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बांसवाड़ा में पीएम मोदी के सभा स्थल तक पहुंचने के लिए 1.27 किमी गेमन पुल ही एकमात्र रास्ता, इसकी सेहत पर कई बार उठ चुके हैं सवाल

वागड़ का अहमदाबाद- दाहोद जैसे 5 अहम शहरों से सीधा जुड़ाव, हालात यह कि एक फोर लेन सड़क भी नहीं

आज बांसवाड़ा में देश की आठवीं परमाणु विद्युत परियोजना का शिलान्यास होगा. इससे राजस्थान की कुल बिजली जरूरत का 20 फीसदी उत्पादन का रास्ता साफ होगा. पानी, बिजली के साथ यह क्षेत्र मैंगनीज अयस्क, डोलोमाइट, चूना पत्थर, तांबा, क्वार्टजाइट जैसे खनिजों का भंडार है. इसमें एक चमक अब सोने की भी जुड़ने वाली है, जो देश के कुल सोने की आपूर्ति का 25% तक योगदान कर सकता है. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और झारखंड के बाद बांसवाड़ा चौथा क्षेत्र होगा, जहां सोने का खनन होगा. करीब 113.52 मिलियन टन स्वर्ण अयस्क के आंकलन के साथ देश को बड़ा भंडार मिलने का अनुमान है.

इन तमाम प्राकृतिक उपहारों के बावजूद यह इलाका आजादी के 78 साल बाद भी उपेक्षा का शिकार है. प्रधानमंत्री की सभा स्थल पर 1 लाख से ज्यादा लोग बांसवाड़ा जिले के नापला (छोटीसरवन) आएंगे. इस जगह तक जाने के लिए गेमन पुल ही एकमात्र रास्ता है. बांसवाड़ा-रतलाम रोड पर स्थित माही नदी पर बने इस 1.27 किलोमीटर पुल की सेहत पर भी कई बार सवाल खड़े हो चुके हैं. इसकी आयु बढ़ाने के लिए कई तरह की मशक्कत की जा रही है. बूढ़े होते इस पुल की मजबूती में कुछ कमी आने की स्थिति में ‘मास्टिक’ का काम किया गया, ताकि इसकी आयु करीब 10 से 15 साल और बढ़ जाए. इसके सभी 27 स्पान के क्षतिग्रस्त हुए हिस्सों की मरम्मत का प्लान भी साल 2017 में बनाया गया था.

वहीं, हवाई या रेल कनेक्टिविटी की बात छोड़िए, एक ऐसा जिला है जहां एक भी फोर-लेन नहीं है. जबकि बांसवाड़ा का नजदीकी 5 बड़े शहरों से सीधा जुड़ाव है. बावजूद इसके बांसवाड़ा से रतलाम, अहमदाबाद, उदयपुर, निम्बाहेड़ा और दाहोद तक जाने के लिए सिर्फ टू लेन है.

दिल्ली- मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से गुजरता तो 90 किमी से ज्यादा की दूरी होती कम

दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे को लेकर पहले खबर आई कि यह बांसवाड़ा से गुजरेगा लेकिन इस मामले में भी निराशा हाथ लगी. यह एक्सप्रेसवे रतलाम जिले से 91 किलोमीटर की दूरी तक गुजरता है और जिले के लगभग 87 गांवों को कवर करता है. झाबुआ से तलावड़ा, महूड़ी का माल होते हुए सैलाना, रतलाम जिले में प्रवेश करता है. एक अनुमान के मुताबिक, अगर दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे बांसवाड़ा से होकर बनाया जाता तो कुल दूरी में लगभग 60-70 किलोमीटर की बचत होती. वर्तमान में यह एक्सप्रेसवे राजस्थान के कोटा, चित्तौड़गढ़, रतलाम होते हुए गुजरता है, जबकि बांसवाड़ा मार्ग भौगोलिक रूप से छोटा व सीधा पड़ता है और इससे गुजरात का प्रवेश क्षेत्र भी जल्दी आता. इससे ईंधन, समय, दोनों की और बचत होती, और राजस्थान के दक्षिणी यानी आदिवासी क्षेत्र को भी बड़ा आर्थिक फायदा मिलता.

परमाणु परियोजना को भी करना पड़ा लंबा इंतजार

आज से 13 साल पहले 3 जून 2011 के दिन डूंगरपुर-रतलाम वाया बांसवाड़ा रेलवे परियोजना का शिलान्यास हुआ था. तत्कालीन गहलोत सरकार के दौरान यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शिलान्यास किया था. योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से 200 करोड़ रुपए भी दे दिए गए थे, लेकिन यह परियोजना कई वजहों से ठंडे बस्ते में चली गई, जिसके बाद से ही यहा रेलवे परियोजना का काम ठप्प हो चला हा है. जिला मुख्यालय पर उप मुख्य अभियंता कार्यालय भी बंद हो गया.

कोर्ट आदेश के ‘पैराग्राफ नंबर-44’ से संसद द्वारा पारित शिक्षा का अधिकार कानून RTE संकट में , 3 लाख बच्चों का भविष्य दांव पर


