजस्थान की शान।”
एक ही राज्य में दो राजस्थान चल रहे हैं एक योजना बनाने वालों का और एक कागजों पर उलझे तथ्यों का।

कोटा TPS का प्रदर्शन इतना अच्छा है कि उसने मार्च 2024 में 97 प्रतिशत उपलब्धता दिखाई। जिस यूनिट में इतना पैसा डालकर R&M और FGD लगा चुके हैं, जिस पर पूंजी लागत वसूल भी हो चुकी है, उसे “पुरानी” बताकर हटाने की कोशिश ऐसे की जा रही है जैसे कोई पुराना मोबाइल हो अपग्रेड चाहिए, तर्क नहीं।
इसी तर्ज पर सूरतगढ़ TPS की यूनिट 1 और 2 भी “रिटायर” घोषित कर दी गईं, जबकि न उम्र 30 साल पार, न तकनीकी कमी, न कोई कमीशन की नोटिंग। बस एक नई स्कीम को फिट करने के लिए पुरानी यूनिटों को अचानक “बुजुर्ग” घोषित कर देना CEA खुद कह चुका है कि उनकी उम्र वाली गाइडलाइन वित्तीय है, तकनीकी नहीं। पर राजकीय निर्णय गाइडलाइन से कम, और तर्क के साथ कम्फर्ट से ज्यादा चलते हैं।

राजस्थान का अजीब मॉडल है जो यूनिटें सबसे सस्ती बिजली देती हैं, उन्हीं को सबसे पहले रिटायर करने का प्रस्ताव। जो नई बिजली सबसे महंगी होगी, उसी को “अनिवार्य” बताया जा रहा है।
अगर यही आर्थिक विवेक है, तो उपभोक्ता भविष्य में अपने बिलों में “सरकार की रचनात्मकता शुल्क” जोड़कर भरने की तैयारी कर लें।

फिर उन परियोजनाओं को देखिए जिन्हें अचानक गायब कर दिया गया

  • गिरल परियोजना: वापस
  • छाबड़ा संयुक्त उद्यम: हवा में
  • माही-बांसवाड़ा: अनिश्चित घोषित
  • 630 मेगावाट फर्म RE: रद्द
  • NTPC/केंद्रीय पावर: गिनती में ही नहीं
  • रावतभाटा की संभावनाएँ: अनदेखी

ऐसा लगता है कि 3,200 मेगावाट की कोयला योजना पहले से तय थी बाकी सभी विकल्पों को बस इतना ही काम दिया गया:
“कृपया रास्ते से हट जाएँ, हम नई 3200 MW कोयला आधारित बिजली खरीद को जरूरी साबित कर रहे हैं।”नवीकरणीय ऊर्जा, स्टोरेज और हाइब्रिड समाधान जिन्हें देशभर में भविष्य का आधार माना जा रहा है इस याचिका में ऐसे पेश किए गए हैं जैसे वे “सहायक कलाकार” हों और कोयला ही कहानी का नायक। तथ्य यह है कि 25 वर्षों के लिए ऐसी भारी कोयला खरीद राजस्थान को उसी दौर में वापस ले जाएगी जब प्रदूषण, लागत और फिक्स्ड चार्ज मिलकर उपभोक्ताओं की जेब हल्की और हवा भारी करते थे।

समग्र निष्कर्ष यह है कि यह प्रस्ताव न प्रदर्शन पर आधारित है, न लागत पर, न राष्ट्रीय व्यवहार पर बस इस धारणा पर आधारित है कि अगर किसी चीज़ को बार-बार “आवश्यक” कहा जाए, तो वह वास्तव में आवश्यक हो जाती है।