विज्ञापन के फेर में लाखों परिवारों को प्रभावित करने का वाला विषय अखबारों से हुआ ओझल शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE एक्ट) के तहत प्रवेश के योग्य इन बच्चों का मामला कोर्ट में अटक गया है. निजी स्कूलों और शिक्षा विभाग के बीच की कानूनी लड़ाई में प्रक्रिया अधर में अटक गई है. मामला कोर्ट में लंबित है और अक्टूबर में इसकी अगली सुनवाई होगी. तब तक आधा सत्र भी निकल गया होगा, जिससे कि स्कूल में प्रवेश पाने की उम्मीद रखने वाले गरीब परिवार के बच्चों की स्कूल शिक्षा पर संकट गहरा गया है. इस संकट के गहराने की एक वजह है और वो है RTE एक्ट के पैराग्राफ नंबर- 44 पर कानूनी पेंच. इस पैरा- 44 के मुताबिक, निजी स्कूलों में विद्यार्थियों के एडमिशन के लिए दो स्तरों पर नर्सरी/PP3+ (प्री-प्राइमरी एजुकेशन) और कक्षा-1 (प्राइमरी एजुकेशन) के स्तर पर पात्र मानी जाती है. इस बिंदु में दोनों ही लेवल को एजुकेशन का एंट्री प्वाइंट माना गया है यानी स्कूल चाहे तो नर्सरी या क्लास-1 पर एडमिशन दे सकता है. इन दोनों ही स्तर पर एडमिशन के बदले के निजी स्कूल सरकार से भुगतान की मांग कर रहे हैं. जबकि शिक्षा विभाग ने आदेश जारी किया है कि पहली कक्षा को ही एंट्री प्वाइंट माना जाएगा और उन्हीं कक्षाओं में गरीब बच्चों के लिए RTE का भुगतान स्कूल को होगा. इस मामले में कोर्ट ने पैरा-44 पर स्टे लगाते हुए सुनवाई अक्टूबर तक टाल दी है. अब इसी स्टे की व्याख्या करते हुए निजी स्कूल का कहना है कि कोर्ट स्टे की स्थिति में एडमिशन नहीं होंगे. जबकि शिक्षा विभाग का कहना है कि एडमिशन की प्रक्रिया पर रोक नहीं है, बल्कि एंट्री प्वाइंट (नर्सरी हो या पहली कक्षा) के मामले में कोर्ट ने स्थगन आदेश दिया है. ऑनलाइन लॉटरी के बाद एडमिशन लटके 2025-26 के लिए ऑनलाइन लॉटरी निकाली गई थी, जिसमें राज्य के 34,799 निजी विद्यालयों में तीन लाख से अधिक बच्चों का चयन किया गया. इनमें से करीब डेढ़ लाख छात्र-छात्राएं पहली कक्षा के लिए चयनित हुए. लेकिन पहली क्लास में प्रवेश देने को लेकर निजी स्कूलों और शिक्षा विभाग में ठन गई. अब इसका खामियाजा इस बार भी अभिभावकों और बच्चों को भुगतना पड़ रहा है. मामला पिछले सत्र के दौरान शिक्षा विभाग की ओर से भुगतान नहीं किए जाने का है. निजी स्कूल प्रबंधनों का कहना है कि आरटीई के अंतर्गत प्री प्राइमरी कक्षाओं में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के पुनर्भरण का भुगतान सरकार ने नहीं किया, पहले वह भुगतान करे. दरअसल, लॉटरी पहली और नर्सरी क्लास के लिए निकाली जाती है. शिक्षा विभाग का कहना है कि भुगतान सिर्फ पहली क्लास का किया जाएगा.  वहीं, निजी स्कूलों का कहना है कि उनकी एंट्री लेवल क्लास ‘नर्सरी’ है, इसलिए वे नर्सरी में ही आरटीई के तहत प्रवेश दे रहे हैं. निजी स्कूलों के इस तर्क पर शिक्षा विभाग का कहना है कि कोर्ट के आदेश का गलत अर्थ निकाला गया है और पहली कक्षा में आरटीई प्रवेश बाधित नहीं किया जा सकता. हर बार एडमिशन में होती है देरी, स्थाई समाधान क्यों नहीं? ये पहली बार नहीं है, जब RTE का मामला पेचीदगियों का सामना कर रहा है. साल दर साल इस तरह की दिक्कतें सामने आती रहती हैं. हर साल निजी स्कूल शिक्षा विभाग पर भुगतान नहीं होने का आरोप लगाते हैं और फिर प्रवेश प्रक्रिया बाधित भी होती है. सरकार की ओर से इन 3 लाख बच्चों को निशुल्क पढ़ाए जाने का निर्देश निजी स्कूलों को दिया गया है, बावजूद इसके कोई स्थाई समाधान नहीं हो रहा और RTE जैसी योजनाओं पर ग्रहण लग जाता है. क्या है इसका समाधान? राजस्थान के 30 हजार से ज्यादा निजी स्कूलों को भुगतान करने की व्यवस्था के बजाय क्या सरकार ऐसा नहीं कर सकती कि सीधे बच्चों के खाते में राशि ट्रांसफर की जाए? RTE की लॉटरी, फिर बच्चों को प्रवेश और सत्र खत्म होने के बाद शिक्षा विभाग का भुगतान, यह एक लंबी प्रक्रिया है. ऐसे में राजस्थान में बच्चों के खाते में राशि हस्तांतरित कर इस प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है. ताकि सत्र में देरी भी ना हो और बच्चों को प्रवेश भी समय पर मिले. सिंधी बच्चे परिजन के साथ स्कूल जाएंगे और प्रवेश प्रकिया पूरी करेंगे. यह ठीक वैसे ही होगा, जैसे आम बच्चों के लिए उनके परिजन भुगतान करते.

पाकिस्तान में पानी क्यों जा रहा, सरकार ने तो रोकने की बात कही थी? 

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राजस्थान सरकार समझौते से 2.50 लाख हेक्टेयर सिंचाई भूमि के लिए पानी के पाती है, जबकि प्रदेश के हिस्से का 4 लाख हेक्टेयर से ज्यादा पानी हम बहा दे रहे हैं? जल संकट से निपटने के लिए पड़ोसी राज्यों के साथ समझौते के अलावा व्यर्थ बह रहे पानी को भी रोकना होगा. ERCP चुनाव के दौरान भी बड़ा मुद्दा बना और सरकार के गठन के बाद भी. राजस्थान सरकार ने मध्य प्रदेश से समझौता किया. पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना से एमपी में लगभग 4 लाख हेक्टयर में सिंचाई होगी और राजस्थान में 2 लाख 80 हजार हेक्टेयर में सिंचाई होगी. लेकिन इससे ज्यादा पानी तो हम व्यर्थ बहा दे रहे हैं और जिसे रोकने के उपायों पर भी काम नहीं हो रहा. राजस्थान के पंजाब की सीमा से लगे हुए जिले श्रीगंगानग़र में प्रतिदिन हजारों क्यूसेक पानी- पाकिस्तान को जा रहा है, किंतु बीकानेर कैनाल को पूरी आपूर्ति नहीं दी जा रही. अगर यह पानी रोक दिया जाए तो करीब 1.50 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई हो सकती है. जबकि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सिंधु जल समझौता रद्द कर दिया गया. बावजूद इसके पाकिस्तान को पानी जा रहा है और हमारे किसानों की मेहनत बर्बाद हो रही है. उत्तर ही नहीं, प्रदेश के दक्षिण क्षेत्र में भी ऐसी तस्वीर सामने आ रही है. यहां माही बांध से ओवरफ्लो होते पानी को रोकने का भी कोई मैनेजमेंट नहीं है, अगर इस पर काम किया जाए तो 3 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हो सकेगा.  यानी काफी मशक्कत के बाद एक समझौते से करीब 3 लाख हेक्टेयर सिंचाई भूमि पर पानी उपलब्ध हो रहा है, जबकि 4 लाख से ज्यादा ओवरफ्लो बह रहा है. पूरे देश में पानी की आवक, सीमावर्ती इलाकों में किसान पानी को मोहताज राजस्थान के पंजाब की सीमा से लगे हुए जिले—श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और बीकानेर- इन दिनों गंभीर जल संकट की चपेट में हैं. यहां की नहरें, खासकर बीकानेर कैनाल और गंगनहर, जो पंजाब के हरिके हेड वर्क्स से आती हैं, सूखी पड़ी हैं. क्षेत्र के किसान बार-बार सिंचाई के पानी की मांग उठा रहे हैं, पर समाधान नहीं निकल रहा. चिंता की बात यह है कि इस बार हिमाचल प्रदेश में असामान्य रूप से अधिक बारिश और भाखड़ा-पोंग बांधों में बंपर पानी आया, फिर भी राजस्थान का जल हिस्सा अधूरा है.  किसानों का सवाल- पाकिस्तान को क्यों जा रहा पानी?  हरिके हेड वर्क्स से हुसैनीवाला की ओर 28 हजार क्यूसेक और पाकिस्तान की ओर 25 हजार क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है. बीकानेर कैनाल को उसका जायज हिस्सा नहीं मिल रहा. गुजरात से समझौता खत्म, लेकिन हम पानी को फिर भी रोक नहीं पा रहे साल 1966 में राजस्थान सरकार ने माही-नर्मदा परियोजना के तहत माही बांध निर्माण का समझौता हुआ. इसके तहत 40 टीएमसी पानी गुजरात को जाना था. बांध के निर्माण में गुजरात सरकार ने भी मदद की थी. बांसवाड़ा के किसान विरोध में उतरे तो नर्मदा ट्रिब्यूनल ने खोसला कमेटी बनाई. कमेटी ने रिपोर्ट में कहा कि जब तक गुजरात के कडाणा बांध तक पानी नहीं पहुंचता, तब तक माही से सप्लाई होगी. उसी समय एक और प्रोजेक्ट बना, जिसके तहत माही का पानी जालोर, सिरोही और बाड़मेर तक पहुंचना था. जब गुजरात का कडाणा बांध का प्रोजेक्ट पूरा हुआ तो भी माही का ओवरफ्लो पानी जालोर से बाड़मेर तक नहीं पहुंचा. आज भी राजस्थान का यह ओवरफ्लो पानी गुजरात जा रहा है. नतीजा यह हुआ कि कई नजदीक के के गांवों में खेतों में फसल सूख रही है और किसानों की आय में गिरावट हो रही है. अगर सरकार इसे रोकने में कामयाब हो जाए तो तीन लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हो सकेगा. गुजरात को हर वर्ष 40 टीएमसी पानी माही बांध से दिया जा रहा है, जबकि राजस्थान के साथ ऐसा कोई समझौता या शर्त नहीं है. आखिर सरकार के पास क्या विकल्प है? – लगातार कम हो रही नहरों की आपूर्ति, समझौतों की अनदेखी और जल प्रबंधन के पुराने ढांचे ने राजस्थान को जल संकट के कगार पर ला खड़ा किया है. – अगर राजस्थान को माही व नर्मदा सहित अन्य जल स्रोतों से उसका उचित हिस्सा मिल जाता है, तो लाखों लाख हेक्टेयर नए क्षेत्र में सिंचाई हो सकती है, जिससे प्रदेश की अर्थव्यवस्था और किसान दोनों को राहत मिलेगी.

राजस्थान की राजनीति में 90 का दशक: जब माथुर-गहलोत के खिलाफ तीन दिग्गजों ने रची साचिश और जादूगर का साथ देने के चलते शिवचरण माथुर को गंवानी पड़ी थी कुर्सी


1980 से 1990 के बीच प्रदेश लगातार राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा था। 1980 में जगन्नाथ पहाड़िया के बाद 1981-85 तक शिवचरण माथुर मुख्यमंत्री रहे। फिर हरिदेव जोशी को सत्ता की बागडोर मिली और उन्होंने 1988 तक सरकार चलाई। उसके बाद फिर माथुर की वापसी हुई, लेकिन वे महज सालभर ही टिक पाए। 1989 में हरिदेव जोशी दोबारा गद्दी पर आए, मगर साल 1990 के बाद वे भी हाशिए पर चले गए। इन वर्षों में राजस्थान ने एक के बाद एक कई मुख्यमंत्रियों को बदलते देखा। यही वह दौर था जब दिल्ली के करीब माने जाने वाले नेता अशोक गहलोत प्रदेश कांग्रेस के मठाधीशों की आंखों की किरकिरी बन गए थे। आज गहलोत का जिक्र होता है तो बातचीत अक्सर उनकी सचिन पायलट से अदावत या हालिया वर्षों में डॉ. सीपी जोशी जैसे दिग्गजों को पटखनी देने तक सिमट जाती है। लेकिन 90 के दशक की शुरुआत में, जब गहलोत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब उनके खिलाफ पार्टी के भीतर ही असंतुष्ट विधायकों और सांसदों की बड़ी फौज खड़ी हो गई थी। इसी असंतोष की अगुवाई हरिदेव जोशी, हीरालाल देवपुरा और सांसद नवलकिशोर शर्मा ने की। डीग कांड और माथुर की विदाई 20 फरवरी 1985 को शिवचरण माथुर चुनाव प्रचार के लिए भरतपुर जिले के डीग कस्बे में पहुंचे थे। वहां निर्दलीय प्रत्याशी और पूर्व विधायक राजा मानसिंह व कांग्रेस समर्थकों के बीच टकराव हो गया। कहा जाता है कि राजा मानसिंह ने अपनी जीप से चुनाव सभा का मंच और माथुर के हेलिकॉप्टर को नुकसान पहुंचाया। पुलिस ने उन पर हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया। अगले दिन 21 फरवरी को डीग बाजार में पुलिस से झड़प के दौरान गोलीबारी हुई, जिसमें राजा मानसिंह और उनके दो साथी मारे गए। इस घटना ने न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरे देश में जाट समाज को कांग्रेस के खिलाफ खड़ा कर दिया। नतीजा यह हुआ कि चुनाव के बाद शिवचरण माथुर से इस्तीफा ले लिया गया और 1985 में हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद सत्ता की कमान कभी जोशी तो कभी माथुर के हाथों में रही। 1988 में माथुर की वापसी और नया मंत्रिमंडल प्रधानमंत्री राजीव गांधी की इच्छा पर 20 जनवरी 1988 को विधानसभा कांग्रेस दल ने माथुर को नेता चुना। 26 जनवरी को उन्होंने छोटा मंत्रिमंडल गठित किया, जिसमें हनुमान प्रभाकर, गोविंदसिंह गुर्जर, डॉ. बीडी कल्ला और माधोसिंह दीवान मंत्री बनाए गए। वहीं वैद्य भैरूलाल भारद्वाज, अश्कअली टाक और कमला भील को राज्यमंत्री नियुक्त किया गया। इसके बाद 6 फरवरी 1988 को मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, जिसमें शीशराम ओला, नरपतराम बरबड़, नारायणसिंह, रघुनाथ विश्नोई, रामकिशन वर्मा जैसे नेता शामिल हुए। बीना काक, डॉ. गिरिजा व्यास, चंद्रशेखर शर्मा और सूरजपालसिंह जैसे युवा चेहरे भी सरकार में आए। राजनीति में नया खून उतर चुका था और सत्ता में हिस्सेदारी की होड़ तेज थी। असंतोष और गहलोत का गृह मंत्री बनना माथुर ने हरिदेव जोशी मंत्रिमंडल (1985-88) के कई वरिष्ठ नेताओं को बाहर कर दिया था। हीरालाल देवपुरा, गुलाबसिंह शक्तावत, रामसिंह विश्नोई, नरेंद्रसिंह भाटी, रामदेवसिंह, सुजानसिंह यादव जैसे कई नाम मंत्रिमंडल से बाहर थे। इससे पार्टी में असंतोष गहराता गया। इस बीच माथुर ने अशोक गहलोत को गृह मंत्री बना दिया। गृह जैसा अहम विभाग अब तक खुद सीएम के पास था। गहलोत तब विधायक भी नहीं थे, बल्कि लोकसभा सदस्य थे। यह निर्णय पार्टी में कई लोगों को नागवार गुजरा। उधर, हनुमानप्रसाद प्रभाकर और लक्ष्मणसिंह को मंत्रिमंडल से बाहर करने से असंतोष और भड़क उठा। धीरे-धीरे गहलोत असंतुष्ट खेमे के सीधे निशाने पर आ गए। 1989: बजट सत्र का बहिष्कार और बगावत असंतोष का चरम उस समय देखने को मिला जब 1989 में विधानसभा का बजट सत्र शुरू हुआ। सत्तारूढ़ दल के ही असंतुष्ट विधायकों ने 17 मार्च को सत्र का बहिष्कार कर दिया। यह कांग्रेस इतिहास में अभूतपूर्व था। हाईकमान को हस्तक्षेप करना पड़ा और सीएम को केवल चार महीने का लेखानुदान पारित कर सत्र खत्म करने का निर्देश दिया गया। दिल्ली से आया संदेश और नए समीकरण जब अंदरूनी कलह थमी नहीं, तो कांग्रेस हाईकमान ने सख्त कदम उठाए। जगन्नाथ पहाड़िया और हरिदेव जोशी को क्रमशः बिहार और असम का राज्यपाल बना दिया गया। 7 जून 1989 को अशोक गहलोत को हटाकर हीरालाल देवपुरा को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया गया। वहीं माथुर को मंत्रिमंडल विस्तार का आदेश दिया गया। 6 जून 1989 को तीसरा विस्तार और मंत्रिपरिषद 35 सदस्यों तक पहुंच गई, जिसमें मुख्यमंत्री समेत 13 मंत्री, 16 राज्यमंत्री, 3 उपमंत्री और 3 संसदीय सचिव शामिल

नए भारत की शिक्षा नीति में गांधी-नेहरू क्यों नही?

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राजस्थान के स्कूलों में इस सत्र से सिलेबस बदल गया है. नया सिलेबस नई शिक्षा नीति (NEP-2020), एनसीएफ-2023 और एनसीईआरटी के बदलावों के अनुरूप तैयार किया गया है. राज्य सरकार ने पांचवीं तक के सिलेबस में बदलाव को मंजूरी दे दी है, और इसे 2025-26 सत्र से लागू किया जाएगा. छठी-नौवीं व 11वीं कक्षा में बदलाव 2026-27 और 10वीं-12वीं में 2027-28 से लागू होगा. नए पाठ्यक्रम में कक्षा-5 की के8तब भारत के महान व्यक्तित्वों के रूप में छत्रपति शिवाजी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रमुखता दी गई है.

नेहरू, गांधी क्यों नहीं?

कक्षा तीसरी से पांचवीं तक ना तो पंडित जवाहरलाल नेहरू का जिक्र है और ना ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का. नए सिलेबस के सन्दर्भ में शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने यह स्पष्ट किया था कि पूर्व सरकार के समय जो किताबें (जैसे ‘आजादी के बाद स्वर्णिम भारत’) शामिल थीं, उनमें कांग्रेस नेताओं और गांधी-नेहरू परिवार का महिमामंडन था, लेकिन परीक्षा के लिहाज से वे किताबें जरूरी नहीं थीं.

“प्रतीकों को भी उचित स्थान मिलना चाहिए”, सरकार ने कही थी ये बात

सरकार की ओर से खुद इस बात को रखा गया था कि सबसे ज्यादा योगदान देने वाले अन्य नेताओं और राष्ट्रीय प्रतीकों को भी उचित स्थान मिलना चाहिए, न कि सिर्फ कुछ चेहरों को. इसी कारण अब नई पुस्तकों और सिलेबस में विविध और व्यापक दृष्टिकोण अपनाया गया है. तो क्या भारत के स्वर्णिम इतिहास के प्रतीक महात्मा गांधी और नेहरू को स्कूल में नहीं पढ़ाया जाना चाहिए?

जानकार मानते हैं कि प्रारंभिक शिक्षा के स्तर पर भारत के राष्ट्र आंदोलन के प्रतीक चिन्हों और पूर्व प्रधानमंत्रियों की जानकारी भी बच्चों को दी जानी चाहिए. स्कूल शिक्षा के स्तर पर आधारभूत जानकारी से ही उसका व्यावहारिक ज्ञान मजबूत होगा.

शिक्षा मंत्री ने किए थे ये दावे

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा है, “कक्षा 5 तक आते-आते छात्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और सामाजिक सुधारकों के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे. हर जिले के हिसाब से स्थानीय भाषाओं के शब्दकोश तैयार हुए हैं, नई किताबों में इन्हें जगह मिली है.”

जनता की भागीदारी, जवाबदेही, पारदर्शिता और ज़िम्मेदारी, राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र में जो भी हुआ वो इन शब्दों के विपरीत ही था.

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राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र भी खत्म हो गया. लेकिन, आप किसी थोड़े से भी जागरूक नागरिक से यह पूछें कि इस सत्र में क्या प्रोडक्टिव हुआ? तो शायद आपको हंगामे और हो हल्ला की अख़बारी खबरों की कतरनों से पढ़ी लाइनों के अलावा कोई जवाब मिल सके. विधानसभा सत्र कानून बनाने के लिए बुलाये जाते हैं. जनता के मुद्दों, उनकी समस्याओं, प्रदेश के भविष्य की रचना करने के लिए सर जोड़ कर बैठने के लिए कॉल किये जाते हैं, लेकिन क्या इन सबका वही हासिल है, जिसकी उम्मीद और जिस वजह से प्रदेश के सारे जनप्रतिनिधि इकट्ठा होते हैं?

1 से 10 सितम्बर 2025 तक चले इस सत्र में 10 बिल पास हुए, लेकिन कौन जानता है कि उन कानूनों में क्या है? क्योंकि इन बिलों पर सदन में कोई चर्चा ही नहीं हुई. देश के सबसे बड़े प्रदेश में सत्ता और विपक्ष ने मिल कर जवाबदेही, ज़िम्मेदारी और लोकतंत्र का ऐसा मज़ाक बनाया कि महज़ 33 मिनट में 9 करोड़ लोगों के लिए 3 क़ानून पास कर डाले। राजस्थान विनियोग विधेयक-2025, राजस्थान वस्तु एवं सेवा कर विधेयक-2025 और महिलाओं को कारखानों में नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति देने वाला फैक्ट्रीज़ विधेयक-2025 पर सिरे से कोई डिस्कशन ही नहीं हुआ.
शायद लॉ-मेकर्स ने यह समझ लिया है कि ब्यूरोक्रेट्स से क़ानून का ड्राफ्ट बनवा कर पास करवा दो, लेकिन वह क़ानून जनता के लिए कितना उपयोगी है, इस बात पर सिरे से पूरा विमर्श ही ग़ायब है. हद तो यह है कि विधानसभा में नए कैमरा लगने की बात पर विपक्ष ने वॉक आउट कर दिया। और सत्ता? उसने भी माहौल का फायदा उठा कर धड़ाधड़ कचौरी की तरह क़ानून छान दिए. पूरा असेंबली हॉल गली नुक्कड़ की तू तू-मैं-मैं बन गया.

जब भी कोई नया क़ानून बनाया जाता है या पुराने में संशोधन किया जाता है, तो उसकी ज़रूरतें ध्यान में रखीं जाती हैं। या फिर किसी समस्या के समाधान या लगाम लगाने के लिए क़ानूनों का निर्माण होता है. लेकिन इस सत्र में ऐसे बिल भी लाये गए जिनको लाने के पीछे जनता का हित ग़ायब दिखा। सरकार ने Anti-Conversion बिल को ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ रोकने के मक़सद से पेश किया, पर सरकार के अपने दावे बताते हैं कि राज्य में लव जेहाद या जबरन धर्मांतरण जैसे मामले दर्ज ही नहीं हैं। फिर भी बिल में भारी सज़ाएँ, DM-inquiry जैसे प्रशासनिक अधिकार और अनिवार्य प्री-नोटिफिकेशन जैसी व्यवस्थाओं को शामिल किया गया.

कोचिंग सेंटर रेगुलेशन बिल इसका अगला उदाहरण है। सरकार का दावा है कि यह छात्रों के हित में है, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? विशेषज्ञों और विश्लेषकों का कहना है कि यह बिल संस्थानों को ज्यादा सुरक्षा देता है, जबकि छात्रों की फीस, मानसिक दबाव और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याओं पर ठोस समाधान नहीं लाता। सवाल यह है कि क्या इस कानून का असली मक़सद छात्रों की सुरक्षा है या संस्थानों पर महज़ दिखावटी लगाम लगाना?
असल समस्या यही है कि चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों ने विधानसभा को गंभीर विमर्श का मंच नहीं बनाने की पूरी कोशिश की और इसका नतीजा यह हुआ कि छात्रों, आम नागरिकों, महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों को सीधे प्रभावित करने वाले कानून ऐसे पास हो गए जैसे किसी बोर्डरूम की मीटिंग हो।

इसके अलावा, जवाबदेही और अपनी ज़िम्मेदारी से ग़फ़लत का आलम यह कि पिछले 3 सत्रों में विधानसभा में सरकार से पूछने के लिए 11000 सवाल लगाए गए, उनमें से केवल 1300 सूचीबद्ध हुए और सदन के भीतर उनमें से महज़ 6 फीसदी जवाब ही दिए गए. बाक़ी के सवालों को या तो गोलमोल कर दिया गया या फिर वो डाक से विधायक आवास भेज दिए गए. सवाल यह कि क्या विधानसभा में पूछे गए सवाल और उनके जवाब जनता के सामने नहीं आने चाहिए? विधानसभा तो जनता की ही पंचायत है, लेकिन ऐसा नहीं होता। हालत यह कि इस मानसून सत्र के सवाल जवाब अभी तक विधानसभा की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं.

अगर विधायकों द्वारा पूछे गए सवालों का नेचर और संबंधित क्षेत्र देखा जाए तो लगेगा ‘पढ़ते जा शर्माते जा’. ऐसे सवालों की एक लंबी फहरिस्त है, जिनका सीधा जनता से कोई लेना देना तक नहीं होता। उनमें जनहित की जगह नेताहित समाहित रहता है.
लोकतंत्र के मज़बूत बने रहने के लिए सर्वाधिक ज़रूरी होता है, जनता का पार्टिसिपेशन। लेकिन सवाल यह कि क्या क़ानून बनाने ने पहले क्या पब्लिक ओपिनियन की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं? क्या हंगामों, धरनों और सदन न चलने देने की यह ‘परम्परा’ रुक पाएगी? कहीं यह लोकतांत्रिक संस्था एक रबर स्टाम्प और ड्रामों की जगह तो नहीं बन जायेगी?

मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलने की मांग आज भी अधूरी, स्कूलों की किताब में जोड़ा तथ्य- साल 2022 में मिला दर्जा

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‘राजस्थान का जलियांवाला बाग’ कहे जाने वाले मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग वर्षों से उठ रही हैं. सैकड़ों आदिवासियों के बलिदान का प्रतीक यह स्थल आज भी इस दर्जे का इंतजार कर रहा है. लेकिन राजस्थान की स्कूली किताबों में इस संबंध में गलत तथ्य जोड़ते हुए बताया गया है कि इस धाम को 3 साल पहले यानी साल 2022 में राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया. जबकि आदिवासी अंचल को आज भी स्मारक घोषित होने का इंतजार है. हालांकि साल 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां आए थे और उनसे आस भी लगाई गई कि वर्षों पुरानी यह मांगी पूरी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब राजस्थान के स्कूलों में कक्षा-5 की EWS विषय में “हमारे प्रेरक” चैप्टर जोड़ा गया है. इस चैप्टर में गोविंद गिरी की प्रेरणादायक कहानियां शामिल हैं. इसमें 17 नवंबर 1913 के दिन मानगढ़ में हुए हत्याकांड को भी शामिल किया गया है. साथ ही अंत में चैप्टर के मुख्य बिंदु लिखते हुए बताया गया कि राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा (2022)- मानगढ़ धाम को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया.

1 नवंबर 2022 को पीएम मोदी ने दौरा किया, लेकिन घोषित नहीं किया स्मारक

दरअसल, 1 नवंबर 2022 को पीएम मोदी के दौरे से पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी कि ऐतिहासिक मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. प्रधानमंत्री लगभग दस साल बाद मानगढ़ धाम पहुंचे और यहां उन्होंने 1500 आदिवासियों की शहीद स्थली को नमन कर आदिवासियों के बलिदान और संघर्ष को याद भी किया. लेकिन आदिवासियों को एक बार फिर बड़ी मायूसी हाथ लगी.

बीजेपी सांसद तो खुद सदन में मांग उठा रहे

इसी साल लोकसभा सत्र में मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग डॉ. मन्नालाल रावत ने भी उठाई थी. उन्होंने कहा था कि स्वाधीनता संग्राम के दौरान 1908 से 1913 के दौरान राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश की सीमा पर मानगढ़ आंदोलन हुआ था. यह उस वक्त औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन था. यहां जो आदिवासी सनातनी भक्त हुए है. उनकी शहादत की गाथा पूरे विश्व के सामने नहीं आ पाई है. जब बीजेपी सांसद सदन में खड़े होकर मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग उठा रहे हैं तो 2022 में स्मारक घोषित होने का तथ्य क्यों किताब में जोड़ा गया?

RIIMS, मेडिकल टूरिज्म से पहले आदिवासी क्षेत्रों में हेल्थकेयर पर ध्यान दो सरकार, क्यों बंद किया ट्राइबल क्षेत्रों के लिए ट्रैवल अलाउंस?

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राजस्थान में भजनलाल सरकार ‘हील इन राजस्थान नीति–2025’ के तहत प्रदेश को आदर्श चिकित्सा स्थल बनाने के लिए नीति का दावा कर रही है. सरकार का मानना है कि इससे राज्य में मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन दूसरी ओर, सरकार ने 36 साल बाद जनजाति क्षेत्र में मेडिकल टीचिंग फैकल्टी के लिए ट्रैवल अलाउंस बंद कर दिया है. नए नियमों के मुताबिक, अब फैकल्टी को 40 हजार ट्रैवल अलाउंस नहीं मिलेगा, जिससे जनजाति क्षेत्र में हेल्थकेयर सेक्टर में बड़ा संकट गहरा सकता है. दरअसल, यह अलाउंस या भत्ता विशिष्ट स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए नवीन दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. दूरस्थ और कठिन क्षेत्रों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को आकर्षित करने के लिए हार्ड एरिया भत्ते और विशेष पैकेज प्रदान किए जाते हैं और आदिवासी बहुल जिलों को अधिक संसाधन आवंटित किए जाते हैं. लेकिन इसके बंद होने से आदिवासी अंचल के मेडिकल कॉलेज में पद खाली पड़े हैं. ये हाल भी तब है, जब सरकार एम्स दिल्ली की तर्ज पर विश्वस्तरीय और सुपर स्पेशियलिटी चिकित्सा सुविधाओं के लिए रिम्स की स्थापना पर जोर दे रही है. जबकि राजस्थान के एक बड़े भाग यानी आदिवासी अंचल में डॉक्टर की कमी को पूरा करने की बजाय उसे सुनिश्चित किए जाने के लिए उठाए जाने वाले कदम पीछे खींच रही है.

क्यों जरूरी है आदिवासी क्षेत्रों में अलाउंस

पिछले साल दिसंबर के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित मंगलागिरी एम्स के पहले दीक्षांत समारोह में कहा था कि युवा डॉक्टरों को ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में सेवा करनी चाहिए. उन्होंने युवा डॉक्टरों से ग्रामीण, आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में सेवा करने को प्राथमिकता देने और समावेशी स्वास्थ्य सेवा में योगदान देने का आग्रह कोई था.

आदिवासी क्षेत्रों में हेल्थकेयर सुविधाओं पर अलग से ध्यान देने पर इसलिए भी जोर दिया जाता है, क्योंकि –

  • आदिवासी समुदायों में स्वास्थ्य सेवाओं के क्रियान्वयन में कमी है. विशेषकर प्रतापगढ़ और बांसवाड़ा जैसे जिलों में कुपोषण एक गंभीर समस्या है, जिससे मातृ मृत्यु दर अधिक है. खराब सड़कें और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच की कमी स्वास्थ्य सेवाओं के पहुँच में बाधा डालती है.
  • सभी आदिवासी बहुल जिलों, जिनका समग्र स्वास्थ्य सूचकांक राज्य औसत से कम है, उन जिलों को उच्च प्राथमिकता वाले जिलों (एचपीडी) के रूप में चिन्हित किया गया है.
  • नियम के मुताबिक, इन जिलों को एनएचएम के तहत राज्य के अन्य जिलों की तुलना में प्रति व्यक्ति अधिक संसाधन प्राप्त होते हैं. इसी के चलते इन जिलों को प्रति व्यक्ति अधिक धनराशि प्राप्त होती है.

आदिवासी क्षेत्रों में हेल्थकेयर में हालात बयां करते हैं ये आंकड़े

  • प्रदेश के 9 आदिवासी जिलों के 10,746 लोगों को सिकलसेल बीमारी है. यह रोग इतना खतरनाक होता है कि खून में हिमोग्लोबिन का स्तर बढ़ने नहीं देता और शरीर के अंगों को धीरे-धीरे बहुत कमजोर कर देता है. इसी साल की रिपोर्ट के मुताबिक, एक साल से चल रहे सर्वे में राजसमंद, चितौड़गढ़, पाली, सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, बारां व उदयपुर जिलों में 2980 लोग पॉजिटिव मिले हैं और 7,766 लोगों में इसके प्रारंभिक लक्षण हैं.
  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार राजस्थान में केवल 55% महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल मिल पाती है. आदिवासी बहुल जिलों में तो यह आंकड़ा और भी कम है. इसके कई कारण हैं और इनमें गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया न होना, साक्षरता की कमी, स्वास्थ्य देखभाल और पोषण के बारे में सीमित जानकारी और खराब आहार जैसी चीजें इसमें शामिल हैं.
  • इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली (EPW) में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, आदिवासी महिलाओं में स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति सामान्य आबादी की तुलना में खराब है और इसका कारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) जैसी महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं की उनकी सीमित पहुंच है.

एजुकेशन को इतिहास के विवाद निकालिए और भविष्य के लिए सोचिए, डिजिटल शिक्षा में राजस्थान क्यों पिछड़ रहा है?

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राजस्थान में जब भी शिक्षा के स्तर को सुधारने की बात आती है तो हम सिलेबस और उसके इतिहास के विवाद में उलझ जाते हैं. बेशक, इतिहास के तथ्यों से छेड़छाड़ पर बात होनी चाहिए और सिलेबस को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए. लेकिन, जब हम एआई के युग की बात कर रहे हैं तो इस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सरकारी स्कूलों में डिजिटल शिक्षा की स्थिति आज भी गंभीर चुनौतियों से गुजर रही है. शिक्षा मंत्रालय की ताजा UDISE+ 2024-25 रिपोर्ट के मुताबिक, जहां राज्य के निजी स्कूलों में 83% से अधिक कंप्यूटर, 84% से अधिक इंटरनेट और 95.8% बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहीं सरकारी स्कूल इन्हीं सुविधाओं के मामले में काफी पीछे हैं- यहां केवल 39.7% कंप्यूटर, 64.5% इंटरनेट और 90.9% बिजली की उपलब्धता है. सरकारी स्कूलों के लिए लाइब्रेरी में भी यह आंकड़ा 83.6% है. इससे साफ है कि शहरी-ग्रामीण, सरकारी-निजी और आर्थिक-तकनीकी आधार पर एक बड़ा अंतर मौजूद है. राजस्थान का एजुकेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर बीते कुछ वर्षों में डिजिटल परिवर्तन, स्मार्ट क्लासरूम और ICT प्रयोगशालाओं जैसी योजनाओं से जरूर जुड़ा है. राज्य सरकार को इस दिशा में हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से प्रदेश के लिए लगभग 3,900 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता की मंजूरी भी मिली है. इस राशि से 3,834 स्मार्ट क्लासरूम, 2,657 ICT प्रयोगशालाएं और 2,256 साइंस लैब स्थापित होंगी. सिर्फ बजट-योजनाओं से कुछ नहीं होगा राज्य की अधिकांश सरकारी स्कूलों में आज भी शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता, इंटरनेट स्पीड, और स्थानीय भाषा में सामाग्री की कमी महसूस की जाती है. राज्य में कई बच्चे ऐसे क्षेत्र में हैं, जहां बिजली और इंटरनेट कनेक्टिविटी अब भी अनियमित है. डिजिटल ग्रासरूट तक पहुंच न होने के कारण शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ा फर्क दिखता है. ऐसे वक्त में केरल का मॉडल एक लर्निंग हो सकता है. केरल भारत का पहला पूर्ण डिजिटल साक्षर राज्य बन गया है. केरल में शिक्षा विभाग के तहत ‘केरल इंफ्रास्ट्रक्चर एंड टेक्नोलॉजी फॉर एजुकेशन’ (KITE) ने स्कूल स्तर पर AI, रोबोटिक्स, गेमिंग, विजुअल इफेक्ट्स, एनीमेशन, फैक्ट-चेकिंग, संगीत, डिजिटल कला जैसी तकनीकी कोर किताबें तैयार की हैं. तीसरी कक्षा से ही छात्र कंप्यूटर और डिजिटल एप्लीकेशन के साथ सीखना शुरू करते हैं. हर पंचायत स्तर पर होना चाहिए डिजिटल साक्षरता केंद्र केरल सरकार ने हर स्कूल में हाईटेक लैब, डिजिटल बोर्ड, एक्सआर (Extended Reality) और एवीजीसी (एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग, कॉमिक्स) को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया है. गांव-शहर की खाई बहुत हद तक कम हो गई है. पंचायत स्तर पर डिजिटल साक्षरता केंद्र बने हैं और राज्य का हर बच्चा कंप्यूटर, स्मार्टफोन और ऑनलाइन सेवाओं के इस्तेमाल में पारंगत हो रहा है. क्या राजस्थान को भी यही मॉडल अपनाना चाहिए? – राजस्थान में डिजिटल शिक्षा को मजबूत करने के लिए सिर्फ स्मार्ट क्लासरूम या नई किताबें ही काफी नहीं. – बल्कि राज्य के हर कोने तक कनेक्टिविटी, स्थानीय बोली और जरूरत के हिसाब से कंटेंट, हर वर्ग तक प्रशिक्षण, और समाज-प्रशासन का साझा सहयोग चाहिए. – राज्य सरकार को चाहिए कि अब सिर्फ ICT लैब या क्लासरूम नहीं, बल्कि केरल की तरह संशोधित ICT किताबें, डिजिटल आर्ट, म्यूजिक, एनीमेशन, और व्यावहारिक AI जैसी पहल को भी प्राथमिकता दे. – शिक्षकों के लिए लगातार ट्रेनिंग, शिक्षा में तकनीकी विशेषज्ञों की नियुक्ति, हर जिले में मॉड्यूलर डिजिटल हब और पंचायत स्तर पर सामुदायिक साक्षरता अभियान चलाने की जरूरत है. – साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त हिस्सेदारी, बजट का सही उपयोग, और सामुदायिक जागरूकता को भी मजबूत किया जाना चाहिए. भारत का IT उद्योग 350 अरब डॉलर की ओर से बढ़ रहा, हमें भी कदमताल करना होगा आज जब भारत का आईटी उद्योग 350 अरब डॉलर की ओर बढ़ रहा है, डेटा सेंटर बाजार 10 अरब डॉलर पहुंचने वाला है, एआई के कारण आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी हो रही है, तो राजस्थान जैसे राज्य को भी शिक्षा के माध्यम से डिजिटल भारत की कहानी में अपना नाम प्रमुखता से दर्ज कराना चाहिए. किसी भी राज्य के लिए डिजिटल शिक्षा क्षेत्र में केरल का मॉडल नई उम्मीद और प्रेरणा है. जरूरत है उसे अपने संदर्भ में ढालकर रफ्तार देने की. ताकि न केवल राज्य, बल्कि देश के हर कोने के बच्चे भविष्य की अर्थव्यवस्था, नौकरियों और समाज के लिए तैयार हो सकें.

क्या क्रेडिट लेने की भेंट चढ़ रही ‘मनरेगा’ योजना ? राजस्थान में कौन ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे बड़ी रोज़गार स्कीम को धीमी मौत मार रहा है?

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साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, तब संसद में उन्होंने अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा था कि मेरे विरोधी चाहे मेरा जितना भी विरोध करते हों, लेकिन मेरी राजनीतिक सूझबूझ के तो वो क़ायल होंगे ही, और इसी लिए वो मनरेगा योजना को बंद नहीं करेंगे, ताकि लोगों को पता चल सके की कांग्रेस की यह कितनी बड़ी विफलता थी. वो अलग बात है कि मनरेगा आज भी जारी है, लेकिन उसकी हालत अन्य सरकारी योजनाओं की तरह जंग खा चुकी है. क्या ऐसा यूं ही हो गया या जानबूझ कर किया गया? यह सवाल बार-बार उठता रहता है.
मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी क़ानून, साल 2005 में शुरू किया गया था। इसके तहत हर ग्रामीण परिवार को, अगर वे मेहनत वाला साधारण काम करने को तैयार हों, तो साल में 100 दिन तक मज़दूरी करने का हक़ मिलता है। इसका मक़सद गाँव के लोगों की रोज़ी-रोटी सुरक्षित करना और गाँव में टिकाऊ काम जैसे सड़क, तालाब, नाली वगैरह बनाना था।
राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो इसमें दिन प्रतिदिन गिरावट ही आ रही है. ग्रामीण विकास मंत्रालय के खुद के आंकड़ें बताते हैं कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के जून तक राजस्थान में सिर्फ़ 9.71 करोड़ मानव-दिवस ही सृजित हो पाए, जो पिछले साल इसी अवधि में बने 13.99 करोड़ मानव-दिवस की तुलना में काफ़ी कम है।

तो क्या लोग अब नरेगा में काम नहीं करना चाहते? क्योंकि काम के दिनों में कमी तो ऐसा ही इशारा करती है. लेकिन ऐसा भी नहीं है. ग्रामीण अंचलों में आज भी लोग काम की डिमांड कर रहे हैं. लिबटेक इंडिया की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि वित्तीय साल 2024-25 में काम के लिए पंजीकरण करवाने वाले परिवार की तादाद में 8.6 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई, लेकिन काम के दिनों में 15.9 फ़ीसदी की कमी आ गई। अफ़सोस की बात है कि राज्य में सिर्फ़ करीब 7 फ़ीसदी परिवार ही साल के 100 दिन का काम पा सके, जबकि क़ानून के हिसाब से हर परिवार को 100 दिन के काम की गारंटी है. इससे साफ़ झलकता है कि काग़ज़ पर दिए गए अधिकार और ज़मीन पर मिलने वाले काम में बड़ा फ़ासला है।

और यह भी सच है कि जब सरकार किसी योजना के दांत तोड़ना चाहती है तो सबसे पहले उसका प्रहार बजट पर होता है. और यही हुआ. सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए स्वीकृत लेबर बजट सिर्फ 12.5 करोड़ पर छोड़ दिया जबकि पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 की शुरूआती महीनों से भी काम है. पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 में पूरे वित्तीय वर्ष के अंत तक लेबर बजट 27 करोड़ था। जिसे इस साल आधे से भी कम कर दिया गया.
मज़दूरों के लिए काम करने वाले संगठन तो यह भी आरोप लगाते हैं कि इतना बजट कम करने के बाद भी, जो बजट स्वीकृत किया जाता है, उसमें से भी 60 फीसदी तो खर्च ही नहीं होता। गांवों से यह शिकायतें खूब आती हैं कि न तो वक़्त पर मज़दूरों को उनका पेमेंट मिलता है और न ही काम तय है. गांव के सचिव से जब पेमेंट की मांग की जाती है तो वो कहते नज़र आते हैं कि ‘बजट नहीं है’.
सवाल यह है कि जब बेरोज़गारी की दर प्रदेश में बढ़ रही है. राजस्थान सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी दर वाले राज्यों में शुमार है, तब भी सरकार लोगों को रोज़गार देने में इतनी लापरवाही क्यों कर रही है? ग्रामीण इलाकों में रोज़गार की यह सबसे बड़ी स्कीम क्या ‘राजनीतिक क्रेडिट’ की लड़ाई की भेंट चढ़ जायेगी? यह वो सवाल हैं जो आज भी जवाब मांग रहे हैं.